Sunday, December 17, 2017

झींगुर



( सत्‍यव्रत की यह टिप्‍पणी 'आह्वान' में बीस वर्षों पहले निकली थी जब वह पाक्षिक के रूप में प्रकाशित हुआ करता था। यह रचना आज उससमय से भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत होती है। मित्र इसे पढ़ें और आनंद लें। )

--सत्‍यव्रत

यह प्राणी जितना अधिक तुच्‍छ है, उतना अधिक शोर मचाता है। अनवरत लम्‍बे समय तक चीखना इसकी जीवनचर्या का एक अनिवार्य अंग है। चीखना इसकी आदत है, जिसका कोई उद्देश्‍य नहीं होता। जो सिर्फ किसी उद्देश्‍य से ही चीखते हैं और सिर्फ चीखने तक ही सीमित नहीं रहते, उन्‍हें यह अतिवादी, अराजकतावादी तथा दर्शन, विचार और कला का द्रोही मानता है।
शाम ढलती है। साहसी कीड़ों के लिए रोमांचक अभियानों से युक्‍त दिन भर का एक कठिन संग्राम समाप्‍त होता है। अनगिनत इसमें खेत रहते हैं, ज्‍यादातर घायल होकर अपनी माँदों में वापस लौटते हैं और थके-माँदे योद्धा जल्‍दी ही झपकियाँ लेने लगते हैं। अँधेरे की चादर इन सबको ढँक लेती है। और फिर निशाचर कीड़ों की एक पूरी दुनिया सक्रिय हो उठती है। ये निशाचर घायल और थके-माँदे कीड़ों पर घात लगाकर हमले करते हैं, रणभूमि में लाशें घसीटते हैं, उन्‍मादी खुशी में चीखते और नाचते-गाते हैं।
जब शाम ढलती है, तब घरों के अँधेरे कोनों में, बाहर झाड़-झंखाड़ों के बीच, बगीचों में या खेतों की मेड़ों में बनाये गये अपने बिल के ठीक बाहर थोड़ी सी जगह बनाकर, यह कहना बेहतर होगा कि अपने घर की चौकठ पर बैठकर, झींगुर अप्रिय, कर्कश स्‍वर में चीखना शुरू करता है ... किर्रर्रर्रर्र...
यूँ वह अपने को बहुत अच्‍छा गायक या ओजस्‍वी वक्‍ता मात्र ही नहीं मानता, बल्कि यह भी दावा करता है कि वही सामवेद का रचयिता है, वही शास्‍त्रार्थों की परम्‍परा का प्रणेता है और प्राचीन रोमन सांसदों ने भी वक्‍तृता कला उसी से सीखी थी। आत्‍मसम्‍मोहन में वह नारद मुनि और नॉर्सिसस को भी मात देता है। अपने रूप पर, अपनी मेधा पर, अपनी सर्जनात्‍मकता और अपनी वक्‍तृता पर वह सदा-सर्वदा मुग्‍ध रहता है। हर आलोचना उसे असहनीय है। हर सुझाव उसके लिए उपेक्षणीय है।
झींगुर बहुत बोलता है और लगातार बोलता है। मगर वह तभी तक बोलता है जबतक कहीं से ख़तरे की कोई आहट नहीं आती, पैरों की कोई धमक नहीं सुनाई देती। तबतक वह अपने गले को अपने शरीर के बराबर तक फुलाकर चीखता है, जिसे वह ''प्रचण्‍ड गर्जन'' कहना अधिक पसन्‍द करता है। पर जैसे ही पदचाप या अन्‍य कोई आवाज निकट आती प्रतीत होती है, वह पलक झपकते ही 'सुट्ट' से अपने बिल में, एकदम भीतर घुस जाता है और फिर बिल के मुँह की ओर अपनी आँखों और कानों को साधे हुए संभावित ख़तरे के टलने की प्रतीक्षा करने लगता है। कहा जाता है कि जीवन भर झींगुर अपने कानों का इस्‍तेमाल केवल ख़तरों की आहट भाँपने के लिए ही करता है, आलोचना, सुझाव या प्रतिवाद सुनने के लिए कदापि नहीं। यह भी कहा जाता है कि अपनी आँखों का इस्‍तेमाल वह सिर्फ उचित अवसर की ताक में रहने के लिए करता है। यह काम वह जितने सुन्‍दर ढंग से करता है, अपनी सौन्‍दर्य-दृष्टि को उतना ही उदात्‍त मानता है। कला-साहित्‍य-संस्‍कृति के बाज़ार के चढ़ावों-उतारों पर उसकी नज़र हमेशा टिकी रह सकती है। बाज़ार की माँग पर आज वह एक क्रान्तिकारी गीत गा सकता है और अगले ही दिन, नई माँग पर 'कविता की वापसी' का नारा लगा सकता है या फिर अपनी ''बुलंद'' आवाज़ में अपनी घर की दहलीज पर खड़े होकर, जिसे वह लाल किले की प्राचीर से एक सेण्‍टीमीटर कम नहीं मानता, 'कविता के अन्‍त' की घोषणा कर सकता है और फिर यह मुनादी कर सकता है कि वाम या दक्षिण नहीं, कविता सिर्फ सुन्‍दर, मानवीय और अच्‍छी होनी चाहिए।
झींगुर की नैसर्गिक आदत को देखते हुए इधर सरकार ने उसके लिए राजधानी में और पूरे देश में ऐसी 'स्‍पेशल' सुरक्षित बिलों का निर्माण कराया है जहाँ वे पैरों की धमक या किसी आहट से भयभीत हुए बगै़र, सुरक्षापूर्वक लगातार बोलते रह सकें। ध्‍यान रहे कि बोलने के अतिरिक्‍त झींगुर की दूसरी आदत और हावी निरन्‍तर गहन अध्‍ययन, शोध और चिन्‍तन है। अध्‍ययन-मनन झींगुर के लिए साध्‍य है, साधन नहीं। शोध-संस्‍थानों, अकादमियों या राजधानी के केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालयों में सरकार निर्मित 'स्‍पेशल' बिलों में झींगुर अनवरत अध्‍ययन- साधना, शोध-तपस्‍या और संगोष्‍ठी-शास्‍त्रार्थों में रत रहते हैं। वे सरकारी नीतियों के खिलाफ़ टिप्‍पणी करते रहते हैं, वे मानवाधिकार पर बोलते हैं, वे काले कानूनों के खिलाफ ज्ञापनों पर हस्‍ताक्षर करते हैं और सत्‍ता यूँ मुस्‍कुराती है जैसे अपने शरारती बच्‍चे की शैतानी पर पिता। झींगुरों के लिए ऐसे स्‍पेशल बिल के निर्माण के लिए इधर विदेशों से भारी मदद के साथ ही एक नयी 'पर्यावरण-प्रिय' नीति और तकनोलाजी भी मिली है। हज़ारों स्‍वयंसेवी संस्‍थाएँ सुदूरवर्ती गाँवों-देहातों तक में, ज्‍यादा से ज्‍यादा झींगुरानुकूल प्राकृतिक परिवेश में ऐसे बिलों को निर्माण कर रही हैं, जहाँ अपने 'सामाजिक कामों' से झींगुर समाज में इतना कुछ कर देने का दावा कर रहे हैं कि अब कष्‍टकारी क्रान्तियों की कोई ज़रूरत ही नहीं रह जायेगी। इन सुरक्षित बिलों के निवासी झींगुरों की सहस्‍त्राब्दियों पुरानी आदतें और प्रकृति बदल चुकी है अब ख़तरों की आहट भाँपकर वे बिलों के भीतर नहीं दुबकते। उनके लिए कोई भी आहट ख़तरे की आहट नहीं होती।
झींगुर की वक्‍तृता, अध्‍ययन और शोध के संगठन का धरातल आज अत्‍यधिक उन्‍नत है। वह लगातार सिम्‍पोजियम-कोलोकियम-सेमिनार-वर्कशाप और कान्‍फ्रेंसों में भूमि सम्‍बन्‍धों पर बोलता है, संस्‍कृति पर वक्‍तव्‍य देता है, संविधान और समाजवाद और ''समाजवादी बाज़ार'' की व्‍याख्‍या करता है। उसके शोधों-वक्‍तव्‍यों की पुस्‍तकों और रिपोर्टों के रिकार्डों के अम्‍बार लगते जाते हैं। फिर झींगुर उनको तसल्‍ली से चाटता है। इस तरह झींगुर एक स्‍वावलम्‍बी प्राणी है। अपना आहार वह खुद जुटाता है। पहले वह आकाशवाणी पर सिर्फ अपनी आवाज़ सुनता था। अब दूरदर्शन पर अपना चेहरा भी देखता है। उसकी नार्सिसस-ग्रंथि इससे लगातार बढ़ती जा रही है।
जीव शास्त्रियों को कहना है कि यह दुनिया का एक अतिप्राचीन प्राणी है। पर यह शुरू से एकदम वैसा ही नहीं है, जैसा कि आज है। इस‍का जो वर्तमान रूप आज हमारे सामने है उसका इतिहास उतना ही पुराना है जितना कुर्सी या सिंहासन का इतिहास। तभी से यह कुर्सियों के नीचे और पायों से चिपका पाया गया है। घरों में अँधेरे कोनों का जन्‍म भी तभी हुआ था। तभी से झींगुर ने न तो अपना 'सामा‍जिक कर्म' बदला है और न ही इसका चरित्र बदला है। झींगुर यदि अपने को अमर समझता है, तो इसके पर्याप्‍त कारण हैं। पर वह अमर नहीं है, ऐसा मानने के भी पर्याप्‍त कारण हैं।
झींगुर के साथ अनजाने ही आपका एक ख़ासतरह का रिश्‍ता बन जाता है । जब एक झींगुर आपके पास कहीं बोलना शुरू करता है तो आप चौंककर उधर आकृष्‍ट होते हैं। जबतक कुछ झींगुर बोलते रहते हैं, तबतक आपका ध्‍यान उधर होता है। फिर ढेरों झींगुर लगातार बोलने लगते हैं, और धीरे-धीरे आप इसके आदी हो जाते हैं। यहाँ झींगुर ही नहीं, बल्कि सत्‍ता आपसे जीत जाती है। झींगुरों का शोर आपकी चिन्‍तन प्रक्रिया का पार्श्‍व संगीत बन जाता है। यह ख़तरनाक है। आपको झींगुरों के शोर की आदत नहीं डालनी चाहिए।
झींगुर लगातार पुस्‍तकों के सफों के बीच खोया रहता है और आप यह सोचने लगते हैं कि किताबें पढ़ना सिर्फ झींगुरों का काम है। इस तरह झींगुर आपको ज्ञान की पूरी सम्‍पदा से वंचित करने का दुश्‍चक्र रचता है और आप इसके शिकार हो जाते हैं। यहाँ फिर झींगुर नहीं, बल्कि सत्‍ता आपसे जीत जाती है।
जीवनपर्यन्‍त झींगुर लगातार मोटी-मोटी किताबें पढ़ता रहता है और अक्‍सर इन्‍हीं के पन्‍नों के बीच दबा हुआ निर्वाण प्राप्‍त करता है। किताबों में ही उसकी कब्र बनती है। पुरानी मोटी-मोटी किताबों को पलटने पर झींगुरों के एकदम चिपटे, सूखे हुए, अर्से से पड़े हुए पार्थिव शरीर प्राय: मिल जाते हैं। कोई कामकाजू आदमी ज़रूरत की कोई जानकारी ढूँढता इन किताबों तक आता है, इनके सफों को पलटता है, झींगुर की पिचकी-चिपटी लाश में न तो वह पुरातत्‍ववेत्‍ता जैसी रुचि दिखाता है, न ही उसकी मृत्‍यु पर एक सेकेण्‍ड का भी शोक मनाता है। वह तर्जनी से पन्‍ने पर चिपके झींगुर के शरीर को खुरचता है, फूँक मारकर दूर उड़ा देता है और फिर पन्‍ने पलटता आगे बढ़ जाता है।

Wednesday, December 13, 2017


... सबसे असहनीय नहीं है पराजय
और न लोगों से भला-बुरा सुनना
और न प्रतिक्रिया के प्रेतों का श्मशान-नृत्य I
सबसे असहनीय शायद यह है कि
बौनों की अदालत में
वाचाल बौने जिरह कर रहे हैं,
जूरी के आदरणीय अनुभवी बौनों से
मशविरा कर रहे हैं विद्वान बौने न्यायमूर्ति,
और मुक़र्रर की जा रही है
वीरोचित व्यवहार के लिए
माक़ूल सज़ा I

-- शशि प्रकाश
(20 जनवरी,2003)
('सबसे असहनीय' कविता का एक अंश, 'कोहेकाफ़ पर संगीत-साधना' कविता संकलन से)



तर्कणा हमेशा मौजूद रही है, लेकिन हमेशा तर्कसंगत रूप में नहीं।
-- कार्ल मार्क्स


स्वप्न

एक दिन अचानक
दहक उठेंगे पर्वत
सदियों के सोये संकल्प जागेंगे
विस्मृति के अँधेरे से
बाहर आ जायेंगी अजेय आत्माएँ
मुक्त होंगी कल्पनाएँ
सृजन के अग्निपक्षी निर्बन्ध
उड़ेंगे उन्मुक्त आकाश में.

(जुलाई, 1995)

-- शशि प्रकाश

Sunday, December 10, 2017



ज़िन्दगी हमारे सामने जो सवाल उपस्थित करती है, वे ठोस भौतिक यथार्थ से उपजे होते हैं I इन्हीं सवालों का हल ढूँढ़ने के लिए हम दार्शनिक अमूर्तन में जाते हैं I

दार्शनिक अमूर्तन हमें 'इंट्यूशन' से आगे एक 'हाइपोथीसिस' तक और समाधान की आम दिशा तक ले जाते हैं I फिर उस दिशा में हमें आगे बढ़ना होता है, ज़िन्दगी के ठोस यथार्थ की ज़मीन पर और बोध से निर्मित अपनी धारणा का सत्यापन और परिशोधन करना होता है I

दार्शनिक अमूर्तन निमित्त है, लक्ष्य नहीं -- साधन है, साध्य नहीं I जीवन का लक्ष्य अंततोगत्वा जीवन को बेहतर और सुन्दर बनाना ही हो सकता है I और यह काम कोई महानायक नहीं बल्कि जन समुदाय की सामूहिक मेधा करती है Iजो जीवन की बुनियादी शर्तों का निर्माण करते हैं, वही जीवन के भौतिक और आत्मिक सौंदर्य को निखारने की सृजनात्मक क्षमता रखते हैं I नायक और नेता, जो इसी समाज के बेटे और उन्नत तत्व होते हैं, वे उपरोक्त ऐतिहासिक-सामाजिक उद्यम में नेतृत्व देने का काम करते हैं I