Monday, February 19, 2018




देख लो भाई, हमसे परिचय करो तो हमारी आत्मा तक पहुँचने की कोशिश करो। हमारे विचार और हमारी प्रतिबद्धता ही हमारी आत्मा है।
हमसे दोस्ती के बारे में सोचने के पहले देख लो, तुम्हारे पास एक कवि का दिल, एक योद्धा का साहस और एक विचारक का विवेक है या नहीं !
हमें सिर्फ हमारे अतीत से ही नहीं, भविष्य की योजनाओं से भी परिभाषित करो, हमें हमारी हारों से ही नहीं, युद्ध में फिर भी डटे रहने के हमारे संकल्पों से भी आंको !
संदेह करते हो ? इन्तज़ार करो ! कुछ दशकों बाद भी यहीं मिलेंगे, युद्ध के मैदान में, पुराने शरीर और नयी आत्मा के साथ, झुर्रियों के अनुभव और पोपली हँसी की शिशुता के साथ, पुराने अनुभवों से जन्मी नयी सोच के साथ !

(18फरवरी,2018)



कोई तानाशाह यदि योग्य और शक्तिशाली भी हो, तब भी भय और असुरक्षा-बोध से ग्रस्त रहता है। चमचों और अंध-भक्तों की भीड़ में भी वह अकेला होता है, लगातार लोगों पर संदेह करता रहता है और बचाव और हमले की युक्तियाँ तथा षडयंत्रकारी चालें सोचता रहता है I तानाशाह किसी पर भी भरोसा नहीं करता, अपने ख़ास लोगों पर भी नहीं। और तानाशाह यदि अयोग्य हुआ तो स्थिति और अधिक बदतर होती है। हर निरंकुश या तानाशाह प्रवृत्ति का व्यक्ति किसी हद तक मनोरोगी होता है।
तानाशाह अक्सर अपने भरोसे के लोगों के षडयंत्र का ही शिकार होता है I मगर तब तानाशाह की जगह कोई तानाशाह ही लेता है। तानाशाही की किसी भी व्यवस्था का ताबूत क़ब्र में तो जन-शक्ति ही उतारती है I
जिन समाजों के ताने-बाने में जनवादी मूल्य नहीं होते और जिनमें जनवादी संस्थाएं कमजोर होती हैं, वहाँ तानाशाह, निरंकुश और स्वेच्छाचारी प्रवृत्ति के लोग बहुत पाए जाते हैं I ऐसे समाजों में उम्र, ज्ञान, पद और हैसियत की तानाशाहियाँ खूब चलती हैं। ज्यादातर लोग इनके आदी होते हैं और अपने से कमतर पर तानाशाही करने के मौके तलाशते रहते है।
ऐसे किसी उत्तर-औपनिवेशिक पिछड़े समाज में, जैसेकि भारत में, पूंजीवादी संकट से जब फासिस्ट उभार पैदा हो रहा है, तो उसकी अगुवाई करने के लिए तानाशाह और निरंकुश प्रवृत्ति के लोग थोक भाव से उपलब्ध हैं I आज के दिवालिया, संकटग्रस्त पूंजीवाद की आत्मिक वंचना यह है कि उसे बुर्जुआ जनवाद की रामनामी चादर ओढ़े जो तानाशाह भी मिल रहे हैं वे हास्यास्पद हदों तक घामड़ और कुसंस्कृत हैं I आज के अमेरिका को ट्रम्प से काम चलाना पड़ रहा है तो भगवा भगत फासिस्टों में से जो थोड़े पढ़े-लिखे या थोडा-बहुत भी सभ्य हैं, उन्हें नरेन्द्र मोदी को एक शर्मिन्दगी की तरह झेलना पड़ रहा है।
(18फरवरी,2018)



आजकल, सामाजिक-राजनीतिक संकटों के घटाटोप से अछूती, परिवेश-विच्छिन्न, फागुन और बसंत से आक्रान्त, "अलौकिक", "निष्कलुष", आत्मलीन, आत्ममुग्ध, शीरे जैसी चिपचिपी प्रेम कविताओं का सोशल मीडिया पर और आयोजनों में धकापेल देख-देखकर कुछ-कुछ उबकाई जैसी फीलिंग आ रही है। कवियो-कवयित्रियो, प्रेम की ऐसी गंगा बहाओ, उसमें ऐसी बाढ़ ला दो कि उसमें सड़कों पर हो रही सारी नृशंस बर्बरताएँ, सारे दंगे-फसाद, पुलिस उत्पीड़न और एनकाउंटर की सारी घटनाएँ, सारे घपले-घोटाले, मँहगाई-बेरोज़गारी जैसी सारी समस्याएँ एक साथ तिनकों के समान बह जाएँ। लानत है !!

(18 फरवरी,2018)

Friday, February 16, 2018

#हमारेसमयमें




(एक)

मरी हुई आत्माएँ
ज़िंदगी की
नई-नई व्याख्याएँ कर रही हैं ।





(दो)

नाउम्मीद लोग
उम्मीदों पर
विमर्श कर रहे हैं !





(तीन)

कवियों की प्रगतिशीलता
इनदिनों
ज़िंदगी का मर्सिया गा रही है ।




(चार)

"मार्क्सवादी" आलोचक
ओशो और कृष्णमूर्ति से सीखकर
अपनी दृष्टि पैनी कर रहे हैं !




(पांंच)


अनुभववाद का फलित ज्योतिष
मार्क्सवाद का
भविष्यफल बाँच रहा है ।




(छ:)

'सार्वजनिक सुविधा' का बोर्ड लगी जगहें
भयंकर गंदी और असुविधाजनक होती हैं
पर मजबूरी में उनका इस्तेमाल करना ही पड़ता है ।
***
सोशल मीडिया पर साहित्यिक वाद-विवाद का स्पेस
बस अड्डे की वह जगह है
जहां 'सार्वजनिक सुविधा' का बोर्ड लगा है ।



(सात)

कुछ कुपितविवेकी बूढ़े और युवा
मुक्तिबोध की कविताओं की फैंटेसी और "जटिलता" से
क्रुद्ध होकर कह रहे हैं कि
मुक्तिबोध ने हिन्दी काव्य-परंपरा का बहुत नुकसान किया ।
वे मुक्तिबोध की तुंग प्रतिमा गिराकर तोड़ देना चाहते हैं ।
उनका कहना है कि प्रगतिशील कविता में
किसान-मजदूर और प्रकृति-- इन तीन चीजों के ब्योरे होने चाहिए
और सबसे बड़ी बात यह कि वह एकदम सरल होनी चाहिए
एकदम आम लोगों के समझ में आने लायक ,
एकदम उनके जैसी भाषा में ।
ऐसी कविता लिख पाना तो बेहद कठिन है , काफी अभ्यास करना होगा ,
सो मैंने अभी से शुरू कर दिया है ।
मेरे अभ्यास-पुस्तिका की पहली कोशिश
प्रस्तुत है :
' लखन उधर चल
नहर पर टहल
बतख मत पकड़
बरतन सर पर रख
झटपट घर चल
खटपट मत कर '



(आठ)

वास्तविक बर्बरता का
प्रतीकात्मक विरोध ?
क्या बर्बरता के ज़मीर को
जगाया जा सकता है ?

(15जुलाई,2017)



संविधान में
संविधान को
संविधानसम्मत ढंग से
ताक पर रख देने के
सारे प्रावधान मौजूद हैं ।

(15जुलाई, 2017)