Wednesday, October 17, 2018

ए भाई सुभचिन्तक लोगन !


ए भाई सुभचिन्तक लोगन ! गूह क हलुवा हम नाहीं कहि सकित हैं ! एतना कडुआ ज़माना में हमके मिठबोलवा होवे के राय न देव ! हमार त भाई ईहे उसूल हौ कि अवसरबाद को अवसरबाद कहौ, कायरता को कायरता कहौ, हरामी को हरामी कहौ, कुत्ता को कुत्ता कहौ आ फासिस्ट को फासिस्ट कहौ ! हमरे जुबान को तो नीम, करेला आउर मिरचा का मिक्सचर ही भावत हौ I तोका मीठ-मीठ बोलके वजीफा-इनाम पावे के हौ तो जाव, मालिक लोग रसगुल्ला खा के कटोरी में जौन चासनी छोड़िन हैं, ओका सुडुप से पी जाव आ कटोरी चाटि जाव !

... ... हाँ नहीं तो ! राय दे-दे के अकराय मारिन हैं !

(17अक्‍टूबर,2018)


तुम जहाँपर हो, अगर उसे पसंद नहीं करते तो वहाँ से दूर हट जाओ ! आखिरकार, तुम एक पेड़ थोड़े ही हो !
(15अक्‍टूबर,2018)

Tuesday, October 16, 2018


हिन्दी साहित्य में रीतिकाल बीता, छायाबाद बीता, नवगीत का रोमानी मौसम भी कबहूँ का चला गया, बाकिर केतना-केतना कबी-लेखक-सम्पादक लोगिन का बेवहार में अबहिनों रीतियेकाल जारी है I लेखिका-कबित्री अगर औरत जात से हुई त उनका छाया परते मौसमे बदल जाता है, एकदम मधुमासे त आ जाता है ! ऊ धाय के आता है आ सम्पादक/लेखक/कबीजी के अंखिये में ढुक जाता है, उमिर का कवनो तकाजा भी नहीं देखता मुँहझौंसा ! अब प्रातःस्मरनीय रजिंदर जादवजी तो रहे नहीं, मगर बहुते तजुरबाकार लोग हैं जो चाहें त इस बाबत बहुत कुछ बता सकित हैं I मगर आपन माटी पलीत कवन कराएगा ?

अब हमको ई उमीद त एकदम्मे नाहीं है कि हिन्दी क कवनो लेखिका-कबित्री 'मीटू-वीटू' में मुँह खोलेगी I पानी में रहके मगर से दुश्मनी ? ना भाइ ना, करियर का सवाल है ! छपना, आलोचना-समिच्छा करवाना, इनाम-वजीफा पाना --- सबकुछ खटाई में न पड़ जाएगा ! हँ, कुछ अइसन भी होइंत हैं जो तुरंते पूजा-पाठ करके निपटाय देंइत हैं I अब ई बात दीगर है कि अइसन जोखिम लेवे वालिन कम्मे हैं, बहुते कम हैं !

हँ, आप सभे तो सुनहीं-देखहीं रहे होंगे, ऊ दिल्ली इउनिभारसीटी वाले प्रोफ़ेसर साहिब जो बामपंथी आलोचक हुआ करित थे आउर आपन सोध-छात्रा को पोंछिया के ओका जिनगी नरक कर दिहिस रहे, ऊ फेर से बिभिन्न आयोजन का नेवता पा रहिन हैं आ मंच सुसोभित कर रहिन हैं ! बाकिर दिल्ली आ दूसर सब महानगर के जानकार त जानिबे करत हैं कि नयकी पीढी के बामपंथियन में भी केतना सब लम्पट-छिछोर लाल गमछा लपेट के घूम रहा है !

(15अक्‍टूबर,2018)

Monday, October 15, 2018


आरे भाई ! हमको ई बतिया एकदम नाहीं बुझाता है कि कुछ बहिनी लोग फेसबुकवा पर एतना चोन्हराती, अगराती काहें हैं, एतना चोना-मोना काहें करती हैं I आधुनिकता आउर फेमिनिजम का साथ ई सब आउटडेटेड टाइप अदा का कवनो तालमेल भी त नाहीं बईठता है ! कुछ बहिनी लोग त दोस्ती-पियार वगैरा का एतना इमोसनल सारबजनिक इजहार करती हैं कि पूछो मत ! जब दुई लोगन क बीच के भावना क बहुत ज्यादा परदर्सन होय तो हमको तो इहे लागत हय कि रियल्टी कम आ डिरामा जियादा होत है ! एलियनेसन, अवसाद आ अकेलापन का सिकार लोग पियार तो ना कर पाता है, न पा पाता है, बस पबलिक में थोर-बहुत डिरामा करके जिया को तसल्ली दे लेता है !

(13अक्टूबर, 2018)

Saturday, October 13, 2018

me too...



काश ! 'Me Too' मुहिम में काम वाली बाइयों, नर्सों-मिडवाइफों, कारखानों-खेतों में काम करने वाली मज़दूर औरतों और आम घरेलू औरतों की भी आवाज़ सुनाई देती ! काश घरों में होने वाले यौन-उत्पीड़न के बारे में भी आम घरों की औरतें खुलकर कुछ बोलतीं !

यह एक काल्पनिक स्थिति है, पर सोचिये कैसा तूफ़ान उठता और कैसा आनंद आता ! हमारी "गौरवशाली" भारतीय संस्कृति के तो परखचे ही उड़ जाते और मर्यादा और नैतिकता के तमाम पहरेदार, पण्डित-पुरोहित और मुल्ले, संघी और मुसंघी श्मशान में भटकते कुत्तों और सियारों की तरह आसमान की ओर मुँह उठाकर रोने लगते !

(13अक्‍टूबर,2018)


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काल्हि एगो बहिनी कहीं कि तुम्हरे पास भी तो कवनो अइसा अनुभव होगा कि 'मी टू' में बयान करके एकाध सरीफ बदमास का चेहरा से सराफत का नकाब नोच सको !
हम बोलीं कि बहिनी, हम तो तुरंते हिसाब-किताब साफ़ कर लेंइंत हैं ! आठ-दस बरिस तो दूर, आठ-दस महीना भी बकाया-उधार नाहीं राखित हैं ! हम कहित हैं, तुरंते मुँहवे नोच लो, आठ-दस बारिस बाद नकाब नोचने का जरूरते नाहीं पड़ेगा I जो पिछवाड़ा सहलाने का कोसिस करे ओका पिछवाड़ा मार जुत्ता लाल कर देव , लार टपकाय के ताके तो अँखिये कोंच देव I मतलब ई कि तुरंते निपट लेव -- देन एंड देयर... काहे का उधार-पाइंच ! एक बार की बाति है कि एक ठो बुद्धीजीबी अंकलजी बोले कि हमका तुमसे कुछ बिसेस भावनात्मक हो गया है ! हम अगलहीं दिन उनका घरे जाके आंटीजी को बता दीं कि आंटीजी, आपका भविस्य तो गया चूल्हा-भाड़ में, काहेसेकि अंकलजी को हमसे कुछ-कुछ होने लगा है ! बस, हमरा काम घरे में आंटिएजी के हाथ संपन्न हो गया ! अब बड़े-बुजुर्ग का कुछ तो ख़याल राखना होता है न !
(13अक्‍टूबर,2018)






Friday, October 12, 2018

me too...

भाई, महानगर की और सोशल मीडिया की और एन.जी.ओ. जगत की नारीवादी वीरांगनाएँ बुरा न मानें ! मैं me too मुहिम की विरोधी नहीं हूँ ! पर जिन लोगों को लग रहा है कि स्त्रियाँ अगर अपने विरुद्ध होने वाले किसी यौन अपराध के विरुद्ध चुप्पी तोड़कर बोलने लगेगीं तो सबकुछ ठीक हो जाएगा, वे भारी मुगालते में जी रही हैं !
पहली बात, यह एक अच्छा कदम है, पर यह प्रतिरोध की शुरुआत भी नहीं है, भूमिका मात्र है ! बेशक उस संकोच भरी चुप्पी को तोड़ देना होगा जिसका लम्पट "शरीफजादे" लाभ उठाते हैं ! पर यह भी तो सोचिये, कार्यस्थलों पर नियमित अनेक रूपों में होने वाले यौन-उत्पीड़न के विरुद्ध मज़दूर औरतें अगर आवाज़ उठाती भी हैं तो उनकी कोई सुनवाई नहीं होती और कोई फर्क नहीं पड़ता ! सोशल मीडिया के स्पेस में उन आवाजों का कोई हिस्सा नहीं होता। यानी, me too का कुलीनतावादी संकरा दायरा तो बनता ही है। दूसरी बात, प्रतिरोध के इस फॉर्म की सीमाओं को न समझा जाये, तो यह भी एक चौंक-चमत्कार भरा प्रतीकवाद ही बनकर रह जाएगा।
me too मुहिम की भारतीय लहर के दौरान मीडिया, राजनीति और फिल्म जगत के जो चेहरे बेनकाब हो रहे हैं, वे अभी चुप्पी साधे हुए हैं ! पर आप देख लीजिएगा, कुछ समय बीतते ही वे अपने सामाजिक रुतबे और बेशर्म हँसी के साथ फिर आपके बीच होंगे और सार्वजनिक मंचों पर नैतिकता आदि पर भाषण ठेलते भी नज़र आ सकते हैं ! मीडिया के दफ्तरों और फ़िल्मी दुनिया में यौन-उत्पीडन कुछ देर को कम भले ही हो जाये, पर फिर बदस्तूर जारी हो जाएगा ! ज़रूरत इस बात की है कि संघर्ष के निम्न और प्रचारपरक रूपों के साथ-साथ स्त्री-विरोधी सांस्थानिक हिंसा और सांस्थानिक यौन उत्पीडन के रूपों के विरुद्ध संघर्ष की एक दीर्घकालिक रणनीति पर काम किया जाये, और इस आन्दोलन के दायरे को आम मध्यवर्गीय और मेहनतक़श स्त्रियों तक पहुँचाया जाये !
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पुनश्च, एक फुटकल बात !
छद्म-वामियों और एन.जी.ओ.पंथियों में भी लम्पटों की कमी नहीं, पर me too के दौरान अबतक जो चेहरे नंगे हुए हैं, उन सबकी संघी राजनीति या दक्षिणपंथी राजनीति के किसी न किसी शेड से करीबी बनाती है।
वैसे जो सब कुछ सामने आ रहा है वह चौंकाने वाला ज़रा भी नहीं है ! बहुतेरे ऐसे भी हैं जिन्हें मसालेदार मनोरंजन का नित-नया मसाला मिल रहा है I पर चलो यह भी ठीक ही है कि जिसे सभी स्त्रियाँ जानती-भोगती थीं, पर बोलती नहीं थीं, उनपर सार्वजनिक मंचों पर बात हो रही है!

(12अक्‍टूबर,2018)

Thursday, October 11, 2018

'मिथ्या चेतना' ....




मिथकों की विज्ञानसम्‍मत ऐतिहासिक व्‍याख्‍या की जानी चाहिए, न कि उनके बरक्‍स प्रति-मिथकों का निर्माण !

इसीतरह, उत्पीड़ित मुक्तिकामी जन अगर मिथ्या आशावाद और सरल समाधान अर्जित करने के लिए ऐतिहासिक तथ्यों को गढ़ते हैं, तो वे एक 'मिथ्या चेतना' का निर्माण करते हैं, और 'मिथ्या चेतना' तात्कालिक राहत दे सकती है, वास्तविक समाधान नहीं ! इतिहास के वस्तुगत यथार्थ की अलग-अलग वर्ग-अवस्थितियों से अलग-अलग व्याख्याएँ हो सकती हैं, पर बीते हुए समय के वस्तुगत यथार्थ को मनमाने ढंग से तोड़ने-मरोड़ने से भविष्य के वस्तुगत यथार्थ के निर्माण में कोई मदद नहीं मिलती, बल्कि उस काम में अड़चन ही आती है !

मुक्तिकामी जनों को इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या की ज़रूरत होती है, न कि सस्ती लोकरंजक व्याख्याओं की, या मनोनुकूल मनगढ़ंत इतिहास की !

(11अक्टूबर, 2018)

Tuesday, October 09, 2018


अंधराष्ट्रवाद का और धार्मिक कट्टरपंथियों के धर्म-आधारित राष्ट्रवाद का अपना अन्तर्निहित तर्क होता है ! जिस तर्क से भारतीय गौरव की दुहाई देते हुए किसी पड़ोसी देश को निशाना बनाया जाता है, जिस तर्क से कश्मीर घाटी और उत्तर-पूर्व में बर्बर राजकीय दमन को औचित्यपूर्ण ठहराया जाता है, जिस तर्क से असम से कथित बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों को भगाने के लिए हुंकारें भरी जाती हैं, वही तर्क जब विस्तारित होता है तो कभी मुम्बई से पुरबिहा लोग भगाए जाते थे और इनदिनों गुजरात से हिन्दीभाषी आबादी को आतंकित करके भगाया जा रहा है I स्थानीय और बाहरी -- सापेक्षिक श्रेणियां हैं ! भारत जैसे कई राष्ट्रों और राष्ट्रीयताओं वाले देश में जब पूंजीवादी संकट लोगों पर बेरोज़गारी-मंहगाई का कहर बरपा करेगा, तो अंधराष्ट्रवादी जूनून का विस्तार इस रूप में भी सामने आयेगा ही कि एक भाषा-संस्कृति वाले इलाके के लोगों को अपने इलाके में रोजी-रोजगार करने वाले दूसरी भाषा -संस्कृति के लोग 'अन्य' नज़र आने लगेंगे, उनकी रोजी-रोजगार छीनने वाले के रूप में दीखने लगेंगे I हर प्रकार की फासिस्ट राजनीति का यह तर्क और परिणति है I हिन्दीभाषी क्षेत्र के जो मध्यवर्ग के लोग और जो ग़रीब मेहनतक़श भी मोदीत्व के नशे में झूम रहे थे, उनकी आँखें गुजरात से हिंदीभाषियों के भगाए जाने की घटनाओं से खुलेंगी या नहीं, यह तो वक़्त ही बताएगा !

(9अक्‍टूबर,2018)

Monday, October 08, 2018

गोरखपुर लिट् फेस्‍ट....



गोरखपुर गुरु गोरखनाथ से लेकर प्रेमचंद, फ़िराक और कई जाने-माने साहित्यकारों और चिन्तकों की धरती रही है ! यहाँ से कुछ ही दूर कबीर की निर्वाण-स्थली मगहर और बुद्ध की निर्वाण-स्थली कुशीनगर हैं ! यहाँ की प्रगतिशील-साहित्यिक सरगर्मियाँ 1960 से लेकर 1980 के दशक तक बड़े-बड़े महानगरों को मात देती थीं I अब इस शहर के साहित्यिक-सांस्कृतिक परिदृश्य पर गुनाहों के देवताओं, पतन के मसीहाओं और सत्ता-संस्कृति के भाँड़-भंडुक्कों ने धुमगज्जर मचा रखा है ! पूरा समाज ही यदि फासीवाद की नर्सरी बना हुआ हो तो संस्कृति की मंडी में दलालों, चारणों, दरबारियों और कमीशन-एजेंटों की यह धकापेल ज़रा भी अप्रत्याशित नहीं है।
इनदिनों गोरखपुर में भी जयपुर की तर्ज़ पर कुछ महत्वाकांक्षी सत्तासेवी, सेठाश्रिताकांक्षी, एन.जी.ओ.पंथी मनबढ़ों ने 'गोरखपुर लिट् फेस्ट' का आयोजन किया है। यानी पूँजी और सत्ता-संस्कृति की दुनिया में मेंढकियाँ भी नाल ठुका रही हैं ! अब जाहिर है कि इस 'लिट् फेस्ट' में अपने अकादमी वाले पंडीजी ( जो अब भूतपूर्व हो चुके हैं ) यानी विप्र तिवारीजी को होना ही था और साहित्य की महिमा के बारे में कुछ आध्यात्मिक सद्विचार सुनाना ही था I आखिर वे इस बात को कैसे भूल सकते हैं कि एक दो कौड़ी के कवि-सम्पादक को साहित्य और सत्ता के महामहिमों की चरण-चम्पी ने कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया ! दूसरे, इसमें हिंदुत्ववाद के साथ मधु-यामिनी मनाकर सत्ता-तृप्ति हासिल करने वाले समाजवादी बौद्धिक गिरोह के सरगना पत्रकार और नीतीश कुमार के खासुलखास और राज्यसभा के उपाध्यक्ष के रूप में स्वर्ग-सुख भोगने वाले हरिवंश भी पहुँचे थे। और सावधान हो जाइए, कहीं हँसते-हँसते आप मर ही न जाएँ ! इस आयोजन में सत्ता के गलियारों में एक ज़माने से कुख्यात पूंजीपतियों के कामों के लिए चक्कर लगाते रहने वाले और फ़िल्मी दुनिया की "सात्विकता" में सराबोर रहने वाले अमर सिंह ने लेखकों-बुद्धिजीवियों को नैतिकता और सामाजिक प्रतिबद्धता का पाठ पढ़ाया I इसमें पुराने समाजवादी और शिक्षक नेता चित्तरंजन मिश्र ने भी बताया कि साहित्य के जरिये एक ख़राब आदमी भी अच्छा बन जाने की इच्छा रखता है ( अच्छा !! यही सोचकर शायद विप्र पंडीजी साहित्य की दुनिया में उतारे थे, पर वे तो घटिया से घटिया होते चले गए !) चित्तरंजनजी भी ऐसे समाजवादी हैं जो समाजवाद का जनेऊ कान पर चढ़ाई विप्र तिवारी का पोंछिटा पकड़कर फासिस्टों के मसानघाट से लेकर मूल्यहीनता के कुम्भीपाक नरक तक जा सकते हैं।
और जाहिर है कि इस गोरखपुरिया ठगों के साहित्यिक कुम्भ में पुराने संघी प्रोफ़ेसर सदानंद गुप्त को होना ही था जिनने बताया कि साहित्य दिल के रकबे को चौड़ा करता है और मनुष्यता के व्यापक पद से परिचित कराता है ! अब यह तो हम सभी जानते हैं कि नागपुरिया संतरों का दिल का रकबा कितना चौड़ा होता है और गुजरात-2002 से लेकर दाभोलकर-पानसारे-कलबुर्गी-गौरी लंकेश तथा अखलाक-जुनैद आदि के मामलों में संघियों ने मनुष्यता के पद से कैसे परिचित कराया था ! सोने में सुहागा के तौर पर इस आयोजन में धुर-दक्षिणपंथी कश्मीरी पण्डित बुद्धिजीवी सुशील पण्डित भी मौजूद थे जो कश्मीरी पंडितों के विस्थापन और घाटी में आतंकवाद के मसले को उठाते हुए हमेशा प्रकारांतर से कश्मीर में भारतीय राज्यसत्ता के बर्बर दमन को उचित ठहराते रहते हैं !
कहने को तो यह 'लिट् फेस्ट' था' पर इसमें पत्रकार के रूप में प्रभार रंजन दीन से लेकर राणा यशवंत तक जो विभूतियाँ मौजूद थीं, उनके बारे में कुछ कहना, उनकी साहित्यिक प्रतिभा और साहित्यिक अवदानों के बारे में कुछ भी बताना तो सूरज को दीपक दिखाने के सामान ही होगा I और तो और, इन सबके बीच लेखिका नासिरा शर्मा भी पहुँची हुई थीं ! सचमुच, मंच पर बिराजने, मुखड़ा दिखने और सम्मान पाने के लिए ये लेखक-लेखिका तो एकदम बौराए-पगलाए रहते हैं !
हमेशा हम सोचते हैं कि साहित्य की दुनिया में यह तो पतन की पराकाष्ठा और विदूषकीय प्रहसन का चरम है ! लेकिन उस कीर्तिमान को जल्दी ही टूटना होता है ! यह नीचता के नित-नए कीर्तिमानों के निर्माण का युग है !
(8अक्‍टूबर,2018)

Saturday, October 06, 2018


रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
-- ग़ालिब

ऐ मौज-ए-बला, उनको भी ज़रा दो-चार थपेड़े हलके से,
कुछ लोग अभी तक साहिल से तूफाँ का नज़ारा करते हैं.
~मोईन अहसान जज़्बी

मक़ाम 'फ़ैज़' कोई राह में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले
-- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ग़लती


उन्होंने झटपट कहा
हम अपनी ग़लती मानते हैं
ग़लती मनवाने वाले ख़ुश हुए कि
आख़िर उन्होंने ग़लती मनवा कर ही
छोड़ी
उधर ग़लती ने राहत की साँस ली कि
अभी उसे पहचाना नहीं गया
---मनमोहन

जिनगी क रफ़्तार


जिनगी क रफ़्तार तेज तौ होवै क चाही ! बिलकुल होवै क चाही ! मगर एतनो तेज ना भागो बच्चा हवा में उड़ने का माफिक, कि आजू-बाजू से जिनगिये पीछे छूट जावै -- पेड़-पौधा, नदी-नाला, चिरई-चुरुंग, इंसानियत, समाजी सरोकार, लोग-बाग--- सब का सब पीछे छूट जावै I जिनगी कवनो इनामी दौड़ ना है बच्चा ! अकेल्ले कुछ हासिल करे बदे भागत-भागत अइसन वीरान-बियाबान में पहुँच जाबो कि चिल्लाय-चिल्लाय के जियरा हलकान कर लेबो तब्बो केहू नाहीं सुनी !
(2अक्‍टूबर,2018)

Friday, October 05, 2018


जज लोया की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत। सुप्रीम कोर्ट से भी न्याय नहीं। आतंकित रिश्तेदार भी चुप्पी साध गए !
एक एक करके गवाहों सहित व्यापम मामले से जुड़े 70-80 लोगों की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत ! मामले को उठाने वाले की जान लेने की कई कोशिशें I
मुजफ्फरपुर बालिका संरक्षण गृह कांड की मुख्य गवाह का पता नहीं !
आसाराम कांड के गवाहों पर 9 हमले और तीन क़त्ल !
फासिस्ट उन्मादियों की भीड़ द्वारा पहलू खान की हत्या के मामले में गवाही देने से रोकने के लिए गवाहों पर फायरिंग !
अलीगढ़ में फ़र्जी एनकाउंटर में मारे गए नौशाद और मुस्तकीम की माँ शबाना ने दिल्ली प्रेस क्लब में आकर प्रेस के सामने इन्साफ की फ़रियाद की, पर मीडिया ने कोई सुध नहीं लीI उलटे अलीगढ़ में उमर खालिद पर उन्हीं शबाना के अपहरण की ऍफ़.आई.आर. दर्ज की गयी I
भीमा कोरेगांव मामले में इन्साफ का जो मखौल उड़ा, वह पूरी दुनिया ने देखा I
उत्तर प्रदेश में जुर्म ख़तम करने के नाम पर लोग सड़कों पर गोली से उड़ाए जा रहे हैं ! इस चक्कर में जब विवेक तिवारी भी आ गए तो काफी शोर मचा और प्रशासन भी डैमेज कण्ट्रोल में लग गया, लेकिन आम ग़रीब आबादी-- विशेषकर अल्पसंख्यकों के साथ तो यह वीभत्स खेल लगातार जारी है !
क्या अब भी आपको इस देश की न्याय-व्यवस्था पर यकीन है ? क्या अभी भी आप "दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र" का गुण गाते हुए मतवाले हो रहे हैं ? क्या अभी भी आपको लगता है कि अभी फासीवाद आया नहीं है, बल्कि आने का खतरा है ? अगर हाँ ! तो जनाब, अपने दिमाग़ का इलाज करवाइए ! वैसे ऐसे वहम का इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं होगा ! हाँ, जब बर्बर उन्मादी फासिस्ट आपके घरों का रुख करें, या आपके बच्चे सामाजिक अराजकता या पूँजीवादी संकट की बलि चढ़ें, तो पें-पें मत कीजिएगा ! तबतक सोइए चादर तानकर, या फेंकुवा जो लम्बी-लम्बी फेंक रहा है, उसे लपकते हुए इस बात पर मस्त रहिये कि हमारा देश अतीत में कितना महान था और अब फेंकुवा उसे उतना ही महान बनाकर ही मानेगा !
(1अक्‍टूबर,2018)