Thursday, December 28, 2017



It doesn't matter how beautiful your theory is, it doesn't matter how smart you are. If it doesn't agree with experiment, it's wrong.
-- Richard P. Feynman (Famous theoretical physicist )

इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आपका सिद्धान्त कितना सुंदर है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आप कितने होशियार हैं । यदि यह प्रयोग से संगति नहीं रखता, तो यह गलत है ।
-- रिचर्ड पी. फ़ाइनमैन ( प्रसिद्ध सैद्धान्तिक भौतिकशास्त्री )

एक पुरानी कहानी नये रूप में



उस नगर राज्‍य में सुसंस्‍कृत संवेदनशील भद्रजनों और कला-मर्मज्ञों की कमी न थी। नगर के केन्‍द्र में कई रंगशालाओं, सभागारों, कला-वीथिकाओं, संगोष्‍ठी कक्षों और विशाल पुस्‍तकालय वाले भव्‍य कला भवन की बहुमंजिली अट्टालिका थी। वहाँ नियमित कला प्रदर्शनियाँ, संगीत समारोह, नाट्य प्रदर्शन, जीवंत वाद-विवाद आदि होते रहते थे। जीवन और कला की दशा-दिशा पर, मानवीय मूल्‍यों के क्षरण, तर्कणा के विघटन और सामान्‍य जनों की जीवन-समस्‍याओं पर वहाँ अनवरत वाद-विवाद-संवाद होते रहते थे।
सामान्‍य जन इस भव्‍य कला भवन की बौद्धिक-सांस्‍कृतिक गतिविधियों को श्रद्धा, कुण्‍ठा और आतंक की भावना से देखते थे। बेशक़, कुछ ऐसे भी थे जो उपेक्षा या उपहास का भाव रखते थे। कला भवन के सुसंस्‍कृत, संवेदनशील कला-कोविद यदा-कदा बर्बरता के ख़तरों पर भी चिन्‍तातुर चर्चाएँ किया करते थे।
फिर नगर पर बर्बरों ने हमला किया। उत्‍पात मचाते हुए वे सड़कों पर घूमने लगे। जीवन से ऊबे हुए, कुछ विघटित चेतना के दुस्‍साहसी लोग भी उनके साथ हो लिए। कला भवन में उन्‍होंने भयंकर लूटपाट और तोड़फोड़ मयायी। सारे बौद्धिकों-कलाकारों को उन्‍होंने रेवड़ों की तरह बाहर निकालकर सड़कों पर हाँक दिया। कोई भी उन्‍हें या कला के उस अद्वितीय प्रतिष्‍ठान को बचाने नहीं आया। वे भी नहीं, जो उनके प्रति श्रद्धाभाव रखते थे।
कुछ समय बीतने के बाद, उन्‍हीं बौद्धिकों की परम्‍परा में दीक्षित-प्रशिक्षित इतिहासकारों ने उस घटना का इतिहास लिखा जिसमें उन्‍होंने उस ऐतिहासिक विनाश के लिए बर्बरों के साथ ही असभ्‍य, गँवार जनता को भी ज़ि‍म्‍मेदार ठहराया।

Thursday, December 21, 2017


शुरू से ही किसी कम्युनिस्ट से शुद्ध-बुद्ध होने,या जीवनपर्यंत बने रहने की उम्मीद करना भी एक किस्म का भाववाद ही है। पार्टी और बुर्जुआ समाज निरंतर एक-दूसरे से संघात-रत रहते हैं और इस प्रक्रिया में पार्टी यदि समाज को प्रभावित करती है तो समाज भी पार्टी को प्रभावित करता है। पार्टी कुछ लोगों को कम्युनिस्ट बनाती है तो समाज पार्टी के कुछ लोगों में बुर्जुआ सोच का विचलन पैदा करता है। इसी संक्रामक बीमारी से निपटने के लिए लेनिन, स्तालिन और माओ ने कम्युनिस्ट पार्टी में हर कुछ समय के बाद दोष-निवारण और छंटनी की मुहिम चलाने की बात की थी।
समाजवाद आने के बाद भी लम्बे समय तक पार्टी के भीतर से 'पूंजीवादी पथगामी' पैदा होते रहेंगे जैसाकि सोवियत संघ और चीन में हुआ था। इसीलिये माओ ने समाजवाद के अंतर्गत पार्टी और राज्य सहित सभी अधिरचनाओं में सर्वहारा अधिनायकत्व के अंतर्गत सतत वर्ग-संघर्ष चलाने की बात कही थी। 
सांस्कृतिक क्रांति के दौरान तीन नारे ऐसे दिए गए थे जो हर-हमेशा किसी भी कम्युनिस्ट संगठन के भीतर बुर्जुआ विजातीय प्रवृत्तियों से लड़ने के सन्दर्भ में अत्यधिक प्रासंगिक हैं।  ये नारे थे : " 'स्व' के विरुद्ध संघर्ष करो", " हमेशा 'लाइमलाइट' में रहने की मानसिकता का विरोध करो", और "नेता बनने के लिए पार्टी में भरती होने की मानसिकता का विरोध करो "। कार्यकर्ता इन विजातीय प्रवृत्तियों के विरुद्ध साहस और सजगता के साथ संघर्ष कर सकें, इसके लिए माओवादी पक्ष से यह भी नारा दिया गया था कि नेतृत्व द्वारा कतारों को "दब्बू औजार" ( डोसाइल टूल ) बनाने की प्रवृत्ति का विरोध करो।

Tuesday, December 19, 2017

पंचकूला हिंसा और राम रहीम परिघटना: एक विश्लेषण



पंचकूला हिंसा और राम रहीम परिघटना की अंतर्वस्तु को समझने के लिए पंजाब-हरियाणा में डेरों की राजनीति के इतिहास और वर्तमान को समझना ज़रूरी है।
पंजाब में डेरों की राजनीति का एक लम्‍बा इतिहास रहा है। यूँ तो पंजाब में डेरों का इतिहास काफी पुराना रहा है। लेकिन आज़ादी के बाद के वर्षों में सिख धर्म के गुरुद्वारों पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के माध्‍यम से जाट सिखों के खुशहाल मा‍लि‍क किसान वर्ग का राजनीतिक-सामाजिक वर्चस्‍व मज़बूत होने के बाद और उनके अकाली दल की राजनीति का मुख्‍य सामाजिक अवलम्‍ब बनने के बाद अलग-अलग डेरे दलित और पिछड़ी जातियों की सिख और हिन्‍दू आबादी को एकजुट करने वाले केन्‍द्र बनते चले गये। यूँ तो पंजाब-हरियाणा में ऐसे कुल 9000 डेरे हैं। इनमें से कुछ के अनुयायी लाखों हैं तो कुछ के सैकड़ों में। इन डेरों में राधा स्‍वामी (ब्‍यास), सच्‍चा सौदा, निरंकारी, नामधारी, सतलोक आश्रम, दिब्‍य ज्‍योति जागरण संस्‍थान (नूरमहल), डेरा संत भनियारवाला, डेरा सचखण्‍ड (बल्लान), डेरा सन्‍त फुरीवाला, डेरा बाबा बुध दल, डेरा बेगोवाल नानकसर वाले आदि प्रमुख हैं। ये डेरे सिख गुरुओं के अतिरिक्‍त कबीर, रविदास आदि को भी महत्‍व देते हैं, दसवें गुरू को अंतिम मानने की जगह जीवित गुरुओं की परम्‍पराको मानते रहे हैं तथा कबीर-रविदास से लेकर अपने जीवित गुरुओं तक की वाणी को गुरुग्रंथ साहिब के बराबर महत्‍व देते रहे हैं। इसके चलते जाट सिखों के साथ इन डेरों का प्राय: टकराव होता रहा है। लेकिन इस धार्मिक टकराव की अन्‍तर्वस्‍तु अतीत में मुख्‍यत: जाट मा‍लि‍क किसानों और भूमिहीन दलित और पिछड़ी जातियों के बीच के अन्‍तरविरोध में निहित थी। कालान्‍तर में पंजाब की इन दलित व पिछड़ी जातियों के बीच से भी एक खुशहाल मध्‍यवर्गीय तबका पैदा हुआ जो सामाजिक-राजनीतिक दायरे में अपनी दखल बढ़ाने के लि‍ए कोशिशें करने लगा। नतीजतन डेरों और जाट सिखों के वर्चस्‍व वाले गुरुद्वारों के बीच के टकराव का चरित्र बदल गया। ज्‍यादातर डेरे अब दलितों-पिछड़ों के बीच से उभरे नये बुर्जुआ और निम्‍न बुर्जुआ वर्ग की राजनीतिक आकांक्षाओं के केन्‍द्र और नये ‘पावर सेन्टर’ बन गये। धार्मिक भावनाओं के सहारे जहाँ कुलक जाट सिख गरीब जाट सिखों को अपने साथ जोड़ लि‍या करते थे, वहीं इसी हथकण्‍डे के सहारे दलित और पिछड़ी जातियों के बुर्जुआ और निम्‍न बुर्जुआ इन जातियों के गरीबों को अपने साथ जोड़ने में कामयाब हो जाते थे। इस तरह पंजाब में वर्गीय अन्‍तरविरोध जातिगत पहचान की धार्मिक राजनीति की विकृति-विरूपित चेतना के रूप में अभिव्‍यक्‍त होते रहे हैं।
पारम्‍परिक तौर पर पंजाब में जाट सिख मालिक किसानों का बहुलांश अकाली दल का सामाजिक आधार हुआ करता था और हिन्‍दू और सिख शहरी मध्‍य वर्ग के साथ गाँगों-शहरों की दलित एवं पिछड़ी जातियाँ मुख्‍यत: कांग्रेस का वोट बैंक हुआ करती थीं। मुख्‍यत: 1990 के दशक में बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस के इस परम्‍परागत वोट बैंक में सीमित सेंध लगायी। गुरुद्वारों की राजनीति का मुकाबला कांग्रेस मुख्‍यत: डेरा प्रमुखों की सहायता से किया करती थी। फिर डेरों के सामाजिक आधार का लाभ उठाने के लि‍ए अकाली दल के नेताओं ने भी अलग-अलग डेरों के साथ सौदेबाजी और जोड़-तोड़ की राजनीति शुरु की और डेरा प्रमुख भी इस सौदेबाजी में पीछे नहीं रहे। वस्‍तुत: यह जाट कुलकों और पूँजीपतियों के साथ दलित और पिछड़ी जातियों के पूँजीपतियों और उच्‍च मध्‍यवर्ग की सत्‍ता के लिए सौदेबाजी का ही एक रूप था।
डेरा सच्चा सौदा की स्थापना मस्ताना बलूचिस्तानी उर्फ़ बेपरवाह मस्ताना महाराज ने सिरसा में 1948 में की थी। 1960 में उनकी मृत्यु के बाद शाह सतनाम सिंह ने डेरा प्रमुख की गद्दी सम्हाली। उनकी मृत्यु दिसंबर,1991 में हुई। इसके पहले ही, सितंबर,1990 में गुरमीत राम रहीम सिंह डेरा के प्रमुख पद पर नियुक्त हो चुके थे। 1990 तक डेरा पंजाब और हरियाणा के दलित ग़रीबों और पिछड़ी जाती के ग़रीब कारोबारी आबादी के बीच काफी लोकप्रिय हो चुका था और दोनों राज्यों की राजनीति में कांग्रेस के परोक्ष समर्थक की भूमिका निभाने लगा था ,लेकिन राम रहीम ने डेरे की लोकप्रियता और राजनीतिक भूमिका को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उन्होने एक सर्वशक्तिमान माडर्न गुरू का अनूठा नया कल्ट निर्मित किया। सिरसा स्थित डेरा का मुख्यालय हथियारबंद निजी सुरक्षाकर्मियों से लैस एक दुर्ग बन गया जिसके भीतर भोग-विलास और ऐश्वर्य का एक स्वर्ग जगमगा रहा था। डेरे को और राम-रहीम को लेकर बहुतेरे विवाद उठे और यौन उत्पीड़न के आरोप कई बार लगे लेकिन आतंक और राजनीतिक दबाव से उन सबको दबा दिया गया। ऐसे ही आरोपों में दो साध्वियों के साथ बलात्कार का आरोप था जिसके लिए राम रहीम को कोर्ट ने दोषी ठहराया है। पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या का मुकदमा अभी भी कोर्ट में लंबित है।
राम रहीम की ख्याति और ग्लैमर बढ़ने के साथ ही दलित और पिछड़ी जातियों के बीच से उभरे मध्य वर्ग और अनिवासी भारतीयों के अतिरिक्त अब अन्य जातियों के छोटे-मोटे कारोबारी और बड़े व्यापारी भी बाबा के शिष्य हो गए और उनकी संख्या करोड़ के आसपास जा पहुंची। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, हिमाचल और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ढेरों निजी कारों के पीछे 'धन धन सतगुरु तेरा ही आसरा' लिखा हुआ दीखने लगा।
डेरा सच्‍चा सौदा पहले हरियाणा और पंजाब की राजनीति में कांग्रेस का पक्षधर माना जाता था। फिर कांग्रेस के पराभव के साथ ही इस डेरे ने अपने अन्‍य राजनीतिक विकल्पों की तलाश और सौदेबाजी भी शुरू कर दी। उल्लेखनीय है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में डेरा सच्‍चा सौदा ने अकाली दल उम्‍मीदवार और सुखवीर सिंह बादल की पत्‍नी हरसिमरन कौर की जीत में अहम भूमिका निभायी थी। इन चुनावों के दौरान और हरियाणा के विधान सभा चुनावों के दौरान डेरा सच्‍चा सौदा ने पर्दे के पीछे से अपना पूरा समर्थन भाजपा को दिया था।
वर्गीय आधार पर यदि देखें तो डेरा सच्चा सौदा के भाजपा के साथ खड़े होने के मूल कारण वही हैं जो ढेरों दलित पार्टियों और नेताओं तथा पिछड़ी जातियों के कुलकों- फार्मरों की क्षेत्रीय पार्टियों के भाजपा के साथ गांठ जोड़ने के हैं। यह दलित और पिछड़ी जातियों के मध्य वर्ग के बड़े हिस्से, कुलकों-फार्मरों और पूँजीपतियों के फासीवाद और नव-उदारवादी नीतियों के पक्ष में खड़े होने की परिघटना को ही दर्शाता है।
यदि संख्यात्मक रूप से देखें तो अभी भी राम रहीम के अधिकांश अनुयायी आम ग़रीब घरों के लोग -- मेहनतकश और छोटे कारोबारी हैं जो ज़्यादातर दलित और अतिपिछड़ी जातियों से आते हैं। ऐसे घरों में थोड़ी-बहुत या पर्याप्त शिक्षा पाये हुए युवाओं की भारी फौज तैयार हुई है जो बेकार है और जिसे मौजूदा समय में अपना कोई भविष्य नहीं दीखता। किसी क्रांतिकारी विकल्प या क्रांतिकारी प्रचार के प्रभाव के अभाव में युवाओं की यह भीड़ गहन अवसाद और दिशाहीन आक्रोश के गर्त में जा गिरती है। यही वह आबादी है जो फासिस्टों के लोकरंजक नारों, धार्मिक कट्टरपंथी प्रचारों और अंध-राष्ट्रवादी जुनूनी चीख-पुकार के प्रभाव में सबसे आसानी से आ जाती है। यह आबादी किसी चमत्कारी गुरू या किसी फासिस्ट जुनून के वशीभूत होकर सड़कों पर बर्बरता का तांडव रच सकती है। पंचकूला में सड़कों पर हिंसा का नंगनाच करने वाले 20 से 25 वर्ष के युवा इसी किस्म की आबादी का हिस्सा थे, जो फासिस्ट किस्म की 'मिथ्या चेतना' के वशीभूत थे।
फासीवाद वित्तीय पूंजी के धुर-प्रतिक्रियावादी चरित्र के वर्गीय हितों की नुमाइंदगी करता है और साथ ही, वह मध्य वर्ग का धुर-प्रतिक्रियावादी सामाजिक आंदोलन होता है। केवल मध्य वर्ग ही नहीं, उत्पादन की प्रक्रिया से बाहर धकेल दिये गए विमानवीकृत मज़दूर और उजड़ते छोटे कारोबारी भी फासिस्ट गुंडों के गिरोहों में जा शामिल होते हैं, विशेषकर उनकी युवा पीढ़ी।
मक्सिम गोर्की ने 1920 के दशक में जो लिखा था वह आज भी प्रासंगिक और गौरतलब है : " जिन्होंने भी फासिस्टों की परेडें देखी हैं, वे जानते हैं कि ये परेडें उन नौजवानों की होती हैं, जिनकी रीढ़ें रोग से सूजी हुई हैं, जिनके शरीरों पर चकत्ते पड़े हुए हैं और जो क्षयग्रस्त हैं, किन्तु जो बीमार आदमियों के उन्माद से जीवित रहना चाहते हैं और जो ऐसी किसी भी चीज़ को अपनाने के लिए तैयार रहते हैं जो उनके विषाक्त रक्त की सड़ांध को बिखेरने की उन्हें आज़ादी देती है। इन हजारों कान्तिहीन और रक्तहीन चेहरों में स्वस्थ और चमकते चेहरे दूर से ही नज़र आ जाते हैं, क्योंकि उनकी संख्या इतनी नगण्य है। निश्चय ही ये थोड़े-से चमकते हुए चेहरे सर्वहारा वर्ग के सचेत दुश्मनों के हैं या दुस्साहसी टटपूँजियों के हैं जो कल तक सोशल डेमोक्रेट थे या छोटे व्यापारी थे और अब बड़े व्यापारी बनना चाहते हैं और जिनके वोट, जर्मनी के फासिस्ट नेता मज़दूरों और किसानों के हिस्से की लकड़ी या आलू मुफ्त में देकर ख़रीद लेते हैं। होटलों के हेड-वेटर चाहते हैं कि वे अपने-अपने रेस्तराँ के मालिक हों, छोटे चोर चाहते हैं कि शासन बड़े चोरों को लूटमार और चोरी करने की जो छूट देता है वह उन्हें भी दी जाये -- ऐसे लोगों की पाँत में से फासिज्म अपने रंगरूट भरती करता है। फासिस्टों की परेड एक साथ ही पूँजीवाद की शक्ति और उसकी कमज़ोरियों की परेड होती है।
हमें आँखें बंद नहीं कर लेनी चाहिए: फासिस्‍टों की जमात में मज़दूरों की संख्‍या भी कम नहीं है -- ऐसे मज़दूरों की संख्या जो अभी तक क्रांतिकारी सर्वहारा वर्ग की निर्णयकारी शक्ति से बेख़बर हैं। हमें अपनेआप से यह तथ्य भी नहीं छिपाना चाहिए कि संसार का उपजीवी -- पूँजीवाद -- आज भी काफी मजबूत है, क्योंकि मज़दूर और किसान अभी भी उसके हाथ में हथियार और भोजन देते जाते हैं और उसे अपने रक्त और मांस से पौष्टिक तत्‍व प्रदान करते जाते हैं। इस विप्‍लवी जमाने का यह सबसे क्षोभजनक और शर्मनाक तथ्य है। जिस विनम्रता से मज़दूर वर्ग अपने दुश्मन को खिलाता-पिलाता है, वह कितनी घृणास्पद है। सोशल डेमोक्रेट नेताओं ने उसके मन में यह विनम्रता पैदा की है। इन नेताओं के नाम हमेशा के लिए शर्म के पीले और चिपचिपे रंग से पुते रहेंगे। कितने आश्चर्य की बात है कि बेकार और भूखे लोग इन तथ्यों को बर्दाश्त करते चले जाते हैं, जैसे मिसाल के लिए, बाजार के भाव ऊँचे रखने के लिए बड़ी तादाद में अनाज को नष्ट करना, वह भी ऐसे समय में जब बेरोज़गारी बढ़ रही है, वेतन की दरें गिर रही हैं और मध्यवर्ग के लोगों तक की ख़रीदने की क्षमता घटती जा रही है।" (सर्वहारा वर्ग का मानववाद)
यह मानना एक भारी भूल होगी कि फासिस्टों की कतारों की भरती व ट्रेनिंग केवल आर एस एस और उसके अनुषंगी संगठनों में ही होती है। जब असाध्य संकट से ग्रस्त समूचा पूंजीवादी समाज ही फासीवाद के लिए उपजाऊ ज़मीन बन गया है तो फासिस्ट दस्तों की ढेरों फुटकल नर्सरियाँ भी अस्तित्व में आ गई हैं। हिन्दू युवा वाहिनी, श्रीराम सेने जैसे सैकड़ों प्रशिक्षण केन्द्रों के अतिरिक्त राम रहीम के डेरे जैसी ढेरों ऐसी फुटकल नर्सरियाँ हैं जहां धार्मिक कट्टरपंथी फासीवाद की किसिम-किसिम की फसलें तैयार की जा रही हैं।
फासीवाद के सरगना राम रहीम, आसाराम, रामपाल जैसे किसी भी बाबा का भरपूर इस्तेमाल करके उसे ठिकाने लगा देंगे और फिर ज़रूरत मुताबिक अपने लिए नए-नए बाबे ढूंढ लेंगे। और फिर मुख्य काम तो संघ की शाखाओं में हो ही रहा है।

दुःख के बारे में एक और खोज



दुःख अंत की भाषा था I
और भाषा का अंत था I
अँधेरे का व्याकरण था दुःख
और व्याकरण का अन्धेरा I
दुःख था अकेलेपन की चीख
और एक चीख का अकेलापन I
दुःख अन्दर की खोहों की
निरुद्देश्य खोजपूर्ण यात्रा था I
दुःख अकेले भोग लेने की
एक स्वार्थपूर्ण कामना था I
दुःख जूते में घुसा हुआ एक कंकड़,
बहा दिया गया आँसू का एक कतरा था I
दुःख था बहुत कुछ जानना
और लगातार जानना
और सिर्फ़ जानना I
दुःख आत्मा पर एक धब्बा था अपरिहार्य,
दुनिया की तमाम अपूर्ण कामनाओं की
हिलती हुई छाया था I
यह पाया कि सबसे बड़ा दुःख था फिर भी
यह जानना कि दुःख है
और यह न जानना कि
इसके कारण क्या हैं ?

--- शशि प्रकाश
(नवम्बर, 1998)