Wednesday, May 24, 2017

विद्वत्तापूर्ण , सुंदर भ्रमों और झूठों के विरोध में सीधे-सादे सच की अनगढ़-फूहड़ कविता

बुनियादी बातों पर विद्वानों में 
परस्पर सहमति हुआ करती थी
और गौण बातों पर ढेरों असहमतियाँ 
जिनपर लंबी बहसें हुआ करती थीं ।
उनके विचारों के बीच सदा होता था शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व ,
निरंतर जारी रहती थी शांतिपूर्ण प्रतिस्पर्धा
और वे एक-दूसरे में शांतिपूर्ण संक्रमण कर जाते थे
क्योंकि नए विचारों में संक्रमण की सभी संभावनाएं
समाप्त हो चुकी थीं ,
और दुनिया में हो चुके और होने वाले सभी बदलावों का
लेखा-जोखा लिया जा चुका था
-- इस ऐतिहासिक आकलन पर
सभी विद्वान एकमत थे ।
नए विचार अब मात्र शब्दों के कुछ समुच्चय ही हो सकते हैं
इस उत्तर-आधुनिक समय में ।
सृष्टि की शुरुआत हुई थी शब्द से
और अंत भी होगा शब्द पर
--- बहुचर्चित , बहुपुरस्कृत , बहुलांश विद्वानों का
ऐसा ही मानना था ।
लेकिन क्लाइमेक्स अभी बाकी था ।
अब सामने आया इस दुनिया का अंतिम यह विचार
कि सत्य की मृत्यु हो चुकी है उत्तर-सत्य के जन्म के बाद
और वस्तुगत यथार्थ से उत्तर-सत्य का कोई नाता नहीं होता ।
उत्तर-सत्य के युग में वस्तुपरकता एक विभ्रम है
और यथार्थ एक मिथक ।
लेकिन सभी विद्वान खाते-पीते, हगते-मूतते
और सत्ता द्वारा पुरस्कृत होते रहे
उतने ही वस्तुगत यथार्थ के तरीके से
जैसे पूंजी निचोड़ती रही अहर्निश उन उजरती गुलामों को
जो उनकी सुख-सुविधा के सारे सरंजाम बनाते थे ।
और यह दुनिया ऐसे ही नहीं बनी रहेगी अनंत काल तक ---
यह विचार अभी भी उतना ही बड़ा वस्तुगत यथार्थ
बना हुआ था , जितना 1848 में ,
1871 में , 1917 में , या 1949 में हुआ करता था ,
या उससे भी पहले हुआ करता था ,
ऐसा उनका मानना था जो
विद्वानों की दुनिया से बहिष्कृत ,
वास्तविक दुनिया में निवास करते थे
और रोज़मर्रा की सरगर्मियों और जद्दोजहद में शामिल थे
और चीज़ों पर सोचने का माद्दा और विद्रोह करने की
कूव्वत रखते थे ।




और अब , अगर तुम बोलते हो , तुम्हें मरना होगा 
अगर चुप रहते हो , तुम्हें मरना होगा 
तो बोलो और बोलकर मरो । 
--ताहर जियात 
(प्रगतिशील अल्जीरियन कवि जिनकी एक इस्लामी कट्टरपंथी गुट ने1993 में हत्या कर दी)



जो कमज़ोर होते हैं वे लड़ते नहीं ।
जो उनसे अधिक मज़बूत होते हैं
वे लड़ सकते हैं घंटे भर के लिए ।
जो और अधिक मज़बूत होते हैं , वे फिर भी
लड़ सकते हैं कई वर्षों तक । 
सबसे अधिक मज़बूत लोग लड़ते हैं
अपनी पूरी ज़िंदगी ।
वही हैं जो अपरिहार्य होते हैं ।
-- बेर्टोल्ट ब्रेष्ट


वे हमारे ऊपर गालियों की बौछार करते हैं ।
हम प्रतिरोध के गीत गाते हैं ।
वे बौखलाते हैं ।
वे हमें धमकियाँ देते हैं । 
हम फिर निर्भीक सड़कों पर निकलते हैं
आकाश गुंजाते नारों के साथ ।
वे बदहवास हो जाते हैं ।
वे हमें यंत्रणा देते हैं कारागृहों में ।
हम दीवारों पर उम्मीदों, विद्रोह और जीत के
चित्र उकेरते हैं।
उन्हें अपने विनाश के दुःस्वप्न सताने लगते हैं।