Sunday, March 17, 2019

सपनों का जीवन


कुछ भी नहीं होता दो बार।

हर घटना अकेली होती है और हर सपना भी।

दो बार वही प्यार नहीं होता।

पुराना प्यार यदि वापस भी लौटे तो वही नहीं रह जाता ।

वही चुम्बन दुहराया नहीं जाता ।

हम जब फिर से पहुँचते हैं किसी पुरानी जगह, वह वही नहीं होती।

हर बार जुदाई अपने ढंग की अकेली होती है ।

हर अलगाव का अपना अलग तरीका और सलीका होता है।

हर नारा नये कंठों से नया होकर उठता है जिस आकाश में

वह गुज़रे दिनों का आकाश नहीं होता

और जो क्रान्ति पुरानी क्रान्तियों से सीखकर डग भरती है ज़मीन पर

वह ज़मीन नयी होती है जो उसे एक नयी शक्ल देती है।

हम जिस देश-काल को जीते हैं वह अगले ही पल इतिहास हो जाता है।

लगातार किसी सपने का पीछा करने में ही जीवन है

धड़कता-थरथराता हुआ अविराम।

(15मार्च, 2019)

Saturday, March 16, 2019


किसी समस्या का सूत्री‍करण उसके समाधान से कहीं अधिक बुनियादी महत्व रखता है।
--अल्बर्ट आइंस्टीन


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ज़ि‍न्‍दगी जीने के दो तरीके हैं। पहला यह कि कुछ भी चमत्‍कार नहीं है और दूसरा यह कि दुनिया की हर चीज़ चमत्‍कार है।
-- अल्बर्ट आइन्स्टीन



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अगर मशीनें हमारी ज़रूरत की हर चीज़ पैदा कर सकती हैं, तो फिर नतीजा इस बात पर निर्भर करता है कि चीज़ों का वितरण किसतरह होता है I अगर मशीनों द्वारा उत्पादित संपदा बाँट दी जाये तो हर आदमी सुविधा और शानो-शौक़त की ज़िन्दगी बसर कर सकता है I लेकिन मशीनों के मालिक अगर संपदा के पुनर्वितरण के विरुद्ध जनमत तैयार कर लें तो अधिकांश लोग नारकीय गरीबी में जीने को बाध्य होंगे I अभीतक तो रुझान दूसरे विकल्प के पक्ष में ही दीख रही है, तकनोलोजी के साथ ही असमानता निरंतर बढ़ती जा रही है I

-- स्टीफ़न हाकिंग ( हमारे समय के एक महानतम वैज्ञानिक )
(8 जनवरी,1942-14 मार्च 2018)

अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा वर्ग के महान नेता और शिक्षक कार्ल मार्क्स के उद्धरण


यह भौतिकवादी सिद्धान्‍त कि मनुष्‍य परिस्थितियों एवं शिक्षा-दीक्षा की उपज है, और इसलिए परिवर्तित मनुष्‍य भिन्‍न परिस्थितियों एवं भिन्‍न शिक्षा-दीक्षा की उपज है, इस बात को भुला देता है कि परिस्थितियों को मनुष्‍य ही बदलते हैं और शिक्षक को स्‍वयं शिक्षा की आवश्‍यकता होती है। अत: यह सिद्धान्‍त अनिवार्यत: समाज को दो भागों में विभक्‍त कर देने के निष्‍कर्ष पर पहुँचता है, जिनमें से एक भाग समाज से ऊपर होता है(राबर्ट ओवेन में, उदाहरणार्थ, हम ऐसा पाते हैं)।
परिस्थितियों तथा मानव क्रियाकलाप के परिवर्तन का संपात केवल क्रान्तिकारी व्‍यवहार के रूप में विचारों तथा तर्कबुद्धि द्वारा समझा जा सकता है।

-- कार्ल मार्क्‍स (फायरबाख़ पर निबंध,1845)



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अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा वर्ग के महान नेता और शिक्षक कार्ल मार्क्स की 135वें स्मृति दिवस के अवसर पर

सिद्धान्‍त जैसे ही जनसमुदाय को अपनी पकड़ में ले लेता है, एक भौतिक शक्ति बन जाता है।

-- कार्ल मार्क्‍स (हेगेल के 'फिलॉसोफी ऑफ राइट' की आलोचना की भूमिका)

Friday, March 15, 2019


बंद और बीमार समाजों में ही नहीं, काफ़ी हद तक अपेक्षतया खुले माने जाने वाले बुर्जुआ समाजों में भी लोग कपड़ों को साथ चरित्र या भूमिका पहने हुए होते हैं । मार्क ट्वेन ने अपने ख़ास मज़ाकिया अंदाज़ में ठीक ही कहा था," कपड़ों से इंसान बनते हैं, नंगे लोगों का समाज पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है, या कोई प्रभाव नहीं पड़ता।" और समाज में सबकुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हम कितने और किन लोगों को किसतरह और कितना प्रभावित कर पाते हैं ! बचपन से हमारा दिमाग इसीतरह अनुकूलित किया जाता है।

लगातार हम लोगों के बाह्य आचरण और रूप से प्रभावित होते हैं और अपने बाह्य आचरण और रूप से प्रभावित करने की कोशिश करते रहते हैं ! कालान्तर में औपचारिकता का यह खेल ही हमारे जीवन का उत्सव बन जाता है ! हम अपनी अंतरात्मा के बारे में, अपनी चाहतों, उड़ानों और फंतासियों के बारे में सोचना ही छोड़ देते हैं और दूसरों से भी ऐसी अपेक्षाएँ नहीं करते। हम मानवीय सार-तत्व के बारे में सोचना छोड़ देते हैं, कभी-कभी तो उससे सर्वथा अपरिचित ही पूरा जीवन बिता देते हैं ! यानी सभ्यता हमारे लिए कपड़ों तक सिमट कर रह जाती है ! यूँ कहें कि कपड़े ही सभ्यता का मूर्त रूप बनकर रह जाते हैं ! यानी मनुष्य का मतलब होता है, कपड़ों में विचरण करता जानवर ! (वैसे भी, बिना कपड़ों के, उसका आचरण पाशविक ही होता है, उसमें कुछ भी मानवीय या काव्यात्मक नहीं होता!)

बंद समाजों में नग्नता और शारीरिक मुक्तता को लेकर तमाम रूढ़ियाँ, ग्रंथियाँ और रुग्णमानस पूर्वाग्रह होते हैं! वास्तव में यह एक व्यंजनात्मक और लक्षणात्मक स्थिति है। जो समाज मानववाद और जनवाद के तत्वों से ऐतिहासिक तौर पर रिक्त रहा हो और जहाँ दिमागों का 'डीकोलोनाइजेशन' अभीतक न हो सका हो, वहाँ के कुलीन-भद्र नागरिक, ख़ास तौर पर उच्चमध्यवर्गीय सवर्ण और पुरुष, और आम तौर पर सभी स्त्री-पुरुष नागरिक, अपनी नग्न आत्माओं से कभी भी साक्षात्कार नहीं कर सकते ! वे अगर अपनी नंगी आत्मा या ज़मीर से कभी अकेले में भी मिल लें तो शर्म से डूब मरें ! आश्चर्य नहीं कि ऐसे ही समाजों में प्रगतिशीलता और जनवाद के नाम पर हमें सबसे घृणित और कायराना पाखण्ड और दुरंगेपन के दर्शन होते हैं। ऐसे समाजों का नागरिक जीवन में हर कहीं पारदर्शिता से डरता और घबराता है ! और इस डर और घबराहट के मौजूद रहते वह कभी भी अपनी और समाज की मुक्ति के बारे में स्वस्थ और साहसिक ढंग से सोच नहीं पाता ! वह कभी भी फंतासियों और सपनों के साथ यथार्थ की बहुरंगी मिलावट करने वाला कीमियागीर नहीं बन पाता। वह यदि कविता लिखता है तो उसकी कविताएँ पाखंडपूर्ण और बनावटी होती हैं, उबाऊ और बेचेहरा होती हैं ! उसके जीवन में कविता का प्रवेश कभी नहीं हो पाता ! कभी कविता आती भी है तो अन्दर की आवाज़ें सुनकर दरवाज़े पर दस्तक दिए बिना ही उलटे पाँव वापस लौट जाती है !

(16मार्च, 2019)

Thursday, March 14, 2019

‘मी टू’ मुहिम : एक समालोचना


--कविता कृष्णपल्लवी

फिलहाल भारत में ‘मी टू’ का कोलाहल दिग-दिगन्त में व्याप्त है। न सिर्फ सोशल मीडिया पर अतिसक्रिय बुर्जुआ नारीवादी वीरांगनाएँ इसे लेकर अति उत्साह और उद्दाम आशावाद से भरी हुई हैं, बल्कि कई प्रगतिशील और वामपन्थी भी इसमें स्त्री आन्दोलन की नयी उठान का दर्शन करने लगे हैं और भाव-विह्वल होकर इसका स्वागत कर रहे हैं।

पहले ही यह स्पष्ट कर दूँ कि मैं ‘मी टू’ जैसी किसी मुहिम की सिरे से विरोधी नहीं हूँ। लेकिन इसकी सम्भावनाओं और परिणतियों को जिस तरह अति की सीमा तक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जा रहा है, वह ज़रूर आपत्तिजनक है। बेशक़, उस झिझक-संकोच भरी चुप्पी को एक झटके से तोड़ दिया जाना चाहिए जिसका लाभ लम्पट ”शरीफज़ादे” उठाते हैं। इस एक कदम पर स्वतंत्र-स्वायत्त रूप से मूल्य-निर्णय देना हो तो यही कहा जा सकता है कि यह किसी स्त्री के चुप रहने से बेहतर है कि वह अपने यौन-उत्पीड़न के विरुद्ध खुलकर बोले। बेहतर होता कि तुरन्त बोलती, लेकिन अगर देर से भी वह बोलने का साहस जुटा पाती है, तो भी कोई बात नहीं। आपत्ति इस अप्रोच पर है जो वैयक्तिक स्तर पर उठने वाली इन आवाज़ों के कुल योग को एक सामाजिक आन्दोलन का रूप या विकल्प बनाकर पेश कर रहा है। वे स्त्रियाँ (और पुरुष भी) जो सोचती हैं कि स्त्रियाँ अगर अपने विरुद्ध होने वाले किसी यौन-अपराध के विरुद्ध चुप्पी तोड़कर बोलने लगेंगी तो हालात में कुछ आमूलचूल बदलाव आ जायेंगे, भारी मुग़ालते में जी रही हैं। और अहम बात अब यह है कि इस मुग़ालते को ज़ोर-शोर से बढ़ावा दिया जा रहा है। बेशक़ यह अपने-आप में एक सकारात्मक बात है, लेकिन यह प्रतिरोध की शुरुआत भी नहीं है, उसकी भूमिका के तमाम उपक्रमों में से एक उपक्रम मात्र है। स्त्री  उत्पीड़न के बुनियादी कारण सामाजिक हैं और इसके प्रतिरोध की कड़ि‍याँ सामूहिक तौर पर ही संगठित की जा सकती है और याद रखें कि बिखरी हुई वैयक्तिक पहलकदमियों के कुल योग को सामूहिक नहीं कहा जा सकता, चाहे मुख्य धारा की मीडिया और सोशल मीडिया पर उसका शोर जितना भी मच जाये। ‘मी टू’ जैसे प्रतिरोध के फॉर्म की सीमाओं को यदि न समझा जाये तो यह एक चौंक-चमत्कार भरे प्रतीकवाद से आगे कहीं नहीं जायेगा।

पश्चिम में ‘मी टू’ ने एक सोशल मीडिया केन्द्रित मुहिम के रूप में ज़ोर तब पकड़ा जब अमेरिकी अभिनेत्री अलीसा मिलानो ने अक्टूबर 2017 में मीटू हैशटैग फैलाने को प्रोत्साहित किया ताकि समाज मे यौन-उत्पी ड़न की दबी-छुपी घटनाएँ सामने आयें, उत्पीड़ि‍ताएँ खुलकर बोलें और उत्पीड़कों पर एक सामाजिक दबाव पैदा हो। लेकिन दरअसल ‘मी टू’ मुहावरे की शुरुआत 2006 में हुई थी जब अमेरिका की ही एक सामाजिक कार्यकर्ता टाराना बर्क ने ‘माइ स्पेस’ नामक सामाजिक नेटवर्क पर इसकी शुरुआत की थी। बर्क की मुहिम की सीमा उसके द्वारा दिये गये नारे से ही समझी जा सकती थी। वह नारा था: ”तदनुभूति के जरिए सशक्तिकरण”, यानी इसका लक्ष्य कोई सामाजिक आन्दोलन खड़ा करना नहीं, बल्कि आपस में दु:ख बाँटकर स्त्रियों को बल देना था। बहरहाल, आन्दोलन ने ज़ोर पकड़ा गत वर्ष अक्टूबर में अभिनेत्री मिलानो की पहल के बाद और अमेरिका तथा अधिकांश यूरोपीय देशों में (और फिर एशिया, लातिन अमेरिका और अफ्रीका के कई देशों में भी) कई उत्पीड़ि‍ताओं ने मीडिया में सामने आकर या सोशल मीडिया में लिखकर अपने यौन-उत्पीड़न के बारे में बताया और कई नामचीन हस्तियों के चेहरों से नक़ाब उतारने का काम किया। फिल्म, फैशन, विज्ञापन, संगीत और मीडिया जगत के बाद राजनीति, सेना, वित्त, शिक्षा, चिकित्सा, खेल और चर्च के नामी-गिरामी लोगों के भी नाम आये। कुछ पर जाँच और कानूनी कार्रवाइयाँ शुरू हुईं, कुछ इस्ती़फे हुए और कुछ पश्चाताप-प्रकटीकरण भी हुए। अभी यह सिलसिला जारी ही है। भारत में इस मुहिम ने ज़ोर पकड़ा जब गुज़रे ज़माने की एक अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने 2008 में एक फिल्मी शूटिंग के दौरान नाना पाटेकर पर यौन-उत्पीड़न का आरोप लगाया। फिर लेखिका विनीता नन्दा ने अभिनेता आलोकनाथ पर ऐसा ही आरोप लगाया। फिर तो एक सिलसिला सा चल पड़ा और फिल्म, संगीत, टी.वी., मीडिया और विज्ञापन की दुनिया के दर्ज़नों ‘इज़्जतदार’ सफेदपोशों की दिमाग़ी रुग्णताओं और आततायीपन के बारे में लोगों को ”विस्फोटक” जानकारियाँ मिलीं। कई लोगों को फिल्मों  और टी.वी. सीरियल्स  आदि के कई प्रोजेक्ट छोड़ने पड़े। ऐसे ही एक आरोपी विनोद दुआ की जाँच होने तक ‘वायर’ न्यूज़ पोर्टल ने उनके कार्यक्रम को रोक दिया। पर सबसे महत्वटपूर्ण घटना थी क़रीब 20 पूर्व सहकर्मियों द्वारा बलात्कार और यौन-उत्पीड़न के आरोपों के बाद मोदी-मंत्रिमण्ड्ल से भूतपूर्व दिग्ग़ज पत्रकार एम.जे. अकबर का इस्तीफा, प्रसंगवश, एक और दिलचस्प तथ्य इस संदर्भ में यह है कि यूँ तो छद्मवामियों, लिबरलों और एन.जी.ओ. पंथियों में लम्पटों की कमी नहीं है, लेकिन भारत मे अबतक ‘मी टू’ के दौरान जो चेहरे नंगे हुए हैं, उनमें चन्द  अपवादों को छोड़कर, अधिकांश की संघी राजनीति या धुर-दक्षिणपन्थी राजनीति के किसी न किसी शेड से क़रीबी बनती है। बहरहाल, यह मूल प्रतिपाद्य न होकर अवांतर प्रसंग है, अत: मूल विषय पर वापस लौटें।

मेरी आपत्ति या आलोचना का एक केंद्रीय  बिन्दु यह है कि ‘तदनुभूति के ज़रिए सशक्तिकरण’ बुर्जुआ दायरे के किसी जनवादी अधिकार आन्दोनलन जितना भी सम्भावनासम्पन्न‍ नहीं है। अपने उत्पीड़न के विरुद्ध किसी व्यक्ति का बोलना तभी एक फलदायी प्रक्रिया बन सकता है जब ऐसी सभी आवाज़ें एक सामूहिकता में संघटित हों और उस सामाजिक व्य़वस्था को निशाने पर लेते हुए सड़कों पर लामबंद होने की दिशा में आगे बढ़ें जो ऐसे तमाम उत्पीड़नों की जन्मदात्री है। ‘मी टू’ के दौरान बेनकाब होने वाले चेहरे, मु‍मकिन है कि, कुछ समय तक सकपका जायें या चुप्पी साध जायें, चन्द लोग फिल्मों आदि के प्रोजेक्ट से (कुछ समय के लिए) निकाले जा सकते हैं, पर आप देख लीजियेगा, ऐसे तमाम लोग कुछ समय बीतते ही अपने सामाजिक रुतबे और बेशर्म हँसी के साथ फिर से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होंगे क्योंकि समाज में वर्चस्वशील पुरुषस्वामित्ववाद उन्हें पूरा सहारा-संरक्षण और प्रोत्साहन देगा। मीडिया, मनोरंजन उद्योग राजनीति और साम‍ाजिक जीवन के हर क्षेत्र में मौजूद यौन-ड्रैक्युला गले में दाँत धँसा देने के लिए स्त्रियों पर फिर भी घात लगाये रहेंगे। बस, अब वे यह काम थोड़ा अधिक चौकन्ना होकर करेंगे। और अगर स्थिति में थोड़ा-बहुत मात्रात्मक अन्तर आ ही जाये, तो इससे भला क्या‍ फ़र्क पड़ जायेगा। ज़रूरत इस बात की है कि संघर्ष के निम्न और प्रचारपरक रूपों के साथ-साथ स्त्री -विरोधी सांस्थानिक हिंसा और सांस्थानिक यौन-उत्पीड़न के रूपों के विरुद्ध संघर्ष की एक दीर्घकालिक रणनीति पर काम किया जाये। ‘मी टू’ अगर इस लम्बी यात्रा का एक प्रारम्भिक कदम होता तो हमारी कोई आपत्ति नहीं होती। लेकिन इसे जिस तरह ‘ग्लैमराइज़’ और ‘ग्लो‍रीफाई’ किया जा रहा है, उससे यह चौंक-चमत्कार भरे कुलीनतावादी प्रतीकवाद की चौहद्दियों में गिरफ्तार होकर रह जा रहा है।

दूसरा नुक्ता इसी पहले नुक्ते से जुड़ा हुआ है। ‘मी टू’ सामाजिक ढाँचे को नहीं, व्यक्ति को निशाने पर लेता है और बात इससे आगे जाती ही नहीं। नतीज़तन, सारा मामला सनसनीखेज बनकर रह जाता है और कालान्तर में बासी पड़कर मर जाता है। एक तीसरा नुक्ता यह भी उठाया जा सकता है कि ‘नेमिंग-शेमिंग’ का यह फॉर्म कानूनी कार्रवाई के दायरे से अलग ‘मीडिया ट्रायल’ का एक ऐसा रूप बन सकता है, जिसमें कोई अपना व्‍यक्तिगत हिसाब-किताब भी चुकता कर सकता है। बुर्जुआ न्याय सिद्धान्त  भी अधिकांश लोगों के अपराधी होने के तर्क से किसी एक बेगुनाह के अपराधी सिद्ध किये जाने का औचित्य-प्रतिपादन नहीं करता। इस कोण से भी इस प्रश्न पर सोचा जाना चाहिए।

चौथा बिन्दु यह है कि घरों और कार्यस्थलों पर यौन-उत्पीड़न के विविध रूपों का सर्वाधिक शिकार होने वाली मेहनतकश स्त्रियों और आम मध्य वर्गीय गृहिणियों की आबादी इस ‘मी टू’ मुहिम के एकदम बाहर है। सोशल मीडिया (जो इस मुहिम का मुख्य ”रणक्षेत्र” है) आम मेहनतकश स्त्रियों का जनवादी स्पेस है ही नहीं। इस रूप में ‘मी टू’ मुहिम न सिर्फ एक आन्दोलन नहीं है, बल्कि इसका एक स्पष्ट कुलीनतावादी चरित्र है।

सामाजिक आन्दोलन वाले मसले को स्पष्ट करने के लिए मैं एक उदाहरण देना चाहूँगी। फरवरी 2017 में एक मलयालम अभिनेत्री पर कुछ गुण्डों  ने हमला किया जिसके पीछे मलयालम अभिनेता दिलीप का हाथ पाया गया और वह जुलाई 2017 में गिरफ्तार हो गया। मामला कोर्ट में आज तक चल रहा है। फिर एक कास्टिंग डायरेक्टर टेस जोसेफ ने टि्वटर पर अभिनेता मुकेश पर यौन-उत्पीड़न का आरोप लगाया। यह मामला तब तूल पकड़ गया जब मलयालम फिल्म कलाकार संघ ने दिलीप की सदस्यता फिर से बहाल कर दी। फिर मलयालम फिल्मों की स्त्री  कलाकारों ने ‘वुमन इन सिनेमा कलेक्टिव’ नामक संगठन बनाकर सड़कों पर मोर्चा खोला। फिल्म कलाकार संघ को बाध्य होकर दिलीप को बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा। यह मलयालम फिल्म उद्योग में हावी पुरुष वर्चस्वरवाद के खिलाफ एक संगठित आन्दोलन था, जो तात्कालिक तौर पर भी सफल रहा और जिसने आगे के लिए भी एक रास्ता  खोला। यह ‘मी टू’ जैसा सनसनीखेज प्रतीकवाद नहीं था।

एक और उदाहरण। एक बुर्जुआ नारीवादी ने झुँझलाकर कहा कि तुमलोग तो उसी आन्दोलन को सपोर्ट करोगे, जो समाजवाद और स्त्रियों की पूर्ण मुक्ति तक जाता हो। मैंने उन्हें बताया कि ऐसा कत्तई नहीं है। हम बुर्जुआ दायरे के भीतर सुधार और जनवादी अधिकार के हर आन्दोलन का समर्थन करते हैं, सिर्फ सुधारवाद, प्रतीकवाद और कुलीनतावाद का विरोध करते हैं। जैसे ‘पिंजरा तोड़ो’ आन्दोलन दिल्ली और पंजाब में कुछ लड़कियों की व्यक्तिगत पहलकदमी पर शुरु हुआ। पर जल्दी ही देश के दर्जनों विश्वविद्यालयों में यह उन छात्राओं का सड़क का आन्दोलन बन गया जो चाहती थीं कि उनको भी देर रात तक पुस्तकालयों में बैठने की छूट हो और छात्रावासों के फाटक शाम सात बजे ही बन्द करके आवाजाही या मिलने-जुलने पर रोक न लगायी जाये। इस तरह ‘पिंजरा तोड़ो’ प्रतीक के सीमान्तों का अतिक्रमण करके जनवादी अधिकार का एक जुझारू आन्दोलन बन गया जिसे शासन-प्रशासन के दमन तक का सामना करना पड़ा। यह जनवादी अधिकार और सुधार का जुझारू आन्दोलन था, जिसका पुरज़ोर समर्थन लाज़ि‍मी तौर पर किया ही जाना था। यह ‘मी टू’ के प्रत‍ीकवाद से एकदम भिन्न था।

अन्त‍ में, यह बात विशेष तौर पर उल्लेखनीय है कि बुर्जुआ मीडिया और सोशल मीडिया (जिसपर वाम के नाम पर लिबरल और सामाजिक जनवादी छाये हुए हैं) जब ‘मी टू’ जैसी किसी मुहिम के आकार और महत्व को वास्तविकता से कई गुना अधिक बढ़ाकर आच्‍छादनकारी रूप में पेश करते हैं तो प्रकारान्तर से स्त्री  मुक्ति के सभी पक्षों को, सभी सरोकारों को और सभी मुद्दों को यौनिकता और यौन मुक्ति में रिड्यूस कर देते हैं। यही छल-प्रपंच पचास और साठ के दशक में आधुनिकतावादी बुर्जुआ नारीवाद की विविध उपधाराओं ने विविध रूपों में किया था और आज उत्तर-आधुनिकतावादी बुर्जुआ नारीवाद की विविध सरणियाँ भी विविध रूपों में यही कर रही हैं।

(मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान,जुलाई-दिसम्बर 2018 में प्रकाशित)
http://ahwanmag.com/archives/7424

Wednesday, March 13, 2019

ब्राजील में फासिस्ट बोलसोनारो की जीत, विश्व स्तर पर नया फासिस्ट उभार और आने वाले समय की चुनौतियाँ


कविता कृष्णपल्लवी

विश्व पूँजीवाद असाध्य ढाँचागत संकट से ग्रस्त है। यह दीर्घकालिक संकट थोड़ा दबता, फिर उभड़ता, 1970 के दशक से ही जारी है। अर्थव्यवस्था का इस हद तक अतिवित्तीयकरण पूँजीवाद के इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया था। इन्हीं  बुनियादी कारणों के चलते, आज पूरे विश्व स्तर पर बुर्जुआ जनवाद का स्पेस सिकुड़ रहा है, बुर्जुआ सत्ताएँ ज्यादा से ज्यादा निरंकुश दमनकारी हो रही हैं और पूरी दुनिया में विभिन्न रूपों में फासिस्ट उभार हो रहा है। पश्चिम से लेकर पूरब तक, और उत्तर से लेकर दक्षिण तक, बुर्जुआ समाज फासिज़्म की उर्वर नर्सरी बन चुका है। कई देशों में फासिस्ट हुकूमत पर काबिज हैं या होने की स्थिति में हैं और कई देशों में फासिस्ट प्रकृति के उग्र मूलतत्ववादी (फण्डामेण्टेलिस्ट) आन्दोलन चल रहे हैं।

आज के फासिस्टों की अपने देश से बाहर सैन्य आक्रामकता 1920 और 1930 के दशक के ज़र्मनी, इटली के फासिस्टों  जैसी भले न हो, लेकिन देश के भीतर मेहनतकशों, धार्मिक-नस्ली-राष्ट्रीय अल्पसंख्यकों और स्त्रियों पर अत्याचार और दमन करने में ये ज़रा भी पीछे नहीं है। यह भी ध्याान देने की बात है कि दुनिया की जितनी बड़ी आबादी आज सीधे फासिस्ट‍ हुकूमतों या धुरदक्षिणपन्थी के मातहत हैं, वह दूसरे विश्वयुद्ध के पहले के फासिस्ट-शासित देशों से बहुत अधिक है। 1 अरब 30 करोड़ आबादी वाले भारत पर रा.ज.ग. के लग्गू‍-भग्गुओं के साथ मोदी के नेतृत्व में फासिस्ट भाजपा शासन कर रही है। क़रीब 8 करोड़ आबादी वाले तुर्की पर एर्दोगान की धुर-दक्षिणपन्थी पार्टी शासन कर रही है। 10.49 करोड़ की आबादी वाले फिलीपीन्स का शासक दुआर्ते भी क्वा्सी-फासिस्ट है। 4.48 करोड़ आबादी वाले उक्रेन की सत्ता  भी फासिस्टोंे के हाथ में है। और 87.1 लाख आबादी वाले इस्रायल के बर्बर जायनिस्ट फासिस्टों के काले कारनामों से भला कौन परिचित नहीं।

अभी एक महत्वभपूर्ण घटना यह घटी है कि ब्राजील (20.93करोड़) के राष्ट्रपति चुनाव में फासिस्ट  उम्मीदवार जायर बोलसोनारो (55.1 प्रतिशत वोट) ने लूला की वर्कर्स पार्टी के उम्मीदवार फर्नाण्डो  हद्दाद (44.9 प्रतिशत वोट) को पराजित कर दिया है। इतने देशों की सत्ता फासिस्टों  के हाथ में है और यूरोप से लेकर एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के कई देशों में या तो सशक्त फासिस्ट आन्दोलन मौजूद हैं या फासिस्टि पार्टियाँ सत्ता में आने के लिए जी तोड़ कोशिश कर रही हैं। जाहिर है कि जो धुर-दक्षिणपन्थी निरंकुश बुर्जुआ सत्ता्एँ हैं उनका इन फासिस्टी सत्ताओं से निकट सम्बन्ध- है और परस्पर प्रतिपर्द्धारत साम्राज्यवादी शक्तियाँ भी इन्हें अपने पक्ष में लेने के लिए भरपूर मदद करती रहती हैं।

आज की ये फासिस्ट सत्ताएँ विश्व बाज़ार पर वर्चस्व की महत्वाकांक्षा पालने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन इनकी क्षेत्रीय विस्तारवादी व प्रभुत्ववादी महत्वाकांक्षाएँ ज़रूर हैं। भारतीय फासिस्ट  भारतीय उपमहाद्वीप में, अपनी धौंसपट्टी दिखाते हैं। दुआर्ते आसपास के देशों को धमकाता है। तुर्की यूरोप में अपनी दख़ल बढ़ाने के साथ ही अरब देशों में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। उक्रेन पश्चिमी शह पर रूसी खेमे से टकराता है। इस्रायल फिलिस्तीन पर कहर बरपा करने के साथ ही कई अरब देशों की ज़मीन दबाये बैठा है और मध्य पूर्व में अमेरिकी सैनिक चेकपोस्ट का काम करता है। भूमण्डलीकरण के इस दौर में दुनिया के सभी साम्राज्यवादी देशों की पूँजी जिस तरह सभी देशों में लगी है, उसे देखते हुए आज यह सम्भावना बहुत कम है कि अन्तर-साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा का विस्फोट किसी विश्वयुद्ध के रूप में हो। दूसरी बात यह कि गत दो विश्वयुद्धों से और उनके बाद होने वाली क्रान्तियों से साम्राज्यवादियों ने भी सबक लिया है। अत: ज्यादा सम्भावना यही है कि आज की पूँजीवादी दुनिया के अन्तरविरोध क्षेत्रीय युद्धों के रूप मे फूटते रहेंगे। आज अरब भूभाग में यह हो रहा है, कल को अफ्रीका, लातिन अमेरिका, मध्य एशिया या एशिया का कोई और भाग भी साम्राज्यवादियों और क्षेत्रीय बुर्जुआ शक्तियों की आपसी ज़ोर-आजमाइश का केन्द्र हो सकता है। इन क्षेत्रीय युद्धों में प्रभुत्ववादी महत्वाकांक्षा वाली फासिस्ट सत्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका होगी, बेशक़ यह भूमिका इस या उस साम्राज्यवादी शक्ति के साथ गठजोड़ करके ही बनेगी।

लेकिन मुख्य बात यह है कि मुख्यत: तीसरी दुनिया के देशों में केन्द्रित फासिस्ट शक्तियों की भूमिका अन्तरराष्ट्रीय पटल पर नहींं, बल्कि सम्बन्धित देशों के भीतर बनेगी। ये फासिस्ट  नवउदारवाद की नीतियों को देशी बुर्जुआ वर्ग और साम्राज्यवादियों के हक़ मे लोहे के हाथों से लागू करेंगे और आर्थिक तबाही-बर्बादी के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाली जनता को बेरहमी के साथ कुचलेंगे। बीसवीं शताब्दी में फासिस्ट  शक्तियों को नेस्त़नाबूद करने में समाजवादी सोवियत संघ ने सर्वप्रमुख भूमिका निभायी थी। आज विश्व-पटल पर न तो कोई समाजवादी देश या शिविर मौज़ूद है, न ही विश्वभयुद्ध जैसी किसी स्थिति की अधिक सम्भावना है। ऐसी सूरत में तय है कि विभिन्न देशों में सत्तारूढ़, या शक्तिशाली होती जा रही फासिस्ट  ताकतों से फैसलाकुन युद्ध की तैयारी मेहनतकश जन समुदाय को अपने बूते करनी होगी और अपने बूते ही उन्हें निर्णायक शिकस्त देनी होगी। पूँजीवाद के असाध्य ढाँचागत संकट से पैदा हुआ इक्कीस्वीं सदी का फासिज़म अब पूँजीवाद के जीवनपर्यन्त बना रहेगा, और सत्ता में न रहने की स्थिति में भी सामाजिक उत्पादत-उपद्रव मचाता रहेगा। दूसरी बाद, आज की दुनिया में नवउदारवाद को आम सहमति की नीति मान लेने के बाद, कोई भी बुर्जुआ या साम‍ाजिक जनवादी पार्टी फासिज्म विरोधी क्रान्तिकारी संयुक्त मोर्चे को हिस्सा नहीं बनाया जा सकता है। इस मोर्चे में मज़दूर वर्ग की क्रान्तिकारी पार्टी के अतिरिक्त अन्य विभिन्न मज़दूर आन्दोंलन के प्ले टफार्म, मेहनतकश वर्गों के संगठन और निम्न-बुर्जुआ वर्ग के कुछ रैडिकल संगठन ही शामिल हो सकते हैं।

मुख्य बात यह ध्यान में रखने की है कि फासिज़्म विरोधी संघर्ष का सवाल किसी फासिस्ट पार्टी को संसदीय चुनाव में हराने का सवाल नहीं है। चुनाव हारकर भी फासिस्ट समाज में अपनी प्रतिक्रान्तिकारी कार्रवाइयाँ जारी रखेंगे। फासिज़्म निम्न बुर्जुआ वर्ग का तृणमूल स्तर से (एक कैडर आधारित दल द्वारा) संगठित धुर-प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन (एक रूमानी उभार) है, जिसे मेहनतकश वर्गों का जुझारू प्रगतिशील सामाजिक आन्दोलन तृणमूल स्तर से खड़ा करके ही पीछे धकेला जा सकता है।

ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव में फासिस्ट बोलसोनारो की जीत ने स्पष्ट कर दिया है कि संकटग्रस्त बुर्जुआ वर्ग ने अपनी रक्षा के लिए कुत्तेु की जंज़ीर को ढीला छोड़ दिया है। दैत्य-दुर्ग के पिछवाड़े सम्‍भावित तूफान से आतंकित अमेरिकी साम्राज्यवाद भी इस फासिस्ट की पीठ पर खड़ा है। एक दिलचस्प जानकारी यह भी है कि जायर बोलसोनारो इतालवी-जर्मन मूल का ब्राजीली नागरिक है। उसका नाना हिटलर की नात्सी सेना में सिपाही था। ब्राजील में बोलसोनारो का सत्तारूढ़ होना अपने-आप में इस सच्चाई को साबित करता है कि तथा‍कथित समाजवाद का जो नया सामाजिक जनवादी मॉडल लातिन अमेरिका के कई देशों में गत क़रीब दो दशकों के दौरान स्थापित हुआ था (जिसके हमारे देश के संसदीय जड़वामन वामपन्थी भी खूब मुरीद हो गये थे), वह सामाजिक जनवादी गुलाबी लहर (‘पिंक टाइड’) भी अब उतार पर है। दरअसल यह तथाकथित समाजवाद (चाहे वह लूला का समझौतापरस्ता चेहरे वाला हो या शावेज़ का गरम चेहरे वाला) बुर्जुआ “कल्याणकारी राज्य’’ का ही एक नया सामाजिक जनवादी संस्करण है। इन सभी लातिन अमेरिकी देशों में जो लोकप्रिय सरकारें क़ायम हुई थीं, उन्होंने बुर्जुआ राज्यसत्ता का ध्वंस करके सर्वहारा राज्यसत्ता की स्थापना नहीं की थी। बुर्जुआ सामाजिक ढाँचे और बुर्जुआ हितों को बरक़रार रखते हुए इन सरकारों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के क्षेत्र में कुछ सुधारपरक कदम उठाये थे और कुछ सेक्टरों में राष्ट्रीकरण के काम को अंजाम दिया था। अब कोई मतिमन्दा ही मात्र इन कदमों के आधार पर किसी सत्ता को समाजवाद कह सकता है। लातिन अमेरिका में चीले में आयेन्दे के तख़्तापलट और निकारागुआ में सान्दिनिस्ता के नवउदारवादी विपथगमन की घटनाएँ पहले भी घट चुकी हैं। अभी जो समाजवाद नामधारी “कल्याणकारी राज्य’’ चल रहे हैं, बुर्जुआ दायरे में वे एक सीमा तक जनता को कुछ दे सकते हैं। फिर सन्तृप्तिबिन्दु पर पहुँचकर उनको संकटग्रस्त’ होना ही है। ऐसी स्थिति में वे या तो स्वयं निकारागुआ के सान्दिनिस्ता  की तरह नवउदारवाद की राह पकड़ सकते हैं, या फिर अमेरिका समर्थित तख़्तापलट के शिकार हो सकते हैं, या फिर ब्राजील जैसे बुर्जुआ संसदीय चुनाव में उन्हेंे हराकार कोई धुर-दक्षिणपन्थी या फासिस्ट पार्टी सत्ता रूढ़ हो सकती है।

ब्राजील का अनुभव एक बार फिर यही सिद्ध करता है कि फासिज़्म या हर प्रकार की धुर-दक्षिणपन्थी राजनीति के उभार का मुकाबला सामाजिक जनवाद या संसदीय वामपंथ की कोई “गुलाबी लहर’’ नहींं कर सकती। जबतक दुनिया में एक सच्ची क्रान्तिकारी लाल लहर नहीं संगठित होगी, फासिज़्म और धुर-दक्षिणपन्थी राजनीति की बर्बरता और कहर को दुनिया झेलती रहेगी।

(मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान,जुलाई-दिसम्बर 2018 में प्रकाशित)
http://ahwanmag.com/archives/7487

Tuesday, March 12, 2019


मुझमें साँस लेती है आज़ादी ।

मेरा ज़ेहन सपनों की वादी है ।

बग़ावत मेरी धमनियों-शिराओं में

खून बनकर बहती है ।

कितनी-कितनी हारों के बाद भी

दिल मेरा तैयार नहीं छोड़ने को

लड़ते रहने की जिद ।

कई बार काटे गए मेरे पंख

पर रात भर में ही

वे फिर उग आये

और मैं निकल पड़ी खुले आकाश में

तूफानों के प्रदेश की यात्रा पर ।

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आज़ादी और सम्मान के लिए लगातार लड़ते रहने की ज़िद के नाम !

(8मार्च, 2019)

Monday, March 11, 2019

नंग नौटंकी का नया सीन


पुलवामा के बाद देशभक्ति का शोर मचाकर और ''बदला-बदला', 'एक-एक को चुनकर मारूँगा', 'घुसकर मारूँगा' आदि-आदि चिल्लाते हुए और वीर रस की सड़क छाप तुकबंदी सुनाते हुए, उतरी हुई चड्ढी उसने फिर से चढ़ा ली थी ! पर आज 'हिन्दू' अखबार में सात कालम का एक और लेख लिखकर एन. राम ने फिर से चड्ढी खींच दी I चौकीदार जो कि चोर था, फिर नंगा हो गया ! एन. राम ने सवाल उठाया है कि सौदे से बैंक गारंटी की शर्त क्यों हटाई गयी जबकि इसका सीधा मतलब है, ज्यादा मँहगे दामों पर रफाएल खरीदना ! यह किसको लाभ पहुँचाने के लिए किया गया ?

अब इन बेशर्म नंगों की नंगई की नयी ऊँचाई देखिये ! सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल वेणुगोपाल ने बेंच को बताया कि रफाएल से सम्बंधित फाइलें रक्षा मंत्रालय से चोरी हो गयी हैं, अतः वे उन्हें पेश कर पाने में असमर्थ हैं ( अब लगे हाथों आप यह भी याद कर लीजिये कि कितने विवादास्पद मामलों की फाइलों अबतक मंत्रालयों में या तो रहस्यमय ढंग से आग लग चुकी है या वे चोरी हो चुकी हैं ) I जनाब अटॉर्नी जनरल साब यहीं नहीं रुके ! उन्होंने यह भी इंगित किया कि 'हिन्दू' में प्रकाशित रिपोर्ट उन्हीं चोरी गई फाइलों पर आधारित हैं ! यानी फाइलों की चोरी एन. राम ने करवाई ! चलो, थोड़ी देर के लिए यह मान भी लें, तो यह भी तो मानना पड़ेगा कि उन फाइलों पर आधारित 'हिन्दू' की रिपोर्ट सत्य है ! गजब बौड़म वकील है भाई ! दूसरे पर गू फेंकने की कोशिश में अपने ही हाथों में गू लभेर लिया ! उधर एन. राम ने भी चैलेंज कर दिया है,' कोई भी ताक़त उन्हें स्रोत बताने के लिए मज़बूर नहीं कर सकती !'

जब प्रशांत भूषण ने 'हिन्दू' में आज छपी रिपोर्ट कोर्ट में पढ़ने की कोशिश की तो वेणुगोपाल ने यह कहकर उसका विरोध किया कि 'हिन्दू' की यह रिपोर्ट चुराए गए डाक्यूमेंट्स पर आधारित है और सुनवाई के बीच इसका प्रकाशन कोर्ट को प्रभावित करने की कोशिश है, अतः यह कोर्ट की अवमानना है ! लेकिन गौरतलब बात यह है कि मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने भी यह कह दिया कि जो सामग्री मुख्य केस में बेंच के समक्ष पहले से ही विचारार्थ मौजूद है, उसके अतिरिक्त बाद में प्रस्तुत किसी दस्तावेज़ या पूरक एफिडेविट का संज्ञान नहीं लिया जाएगा ! सवाल है कि क्यों नहीं लिया जाएगा ? ऐसे मामलों में तो सुप्रीम कोर्ट को तमाम तथ्यों को, अगर कोई कोर्ट में प्रस्तुत न करे, तो भी, स्वतः संज्ञान में लेना चाहिए ! ऐसा होता भी रहा है !

माननीय न्यायमूर्ति ! डाक्यूमेंट्स 'हिन्दू' वालों ने चुराए या नहीं, उसपर आप कोई विशेष जाँच बैठा देते, पर बकौल वेणुगोपाल, अगर 'हिन्दू' की रिपोर्ट उन्ही दस्तावेजों पर आधारित है, तब तो उन्हें सही मानकर आपको इस सरकार के ख़िलाफ़ निर्णय पर पहुँचने में कोई देर होनी ही नहीं चाहिए !

न्याय का इससे बड़ा मखौल क्या हो सकता है कि जिन तथ्यों पर कोर्ट फैसला दे रहा है, वे उसे सरकार ने बंद लिफ़ाफ़े में सौंपे थे और जो तथ्य डंके की चोट पर, चुनौती के साथ, खुल्लमखुल्ला अखबार में धारावाहिक छप रहे हैं, कोर्ट उन्हें संज्ञान में लेने के लिए तैयार ही नहीं है !

लेकिन भई, जो भी हो, एक बात है, यह प्रधान सेवक और चौकीदार जब खुद अपने गिरोह सहित नंगा हो रहा है तो पूरे बुर्जुआ सिस्टम के पजामे का नाड़ा खींच रहा है ! इसके इस "महान अवदान" को तो स्वीकार करना ही पड़ेगा ! मुझे तो अवकाशप्राप्त न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू का वह आरोप भी अनायास ही, बेसाख्ता याद आ रहा है ! अरे वही सौदे वाली बात जो बकौल काटजू साब, मुख्य न्यायाधीश बनने के पहले मोदी और गोगोई के बीच हो गया था ! अब काटजू साब ने ऐसा कहा था, सच क्या है, राम जाने !

अब लगे हाथों आज की यह खबर भी जान लीजिये ! उधर जब सभी देशभक्ति के जुनून में डूबे हुए थे, तब पूँजीपतियों के कमीशन एजेंटों के इस गिरोह ने देश के पाँच हवाई अड्डे अदानी को सौंपने के बाद आज चारबाग, चंडीगढ़, हरिद्वार और अमृतसर सहित उत्तर रेलवे के पाँच ऐतिहासिक स्टेशनों को भी 99 वर्षों की लीज पर पूँजीपतियों को सौंपने का निर्णय किया है ! खबर है कि जल्दी ही कई और स्टेशनों की बारी आने वाली है ! आप कविता सुनते रहिये,'मैं देश नहीं बिकने दूँगा... वगैरा-वगैरा ... और बोलिए, भा मा की जै...

#मोदी_है_तो_मुमकिन_है

(6मार्च, 2019)

Sunday, March 10, 2019

सपने देखने के बारे में पीसारेव के विचार मार्फ़त लेनिन


(व्यवहारवादी (प्रैग्मेटिस्ट) और दुनियादार लोग "ठोस वास्तविकता" के करीब होने के नाम पर सपना देखने की खिल्ली उड़ाते हैं ! जिनके पास कभी कोई भविष्य-स्वप्न नहीं होता, इरादों और मंसूबों की कोई ऊँची उड़ान भी उनके पास नहीं होती ! वे कभी नव-सृजन के किसी अभियान के हिरावल नहीं बन पाते ! लेनिन ने ऐसे "अतिव्यावहारिक" कम्युनिस्टों की खिल्ली उड़ाते हुए यहाँ उन्नीसवीं शताब्दी के सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी जनवादी लेखक पीसारेव को उद्धृत किया है ! )

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"हमें स्वप्न देखना चाहिए !" ये शब्द लिखते ही मैं एकाएक चौंक पड़ा I मुझे लगा मानो मैं "एकता सम्मलेन" में बैठा हुआ हूँ और मेरे सामने 'राबोचेये देलो' के सम्पादक तथा लेखक-गण बैठे हुए हैं I साथी मार्तीनोव उठते हैं और मेरी और रुख करके बड़ी कठोर मुद्रा के साथ कहते हैं : " जनाब, मुझे यह प्रश्न करने की इजाज़त दीजिये कि क्या किसी स्वायत्त सम्पादक-मण्डल को पहले पार्टी समितियों की राय लिए बिना सपना देखने का अधिकार है ?" और उनके बाद साथी क्रिचेव्स्की उठते हैं और वह ( साथी प्लेखानोव को बहुत पहले ही ज़्यादा गूढ़ बनाने वाले साथी मार्तीनोव को भी दार्शनिक ढंग से और गूढ़ बनाते हुए ) और भी अधिक कठोर मुद्रा के साथ कहते हैं : "मैं और आगे जाता हूँ I मैं पूछता हूँ कि क्या किसी मार्क्सवादी को सपना देखने का कोई अधिकार है, जबकि वह जानता है कि मार्क्स के मतानुसार मानव जाति अपने सामने सदा ऐसे कार्यभार रखती है जिन्हें वह पूरा कर सकती है, और यह कि कार्यनीति पार्टी के कामों के विकास की प्रक्रिया है, जो पार्टी के विकास के साथ-साथ बढ़ रहे हैं ?"

इन कठोर प्रश्नों का विचार मात्र मेरा खून सर्द कर देता है और मेरे मन में सिवा इसके और कोई इच्छा नहीं रह जाती कि कहीं कोई ऐसी जगह मिल जाए जहाँ मैं छिप जाऊँ I सो मैं पीसारेव की आड़ लेने की कोशिश करूँगा I

पीसारेव ने सपनों और वास्तविकता के टकराव के विषय में लिखा था : "टकराव कई तरह का होता है I हो सकता है कि मेरा सपना स्वाभाविक घटना-क्रम से आगे चला जाए या घटनाओं की दिशा से बिलकुल अलग एक ऐसी दिशा में चला जाए, जिसमें घटनाओं का स्वाभाविक प्रवाह कभी नहीं जाएगा I पहली सूरत में मेरे सपने से किसी प्रकार की हानि नहीं होगी, बल्कि संभव है कि उससे श्रमजीवी मानव की क्रियाशीलता को बल मिले और उसमें नया जोश आ जाए ... ऐसे सपनों में कोई बात ऐसी नहीं होती, जिससे श्रमिकों की शक्ति के बहक जाने या पंगु हो जाने का खतरा हो I इसके विपरीत, यदि मनुष्य इसप्रकार सपना देखने की क्षमता से बिलकुल वंचित कर दिया जाये, यदि वह समय-समय पर घटनाओं से आगे निकल जाने और जिस चीज़ को तैयार करने में अभी उसने हाथ ही लगाया है, उसकी पूरी मानसिक तस्वीर न बना सके, तो मैं इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता कि फिर मनुष्य को कला और विज्ञान तथा व्यावहारिक प्रयासों के क्षेत्र में व्यापक और श्रमसाध्य कार्य का बीड़ा उठाने और उसे पूरा करने की प्रेरणा कहाँ से मिल पायेगी ... सपनों तथा वास्तविकता के टकराव से कोई हानि नहीं होती है, पर शर्त सिर्फ़ यह है कि सपना देखने वाला व्यक्ति अपने स्वप्न में सचमुच विश्वास करता हो, जीवन का ध्यानपूर्वक अवलोकन करते हुए जीवन के तथ्यों का अपनी कल्पना के महलों से मिलान करता रहता हो और आम तौर से अपने सपनों को साकार करने के लिए ईमानदारी से काम करता हो I यदि सपनों का जीवन से थोड़ा सा भी सम्बन्ध है, तो सब ठीक है I"

-- लेनिन
( 'क्या करें' पुस्तक में सपनों के बारे में पीसारेव को उद्धृत करते हुए )

Saturday, March 09, 2019


हिस्स... हिस्स...हुंह ... हुंह ... फों...फों...गुर्र...गुर्र...भौं...भौं... हौं...हौं...घर में घुस के मारूँगा...गिन-गिन के लगाऊँगा...एक-एक का हिसाब होगा ... छट्ठी का दूध याद दिला दूँगा...माई का लाल है तो आ जा ... सारा बकाया चुकता कर दूँगा...सारा ... घुसेड़ दूँगा ...@#$%^&*+...+_*&^%$#@ ... ये देश है वीर जवानों का... भारत माता की जै ...बचना ऐ ...लो मैं आ गया ...

यह है बीमार, सड़ते हुए भारतीय पूँजीवाद का नायक ! इतिहास का एक वीभत्स प्रहसन जारी है I राजनीति के मंच पर टपोरियों, लम्पटों, लफंगों, तड़ीपारों और गली के गुंडों की धमाचौकड़ी चरम पर है !

लेकिन किसी भ्रम में रहने की ज़रूरत नहीं है ! मंच पर कोहराम है, लेकिन परदे के पीछे पूँजी का खूनी खेल व्यवस्थित ढंग से जारी है !

(5मार्च, 2019)



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हरदम झूठ बोलता है !

रोता है ! ड्रामेबाजी करता है !

नौटंकीबाज़ी और सस्ती डायलागबाज़ी करता है !

देशभक्ति की सड़कछाप तुकबंदी दुहराता है, वो भी उधार की !

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और वास्तव में क्या करता है ?

आँकड़ों और दस्तावेजों की जालसाजी करता है !

कुछ ख़ास पूँजीपति घरानों का दल्ला है, उनके बच्चों का 'रामू काका' है !

पुराना हत्यारा है ! कई नरसंहारों और फर्जी मुठभेड़ों को अंजाम दे चुका है !

आतंक का माहौल बनाकर रखता है ! तड़ीपार और गली के गुंडे इसके ख़ास हैं !

किसी लड़की का अपने तड़ीपार दोस्त से निगरानी करवाने जैसी हरक़त भी कर चुका है !

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अब अगर तुम नहीं जानते कि वह कौन है, तो न जाने किस दुनिया में रहते हो ! इतने नादान हो तो बताने का भी क्या फ़ायदा ? मैं नहीं बताऊँगी !

(7मार्च, 2019)


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'तड़-तड़-तड़-तड़-तड़ाक,तड़-तड़-तड़-तड़-तड़ाक', भड़-भड़-भड़-भड़-भड़ाक,भड़-भड़-भड़-भड़-भड़ाक', 'ठूयं-ठायं-ठस्स', 'भोम्म-भोम्म-बड़ाम्म-बड़ाम्म -- यह एच.ए.एल., यानी 'हिंदुत्वा एरोनॉटिक्स लिमिटेड' का युद्धक सह बमवर्षक विमान है ! यह अद्भुत जहाज़ देश के भीतर और बाहर के दुश्मनों के कलेजों में अन्दर तक डर पैठा देता है I जुमलों-डॉयलॉगों-तुकबंदियों की अद्भुत बमबारी करता है I चुनावी मोर्चे फतह करने में गजब प्रभावी है ! आँखों में धूल झोंकने में भी अद्भुत है ! गुबार जब छंटता है, तबतक सबकुछ ग़ायब ! इस जहाज़ के रहते वैसे तो सुखोई, मिराज, यूरो, रफाएल आदि की कोई ज़रूरत ही नहीं थी ! वो तो प्रधान सेवक जी की देश के प्रति चिंता है कि उन्होंने एहतियात के तौर पर रफाएल के लिए भी सौदा कर लिया ! और ये कुछ अहसानफरामोश और देशद्रोही किस्म के लोग हैं जो उसमें भी दलाली खाने का और भैया अनिल अम्बानी को लाभ पहुँचाने का आरोप लगा रहे हैं ! क्या ज़माना है !

(7मार्च, 2019)


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बी.जे.पी. -- भारतीय जुत्तम-जुत्ती पार्टी !

बाक़ी, बालाकोट में मारे थे तीन सौ ही ! सच्ची !

और रफाएल होता तो और मारते ! माँ कसम !

(7मार्च, 2019)



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ए भइया-बहिनी लोगन ! सुनि लेव असल बात ! हम गए रहिन संतोसी माता के कथा सुने बदे I बस एही बीच मौक़ा ताड़िकै ऊ एन. रमवा फइलवे चुराय लिहिस दहिजरा का पूता ! बाक़ी, हम मारे रहिस तीने सौ ! सच्ची ! आउर सुनो ! रफ़ाल बहुते बढ़िया जहाज हौ ! मानो चाहे न मानो, मरजी तोहार !

-- Nirmala Bahinji with Sushma, Hema, Angan wali Tulasi and Menaka Bahinji .

(7मार्च, 2019)


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सिंहासन पर विराजमान राजा तो भयवश विकट ध्वनियुक्त अपानवायुसरण कर रहा है !

राजसभा में बैठे चाटुकार कह रहे हैं कि राजन युद्ध का बिगुल बजा रहे हैं !

(7मार्च, 2019)


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आपको ऐसे बहुतेरे मध्यवर्गीय सहृदय, दयालु, न्यायप्रिय भद्रपुरुष मिलेंगे, जो लाचारों, कातरों, दयनीयों पर थोक भाव से दया करते हैं और करुणा-सहानुभूति की बारिश कर देते हैं I आजकल के उन मज़दूरों पर बहुत कोशिश करके भी उनके भीतर दया की भावना उमड़ती ही नहीं, जो ज़्यादातर युवा होते हैं, बेहद अभावों-परेशानियों में जीते हुए भी दयनीय और लाचार नहीं दीखते, उनकी रीढ़ की हड्डी कमानी की तरह झुकी नहीं होती, वे आँखों में आँखें डालकर बात करते हैं और अपनी शिकायतें साफ़ शब्दों में बयान करते हैं, तथा, गरीबी के बाद भी वे फटेहाल नहीं रहते, साफ़-सुथरे ढंग से, सलीके और फैशन से रहते हैं I मध्यवर्गीय भलेमानस लोग गरीब मेहनतकशों में स्वाभिमान और ख़ुद्दारी नहीं, बल्कि दयनीयता, फटेहाली और लाचारी देखना पसंद करते हैं ! उन्हें दया करने के लिए दयनीय तुच्छ प्राणियों की तलाश रहती है ! बराबरी, स्वाभिमान, लड़ाकूपन आदि से उन्हें तब बहुत चिढ मचती है, जब ये चीज़ें उन्हें उत्पीड़ित लोगों में दीखती हैं ! ऐसे भलेमानस अन्यायपूर्ण व्यवस्था के महत्वपूर्ण खम्भे होते हैं !

(10मार्च, 2019)



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Friday, March 08, 2019

जर्मनी 1945


(गत 28 फरवरी को मैंने बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की आठ छोटी कविताएँ शेयर की थीं जो उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के ठीक पहले लिखी थीं जब पूरा जर्मनी नात्सियों द्वारा भड़काए गए युद्धोन्माद के नशे में डूबा हुआ था ! ब्रेष्ट ने अपनी निम्नलिखित कविता 1945 में युद्ध की समाप्ति के बाद लिखी थी जब पूरे यूरोप और सोवियत संघ पर तबाही का कहर बरपा करने के बाद जर्मनी भी युद्ध में पराजित और पूरी तरह से बर्बाद हो चुका था I युद्धोन्मादी अंधराष्ट्रवाद और फासिस्ट बर्बरता के नतीजे भुगतने के बाद, जर्मनी इस ऐतिहासिक अपराध-बोध में डूबा हुआ था कि वह नात्सियों द्वारा भड़काए गए जुनून में बह गया था जिसकी कीमत पूरी मनुष्यता ने चुकाई ! ब्रेष्ट की यह कविता इसी माहौल और मनःस्थिति को अभिव्यक्त करती है !)

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जर्मनी 1945
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घरों के भीतर प्लेग से मौत है
घरों के बाहर ठण्ड से मौत है
तब हमारा ठिकाना कहाँ हो ?

सुअरी ने हग डाला है अपने बिस्तर पर
सुअरी मेरी माँ है, मैंने कहा :
ओ मेरी माँ, ओ मेरी माँ,
तुमने यह क्या कर डाला मेरे साथ ?
-- बेर्टोल्ट ब्रेष्ट
(अनुवाद : मोहन थपलियाल)

युद्धोन्मादी अन्धराष्ट्रवाद के ख़िलाफ़ दहाड़कर बोलना होगा ! चुप्पी कायरता है !


सुलझे खयालात वाले तरक्कीपसंद बुद्धिजीवी और आम नागरिक भी प्रायः सोचते हैं कि जब युद्धोन्मादी, सैन्यवादी देशभक्ति की लहर चल रही हो तो इसके ख़िलाफ़ खुलकर बोलना न संभव होता है, न व्यावहारिक होता है और न इसका कोई फ़ायदा होता है ! उन्हें लगता है कि उन्मादी फासिस्ट गुण्डे उनपर टूट पड़ेंगे और उन्हें देशद्रोही घोषित कर देंगे और कोई भी उनके साथ नहीं खड़ा होगा ! इसलिए युद्ध की मानसिकता भड़काने के ख़िलाफ़ अगर वे बोलते भी हैं तो अपने को बार-बार देशभक्त और सेना का समर्थक कहते हुए बोलते हैं, मिमियाते हुए बोलते हैं !

हमारा मानना है कि यह कायरता एक भ्रांत धारणा से पैदा होती है I पूरा समाज युद्धोन्माद की लहर में बहने लगता है, यह एक भारी भ्रम है !यह युद्धोन्माद और अंधराष्ट्रवाद की लहर समाज के मध्यवर्गीय खित्तों में सबसे अधिक प्रभावी होती है I सीमा पर जो जवान तोपों के चारे बनते हैं वे बहुसंख्यक मज़दूरों-किसानों के बेटे होते हैं ! ये जो बाबू लोग अपने ड्राइंग रूमों में पॉपकॉर्न खाते हुए न्यूज़ चैनलों के ऐंकरों को चीखते हुए देखकर उछलते हैं, इन्हें असली युद्ध का स्वाद नहीं पता ! देख भर लें तो भी पैन्ट गंदी कर देंगे ! ये युद्धोन्माद में वहशी की तरह चीखते हैं और सोशल मीडिया पर युद्ध के ख़िलाफ़ बोलने वालों को तरह-तरह की गालियाँ देते हैं, पर इनकी बहादुरी भौंकने वाले सड़क के कुत्तों से ज़रा भी ज़्यादा नहीं होती I

इस मध्यवर्गीय परिवेश से बाहर सड़कों पर निकलिए ! शहरों की मज़दूर बस्तियों में जाइए ! रेहड़ी वालों, खोमचेवालों, रिक्शेवालों से बात कीजिए, गाँवों में खेतों में काम कर रहे मज़दूरों से बात कीजिए ! उनमें युद्धोन्मादी देशभक्ति की कहीं कोई लहर नहीं है ! वे अपनी ज़िंदगी की परेशानियों से लड़ रहे हैं और सरकार की सारी धोखाधडियों-मक्कारियों से बखूबी वाकिफ़ हैं ! टीवी चैनलों के प्रभाव में अगर वे थोड़ी-बहुत देशभक्ति और पाकिस्तान-विरोध की बातें करेंगे भी, तो थोड़ी ही देर बाद आपकी बातें सुनने लगेंगे ! आम मेहनतक़श आबादी अब ज़्यादातर खुद ही कह रही है कि मोदी और भाजपा ने अपनी असफलताओं, वायदाखिलाफ़ियों और चरम भ्रष्टाचार को ढँकने के लिए युद्ध का हौव्वा खड़ा किया है ताकि चुनाव में उसका लाभ उठाया जा सके I

यह मैं कोई हवाई बात नहीं कर रही हूँ ! हमलोग मज़दूर बस्तियों में खुलकर युद्धोन्माद फैलाने की साज़िश के ख़िलाफ़ प्रचार कर रहे हैं और लोगों को बता रहे हैं कि चुनावी गोट लाल करने के लिए भाजपा जब मंदिर कार्ड खेलकर धर्मोन्माद नहीं भड़का सकी तो अब देशभक्ति का गेम खेलकर युद्धोन्माद भड़काकर अपना उल्लू सीधा करना चाहती है I इन बस्तियों में संघी गुंडा वाहिनियों के जो कुछ लोग मिलते हैं, उन्हें छोड़कर सभी आम मज़दूर हमलोगों की बातें न सिर्फ़ सुनते हैं, बल्कि बढ़-चढ़कर समर्थन करते हैं I अभी कल 3 मार्च को दिल्ली में जो रोज़गार अधिकार रैली हुई उसमें देश के विभिन्न हिस्सों से आये करीब 8-9 हज़ार स्त्री-पुरुष मज़दूरों और छात्रों-युवाओं ने हिस्सा लिया ! रैली के मुख्य नारों में ये भी नारे थे :'युद्ध नहीं रोज़गार चाहिए' और ' चुनावी लाभ के लिए युद्ध की आग मत भड़काओ !' रैली के बाद हुई सभा में कई वक्ताओं ने खुलकर युद्धोन्माद भड़काने की साज़िश के ख़िलाफ़ अपनी बात रखी और इस बात पर जोर दिया कि अपना उल्लू सीधा करने के लिए दो देशों के पूँजीपति शासक लड़ते हैं और गरीबों के बेटे तोपों के चारे के रूप में इस्तेमाल होते हैं ! वक्ताओं ने साफ़ शब्दों में कहा कि हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के मेहनतकश अवाम की आपस में कोई दुश्मनी नहीं है और उनके असली दुश्मन तो वे हैं जो उनपर शासन करते हैं I मज़दूरों ने और युवाओं ने इन बातों का ज़ोरदार नारों और तालियों के साथ स्वागत किया I Madan Mohan जी ऐसे वरिष्ठ प्रगतिशील हिन्दी कथाकार हैं जो गाँव-देहात के गरीबों के जीवन से करीबी संपर्क रखते हैं ! मेरी एक पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने बताया कि गाँवों में गरीब और मज़दूर आबादी के बीच यह धारणा मज़बूती से स्थापित हो रही है कि अपने चुनावी फायदे के लिए मोदी ने पुलवामा होने दिया ! गाँवों में कहीं भी युद्धोन्मादी देशभक्ति की कोई लहर कम से कम गरीबों के बीच तो नहीं ही है ! जो सोशल डेमोक्रेत, लिबरल और संसदीय वाममार्गी होते हैं, उनका सामाजिक आधार मेहनतक़श आबादी से उजाड़कर मध्यवर्ग और सफेदपोश कुलीन मज़दूरों में सिमट जाता है ! इसीलिये वे मार्क्स-लेनिन का नाम जपते हुए भी करनी काउत्स्की वाली करते हैं और अंधराष्ट्रवाद के विरुद्ध खुलकर बोलने के बजाय खुद को "देशभक्त" साबित करने के लिए तरह-तरह के अवसरवादी करतब करने लगते हैं I

देशभक्ति को सेना और वर्दी से जोड़ देना और उसका लोकेशन देशों की सीमा को बना देना भी एक शासकवर्गीय साज़िश है ! देशभक्ति का असली लोकेशन देश के भीतर होता है I जैसाकि कवि सर्वेश्वर ने अपनी एक कविता में कहा था,'देश कागज़ पर बना नक्शा नहीं होता !' देश बनता है वहाँ की उस बहुसंख्यक जनता से जो अपने श्रम और हुनर और ज्ञान से देश को भौतिक-आत्मिक प्रगति की राह पर आगे बढ़ाती है I इस जनता के हितों के लिए उन लोगों के ख़िलाफ़ खड़ा होना ही सच्ची देशभक्ति है जो परजीवी और लुटेरे हैं और जो अत्याचारी शासन-व्यवस्था के सिरमौर हैं ! आपको बहुत सारे ऐसे "देशभक्त" वामपंथी मिल जायेंगे जो नेताओं की, बुर्जुआ पार्टियों की और पूँजीपतियों की तो आलोचना करेंगे लेकिन साथ में यह भी जोड़ देंगे कि हम अपने देश की बहादुर सेना के साथ हैं जो देश के सीमाओं की रक्षा करती है ! अब ज़रा दिमाग ठंडा करके इस मिथकीय प्रचार पर सोचिये I सीमाओं के आर-पार सारे विवाद और युद्ध पूँजीवादी विश्व में दो देशों के शासक पूँजीपति शुद्ध रूप से अपने हित-साधन के लिए भड़काते हैं ! ये अपने-अपने देशों की जनता के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि उसके दुश्मन होते हैं ! आप सरकार की आलोचना करते हैं और यह कहते हैं कि हम अपने देश की बहादुर सेना के साथ हैं, पर यह बहादुर सेना अपनी देशभक्ति दिखाने के लिए स्वतंत्र नहीं होती ! यह सरकार के हुक्म की गुलाम होती है और हर सरकार पूँजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी होती है ! हर देश की सेना शासक वर्ग के हुक्म की ताबेदार होती है और राज्यसत्ता का मुख्य अंग होती है ! माना कि सेना में अति-विशेषाधिकार-संपन्न अफसरों के नीचे मोर्चे से लेकर कैंटोनमेंट तक में जो हाड़तोड़ और जोखिम भरा जीवन बिताने वाले जवान होते हैं वे आम मज़दूरों-किसानों और निम्न-मध्य वर्ग के घरों से आते हैं ! सेना के किसी रिटायर्ड जवान से मिलिए ! आपको इस सीधे से नंगे सच का अहसास हो जाएगा कि सेना में कोई भी युवा देशभक्ति करने नहीं, बल्कि अपने परिवार का पेट पालने जाता है ! और फिर यह भी होता है कि एक बार बदन पर वर्दी चढ़ जाने के बाद एक गरीब के बेटे का उस गाँव-कसबे में थोड़ा रुआब हो जाता है और उसके परिवार ने जो अपमान के जख्म खाए होते हैं, उनपर यह रुआब मरहम का काम करता है I सेना का जवान भले ही एक गरीब का बेटा होता है, पर उसकी ट्रेनिंग ऐसी होती है कि वह अपनी सारी सामाजिक और वर्गीय चेतना छोड़कर हुक्म बजाने वाला एक यंत्र मानव बनकर रह जाता है I इस नंगी सच्चाई से मुँह नहीं चुराया जा सकता कि बेहद कठिन जीवन और एकाकीपन सेना के जवानों का काफ़ी हद तक अमानवीकरण भी कर देता है Iसेना और अर्धसैनिक बलों की देशभक्ति और वीरता के कसीदे मुम्बइया फिल्मों में, कवि-सम्मेलनों के मंचों पर और न्यूज़ चैनलों पर खूब पढ़े जाते हैं, पर आपको पता होना चाहिए कि इन सशस्त्र बलों ने उत्तर-पूर्व के राज्यों में विद्रोह कुचलने के नाम पर, कश्मीर घाटी में पाकिस्तान-समर्थक आतंकियों को कुचलने के नाम पर और छतीसगढ़ में माओवादियों के सफाए के नाम पर आम लोगों पर जो ज़ुल्म ढाये हैं उनसे मुँह चुरा पाना असंभव है I आप मणिपुर में बलात्कार के बाद मनोरमा की ह्त्या, इरोम शर्मिला की 15 वर्षों तक चलने वाली भूख हड़ताल और असम रेजिमेंट के हेडक्वार्टर के सामने मणिपुर की माओं का नग्न प्रदर्शन भूल गए क्या ? आप छत्तीसगढ में सशस्त्र बलों की "देशभक्तिपूर्ण" कार्रवाइयों के बारे में आदिवासी नेता सोनी सोरी से पूछिए, आदिवासी पत्रकार लिंगाराम से पूछिए, गाँधीवादी कार्यकर्ता Himanshu Kumar से पूछिए, दिली विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर नंदिनी सुन्दर से पूछिये और मानवाधिकारकर्मी सुधा भारद्वाज से पूछिए ! और कश्मीर घाटी की क्या बात की जाये जहाँ सरकारी आँकड़ों के हिसाब से आतंकी तो 6-7 सौ हैं, पर सशस्त्र बल 7 लाख से अधिक तैनात हैं ! वहाँ जाकर सेना की "देशभक्ति" के बारे में आम लोगों से पूछिए ! कुनान-पोशपुरा के बारे में पूछिए जहाँ पूरे दो गाँवों की औरतों के साथ सामूहिक बलात्कार हुए ! शोपियां के सामूहिक बलात्कार के बारे में पूछिए, माछिल और ऐसे तमाम फर्जी मुठभेड़ों के बारे में पूछिए, हज़ारों गुमनाम क़ब्रों और 5000 से भी अधिक ग़ायब लोगों के बारे में पूछिए, शायद आपको सच्चाई का कुछ अहसास हो जाए !

बेशक ऐसे भी युद्ध होते हैं जो देशप्रेम और देश की रक्षा के या गुलामी से मुक्ति के युद्ध होते हैं ! पर इन युद्धों में आक्रान्ता सेना के ख़िलाफ़ कोई वेतनभोगी, यानी भाड़े की सेना नहीं लड़ती बल्कि समूची जनता लड़ती है और अगुवा भूमिका जन सेना निभाती है I जन सेना वेतनभोगियों की सेना नहीं होती I वह उसूली प्रतिबद्धता के आधार पर संगठित क्रांतिकारियों की सशस्त्र टुकड़ी होती है I जैसे जापानी साम्राज्यवाद ने जब चीन पर हमला कर दिया तो उसका प्रतिरोध पूरी जनता ने किया जिसकी हिरावल कम्युनिस्ट पार्टी थी और क्रांतिकारी लाल सेना उसका सशस्त्र दस्ता थी I कोरिया में और वियतनाम में अमेरिकी साम्राज्यवाद का सामरिक मुकाबला भी इसीतरह से जनता ने और उसकी क्रांतिकारी सेना ने किया I हिटलर की सेना ने जब सोवियत संघ पर हमला कर दिया तो उसका प्रतिरोध लाल सेना के साथ ही पूरी जनता ने किया I इतिहास में और पीछे जाएँ, तो ब्रिटिश गुलामी का विरोध करके अमेरिकी क्रान्ति को अंजाम देने वाली जॉर्ज वाशिंगटन की सेना भी भाड़े की सेना नहीं थी, बल्कि एक जन सेना थी I निचोड़ यह कि किसी भी पूँजीवादी शासन के अंतर्गत संगठित प्रशिक्षित वेतनभोगी सेना उन शासक वर्गों के लिए ही काम करती है सरकार जिनकी मैनेजिंग कमेटी होती है ! दो देशों की सीमाओं पर जब सेनायें भिड़ती हैं, तो यह वह मुकाम होता है जब शासक वर्गों का टकराव तीव्र होकर राजनीतिक दायरे से सामरिक दायरे में संक्रमण कर जाता है I इसके अतिरिक्त युद्ध की कई महत्वपूर्ण भूमिकाएँ होती हैं ! युद्ध के द्वारा देशभक्ति की लहर भड़काकर मूल समस्याओं से जनता का ध्यान भटका दिया जाता है और उसकी वर्गीय चेतना को कुंद कर दिया जाता है I फिर यह भी याद रखना चाहिए कि युद्ध उद्योग दुनिया का सबसे बड़ा उद्योग है i सबसे अधिक पूँजी दुनिया में युद्ध-सामग्री बनाने में लगी है I युद्ध और सीमा पर तनाव से हथियार बिकते हैं और साम्राज्यवादी तथा उनके जूनियर पार्टनर पूँजीपति अकूत मुनाफ़ा कूटते हैं ! फिर युद्धों से भयंकर तबाही होती है और पुनर्निर्माण के काम में पूँजी लगाकर पूँजीपति फिर मुनाफ़ा कूटते हैं ! हर युद्ध में देशभक्ति की अफीम चाटकर जनता सारी तबाही झेलती है और पूँजीपति मालामाल होते हैं तथा उनकी सत्ता को नया बल मिलता है I

सच्चे अर्थों में क्रांतिकारी और जनता का आदमी वही है जो बुर्जुआ "देशभक्ति" के अफीम के बारे में लोगों को बताता है और धारा के विरुद्ध खड़ा होकर युद्धोन्मादी अंधराष्ट्रवाद का विरोध करता है I माना कि पूँजीवादी मीडिया बहुत शक्तिशाली है क्योंकि उसके पीछे पूँजी की अपार ताकत है और भाड़े के प्रचारकों की पूरी फौज है I लेकिन पूँजी की इस ताकत का मुकाबला जनशक्ति से, यानी प्रतिबद्ध, कर्मठ लोगों की टीमों को जोड़कर किया जा सकता है I शासक वर्ग अपने राजनीतिक वर्चस्व के लिए जो उपक्रम संगठित करता है, उनके बरक्स हमें प्रति-वर्चस्व के उपक्रम संगठित करने होंगे !

(4मार्च, 2019)

Thursday, March 07, 2019

युद्धोन्माद की लहर को वोट में बदलने की बेशर्म और बदहवास संघी कोशिशें

अब यह बात दिन के उजाले की तरह साफ़ हो चुकी है कि सारा धंधा युद्धोन्माद की आँच भड़काकर चुनावी गोट लाल करने की थी I वो तो येदुयुरप्पा की मूर्खता थी कि उसने यह बयान भी दे दिया कि एयर स्ट्राइक के बाद पैदा हुई लहर में हम कर्नाटक की सभी लोकसभा सीटें जीत लेंगे ! एक और भाजपा नेता ने भी यह बयान दे दिया कि जो राष्ट्रीय भावना पैदा हुई है, उसे हमें वोटों में तब्दील करना होगा !

यह अनायास नहीं था कि पुलवामा के बाद ही मोदी ने धुंआधार रैलियाँ करके युद्धोन्माद भड़काने और उसे भुनाने की पूरी कोशिश की I और अब भाजपा वाले जीप में अभिनन्दन की तस्वीर बाँधकर बेशर्मी से मोदी को सारा श्रेय देने और वोट लूटने की कोशिश कर रहे हैं I जीप में तस्वीर कुछ वैसे ही और उसी जगह बाँधी गयी है जैसे कश्मीर में सेना के एक अधिकारी ने एक युवक को बाँधकर घुमाया था ! आखिर ये बेशर्म और मूर्ख श्रेय किस बात का ले रहे है ? पुलवामा के बाद भारत ने खोये 62 जवान, एक जहाज़ और एक हेलीकाप्टर और पाकिस्तान से सिर्फ़ एक जहाज़ ! अब मीडिया और सरकार द्वारा भारतीय हवाई हमले में 300 से लेकर 600 तक आतंकियों के मारे जाने की जो खबर फैलाई गयी थी, वह सिरे से झूठ निकली जिसकी पूरी दुनिया में खिल्ली उड़ाई जा रही है ! लेकिन देश में गोदी मीडिया ने और सोशल मीडिया पर बैठे भाजपा के भाड़े के टट्टुओं ने ऐसा माहौल बनाया है जैसे मोदी ने सामरिक और कूटनीतिक तौर पर कोई बहुत बड़ा तीर मार लिया हो ! यह होता है फासिस्टों का प्रचार-तंत्र ! सेना के कई रिटायर्ड अधिकारियों ने और कई शहीदों के परिवार वालों ने भी जब यह बात कही कि युद्ध कोई समाधान नहीं है और राजनीतिक लाभ के लिए युद्ध का माहौल नहीं बनाया जाना चाहिए, तो गोदी मीडिया ने इस बात को ही दबा दिया और भाजपाई साइबर गुंडे तुरत ऐसा बयान देने वालों की ट्रोलिंग करने लगे I उधर पटना में एन.डी.ए. की रैली में कोई बाधा न आये, इसके लिए कश्मीर में आतंकियों से मुठभेड़ में शहीद हुए जवान पिंटू कुमार सिंह की खोज-खबर परिवार तक पहुँचने से काफ़ी समय तक रोक रखा गया ! यही नहीं, पिंटू कुमार के अंतिम संस्कार में कोई मंत्री या नेता नहीं पहुँचा I बडगाम के हेलीकाप्टर क्रेश में एयरफोर्स अधिकारी सिद्धार्थ वशिष्ठ सहित जो 6 लोग मारे गए, उनकी शहादत की भी न कोई विशेष चर्चा हुई, न ही उनके अंतिम संस्कार में कोई नेता पहुँचा, जबकि अभिनन्दन की रिहाई को एक मीडिया ईवेंट बना दिया गया क्योंकि उसे चुनावी फायदे के लिए भुनाया जा सकता था !

इस बीच कोशिश जारी है कि राफेल के प्रेत को सुला दिया जाये और नोटबंदी, जी.एस.टी., 15 लाख वाले जुमले और बैंकों के खरबों रुपये लेकर चहेते पूँजीपतियों के देश से बाहर भाग जाने जैसे सभी कंकालों को वापस आलमारी में बंद कर दिया जाए I युद्धोन्माद के शोर के दौरान ही देश के 5 हवाई अड्डे अदानी को दे दिए गए, कोर्ट के फैसले की आड़ लेकर 10 लाख से भी अधिक आदिवासियों को दर-बदर कर देने की साज़िश की खबर दबा दी गयी और रसोई गैस की कीमत 43 रुपये फिर से बढ़ा दी गयी ! बेरोजगारी और मँहगाई के रिकार्डतोड़ आँकड़ों को छिपाने के लिए सरकार ने जो घपला किया था और जिसतरह आँकड़ों के साथ फ्रॉड करके विकास-दर को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा था, वो सारी बातें देश की आम आबादी तो दूर, पढ़े-लिखे लोगों तक भी नहीं पहुँच पायीं I

फिर भी राहत की बात यह है कि आम लोगों पर युद्धोन्माद का नशा उतना असर नहीं कर रहा है, जितनी भाजपाइयों को अपेक्षा थी ! इसीलिये, तमाम गाल बजाने के बावजूद संघियों की जुबान लटपटा रही है और कनपटियों पर पसीना बह रहा है I

यह सही है कि फासिस्टों ने सत्ता में बने रहने के लिए अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है और वे किसी हद तक जा सकते हैं ! पर यथार्थ का दूसरा पहलू यह है कि आम लोगों में भी सतह के नीचे, असंतोष भयंकर रूप से खदबदा रहा है ! सबकुछ इस बात पर निर्भर करता है कि नयी, उदीयमान क्रांतिकारी शक्तियाँ असंतुष्ट-त्रस्त आम आबादी को क्रांतिकारी परिवर्तन की आकांक्षा और समझ से लैस कर पाने में, और इस प्रक्रिया में अपना सामाजिक आधार मज़बूत कर पाने में, किस हद तक सफल हो पाती हैं !

(3मार्च, 2019)

मेरी देशभक्ति का मेनिफेस्टो

(एक "शरीफ़" गुबरैला इनबॉक्स पधारा ! अन्य गुबरैलों की तरह उसने गालियों की झड़ी नहीं लगाई I उसने मुझे "भटकी हुई और बहका दी गयी" बताया और प्यार से धमकाया कि मैं देशद्रोह का रास्ता छोड़कर देशभक्तों के खेमे में आ जाऊँ, नहीं तो अंजाम बुरा होगा I उसे तो मैंने "आदर-सत्कार" करके विदा कर दिया , पर उसीसमय यह आईडिया आया कि मुझे अपनी देशभक्ति के बारे में चंद शब्द लिखने चाहिए !)

*

मेरी देशभक्ति का मेनिफेस्टो


मैं एक भारतीय हूँ I मैं इस देश से प्यार करती हूँ !

मैं इस देश से प्यार करती हूँ, यानी इस देश के लोगों से प्यार करती हूँ I

मैं इस देश के सभी लोगों से प्यार नहीं करती I मैं इस देश में अपनी मेहनत से फसल पैदा करने वाले, कारखानों में काम करने वाले, खदानों में काम करने वाले, बाँध, सड़क और बिल्डिंगें बनाने वाले, स्कूलों-कालेजों में पढ़ने-पढ़ाने वाले और ऐसे तमाम आम लोगों से और उनके बच्चों से प्यार करती हूँ !

मैं उन थोड़े से लुटेरों से प्यार नहीं करती जो कारखानों, फार्मों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, बैंकों आदि के मालिक हैं और मज़दूरों और आम मध्यवर्गीय लोगों की हड्डियाँ निचोड़ते हैं ! मैं दलालों, कालाबाजारियों, पूँजीपतियों के टुकड़ों पर पलने वाले और उनकी सेवा करने वाले पूँजीवादी पार्टियों के नेताओं, शासन की मशीनरी को चलाने वाले नौकरशाहों, धार्मिक कट्टरपंथी फासिस्टों, जातिवादी कट्टरपंथी बर्बरों और दंगाइयों से ज़रा भी प्यार नहीं करती I मैं पूँजीवादी मीडिया के उन भाड़े के टट्टुओं से भी प्यार नहीं करती जो चंद सिक्कों पर बिककर सत्ता और थैली के भोंपू बन जाते हैं और अवाम को धर्म, जाति, क्षेत्र आदि के आधार पर बाँटने के लिए झूठ का घटाटोप फैलाते हैं ! सिर्फ़ यही नहीं, कि मैं इन तमाम लोगों से प्यार नहीं करती, बल्कि मैं इनसे तहेदिल से नफ़रत करती हूँ ! एक देश के भीतर ही इनका देश मेरे देश से अलग है I

मेरी देशभक्ति मुझे बताती है कि इस देश को सुन्दर, खुशहाल, मानवीय और न्यायपूर्ण बनाने के लिए तथा गैर-बराबरी और अन्याय के सभी रूपों को ख़तम करने के लिए इस देश के भीतर ही शोषक-उत्पीड़क सत्ताधारियों के विरुद्ध एक लम्बी और फैसलाकुन लड़ाई लड़नी होगी ! सीमा के आर-पार तनाव इसलिए भड़काए जाते हैं और सारी लडाइयाँ इसलिए होती हैं कि न भारत और न ही पाकिस्तान की जनता अपने -अपने देश के लुटेरे पूँजीपतियों से, उनके लग्गू-भग्गुओं से और साम्राज्यवादियों से लड़ने के लिए संगठित न हो सके I

मैं भारत के आम लोगों से ही नहीं, पाकिस्तान और चीन और अमेरिका और रूस आदि देशों के आम मेहनतक़श लोगों से, यानी पूरी दुनिया की आम जनता से प्यार करती हूँ ! मैं भारत के लुटेरों-चोरों और हुक्मरानों से ही नहीं, पाकिस्तान के, और पूरी दुनिया के चोरों-लुटेरों-हुक्मरानों से तहे-दिल से नफ़रत करती हूँ !

मैं इन अर्थों में एक देशभक्त हूँ , पर नोट कीजिए, मैं राष्ट्रवादी कत्तई नहीं हूँ ! मेरे लेखे, राष्ट्रवाद और देशभक्ति दो अलहदा चीज़ें हैं !

*


(समझे भाई भगतजी ! नहीं, तुम काहे को समझोगे ! समझने की ताकत ही होती दिमाग में, तो वह खिसककर घुटने में क्यों आ जाता और तुम भक्त क्यों होते ?)

(2मार्च, 2019)

Wednesday, March 06, 2019

भारतीय मध्य वर्ग और युद्धोन्मादी अंधराष्ट्रवाद के बारे में कुछ स्फुट विचारणीय बातें ...


अंधराष्ट्रवादी युद्धोन्माद की लहर हिन्दी पट्टी में, यानी उत्तर प्रदेश,उत्तराखण्ड,बिहार, झारखण्ड,मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा में ही सर्वाधिक तूफ़ानी बनकर बहती है I दक्षिण के राज्यों में इसका प्रभाव सबसे कम दीखता है I उनमें भी केरल में सबसे कम होता है और कर्नाटक के कुछ खित्तों में थोड़ा ज्यादा दीखता है I महाराष्ट्र की मेहनतक़श आबादी में तो नहीं पर मध्य वर्ग के उग्र हिंदुत्ववादियों में यह लहर दीखती है, हालाँकि वहाँ मध्य वर्ग का तर्कशील और सेकुलर हिस्सा भी मज़बूत है I बंगाल, ओडिशा और असम में लाख कोशिशों के बावजूद युद्धोन्माद की लहर कभी उतनी मज़बूत नहीं हो पाती और उत्तर-पूर्व के अन्य राज्यों में तो यह है ही नहीं !

इस फ़र्क़ के कारण ऐतिहासिक हैं ! यह हिन्दी पट्टी ही है, जहाँ का पढ़ा-लिखा मध्य वर्ग भी परले दर्जे का कूपमंडूक, पुरातनपंथी और जाति-धर्म के बंधनों में जकड़ा हुआ है I मध्य काल और औपनिवेशिक काल के धर्म-सुधार आन्दोलन और सामाजिक सुधार आन्दोलन यहाँ के समाज की अन्तश्चेतना में गहराई तक पैठ नहीं पाए, जल्दी ही वे भटक गए या ठहराव-ग्रस्त हो गए, और यह भी एक सच है कि प्रायः उनका चरित्र अपेक्षतया कम रेडिकल था I एक और भी तथ्य यह है कि इस इलाके में 'रिफोर्मेशन' के बरक्स 'काउंटर-रिफोर्मेशन' की धारा हमेशा मज़बूत रूप में खड़ी रही I मध्यकालीन निर्गुण भक्ति आन्दोलन के बरक्स सगुण भक्ति की धारा की शक्तिशाली मौजूदगी इसका बस एक उदाहरण है जिसके शिखर-पुरुष तुलसी थे I इस हिन्दी पट्टी के बड़े हिस्से में ज़मींदारी व्यवस्था के अंतर्गत सर्वाधिक सामंती उत्पीड़न था और ज्यादातर इन्हीं सामंती (सवर्ण) उत्पीड़कों के भीतर से इस इलाके का आधुनिक मध्य वर्ग विकसित हुआ जिसकी चेतना में आधुनिकता के संघटक तत्व बहुत ही कम थे I आज़ादी के बाद इस इलाके में सामंती भूमि-सम्बन्ध सबसे मद्धम गति से टूटे और पुराने सामंती वर्गों से जो नया मध्य वर्ग विकसित हुआ वह विचारों और जीवन में निहायत प्रतिक्रियावादी था I हिन्दी पट्टी में बड़े-बड़े महानगरों का विकास हुआ, पर हिन्दी पट्टी का जो मध्य वर्ग यहाँ का निवासी बना, वह अपने पारिवारिक-सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में ग्रामीण जीवन की बर्बरताओं और रूढ़ियों से मुक्त नहीं था I आश्चर्य नहीं कि इन महानगरों में आप को ऐसे कथित मार्क्सवादी बुद्धिजीवी मिल जायेंगे, जो जड़ों से जुड़ने के नाम पर ग्रामीण जीवन के अनालोचनात्मक प्रशंसक होंगे और उनकी चेतना लोकवाद या नरोदवाद से आगे की नहीं होगी I आश्चर्य नहीं कि मार्क्सवादी हिन्दी आलोचना के दो शिखर-पुरुषों में से एक, रामविलास शर्मा की आत्मा हमेशा "अतीतआकुल" और "भारतव्याकुल" रहा करती थी और दूसरे, यानी नामवर सिंह को हिंदुत्ववादी फासिस्ट नेताओं और बुद्धिजीवियों के साथ गलबहियाँ करने में तथा खुले मंचों से अपने सवर्ण पूर्वाग्रहों को प्रकट करने में कोई हिचक नहीं होती थी I एक तरफ सेक्युलर और सुसंस्कृत और दूसरी ओर हिन्दू धर्म के प्राचीन गौरव का महिमा-मंडन करते हुए सती-प्रथा के समर्थन तक चले जाने वाले यशस्वी पत्रकार प्रभाष जोशी हिन्दी पट्टी की ही पैदावार हो सकते थे I जो मध्यवर्गीय नागरिक जितना ही रूढ़िवादी होगा, अतार्किक होगा, जाति-धर्म के बंधनों में जकड़ा होगा, युद्धोन्मादी अंधराष्ट्रवाद का ज़हर उसके ऊपर उतना ही अधिक प्रभावी होगा ! वैसे तो इस वर्ग की आम प्रकृति ही ऐसी है कि यह अंधराष्ट्रवाद की चपेट में आ जाता है I भूलना नहीं चाहिए कि फासिज्म तृणमूल स्तर से संगठित, इसी मध्य वर्ग का धुर-प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन होता है और अंधराष्ट्रवाद फासिज्म का सबसे प्रभावी और आज़मूदा हथियार होता है !

अंधराष्ट्रवाद हालाँकि मेहनतक़श आबादी के एक हिस्से की चेतना की ऊपरी परत पर भी कालिख की तरह छा जाता है, पर मध्य वर्ग की चेतना की पोर-पोर में यह ज़हर की तरह भिन जाता है I चूँकि यह मध्य वर्ग ही सोसायटी का 'वोकल सेक्शन' होता है और इसीके बीच अपने मार्किट का फैलाव होने के कारण न्यूज़ चैनल और अखबार भी अपनी सामग्री और भाषा इसी के मिजाज़ के हिसाब से तैयार करते हैं, तथा सोशल मीडिया पर भी यही वर्ग छाया रहता है, इसलिए परिदृश्य कुछ ऐसा दिखाई देता है मानो पूरे देश की जनता के सर पर उन्माद का भूत चढ़कर बोल रहा है I आप किसी मज़दूर बस्ती में जाइए तो वहाँ भी आपको आज जैसे माहौल में "पाकिस्तान को नेस्तनाबूद कर दो" और "गद्दारों को भूनकर खा जाओ" टाइप देशभक्ति की भावना प्रथमदृष्टया दिखाई देगी, लेकिन जैसे ही आप इस उन्मादी देशभक्ति के बुनियादी कारणों पर बात करेंगे, लोगों की ज़िंदगी की परेशानियों और उनके कारणों पर बात करेंगे, 95 फीसदी लोग आपकी बातें सुनने लगते हैं और सहमत भी होने लगते हैं I इस आबादी का बहुलांश आज भी समझ रहा है कि युद्ध का यह माहौल संघियों ने और उनकी सरकार ने आम जनता का ध्यान बुनियादी सवालों से भटकाने के लिए बनाया है ! अगर खुद समझ नहीं रहा है तो कम से कम समझाने पर आसानी से समझ जाता है I

जो सोशल डेमोक्रेट, बुर्जुआ लिबरल और संसदीय जड़वामन वामपंथी होते हैं, वे आम मेहनतक़श आबादी की ज़िंदगी से बहुत दूर हो जाते हैं और मध्य वर्ग तथा सफ़ेदपोश-कुलीन मज़दूरों तक सिमट जाते हैं ! इसीलिये उन्हें लगता है कि युद्धोन्मादी अंधराष्ट्रवाद की लहर समाज के पोर-पोर में भीतर तक धँसी हुई है और उसके विरोध में वे आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते I दूसरी बात यह कि, छद्म-वामपंथियों की चेतना स्वयं ही बुर्जुआ राष्ट्रवाद के जीवाणुओं-विषाणुओं से संक्रमित होती है, इसलिए वे युद्धोन्मादी "देशभक्ति" का कारगर विरोध कर ही नहीं सकते !
(28फरवरी, 2019)