Thursday, August 09, 2018

महाशयजी का चूतड़

हालात आपसे जो-जो न करायें | जैसा कि आप सभी जानते हैं, मैं आदतन बहुत सभ्य-सुशील हूँ | गंदी बातें करना मेरी फ़ितरत नहीं | लेकिन समय ही अगर बहुत गन्दा हो, और सच की तरफ़, ख़ास तौर पर परदे के पीछे की सच्चाइयों की तरफ़, लोगों का ध्यान खींचना आप अपना बहुत ज़रूरी फ़र्ज़ मानते हों तो आपको न चाहते हुए भी कुछ गन्दी बातें करनी ही पड़ती हैं | वरना मुझे क्या पड़ी थी कि सम्मानित महाशयजी के चूतड़ के हैरतअंगेज़ कारनामों के बारे में यूँ  सरेआम बातें करूँ ? वैसे समय भी इतना नीचे तो गिर ही गया है कि गोगोल के ज़माने में नाक जो करिश्मे किया करती थी, हमलोगों के ज़माने में चूतड़ वह सब करने लगा है | तो अब चारा ही क्या बचा है सिवाय इसके कि मैं महाशयजी के चूतड़ की रोमांच-कथा आपको सुना ही डालूँ |

भारत में एक जाने-माने बुद्धिजीवी हुआ करते थे -- महाशयजी | इतिहास में उनकी बौद्धिक सरगर्मियों के उत्कर्ष का काल यही कोई 1970 के दशक से 2010 के दशक के आसपास का बताया जाता है | छात्र-जीवन में उन्हें बात-बात में “देखिये महाशय" बोलने की आदत थी | इसलिय कालांतर में लोग उन्हें महाशयजी नाम से ही जानने लगे | फिर उन्होंने बौद्धिकता की दुनिया में जब प्रवेश किया, तो ‘महाशयजी' नामसे ही लिखने भी लगे | जल्दी ही साहित्य,इतिहास और मानविकी के विभिन्न क्षेत्रों में उन्होंने कई-कई पुस्तकें लिख डालीं | देश के दर्ज़नों विश्वविद्यालयों में वह प्रोफ़ेसर रहे और कोई ऐसा विश्वविद्यालय नहीं था जहाँ के शिक्षकों और छात्रों ने उनके व्याख्यानों का ज्ञानामृत-पान न किया हो | केन्द्र और राज्यों का कला-साहित्य-संस्कृति का एक भी ऐसा प्रतिष्ठान नहीं बचा था, जिससे महाशयजी कभी न कभी जुड़े न रहे हों | संस्कृति के सभी पुरस्कार उन्हें मिल चुके थे, दो पद्म पुरस्कार भी मिल चुके थे और तीसरा वाला अब कभी भी मिल सकता था | शायद ही कोई ऐसा राजनेता हो, जिसके साथ महाशयजी कभी न कभी मंचासीन न हुए हों | हिन्दी की प्रगति के लिए दुनिया के पाँचो महाद्वीपों के अधिकांश देशों की वह यात्रा कर चुके थे और यहाँ तक कि थोड़े-थोड़े दिन उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर भी बिता आये थे | विवादों और दलबंदियों से वह इतना ऊपर उठ चुके थे कि ’फिक्की'  के आयोजनों, सभी सरकारी आयोजनों, सभी राजनीतिक पार्टियों के आयोजनों और वैश्य सभा-क्षत्रिय सभा टाइप संस्थाओं के आयोजनों से लेकर सभी जनवादी-प्रगतिशील सांस्कृतिक संगठनों के आयोजनों में समान भाव से जाया करते थे | कहीं उन्हें ‘मि.महाशय', तो कहीं ‘परम आदरणीय महाशयजी' कहकर संबोधित किया जाता था और कहीं ‘कामरेड महाशय को लाल सलाम' की तुमुल ध्वनि भी दिग-दिगंत में गुंजायमान होती थी | मित्रों का मान इतना रखते थे कि उनके आग्रह पर एक कुख्यात अपराधी राजनेता की आत्मकथा का विमोचन भूरी-भूरी प्रशंसाओं के साथ कर आये थे और एक मज़दूर नेता के हत्यारे पूँजीपति घराने से पुरस्कार भी ले लिया था | कृपालु और उदार इतने थे कि हर वर्ष दो-तीन युवा कवियों-लेखकों को ‘क्षितिज का तारा', ‘भविष्य की उम्मीद', ‘अदभुत', ‘अद्वितीय’ आदि-आदि घोषित कर दिया करते थे | सरल-हृदयऔर ज़मीनी इतने थे कि कालोनी के लोग उन्हें माता की चौकी और जगराता में भी खींच ले जाते थे | किसी मोहल्ले के ‘हिन्दू हृदय सम्राट' के जन्मदिन पर आयोजित कवि-सम्मलेन में भी वह मुख्य अतिथि थे और शाल-श्रीफल-ताम्बूल आदि पाकर सम्मानित हुए थे |

तो ऐसे थे महाशयजी और ऐसा था उनका प्रताप ! पर जगत और जीवन की भी अपनी गति होती है | सिरों पर अग्नि-वर्षा करता प्रचंड मार्तण्ड भी धीरे-धीरे मंद पड़ता हुआ अस्ताचल-गामी होने लगता है | उम्र ढलान पर थी | महाशयजी को अवकाश प्राप्त किये भी अच्छा-खासा समय हो गया था | संस्कृति और विचारों की दुनिया में ढेरों ऐसे लोग उभर रहे थे, या उभर चुके थे जो महाशयजी के जूते और ओवरकोट पहनकर उनका स्थान ले लेना चाहते थे | विभिन्न संस्थाओं के मानद पदों से महाशयजी का नाम हटता जा रहा था | आयोजनों के मुख्य आतिथ्य और अध्यक्षता के निमंत्रणों की संख्या कम होती जा रही थी | जो शख्स जीवन भर दुनिया की भाँति-भाँति की कुर्सियों पर बैठा था, उसका चूतड़ अब दिन-दिन भर घर की अलग-अलग कुर्सियों पर अनमना-सा पड़ा रहता था |

महाशयजी को कभी-कभी लगता था कि उनका चूतड़ हालात से तंग आकर बग़ावत करने पर आमादा है | एक बार एक मित्र के साथ वह फर्नीचर की एक बड़ी दूकान में गए | वहाँ एक भव्य कुर्सी नज़र आते ही उनके चूतड़ ने आव देखा न ताव, फ़ौरन उससे जाकर चिपक गया | फिर तो बहुत देर तक वह इस से उस कुर्सी पर उछलता-कूदता रहा और महाशयजी उसके पीछे भागते रहे | दोस्त को तो समझ ही न आया कि माजरा क्या है ! कई बार ऐसा हुआ कि किसी आयोजन में महाशयजी जब मंचासीन हो गए तो चूतड़ कुर्सी से ऐसा चिपका कि छोड़ने का नाम ही न ले | चूतड़ की ऐसी हिमाक़त और ऐसे बगावती तेवरों से महाशयजी काफी परेशान रहने लगे |
ऐसा नहीं था कि महाशयजी का चूतड़ हमेशा से इतना उद्दंड और प्रचंड कुर्सी-प्रेमी रहा हो | किसी ज़माने में वह शर्मीला, झेंपू-दब्बू सा चूतड़ हुआ करता था | कुर्सियों से उसका यह उत्कट प्रेम धीरे-धीरे, निरंतर सघन साहचर्य से पैदा हुआ था | जिस कुर्सी पर भी वह बैठता, अमर-बेल की तरह उससे ख्याति और रुतबे का रस सोखता रहता था और मोटाता जाता था | किसी ज़माने का वह दुबला-पतला, शरीफ चूतड़ पहले ओखल जैसा, और फिर विशाल हवन-कुण्ड जैसा बन गया | बच्चे भले ही उसे देखकर आपस में फुसफुसाते थे कि यह ज़रूर हंडा भर हगता होगा, लेकिन भद्र-सुसंस्कृत नागरिक उसे देखते ही श्रद्धा से विह्वल हो जाते थे, मन में भी वे उसे चूतड़ कहने की जगह ‘पृथुल पृष्ठभाग’ या ‘शरीफ़ तशरीफ़' ही कहा करते थे |

महाशयजी जब युवा थे तो उनका युवा चूतड़ भी इतना अनुभवी नहीं था | कुर्सी का चस्का अभी लग ही रहा था | कुर्सी की तलाश में वह आन्दोलनों और जन-सभाओं में भी पहुँच जाता था | एक बार वह एक ऐसी जन-सभा में पहुँच गया जहाँ मंच पर कुर्सी ही नहीं थी | ऊपर से तुर्रा यह कि थोड़ी ही देर बाद वहाँ भगदड़ मची और पुलिसिया डंडे ने महाशयजी के चूतड़ को भी ऐसा लाल किया कि वह कई दिनों तक लाल रहा | आज जैसा अनुभव होता तो वह उसे भी भुना लेता और घोषित कर देता कि लाल ही उसका रंग है और यह कि वह एक इंक़लाबी चूतड़ है | बहरहाल उस दिन की घटना से महाशयजी के चूतड़ ने इतना तो सबक लिया ही कि अब वह उन्हीं कुर्सियों से चिपकने के लिए लपकता था जो अकादमिक संस्थानों, सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों, सांस्कृतिक संगठनों के वैचारिक आयोजनों, गोष्ठियों-संगोष्ठियों और सरकारी आयोजनों को सुशोभित करते थे | ऐसे दिव्य-भव्य चूतड़ के प्रति महाशयजी की पत्नी भी काफ़ी श्रद्धा रखती थीं और अक्षत-फूल-धूप-दीप-नैवेद्य लिए पूजा को तत्पर रहती थीं | अब नौजवानी के उन दिनों को महाशय-पत्नी लगभग भूल चुकी थीं, जब इसी चूतड़ पर उन्होंने तीन-चार बार प्रचंड पाद-प्रहार किये थे | ये अवसर तब आये थे जब उन्होंने महाशयजी को अपनी किन्हीं शिष्याओं को कभी सोफे पर, तो कभी बेड पर कविता का शिल्प या आलोचना की पद्धति सिखलाते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया था | बहरहाल, इसके बाद महाशयजी भी सतर्क हो गए थे, ज्यादातर अकादमिक कार्य विभाग में ही निपटाने लगे थे और पत्नी का विश्वास जीतने में सफल हो गए थे | इसतरह उनके चूतड़ की प्रतिष्ठा न सिर्फ बहाल हुई, बल्कि उसकी दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति का रास्ता भी खुल गया | अब तो पूरी दुनिया जानती थी कि कितने सुसंस्कृत बुद्धिजीवी का कितना सुसंस्कृत यह चूतड़ था जिसे अपने ऊपर विराजमान करवाकर कितनी सुसंस्कृत कुर्सियाँ स्वयं को धन्यभाग्य समझती थीं |

बहरहाल, असली कहानी पर आने से पहले पृष्ठभूमि बताने में ही मैंने इतना समय लगा दिया | किस्सागो अगर अनाड़ी हो तो ऐसा ही होता है |

हाँ तो मैं बता रही थी कि वृद्धावस्था की ढलान पर लुढ़कते महाशयजी के चूतड़ को भव्य सभागारों के दिव्य आयोजनों की अतिविशिष्ट और विशिष्ट कुर्सियों से जा चिपकने के अवसर लगातार कम होते जा रहे थे | चूतड़ की बेचैनी बढ़ती जा रही थी और अब महाशयजी को भी उसके धीरे-धीरे बगावती होते जा रहे तेवरों से किसी अनिष्ट की आशंका सताने लगी थी | और फिर, आखिरकार, वह अघट घट ही गया |
एक सुबह उठने के बाद से ही महाशयजी बेचैन-हैरान-परेशान इधर से उधर चक्कर काट रहे थे | पत्नी के पूछने पर भी बता नहीं पा रहे थे कि बात क्या है ! दस बजने को आ रहे थे, पर वह न नित्य-क्रिया से निवृत्त हो रहे थे, न ही नाश्ते की टेबल पर आ रहे थे | आखिरकार पत्नी के काफी पीछे पड़ने पर उन्हें इस ‘विचित्र किन्तु सत्य' का उद्घाटन करना ही पड़ा कि आज सुबह बाथरूम जाने पर उन्होंने पाया कि उनका चूतड़ गायब है | श्रीमतीजी तो बेहोश होते-होते बचीं | फिर महाशयजी ने पिछले कुछ दिनों के दौरान अपने चूतड़ के बगावती तेवरों और बढ़ते खुराफ़ातों के बारे में भी बताया | श्रीमतीजी ने दिमाग लगाया और पूरे घर में पड़ी हर कुर्सी, हर आराम-कुर्सी, हर सोफे को देख आयीं कि कमबख्त कुर्सी-प्रेमी चूतड़ कहीं उनमें से किसी पर चिपका तो नहीं बैठा है ! पर वह कहीं नहीं मिला |

मामला बेहद संगीन था | दिक्क़त यह थी कि ऐसे नाज़ुक मामले में किसी रिश्तेदार या दोस्त या शिष्य की मदद भी नहीं ली जा सकती थी |सैकड़ों पर महाशयजी के अहसान थे, लेकिन अगर भविष्य में भी फायदे की उम्मीद न हो, तो भला कौन किसी के काम आता है ! और फिर यह तो ऐसा मामला था कि किसी का क्या भरोसा ! कोई भी लिहाड़ी ले सकता था, गली-कूचे में शोर मचाकर तमाशा बना सकता था और कोई पुरानी खुन्नस निकाल सकता था | ऐसे भी लोग थे जो ऊपर से हवाई हमदर्दी दिखाते और अन्दर ही अन्दर उनके जलन भरे दिल को खूब शीतलता मिलती | अंततोगत्वा, इस पूरे मामले को एक प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी को सौंपने का पति-पत्नी ने निर्णय लिया | सारा काम एकदम गुप्त तरीके से हुआ | नौकरों तक को कानों-कान भनक नहीं लगने दी गयी |डिटेक्टिव एजेंसी वाले से महाशयजी की पत्नी ने कहा कि वह पैसे की कोई चिंता न करे और पूरे शहर में अपने जासूसों का जाल फैला दे और किसी भी कीमत पर महाशयजी के चूतड़ को जल्दी से जल्दी बरामद करे |
फिर ऐसा ही हुआ | जासूस पूरी राजधानी में फैल गए | चन्द घंटों बाद ही डिटेक्टिव एजेंसी के डायरेक्टर के पास ताबड़तोड़ एजेंटों के फोन आने लगे और व्हाट्सएप से तस्वीरें भी आने लगीं | महाशयजी के चूतड़ को एकदम महाशयजी की तरह सजा-बजा एक राजनीतिक पार्टी के बौद्धिक सेल की मीटिंग से निकलते हुए देखा गया जहाँ यह तय होने वाला था कि इसबार साहित्य-संस्कृति के कोटे से किसको राज्यसभा में भेजा जाये | कुछ घंटे बाद दूसरे खबरी ने उसे ‘इण्डिया इन्टरनेशनल सेंटर’ में किसी आयोजन की अध्यक्षता करने के बाद वहाँ से निकलकर ‘इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र' की ओर जाते देखा गया | पल-पल की सूचना महाशयजी तक पहुँच रही थी लेकिन समस्या यह थी कि चूतड़ इतना गतिमान था कि महाशयजी उसे पकड़ने के लिए कहीं जाने को निकलने को होते ही थे, या रास्ते में ही होते थे, तबतक उनके चूतड़ के कहीं और उपस्थित होने की खबर आ जाती थी |  कभी मंडी हाउस, कभी साहित्य अकादमी, कभी ललित कला केंद्र, कभी जे.एन.यू., कभी डी.यू., ... फिर आख़िरी बार वह राष्ट्रपति भवन में आयोजित किसी समारोह में देखा गया | फिर उसे इंदिरा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे की ओर एक तेज़-रफ़्तार बड़ी-सी कार में जाते हुए देखा गया |

अप्रत्याशित संकट के शुरुआती झटके से उबरने के बाद अब महाशयजी का दिमाग थोड़ा-थोड़ा काम करने लगा था | डिटेक्टिव एजेंसी को उन्होंने राय दी कि वह अपने एजेंटों को देश के सभी राज्यों की राजधानियों के सरकारी सांस्कृतिक-साहित्यिक प्रतिष्ठानों, बड़े औद्योगिक घरानों के साहित्यिक प्रतिष्ठानों, संस्कृति मंत्रालय आदि-आदि के आस-पास फैला दे और पैसे की कोई चिंता न करे | एक बार जब लोकेशन पता चल जाए तो चूतड़ को टाँगकर, घसीटकर,खींचकर उठा लाने के लिए ठेके पर बाउंसरों की टीमें तैनात करने की इजाज़त भी महाशयजी ने  डिटेक्टिव एजेंसी को दे दी | खबर मिली कि किसी एजेंट ने महाशयजी के चूतड़ को शिमला में ‘इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज़' के सुरम्य-मनोरम प्रांगण रात को डिनर के बाद चहलकदमी करते देखा | पर बाउंसरों की टीम जब उसे उठाने के लिए गयी तो वहाँ कोई नहीं मिली | फिर उसकी एक झलक भोपाल में भारत भवन में देखी गयी | लेकिन वहाँ भी उसे पकड़ा नहीं जा सका | एक हफ़्ते बाद महाशयजी ने खुद अखबार में एक तस्वीर सहित खबर देखी जिसमें उनका चूतड़ उन्हीं की तरह सजा-बजा छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मुक्तिबोध पर आयोजित एक संगोष्ठी में अति-प्रभावशाली भाषण देने के बाद मुख्यमंत्री और राज्यपाल से हाथ मिला रहा था | इसके बाद पता चला कि महाशयजी का चूतड़ ‘बिहार संगीत नाटक अकादमी' का अध्यक्ष मनोनीत हो गया है | उसे पकड़ने वाली टीम जब वहाँ पहुँची तबतक वह अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के लिए ट्रेन पकड़ चुका था | बेचैन महाशयजी अब जासूसों और बाउंसरों की टीम के साथ खुद भी भाग-दौड़ रहे थे और शहर-शहर की ख़ाक छान रहे थे | वर्धा पहुँचने पर पता चला कि महाशयजी का चूतड़ तो इनदिनों देहरादून में है और उसने उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री को अपना दत्तक पिता बना लिया है और हिमालय में बड़े बाँध बनाने की सरकारी नीति के पक्ष में जोर-शोर से बयान दे रहा है | पर्यावरण विज्ञान और पारिस्थितिकी के बारे में ‘क ख ग' भी न जानने वाले महाशयजी को आश्चर्य हुआ कि उनका चूतड़ पर्यावरण-विशेषज्ञ कबसे और कैसे हो गया ! बहरहाल, लगातार चुस्त सुरक्षा-व्यवस्था के कारण महाशयजी का चूतड़ देहरादून में तो महाशयजी के हाथ न आ सका | इसी बीच उसके दिल्ली आने की सूचना मिली | महाशयजी की टीम चाक-चौबंद हो गयी, लेकिन चूतड़ उनकी सारी चौकसी को धता बताकर विशेष सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों के अन्तर्गत पोलिश, हंगारी और जर्मन में अनूदित महाशयजी की कई पुस्तकों के लोकार्पण समारोहों में तथा विभिन्न साहित्यिक आयोजनों में भाग लेने के लिए जर्मनी और पूर्वी यूरोप के देशों की लम्बी यात्रा पर निकल गया |

उधर महाशयजी और उनके चूतड़ के बीच यह आँख-मिचौली का खेल जारी था, इधर देश में अस्थिरता-अशांति-अराजकता लगातार बढ़ती जा रही थी | लोगों ने लम्बे समय तक सब कुछ बर्दाश्त किया | अच्छे-खासे लोग तो लम्बे समय तक हुकूमत करने वालों के बहकावे में भी आते रहे | जोरो-ज़ुल्म से तंग आकर यहाँ-वहाँ जो लोग उठ खड़े हुए, उन्हें कुचल दिया गया | कुछ वर्षों तक यही सब चलता रहा | फिर पूरे देश में लोग बड़े पैमाने पर सड़कों पर उतरने लगे --- मज़दूर, उजड़ते किसान, आम स्त्रियाँ, छात्र, बेरोज़गार युवा -- सभी के सभी | सेना-पुलिस इन सबको दबाने में जी-जान से लग गयी | पर इसबार मामला आसान नहीं था | उथल-पुथल के इसी आलम में महाशयजी का चूतड़ लम्बी विदेश-यात्रा से वापस लौटा | एअरपोर्ट पर ही पता चला कि राजधानी ठप्प है | बस वाले, टैक्सी वाले, ऑटो वाले, मेट्रो का स्टाफ -- सभी हड़ताल पर हैं | बड़ी मुश्किल से एक टैक्सी वाला मिला जो आठगुनी रकम लेकर महाशयजी के चूतड़ को सरदार पटेल मार्ग स्थित आई.टी.सी. मौर्या पाँच सितारा होटल पहुँचाने को तैयार हुआ | दुर्भाग्य ऐसा कि होटल के एकदम नज़दीक पहुँचने पर कुछ हड़ताली टैक्सी वालों ने उस टैक्सी को देख लिया और दौड़ा लिया | कुछ दूर गाड़ी भगाने के बाद ड्राईवर गाड़ी छोड़कर भाग गया और चारदीवारी फलाँगकर रिज के जंगलों के अँधेरे में खो गया | हड़ताली ड्राइवरों ने टैक्सी का पीछे का दरवाज़ा खोलकर देखा| वहाँ थर-थर काँपता हुआ एक चूतड़ गाड़ी की सीट से चिपका हुआ था | उन्होंने पहले तो उसे देखकर नफ़रत से थूक दिया और फिर हँसते हुए चले गए |

अगले दिन सुबह माहौल थोड़ा शांत देखकर फुटपाथ पर चाय वाले ने अपना खोखा खोला | प्रेस वाला अपनी इस्तरी सुलगाने लगा | एक गुब्बारेवाला भी आकर खड़ा हो गया और गुब्बारों में हाइड्रोजन गैस भरने लगा | कुछ बच्चे आकर भी जामुन के पेड़ की छाँव में कंचे खेलने लगे | कुछ देर में बच्चों का ध्यान लावारिस खड़ी कार की ओर गया जिसका पीछे का दरवाज़ा खुला हुआ था | उत्सुक बच्चों ने पास जाकर जब झाँका तो उनके आश्चर्य की सीमा न रही | कर की पीछे की सीट से थर-थर काँपता हुआ एक विशालकाय चूतड़ चिपका हुआ था | हिचकते हुए बच्चों ने पहले उसे छुआ, फिर हिचक छोड़ गुदगुदी करने लगे, फिर उन्होंने बहुत ज़ोर लगाकर खींचकर चूतड़ को सीट से अलग किया | वह उन्हें बैलून सरीखा लगा | बच्चों के आग्रह करने पर बैलून वाले ने उसमें गैस भर दी | बच्चे एक धागा बाँधकर महाशयजी के चूतड़ को हवा में उड़ाते हुए सड़क पर भाग चले | लेकिन आपस की छीना-झपटी में धागा हाथ से छूट गया और महाशयजी का चूतड़ ऊपर आसमान में उड़ गया |
वह साल  2032 के नवम्बर की कोई सुबह थी जब राजधानी के नागरिकों ने गैस से भरे महाशयजी के चूतड़ को लुटियन जोन के ऊपर उड़ते हुए देखा था |

(7अगस्‍त,2018)

Wednesday, August 08, 2018

तानाशाह के मन की बात



*

तानाशाह जब लोगों से अपने मन की बात करता है
तो वह सब कुछ कहता है जो
उसके मन में कभी नहीं होता I
तब वह दरअसल अपने हृदय का सारा अन्धकार
सड़कों पर उड़ेल देना चाहता है,
उसे पूरे देश में फैला देना चाहता है I
तानाशाह का यह हृदय
दलाल स्ट्रीट के सांड के शरीर से निकाला गया है I
कुछ दिनों तक यह सजा हुआ रखा था
एंटीलिया के एक भव्य ड्राइंग रूम में I
कभी यह सुशोभित हुआ करता था
वाल मार्ट के शोरूम में I


*


तानाशाह अपना हृदय खोल रहा है और
पूरे देश में अँधेरा भरता जा रहा है,
गलियों से बहती खून की धाराएँ
सड़कों पर आकर मिल रही हैं
और शहर डूबने के कगार पर हैं I


*


यह आम लोगों का खून कभी व्यर्थ नहीं बहता I
इस खून की बाढ़ में एक दिन
डूबकर मर जाना है तानाशाह को
अपने हृदय के सारे अन्धकार के साथ,
अपने शरीर के खून की सारी गन्दगी के साथ
और हर क़ीमत पर चिरकाल तक शासन करने के
अपने आततायी इरादों के साथ I
(07-08-2018)

Sunday, August 05, 2018

आछा भाई लोग...


आछा भाई लोग, अब आपलोग ईमानदारी से दिल पर हाथ राखकर एक ठो बात बताइये I ई जो बड़का-बड़का सहर में,आ रजधानी में बड़का-बड़का लिबड़ल टाइप बामपंथी बुद्धिजीवी फैब इंडिया टाइप डिजाइनर कुरता पहिरके कॉफीहाउस, धरनास्थल-सभागार, जंतर-मंतर, इंडिया गेट, आई.आई.सी.-आई.एच.सी., मंडीहाउस जइसन इलाकन में टहलता रहता है, भाखन-भूखन करता रहता है, मोमबत्ती जुलूस निकारता रहता है, प्रकासकों से किताब छपाने के के लिए, फेलोशिप आ ग्रांट पाने के लिए, पुरस्कार आउर सम्मान के खातिर कुलाबा भिड़ाता रहता है, आ साम होते ही आपाने चाहे आपाने कवनो दोस्त का घर में, चाहे कवनो एन.जी.ओ. का आफिस में दारू की बाटली खोलके बईठ जाता है , ई सबका बारे में आप सभे का सोचता है! हम तो कई को जानित हैं ! एक ठो है, सरकारी अफसर है, दमित रास्ट्रीयता से लेकर मार्क्सवाद तक पर किताब लिखता है, कबिता-उबिता भी करता है,स्त्री अधिकार, नागरिक अधिकार -- सब करता है, खूब गोल-गोलइती करता है, लम्पटई करते हुए कै बार रंगेहाथ धरने के बाद बीबी भी छोड़ गयी है (लम्पट तो ई सब जादातर होता है), तरह-तरह के जुमलेबाजी करके फेसबुक पर खूब लाइक बटोरता है I कई लोग उसका चरित्र और कुकर्म जानके भी उसके गुडबुक में रहना चाहते हैं काहेसे कि उभरता मठाधीस है I ई सब जादा मूभमेंट का भगोड़ा है, कैरियरवादी है सब महराज ! कवना भरम में पड़े हैं ! ई सब संकट का समय माफीनामा लिखने वाला लोग है I ई सब का खा के फासीबाद से लडेगा ! सब लिबड़ल लिब-लिब होता है ! आपना कुंठा मिटाने वास्ते काम करने वालों को नसीहत झाड़ता रहता है I सुबिधा आउर तरक्की आउर इनामो-इकराम खातिर सब पिछवाड़े से कुक्कुर माफिक लाइन लगाके राजमहल में घुस जाता है I भाई, हमरा तो दिली इच्छा होती है की कब्बों कवनो मौक़ा लगे तो ई सब को कम्बल ओढाके खातिर-बात कर देना चाहिए, देना पाँच चाहिए आ गिनना एक चाहिए ! ई सब बामपंथी सिबिर का बिभीसन है, जयचंद आ मीरजाफर है, रंगा सियार है ! लेकिन जइसे बरसेगा झमड़के, सगरो रंग बह जायेगा !
(5अगस्‍त,2018)

यह शर्मनाक हादसा हमारे ही साथ होना था
कि दुनिया के सबसे पवित्र शब्दों ने
बन जाना था सिंहासन का खड़ाऊँ
मार्क्स का सिंह जैसा सिर
दिल्ली की भूल-भुलैया में मिमियाता फिरता
हमें ही देखना था
मेरे यारो, यह कुफ़्र हमारे ही समयों में होना था I
--- पाश

1914 में आज ही के दिन जर्मन सामाजिक जनवादी पार्टी...


1914 में आज ही के दिन जर्मन सामाजिक जनवादी पार्टी के संसदीय ब्लॉक ने तय किया कि वह अगले दिन संसद में युद्ध ऋण के पक्ष में वोट करेगा I ऐसा करके उन्होंने सभी साम्राज्यवादी युद्धों का विरोध करने की स्थापित मार्क्सवादी नीति को तिलांजलि दे दी I लेनिन ने इन संसदीय वामपंथी कुकर्मियों और इनके नेता कार्ल काउत्स्की को मज़दूर आन्दोलन का गद्दार बताया और उनके विरुद्ध तीखा विचारधारात्मक संघर्ष चलाया I जर्मन पार्टी के अन्य शीर्ष नेता शार्ल लीबनेख्त और रोज़ा लक्जेमबर्ग भी काउत्स्की और उसके अनुयाइयों के ख़िलाफ़ थे I
यही काउत्स्की महोदय आज के सभी संसदीय जड़वामन कम्युनिस्टों और सोशल डेमोक्रेट्स के पितामह थे I इनके प्रपितामह बर्नस्टीन थे और आदरणीय पिताश्री ख्रुश्चेव जी थे I इन सबके एक चीनी चचा भी हुआ किये हैं, देंग सियाओ-पिंग, जिन्होंने "बाज़ार-समाजवाद" का सिद्धांत दिया था I बर्नस्टीन-काउत्स्की-ख्रुश्चेव-देंग के वंशज जितने भी संशोधनवादी, संसदमार्गी, अर्थवादी होते हैं, वे सभी बुर्जुआ राष्ट्रवाद और अंध-राष्ट्रवाद के आगे घुटने टेकते हैं I जो सर्वहारा क्रांति का रास्ता छोड़ता है, वह अनिवार्यतः सर्वहारा अंतरराष्ट्रीयतावाद के उसूलों को भी छोड़ देता है I
यही छद्म-कम्युनिस्ट हैं जिन्होंने 1920 और 1930 के दशक में मज़दूर वर्ग को संसदीय विभ्रमों में फँसाकर फासीवाद के विरुद्ध उसकी तैयारी को ढीला करने का काम किया था और फैसलाकुन घड़ियों में फासीवाद के सामने घुटने भी टेक दिए थे, हालाँकि फिर भी फासिस्टों ने इनको बख्शा नहीं था I आज के संशोधनवादी भी ऐसा ही आचरण कर रहे हैं हमारे देश में !
(3अगस्‍त,2018)

"बात यह है कि जो कुछ भी नया है,
हमें उनका पालन-पोषण करना होगा I
उनमें से जो कुछ भी सर्वोत्कृष्ट होगा,
उपयोगी और सुन्दर होगा,
जीवन उन्हें चुन लेगा I"

--- व्ला.इ. लेनिन ('एक महान शुरुआत')

आप अब भी सोच रहे हैं कि आपके आसपास घट रही घटनाएँ...


आप अब भी सोच रहे हैं कि आपके आसपास घट रही घटनाएँ छिटफुट हैं, ये दुर्दिन बीत जायेंगे और ज़िन्दगी फिर रेंगती-घिसटती ढर्रे पर चलने लगेगी I आप सोच रहे हैं कि बर्बर शायद आपकी बस्ती से बहुत दूर हैं, या शायद इतिहास में दफ़न हो चुके हैं I आप फिर भी बस्ती के बाहर खड़े हैं और सोच रहे हैं कि अगर बर्बरों का हमला हो ही गया तो आप क्या करेंगे ! आप शायद यह भी सोच रहे हैं कि बर्बर आपको ईमानदारी से चुनने का विकल्प देंगे और चुनाव में हारने के बाद वे आपकी बस्ती को तहस-नहस करने का इरादा छोड़कर वापस लौट जायेंगे I
लेकिन महोदय ! आप भारी मुगालते में जी रहे हैं ! आप बहुत बड़े छल और धोखे का शिकार हो चुके हैं ! जनतंत्र का चोला पहने संविधान नामक "पवित्र पुस्तक" हाथ में लिए नए ज़माने के नए बर्बर आपकी बस्तियों में कभी के प्रवेश कर चुके हैं ! उन्होंने अपने किलेबंद अड्डे बना लिए हैं और उनका खूनी खेल ज्यादा से ज्यादा खुला और खूँख्वार होता जा रहा है I
आप घुटने टेककर और रेंगकर भी इन फासिस्टों के विनाशकारी उत्पात से अपने बच्चों और परिवारों को नहीं बचा सकते I इनका हृदय-परिवर्तन किसी भी सूरत में मुमकिन नहीं ! आपको इनसे आर-पार की लड़ाई लड़नी ही होगी ! यह लड़ाई आपकी बस्ती के गली-कूचों में होगी, खेतों-कारखानों से लेकर कला-संस्कृति तक के सभी मोर्चों पर होगी I हर सूरत में लड़ने से बचने की कोशिश भी इंसान को एकदम कीड़ा माफिक बना देता है I यकीन न हो तो इन लिबरल भलेमानसों और संसदीय वामी जड़वामनों को ही देख लीजिये !

(3अगस्‍त,2018)

कवि होना


कवि होना ऐसा है
जैसे जीवन के प्रति निष्ठा रखना
हर मुश्किल में
मानो खुद अपनी उधेड़कर कोमल चमड़ी
देना लहू उड़ेल अन्य लोगों के दिल में I
--- सेर्गेई येसेनिन

हमारा समाज...


हमारा समाज अन्दर से इतना सड़ चुका है, इतना सड़ चुका है कि कोई छोटे-मोटे सामाजिक आन्दोलन इसे व्याधि-मुक्त कर ही नहीं सकते I फासिज्म का बर्बर-असभ्य उभार तो इसका एक आयाम है ! पूरा समाज तरह-तरह की निरंकुश मानवद्रोही प्रवृत्तियों की नर्सरी बन चुका है I 200 वर्षों की गुलामी के बाद जन्मना रुग्ण-विकलांग भारतीय पूँजीवाद ने समाज को केवल पूँजीवादी बुराइयाँ दीं, क्योंकि इसके पास पूँजीवाद का कुछ ऐतिहासिक सकारात्मक था ही नहीं I यह पूँजीवाद जब अति-वित्तीयकरण और व्यवस्थागत संकट की मंजिल तक पहुँचा तो देश फासिस्ट काली आँधी की गिरफ्त में आ गया I ये फासिस्ट यदि सत्ता में नहीं रहेंगे तब भी फासिस्ट उत्पात जारी रहेगा जैसेकि 1990 से जारी है I इसलिए सवाल भा.ज.पा. को चुनाव में हराने का नहीं, बल्कि तृणमूल स्तर से मेहनतकशों और प्रगतिशील मध्यवर्गीय युवाओं को संगठित करके एक रैडिकल सामाजिक आन्दोलन खड़ा करने का है I फासिज्म तृणमूल स्तर से संगठित निम्न-बुर्जुआ वर्ग का एक धुर-प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन है I उसे केवल इसीतरह से धूल में मिलाया जा सकता है I
यह सपना छोड़ दीजिये कि 2019 में मोदी हार जायेगा और भारत में किसी कल्पित आदर्श बुर्जुआ जनवाद की स्थापना हो जायेगी I पहली बात, फासिस्टों का उत्पात जारी रहेगा I दूसरी बात, यह मत भूलिए कि कांग्रेस ने ही उन नव-उदारवादी नीतियों की शुरुआत की थी, जिन्हें लागू करने की गति और तर्क को भा.ज.पा. ने चरम तक पहुँचाया I उन सामाजिक जनवादियों की मति निराशा, कायरता और संसदीय जड़-वामनता के चलते मारी गयी है जो बस यहीं तक सोच पते हैं कि कांग्रेस, संसदीय वाम दल और बुर्जुआ क्षेत्रीय दल मिलकर भा.ज.पा. को हरा देंगे और फासिज्म का संकट दूर हो जायेगा I याद रखिये, नव-उदारवादी नीतियों पर अमल हर हाल में एक निरंकुश राज्य-सत्ता की मांग करता है और यही कारण है कि आज पूरी दुनिया में बुर्जुआ जनवादी स्पेस सिकुड़ता जा रहा है तथा बुर्जुआ जनवाद और निरंकुश राज्यसत्ता के बीच की विभाजक रेखा धूमिल पड़ती जा रही है I बात केवल फासिज्म की नहीं है I बुर्जुआ जनवाद और फासिज्म के बीच बुर्जुआ राज्य के कई आपवादिक रूप भी होते हैं, जैसेकि बोनापार्तिज्म, जैसे नव-उपनिवेशवाद के दौर में लातिन अमेरिका की मिलिट्री जुंटाओं की सत्ताएँ, आदि-आदि ... Iभारत में आपातकाल का दौर भी एक आपवादिक बुर्जुआ राज्यसत्ता का दौर था I कांग्रेस एक फासिस्ट पार्टी या आन्दोलन नहीं है, लेकिन उसने राजनीतिक-संवैधानिक संकट के दबाव में 1975-77 के बीच एक बर्बर निरंकुश राज्यसत्ता का संचालन किया था I
भारत के वाम बौद्धिकों और संसदीय जड़-वामनों ने समाजवाद की परियोजना को मन ही मन असंभव मान लिया है और उसके बारे में सोचना ही छोड़ दिया है I एक बुर्जुआ जनवाद के आदर्शीकृत यूटोपिया से आगे वे सोच ही नहीं पाते I वे सिर्फ छोट-छोटे बदलावों की पैबंदसाज़ी करने तक ही सोच पाते हैं ! लेकिन, जैसाकि ब्रेष्ट ने कहा था, छोटे बदलाव बड़े बदलावों के दुश्मन होते हैं ! और जर्मन महाकवि गोएठे ने भी यूँ ही तो नहीं कहा था कि 'छोटे सपने मत देखो क्‍योंकि उनमें लोगों के दिलों को झकझोरने की ताक़त नहीं होती।'
ब्रेष्ट की ये पंक्तियाँ भी इस व्यवस्था की चौहद्दी को अपनी और समूची जनता की नियति मान चुके वाम "शरीफजादों" को शायद बहुत कड़वी लगें :
"जो कमज़ोर होते हैं वे लड़ते नहीं ।
जो उनसे अधिक मज़बूत होते हैं
वे लड़ सकते हैं घंटे भर के लिए ।
जो और अधिक मज़बूत होते हैं , वे फिर भी
लड़ सकते हैं कई वर्षों तक ।
सबसे अधिक मज़बूत लोग लड़ते हैं
अपनी पूरी ज़िंदगी ।
वही हैं जो अपरिहार्य होते हैं ।"
इन लिबरल लोगों के बारे में लेनिन कहते हैं :" लिबरल लोग संघर्ष की पैरवी कर ही नहीं सकते क्योंकि वे संघर्ष से डरते हैं. प्रतिक्रिया के तीव्र होने पर वे संविधान का रोना रोने लगते हैं, और इसप्रकार अपने तीव्र अवसरवाद से वे लोगों का दिमाग भ्रष्ट करने का काम करते हैं. ...जब किसी लिबरल को गाली दी जाती है तो वह कहता है कि शुक्र है कि उन्होंने उसे पीटा नहीं, जब उसकी पिटाई होती है तो वह खुदा का शुक्रिया अदा करता है कि उन्होंने उसकी जान नहीं ली. अगर उसकी जान चली जाए तो वह ईश्वर को धन्यवाद देगा कि उसकी अनश्वर आत्मा को उसके नश्वर शरीर से मुक्ति मिल गयी."
लिबरल बुद्धिजीवी वे लोग होते हैं जो जीत के दिनों में अति-उत्साही और पराजय के दिनों में अति- दुनियादार "व्यावहारिक" हो जाते हैं I मार्क्स की बेटी और यूरोपीय मज़दूर आन्दोलन की नेता एलीनोर मार्क्स ने पेरिस कम्यून के 21 वर्षों बाद कम्यूनार्डोंको याद करते हुए कहा था,"वीरोचित ढंग से लड़ना बड़ी बात है ... लेकिन कितने ऐसे लोग हैं जो एक दिन के लिए नहीं,एक घंटे के लिए नहीं, बल्कि वर्षों की लम्बी, थकाऊ अवधि के दौरान, हर दिन वीरोचित बने रहेंगे ?"
(31जुलाई,2018)

अब क्रांति में ही देश का उद्धार है, ऐसी क्रांति जो सर्वव्यापक हो, जो जीवन के मिथ्या आदर्शों का, झूठे सिद्धांतों और परिपाटियों का अंत कर दे। जो एक नए युग की प्रवर्तक हो, एक नई सृष्टि खङी कर दे, जो मनुष्य को धन और धर्म के आधार पर टिकने वाले राज्य के पंजे से मुक्त कर दे।
-- प्रेमचंद

प्रख्यात मार्क्सवादी इतिहासकार और गणितज्ञ डी.डी.कोसम्बी केे111वाँ जन्मदिवस के अवसर पर !

मार्क्सवाद के कुछ विरोधी इसे 19वीं सदी के पूर्वाग्रहों पर आधारित एक पुराना पड़ चुका आर्थिक जड़सूत्र कहकर खारिज करते हैं। मार्क्सवाद कभी भी जड़सूत्र नहीं था। महज़ 19वीं सदी में सूत्रबद्ध किये जाने के कारण यह पुराना पड़ चुका और गलत नहीं हो जाता, ठीक वैसे ही जैसे गौस, फैराडे और डार्विन की खोजें, जो अब विज्ञान का हिस्सा बन चुकी हैं। तार्किकता का तकाज़ा है कि जो लोग इसके 19वीं सदी के पुरानेपन पर नाकभौं चढ़ाते हैं उन्हें मिल, बर्क और हरबर्ट स्पेंसर को अपने पक्ष में उद्धृत नहीं करना चाहिए, और न ही इससे भी कहीं ज़्यादा पुरानी और निश्चित तौर पर ज़्यादा कालातीत हो चुकी भगवद् गीता में आस्था रखनी चाहिए। आम तौर पर इसके बचाव में कहा जाता है कि गीता और उपनिषद भारतीय हैं; जबकि मार्क्सवाद जैसे विदेशी विचार आपत्तिजनक हैं। आम तौर पर ऐसे तर्क अंग्रेज़ी में, यानी शिक्षित भारतीयों के बीच प्रचलित विदेशी भाषा में, और ऐसे लोगों द्वारा दिये जाते हैं जो विदेशियों द्वारा भारत में ज़बर्दस्ती लागू की गयी उत्पादन प्रणाली (बुर्जुआ प्रणाली) के तहत जीते हैं। इसलिए आपत्ति विदेशी मूल से उतनी नहीं लगती जितनी स्वयं उन विचारों के प्रति लगती है जिनसे वर्गीय विशेषाधिकार खतरे में पड़ सकते हैं। कहा जाता है कि मार्क्सवाद हिंसा पर, वर्ग-युद्ध पर आधारित है जिसमें आजकल श्रेष्ठ जन विश्वास नहीं करते हैं। वैसे वे यह घोषणा भी कर सकते हैं कि मौसमविज्ञान तूफानों की भविष्यवाणी करके उन्हें प्रोत्साहन देता है। मार्क्सवाद की किसी भी कृति में युद्ध के लिए उकसावा और बेवजह हत्याओं के पक्ष में शब्दाम्बरपूर्ण तर्क ऐसे नहीं हैं जिनकी दिव्य गीता में ऐसी बातों से रत्तीभर भी तुलना की जा सकती हो।

— दामोदर धर्मानन्‍द कोसम्‍बी
‘‘एग्ज़ैसपरेटिंग एसेस’’ की भूमिका से (1957)

हिन्दी कवि और कविता पर कुछ “अगंभीर विचार” ( बुरा न मानने के लिए )



हांस आइस्लर ने एक जगह लिखा है कि ब्रेष्ट पारंपरिक संगीत के रूपवाद से बहुत चिढ़ते थे। उनका मानना था कि सिम्फ़नी कंसर्ट और ऑपेरा सिर्फ़ ‘इमोशनल कन्फ्यूजन’ पैदा करते हैं। वह संगीत से ‘रीज़न’ की -- तर्कणा की माँग करते थे।
ब्रेष्ट तो संगीत से ‘रीजन' की माँग करते थे, लेकिन अगर आप हिन्दी कविता से ‘रीजन' की माँग कर दें तो अभिजन कवि समाज नाक पर रुमाल रखकर उछल पड़ेगा। हिन्दी कविता की दुनिया में ‘इमोशनल कन्फ्यूजन' का घटाटोप है। अपने समय और समाज को समझने वाली ऐतिहासिक तर्कणा के दर्शन यहाँ विरल ही होते हैं।
कुछ कवियों की कलम में तो ऐसा जादू है कि वे भारत के पहाड़ों के बारे में जब लिखते हैं तो वे हमें ग्रीस या इटली के पहाड़ लगने लगते हैं, या माच्चू-पिच्चू, या किलिमंजारो। हमारी नदियाँ उनकी कविताओं में आकर लातिन अमेरिका की नदियाँ बन जाती हैं और जंगल अमेजन के वर्षा-वन लगने लगते हैं। ऐसा उनके जादू का ज़ोर है ! वे जब हमारे समाज के आम लोगों के बारे में कभी लिखते हैं, तो चिर-परिचित लोग हमें बेगाने लगने लगते हैं, किसी अन्य महादेश के निवासी, या कभी-कभी तो परग्रहीय प्राणी। वे हमारी एकदम अपनी चीज़ों को जादू के ज़ोर से बेगाना बना देते हैं। और उनकी कविता में इतनी शक्ति होती है कि वह हमें कभी ग्रीक, कभी पोलिश, कभी फ्रेंच, कभी स्पेनिश, कभी हंगारी, तो कभी किसी अन्य स्लाव भाषा की कविता लगती है।
कुछ कवि शब्दों को इतना तराशते हैं कि ताज के शिल्पी भी शर्मा जाते।इतना बारीक़ कातते-बुनते हैं कि ढाका का मलमल बुनने वाले कारीगर भी अपना करघा तोड़ देते। उनके शब्दों, बिम्बों और रूपकों के जादुई  चमक और चमत्कार से आप इसतरह मोहाविष्ट हो जाते हैं कि अंतर्वस्तु के बारे में सोचना ही भूल जाते हैं।
कुछ कवि सामाजिक विद्रोह की दुनिया से व्यक्तिगत विद्रोह की दुनिया में विस्थापित हो गए हैं, या फिर उन्होंने व्यक्तिगत विद्रोह और अराजक ध्वंस-वृत्ति को ही सामाजिक विद्रोह की रणनीति घोषित कर दिया है। ये आज के नए अवांगार्द हैं। ये लोग मंटो से ऊबकर इनदिनों भुवनेश्वर और राजकमल चौधरी की आत्माओं का आवाहन कर रहे हैं, या फिर अज्ञेय के शेखर को नए अवतार में प्रस्तुत कर रहे हैं।
कुछ कवि जीवन में परम संतुष्ट भले हों, पर कविता में अपने को जीवन-जगत से परम असंतुष्ट दिखलाते हैं और लगातार भिनभिन-भुनभुन टाइप कविताएँ लिखते रहते हैं। इनमें से कुछ हमेशा नाराज रहते हैं और कविता में जनता को उसकी मूढ़ता के लिए कोसते हैं, क्रांतिकारी वामपंथियों को कठमुल्लापन और फूटपरस्ती के लिए और क्रांति में देरी करने के लिए कोसते हैं, संसदीय वामपंथियों को यथास्थितिवादी हो जाने के लिए कोसते हैं, आलोचकों को गुटपरस्ती के लिए कोसते हैं और यह कोसना वे उसीतरह करते हैं जैसे दैनंदिन जीवन में वे पत्नी को दाल में नमक कम होने के लिए कोसते हैं, पढ़ाई पर ध्यान न देने के लिए बच्चों को कोसते हैं, उमस और गर्मी के लिए मौसम को कोसते हैं, गन्दगी और जाम के लिए प्रशासन को कोसते हैं और रोज सुबह साफ़ न होने के लिए अपने पेट को कोसते हैं।
कुछ कवि अहर्निश, अनंत-अछोर प्रेम में डूबे रहते हैं। उनके प्रेम की दुनिया में किसी भी किस्म की मानवीय आपदा या सामाजिक-राजनीतिक संकट का प्रवेश नहीं हो पाता। कभी वे रिल्के की तरह, कभी फर्नान्दो पेसोआ की तरह, कभी मंदेलश्ताम की तरह, कभी त्स्वेतायेवा की तरह, कभी अख्मातोवा की तरह, कभी शिम्बोर्स्का की तरह, कभी वास्को पोपा की तरह, कभी बोर्खेस की तरह, तो कभी गैब्रियेला मिस्राल की तरह प्यार करते हैं (नाजिम हिकमत या पाब्लो नेरूदा की तरह इनदिनों वे थोड़ा कम प्यार करते हैं )। प्यार के अतिरिक्त वे मनुष्यता के अमूर्त दुखों और उदासियों के बारे में बातें करते हैं। मूर्त चीज़ों को वे कविता का शत्रु मानते हैं।
कुछ स्त्री-कवि भी हैं जो रीतिकाल और छायावाद से आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता तक निरंतर आवाजाही करती रहती हैं। कभी वे अति-भावुक प्यार में आकुल-व्याकुल दीखती हैं, कभी विरहिणी नायिका बन जाती हैं, कभी ‘लस्ट स्टोरीज़' सुनाने पर आमादा होकर मांसलता और यौनिकता के साहसिक आख्यान रचने लगती हैं, तो कभी जूडिथ बटलर के उत्तर-आधुनिकतावादी, उत्तर-मार्क्सवादी नारीवाद से प्रेरित होकर जीवन और कविता में, समाज के पोर-पोर में समाई पुरुष-सत्ता का प्रतिकार, स्थापित ‘सोशल नॉर्म्स’ को तोड़कर और विचलनशील यौन-व्यवहार (‘डेविएन्ट सेक्सुअल बिहेविअर') करके करने लगती हैं |
कुछ कवि रूमानी अतीतजीविता की गुफा में अभी भी ध्यानस्थ हैं। लेकिन ग्राम्य जीवन की लोकवादी रागात्मकता की अभ्यर्थना का चलन अब कम हो रहा है। यह समय आदिवासी जीवन और मूल्यों के अनालोचनात्मक महिमा-मंडन का है।
और इन सभी प्रवृत्तियों की नक़ल करके महाकवि बनाने की महत्वाकांक्षा पाले अधकचरे कवियों की संख्या तो कई सौ, या शायद हज़ार से भी ऊपर होगी। विश्वास न हो तो सोशल मीडिया पर देख लीजिये। जिसे नाक छिनकने की तमीज नहीं, वह कुछ कूपमंडूकों द्वारा संपादित चन्द-एक पत्रिकाओं में छप जाने के बाद स्वयं को कविता का महाशिल्पकार समझने लगता है। कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें यकीन है  कि कविता की विद्योत्तमा यदि दुत्कार कर भगा भी दे तो देर-सबेर वे कालिदास की तरह निष्णात कवि और दुर्दांत विद्वान बनाकर वापस लौटेंगे ही।

(30जुुुुलाई, 2018)

हमारी संस्कृति का कोई भी पक्ष प्रत्यक्ष रूप से उसी अनुपात में फलता-फूलता है, जिस अनुपात में उसे औद्योगिक संपत्ति के विधाताओं का प्रश्रय प्राप्त होता है I
--- प्रो. वाल्टर एबेल
(अमेरिकी अकादमीशियन )

आरे भयवा...


आरे भयवा, ई 'टाराई' के जो चेयरमैन हैं, सरमाजी, ई तो गजब ओभरकौन्फिडेंट चपाट निकले ! खुल्ला चाईलेन्ज दे दिए की हमरा आधार न. से हमरा पाराईभेट कौनफीडेन्सिअल जानकारी निकाल के दिखाओ ! ओन्ने थोड़हीं देर में फ्रानस का एक ठो खंच्चड हैकर सब निकाल के दिखा दिया I सरमाजी का मुंह चोखा हो गया I गलदोदई करते रहे, बाकी समझ गए की ई सब तो हमरा गंजी- चड्ढी का लम्मर भी बता देगा I

अब भगत लोग तो किड़बिड़ करबे करेगा, मगर हमको एक अईडिया आया है I ई जो मुख्य इलेक्सन कमिश्नर महोदय हैं न, का नाम है, ओम परकास रावत जी, ईहो एक ठो चाईलेन्ज काहे न दे देते हैं की ई.भी.एम. हैक करके दिखा दो असली माई का लाल हो तो ! हँ भाई, सांच को आंच कईसा ? कर दो राउत जी चाईलेन्ज ! मजा आ जाएगा आउर दूध का दूध पानी का पानी त होइये जाएगा !
(29जुलाई,2018)


ख्याति का प्रेक्षागृह और सर्राफे की दुकानें एक ही मंडी में पड़ते हैंI

--- हांस मुंच (जर्मन कलाकार)