Saturday, July 25, 2020


परसों एक बरसों पुराने शुभचिंतक साथी मिल गये I रिटायर हो चुके हैं, बाल-बच्चों को व्यवस्थित कर चुके हैं, नया घर भी पॉश लोकैलिटी में बनवा लिया है I तन और मन से टंच और टन-मन हैं I अभी भी सुबह अपने कुत्ते के साथ रोज़ सुबह 5 कि.मी. की सैर करते हैं I पहले भी पॉलिटिक्स पर काफ़ी बात करते थे और क्रांतिकारियों को एक दर्ज़न शिक़ायतों के साथ दो दर्ज़न सुझाव दे देते थे , अब देश-दुनिया के बारे में चिंतित रहने के लिए और अधिक फुर्सत में रहते हैं I

अबकी मिले तो सामाजिक चिंताओं और ज़रूरी सलाहों-मशवरों के बाद निजी चिंताओं-सुझावों पर उतर आये, बोले,"अब अपना जीवन भी कुछ थोड़ा-बहुत व्यवस्थित कर लेने के बारे में सोचना चाहिए तुम्हें I मैंने बहुत सारे कम्युनिस्टों को बुढ़ापे में अकेले पड़ जाते, उपेक्षा झेलते, कष्ट उठाते और अवसाद-ग्रस्त होते देखा है I"

मैंने कहा,"हम उन 'बहुत सारों' से ज़रा अलग किस्म के हैं I" मैंने उन्हें अपनी 15-16 वर्षों पुरानी वही कविता फिर से सुना दी, जो कभी सुना चुकी थी I इस कविता का विद्रोही स्वर बेशक अराजकतावादी है, लेकिन समझौता और समर्पण करके रूढ़ि‍यों और बर्बर परम्पराओं के दुर्गंधमय कीचड़ में रेंगने-घिसटने की तुलना में तो अराजक विद्रोह भी बेहतर ही माना जाना चाहिए I आप सब भी फिर से पढ़िए यह कविता :

"अगर फिर मुझसे कहा गया
किसी कलमघसीट मुदर्रिस,
बुद्धि का चंदन घिसने वाले तुंदियल,
भत्ताभोगी क्रांतिधर्मी
या किसी थकी-हारी आत्मा के साथ
ज़िन्दगी बिताने को,
तो मैं चुनूँगी
किसी क़ब्र खोदने वाले को
और किसी अधखुदी क़ब्र में
रात बिताने के बाद
अगले दिन किसी घुमक्कड़ के साथ
दुनिया घूमने निकल जाऊँगी।"

शुभचिंतक साथी इतने से कन्विंस नहीं हुए I वह कुछ और कहना चाहते थे, लेकिन मैंने शॉर्टकट मारते हुए इक़बाल के ये दो शेर सुना दिए और फिर हम दोनों अपने-अपने रास्ते लग लिए :

"तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा
तेरे सामने आसमां और भी हैं।"

और,

"नहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर
तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों में "

(28जून, 2020)

Friday, July 24, 2020


(भारतीय मीडिया में इनदिनों आम पाठक रोज़ यह पढ़ और देख-सुन रहा है कि नेपाल भी चीन की शह पर भारत को "आँखें दिखा रहा है" और कालापानी एवं लीपुलेख के इलाकों पर अपना दावा ठोंक रहा है I अंधराष्ट्रवाद की आँधी में यह बात लोग सहज स्वीकार भी कर रहे हैं I पर आखिर भारत-नेपाल सीमा विवाद की सच्चाई क्या है ? इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है ? इन सभी के बारे में तथ्यों को जानना बेहद ज़रूरी है ! इस विषय पर जानकारी देने के लिए, जाहिर है, उपयुक्ततम व्यक्ति कामरेड Anand Swaroop Verma ही हो सकते हैं जो नेपाल के इतिहास और वर्त्तमान के तथा नेपाल-भारत-संबंधों के अनन्य विशेषज्ञ हैं I मेरा सभी साथियों से आग्रह है कि वे का. आनंद स्वरूप वर्मा का यह आलेख ज़रूर पढ़ें, और गौर से पढ़ें, और संजीदा लोगों को पढ़वायें भी !)

भारत-नेपाल विवाद और कालापानी का सच
-- आनंद स्वरूप वर्मा

नवम्बर 1814 से मार्च 1816 तक नेपाल (जिसे उस समय गोरखा अधिराज्य कहा जाता था) और भारत पर शासन कर रही ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच युद्ध चला जिसमें नेपाल को पराजय का सामना करना पड़ा। 4 मार्च 1816 को सम्पन्न सुगौली संधि के साथ इस युद्ध का समापन हुआ और संधि के फलस्वरूप नेपाल को अपने एक तिहाई हिस्से से हाथ धोना पड़ा। संधि से पहले तक जो नेपाल का भू-भाग था वह ब्रिटिश भारत में शामिल कर लिया गया। नेपाल, जो कभी किसी का उपनिवेश नहीं रहा, अब भी एक स्वतंत्र राष्ट्र तो था लेकिन संधि के अनुसार काठमांडो में स्थायी तौर पर एक ब्रिटिश रेजिडेंट की नियुक्ति हुई और ब्रिटिश सेना के लिए गोरखा सैनिकों की भर्ती की प्रथा शुरू हुई। वैसे भी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का मकसद तिब्बत तक व्यापार के लिए रास्ता तैयार करना था।
सुगौली संधि की धारा 5 के अनुसार महाकाली नदी के पूर्व का क्षेत्र नेपाल के हिस्से में आया और इसके पश्चिम का सारा क्षेत्र ब्रिटिश भारत में मिल गया। इस संधि में लिंपियाधारा को महाकाली नदी का स्रोत बताया गया है। कालापानी और लीपुलेख महाकाली नदी के पूर्व में है जिसके आधार पर नेपाल इस पर अपना दावा करता है।
कालापानी में भारतीय सैनिक कब और कैसे पहुंचे, इसका किसी के पास ठोस रूप से कोई जवाब नहीं है। नेपाल के सीमा विशेषज्ञ और ‘भू सर्वेक्षण विभाग’ के पूर्व डायरेक्टर जनरल बुद्धि नारायण श्रेष्ठ का अनुमान है कि 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध होने के बाद जब चीनी सेनाओं ने भारतीय सैनिकों को पीछे खदेड़ना शुरू किया तो वे कालापानी तक पहुंचे। उन्होंने देखा की सामरिक दृष्टि से यह स्थान बहुत महत्वपूर्ण है और फिर उन्होंने यहां एक सैनिक अड्डा स्थापित कर लिया ताकि अगर चीन दोबारा हमला करे तो वे मुकाबला कर सकें। यह स्थान थोड़ी ऊंचाई पर था जहां से चीनी सैनिकों पर निगरानी रखी जा सकती थी।
लंबे समय तक नेपाल के लोगों का ध्यान कालापानी और वहाँ स्थित भारतीय सैनिक अड्डे पर नहीं गया क्योंकि 1991 के बाद से ही कालापानी की चर्चा सुनने को मिलती है। इसकी दो वजहें समझ में आती हैं। एक तो यह कि सुदूर पश्चिमी नेपाल का यह हिस्सा अत्यंत दुर्गम था और वहाँ तक पहुँचने के लिए कोई साधन नहीं था। महेंद्र राजमार्ग बनने के बाद ही सुदूर पश्चिम का काठमांडो तथा अन्य हिस्सों के साथ सहज संपर्क कायम हो सका। दूसरी वजह नेपाल की निरंकुश पंचायती व्यवस्था थी जिसमें राजा ही सर्वोपरि था और जनता की आवाज़ का कोई अर्थ नहीं था। राजकाज के मसलों से काफी हद तक लोग उदासीन रहते थे। 1990-91 में लंबे जन आंदोलन के बाद जब बहुदलीय व्यवस्था और संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना हुई इसके बाद ही लोग ज्यादा मुखर हो सके। फिर जितने भी चुनाव हुए उनमें नेपाली कांग्रेस को छोड़ कर, जिसे भारत समर्थक माना जाता था, लगभग सभी पार्टियों ने ‘कालापानी खाली करो’ नारे को बुलंद किया। चुनाव खत्म होते ही यह नारा भी अगले चुनाव तक ठंडे बस्ते में चला जाता था। देखा जाय तो कालापानी का मसला चुनाव के समय ‘भारतीय विस्तारवाद’ के बरक्स ‘नेपाली राष्ट्रवाद’ को उभारने तक ही सीमित था। ‘नेपाली टाइम्स’ ने भी 2 नवम्बर 2019 के अपने संपादकीय में लिखा है-“नेपाल के शासकों ने 1990 के बाद अपने राजनीतिक हितों के लिए भारत-विरोध को राष्ट्रवाद के रूप में इस्तेमाल किया लेकिन अपने इस क्षेत्र पर वैधानिक दावे के लिए दबाव डालने के मकसद से कुछ नहीं किया।“
लेकिन क्या नेपाल के तत्कालीन राजा महेंद्र को भी इसकी जानकारी नहीं थी कि कालापानी में भारतीय सैनिकों ने अपनी छवानी बना ली है ? नेपाली अखबार ‘माई रिपब्लिका’ में पत्रकार महाबीर पौड्याल ने प्रमुख राजनीतिज्ञ और इतिहासकार ऋषिकेश शाह के हवाले से बताया है कि राजा महेंद्र को इसकी जानकारी थी। उस समय ऋषिकेश शाह राजा के मंत्रिपरिषद के सदस्य थे और उन्होने नेपाल नरेश का ध्यान इस ओर दिलाया जिसके जवाब में महेंद्र ने कहा कि अभी इस मुद्दे को उठाना ठीक नहीं है क्योंकि भारत सरकार उनसे काफी नाराज है—उचित अवसर आने पर वह इस मुद्दे को उठाएंगे। दरअसल 1960 में उन्होने बी॰ पी॰ कोईराला की निर्वाचित सरकार को भंग कर कोईराला को आठ साल तक जेल में रखा था जिससे भारत सरकार काफी नाराज थी। जेल से छूटने के बाद कोईराला ने 1968 में भारत में ही आ कर राजनीतिक शरण ली थी। 12 नवंबर 2019 को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में पत्रकार युबराज घिमिरे ने लिखा कि “तकरीबन पाँच वर्ष पूर्व विदेश मंत्री महेंद्र बहादुर पांडे ने दावा किया कि स्वर्गीय राजा महेंद्र ने काला पानी के इलाके को भारत को सौंपा था।“
लगभग इससे मिलती जुलती बात भेष बहादुर थापा ने, जो 1997 से 2003 तक भारत में नेपाल के राजदूत थे, अपने एक संस्मरण में कही। 31 अगस्त 2015 को नेपाल के प्रमुख दैनिक ‘नया पत्रिका’ में उन्होने लिखा कि उनके कार्यकाल के दौरान सीमा से संबंधित विवादों पर विचार विमर्श के लिए नई दिल्ली में नेपाली और भारतीय सर्वे ऑफिसर्स की एक बैठक हुई थी। उस बैठक में नेपाल की ओर से बुद्धि नारायण श्रेष्ठ जैसे विशेषज्ञों ने भाग लिया था और उन्होंने प्रामाणिक नक्शा तथा लिंपियाधारा और कालापानी के बीच वाले इलाकों में रहने वाले नेपाली नागरिकों द्वारा जमा की गई भू राजस्व की रसीदें पेश की थी। भारतीय विशेषज्ञों के पास कोई ठोस प्रमाण नहीं था जिससे वे सिद्ध कर सकें कि काला पानी उनका इलाका है तो भी बैठक बिना किसी निष्कर्ष के समाप्त हुई। शाम को दोनों देशों की सर्वे टीम के सदस्यों के लिए उन्होंने दूतावास में एक रात्रि भोज का आयोजन किया जिसमें भारत के सर्वे डिपार्टमेंट के डायरेक्टर जनरल भी उपस्थित थे। आगे उन्होंने लिखा है - “मैंने उनसे (डायरेक्टर जनरल से) पूछा कि हमारी ओर से सारे दस्तावेज पेश किए गए फिर भी आप लोगों की ओर से समस्या को हल करने में इतना विलंब किया जा रहा है। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि ‘हिज हाईनेस’ ने हमें कालापानी दे दिया था... मैंने उनसे कहा कि राजा अथवा संसद को भी यह अधिकार नहीं है कि वह देश के किसी हिस्से को किसी अन्य देश को दे दे। उन्होंने इसका कोई जवाब नहीं दिया।”
अपने इसी संस्मरण में राजदूत ने यह बताया है कि भारत के तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्र ने एक बातचीत के दौरान उनसे कहा कि “काला पानी से हटने में भारत अपने को सुरक्षित नहीं महसूस करता।“ राजदूत के अनुसार इसके कुछ ही समय बाद नेपाल में सत्ता परिवर्तन हुआ और नए शासकों को लगा कि भारत के हस्तक्षेप के बिना वे सत्ता में नहीं बने रह सकते हैं। इसका असर यह हुआ कि कालापानी का मुद्दा कहीं ओझल हो गया।
अभी 24 मई 2020 को नेपाल के अखबार ‘माई रिपब्लिका’ में विदेश मंत्री का एक इंटरव्यू प्रकाशित हुआ है जिसमें यह पूछे जाने पर कि क्या कालापानी के लिए भारत को अनुमति देने का कोई दस्तावेज है, विदेश मंत्री ने कहा कि हमारे पास ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है लेकिन अगर हम उस समय की घटनाओं को देखें तो जिस समय 1962 का भारत-चीन युद्ध हुआ था, नेपाल में एक तानाशाही व्यवस्था थी जहां जनता इस हालत में नहीं थी कि वह ऐसे मुद्दों पर शासकों से बात करे। भारत ने इस स्थिति का फायदा उठाया।
क्या वजह है कि नेपाल के पास ऐसा कोई दस्तावेज़ नहीं है जिससे यह पता चल सके कि नेपाल ने कालापानी भारत को कब सौंपा? इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमें 1952 की घटनाओं पर सरसरी तौर पर निगाह डालने की जरूरत है। राजा त्रिभुवन और राणा शासकों के बीच समझौता कराने के कुछ समय बाद प्रधान मंत्री नेहरू ने त्रिभुवन से कह कर अपने चहेते मातृका प्रसाद कोईराला (नेपाली कांग्रेस) को प्रधान मंत्री बनवाया। उधर 1949 की चीनी क्रांति और फिर 1951 मंं चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जा करने के बाद नेपाल और भारत दोनों को कम्युनिज्म का भूत सताने लगा। मातृका प्रसाद कोईराला के ‘अनुरोध’ पर नेपाली सैनिकों और नेपाली सेना के रेडियो आपरेटरों को प्रशिक्षण देने के लिए भारत ने सेना की एक टीम भेजी। नेपाल सरकार की ओर से वक्तव्य जारी हुआ कि “भारतीय सेना की टीम एक वर्ष अथवा इससे कुछ कम समय के अंदर हमारे सैनिक अधिकारियों को प्रशिक्षण देगी और नेपाल की सेना का पुनर्गठन करेगी।” लेकिन यह टीम एक वर्ष की बजाय 18 वर्ष तक वहाँ जमी रही। उस प्रकरण पर ‘अन्नपूर्णाएक्सप्रेस डॉट कॉम’ में वरिष्ठ पत्रकार हरी बहादुर थापा ने लिखा-“भारतीय सैनिक मिशन ने अपना काम नेपाल के आधुनिकीकरण तक ही सीमित नहीं रखा। भारतीय सलाहकारों ने नेपाल सरकार को यह विश्वास दिलाया कि चीनी साम्यवाद नेपाल में प्रवेश कर सकता है। उनका कहना था कि नेपाल और भारत दोनों को चीन से खतरा है। नतीजा यह हुआ कि भारतीयों ने एक सामरिक योजना तैयार की और उसके अनुसार तिब्बत से लगी नेपाल की सीमा पर 18 चेकपोस्ट स्थापित किए गए। जब एक साल के बाद भारतीय सैनिक मिशन ने वापस जाने का इरादा नहीं प्रकट किया तो सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के अंदर आपस में संघर्ष शुरू हो गया। इसके नेता बीपी कोइराला ने एक बयान जारी कर कहा कि “भारतीय सैनिक मिशन, जो यहां एक साल के लिए आया था, उसे अब वापस जाना चाहिए।” विपक्षी राजनीतिक पार्टियां भी यही चाहती थीं।” फिर कैसे तत्कालीन प्रधान मंत्री कीर्ति निधि बिष्ट ने राजा महेंद्र को समझा-बुझा कर और इन्दिरा गांधी की नाराजगी मोल लेते हुए भारत के साथ किए गए सैन्य समझौते को अप्रैल 1969 में रद किया और भारतीय सैनिकों को वापस भेजा, इसका व्यौरा 24 जून 1969 के ‘दि राइजिंग नेपाल’ में देखा जा सकता है। 1969 में नेपाल के खिलाफ भारत ने जो पहली बार आर्थिक नाकाबंदी की थी उसके मूल में भी इन्दिरा गांधी की नाराजगी ही थी।
उन्हीं 18 भारतीय चेक पोस्टों में एक चेक पोस्ट सुदूर पश्चिम के टिंकर दर्रे में था जो लीपुलेख से कुछ किलोमीटर पूर्व में है। खाली किए गए 18 चेक पोस्टों की सूची में टिंकर दर्रे का भी नाम था लेकिन टिंकर से लौटते हुए भारतीय सैनिकों ने कालापानी को अपना बेस कैंप बना लिया, इसकी जानकारी नेपाल सरकार को काफी समय तक नहीं हो सकी। यही वजह है कि भारतीय सैनिकों के कालापानी में रहने का नेपाल के पास कोई रेकार्ड नहीं था। बुद्धि नारायण श्रेष्ठ के ब्लॉग से भी यही जानकारी मिलती है। उन्होंने ‘कमेटी ऑफ इंटेलेक्चुअल ऐंड प्रोफेशनल सॉलिडेरिटी अगेंस्ट बॉर्डर एंक्रोचमेंट ऐंड दि स्टेट एट्रोसिटीज’ की 4 जुलाई 1998 की काठमांडों की एक बैठक का जिक्र किया है जिसमें कीर्ति निधि बिष्ट से सवाल किया गया कि जब सभी चेक पोस्टों को हटा दिया गया था तो आपके प्रधानमंत्री रहते हुए कालापानी की चौकी कैसे बनी रही? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि “इसकी एक वजह यह हो सकती है कि कालापानी में सैनिक चौकी की स्थापना के समय दोनों देशों के बीच कोई पत्राचार नहीं हुआ था। हुआ यह होगा कि 1962 में चीन से पराजित होने के बाद जब भारतीय सैनिक टिंकर के मोर्चे से पीछे हटने लगे और उन्होंने कालापानी के इलाके को देखा तो उन्हें लगा कि सामरिक दृष्टि से यह बहुत अच्छी जगह है और फिर उन्होंने वहां अपना अड्डा बनाने का निर्णय ले लिया। वे यह भूल गए कि यह तो नेपाल की जमीन है। 1952 में जब दोनों देशों ने नेपाल की उत्तरी सीमा पर भारतीय चौकियों की स्थापना का निर्णय लिया था तो जो पत्राचार हुआ था, उनमें 18 स्थानों का नाम दर्ज था जिनमें कालापानी नहीं था। इसलिए जब चौकियों को सैनिकों ने खाली किया तो जाहिर सी बात है कि कालापानी का नाम नहीं था।”
दशकों से सत्ता की आपसी खींचतान में व्यस्त और कालापानी के मामले में बेहद निश्चिंत पड़े हुए नेपाली नेताओं की नींद आज अचानक कैसे टूट गई? दरअसल नवंबर 2019 में कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश दिखाते हुए भारत सरकार ने जो नया नक्शा जारी किया, उसमें कालापानी को भारत के हिस्से में दिखा दिया। भारत के इस नक्शे पर विरोध व्यक्त करते हुए नेपाल के विदेश मंत्रालय ने तुरत एक बयान जारी किया। इसके जवाब में भारत ने कहा कि नेपाल का दावा अनुचित है। इस पर नेपाली जनता ने अपना रोष व्यक्त किया जिसकी अभिव्यक्ति लगातार अलग अलग रूपों में नजर आने लगी थी। इसके कुछ ही दिनों बाद भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उत्‍तराखंड के धारचुला से लिपुलेख तक के लिए एक लिंक रोड का अनावरण किया जो मानसरोवर यात्रा रोड है। यहाँ यह बताना प्रासंगिक होगा कि भारत द्वारा नक्शा छापे जाने के बाद से ही नेपाल लगातार कालापानी-लीपुलेख पर भारत सरकार से बातचीत करने के प्रयास में लगा था लेकिन भारतीय अधिकारी कोविड-19 का हवाल दे कर बातचीत टालते रहे। ऐसे में कोविड-19 संकट के बीच सड़क-उद्घाटन की हड़बड़ी ने अनेक सवाल पैदा किए। 19 मई 2020 को प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने कहा कि “नेपाल के तत्कालीन शासकों ने काला पानी के मुद्दे पर भारत से बात करने में हिचकिचाहट प्रकट की लेकिन मौजूदा सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में मैं आप सब को यह जानकारी देना चाहता हूं कि मैं इस मुद्दे को छोडूंगा नहीं।”
और इसी क्रम में सभी पार्टियों की अभूतपूर्व एकता के बीच नेपाल ने अपना नया नक्शा जारी किया जिसे संसद और राष्ट्रपति का अनुमोदन मिला।
इस दौरान नेपाल ने उन पुराने नक्शों को सार्वजनिक किया है जो उसके दावों की पुष्टि करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय सीमा-निर्धारण विशेषज्ञ प्रभाकर शर्मा ने, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र ने कैमेरून—नाइजीरिया सीमा विवाद हल करने के लिए सर्वे इंजीनियर के रूप में नियुक्त किया था, अपने एक लेख में जानकारी दी कि “ब्रिटिश सर्वेयर जनरल ऑफ इंडिया द्वारा प्रकाशित और अभी भी उपलब्ध 1816 और 1827 तथा बाद में 1850 और 1856 के नक्शों में स्पष्ट तौर पर लिंपियाधारा, लिपुलेख और कालापानी को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया है।” नेपाल के कुछ अखबारों ने इन नक्शों को प्रकाशित भी किया। भारत का कहना है कि काली नदी का स्रोत लिंपियाधारा से निकली एक दूसरी नदी है और इसके आधार पर इसने कालापानी को अपनी सीमा के अंदर ले लिया है। नेपाल के लैंड सर्वे डिपार्टमेंट के पूर्व डायरेक्टर जनरल बुद्धि नारायण श्रेष्ठ का कहना है कि चीन में छिंग राजवंश (1903) के समय 'ओल्ड एटलस ऑफ चाइना' में जो नक्शा प्रकाशित है उसमें लिंपियाधुरा को कालीनदी का स्रोत दिखाया गया है। इस नक्शे में नदी के उत्तर-पूर्वी हिस्से को 'नेपाल' के रूप में चित्रित किया गया है।
अबसे पहले भारत ने नेपाल के दावे को कभी खारिज नहीं किया था—जब भी कालापानी की बात होती, भारत यही कहता कि मिल-बैठ कर इसे हल कर लेंगे। कुछ बातें ऑन रेकॉर्ड हैं, मसलन 1997 में प्रधानमंत्री आई के गुजराल ने कहा था कि “दोनों पक्षों के टेक्नीशियन सीमांकन के काम में लगे हुए हैं और अगर उनकी रिपोर्ट से यह निष्कर्ष निकलता है कि कालापानी नेपाल का हिस्सा है तो हम फौरन उसे खाली कर देंगे।” इसी प्रकार 1999 में विदेश मंत्री के रूप में जसवंत सिंह ने कहा था कि “नेपाल इंडिया ज्वाइंट टेक्निकल लेवल बाउंड्री कमेटी को निर्देश दिया गया है कि वह कालापानी सहित विवादित क्षेत्र के सभी इलाकों के बारे में तथ्य इकट्ठा करे और उसी के अनुसार सीमांकन के काम को जल्द से जल्द पूरा करे।” वर्ष 2000 में नेपाली प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला की भारत यात्रा के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस बात पर सहमति प्रकट की थी की स्थलगत अध्ययन के जरिए कालापानी के सीमा विवाद को 2002 तक हल कर लिया जाएगा। 2014 में नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री सुशील कोइराला ने भारत की यात्रा की और इस मौके पर भी दोनों पक्षों ने संकल्प व्यक्त किया कि "काला पानी सहित नेपाल-भारत सीमा से संबंधित सभी विवादों को हमेशा के लिए हल कर लिया जाएगा।" 2014 में ही अपनी पहली नेपाल यात्रा के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आश्वासन दिया था कि कालापानी और सुस्ता सहित सीमा से संबंधित सभी विवादित मसलों पर जल्द से जल्द फैसला लिया जाएगा।
23 मई 2020 को ‘दि हिन्दू’ में नेपाल में राजदूत पद पर रहे जयंत प्रसाद ने लिखा कि नेपाल-इंडिया टेक्निकल लेवल ज्वाइंट बाउंड्री वर्किंग ग्रुप की स्थापना 1981 में हुई थी। इसका मकसद सीमा से संबंधित मुद्दों का समाधान ढूंढना, अंतर्राष्ट्रीय सीमा का अंकन करना और सीमा पर लगे खंभों का प्रबंधन करना था। 2007 तक इस ग्रुप ने सीमा से संबंधित 98 प्रतिशत विवादों को हल कर लिया था- बस कालापानी और सुस्ता का मामला रह गया था। नेपाल के पत्रकार अनिल गिरि (काठमांडो पोस्ट) की रिपोर्ट से पता चलता है कि 2014 में नेपाल इंडिया ज्वाइंट कमीशन की तीसरी बैठक काठमांडो में हुई जिसमें दोनों पक्ष इस बात पर राजी हुए कि कालापानी और सुस्ता से संबंधित विवाद को भारत और नेपाल के विदेश सचिवों को सौंप दिया जाएगा ताकि वे इसका समाधान ढूंढ लें। लेकिन इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई।
नेपाल द्वारा नक्शा प्रकाशित करने के बाद सरकार के इशारे पर हमारे यहाँ के टी वी चैनलों ने नेपाल के खिलाफ जबरदस्त निंदा अभियान और डिसइंफार्मेशन कैम्पेन चला रखा है। पतनशीलता का आलम यह है कि इस अभियान में देश का सेनाध्यक्ष तक शामिल हो जाता है जब वह चीन को इंगित करते हुए कहता है कि “नेपाल किसी और के उकसावे पर काम कर रहा है।” क्या सेनाध्यक्ष मनोज मुकुन्द नरवणे को यह जानकारी नहीं थी कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा के अंतिम दिन 15 मई 2015 को जारी उस संयुक्त विज्ञप्ति का नेपाल ने विरोध किया था जिसमें भारत और चीन दोनों ने नेपाल की सहमति के बगैर द्विपक्षीय व्यापार मार्ग के रूप में लिपुलेख को समझौते में शामिल किया था? क्या उन्हें पता नहीं था कि कालापानी और लीपुलेख के मसले पर, नेपाल के नज़रिये से देखें तो, भारत और चीन दोनों की सोच एक जैसी है? फिर ऐसा बयान देने का मतलब साफ है—भारत के ढेर सारे घटिया हिन्दी चैनलों के सुर में सुर मिलाना और जनता को गुमराह करना। शुक्र है कि कम से कम नेपाल में कार्यरत दो पूर्व राजदूतों राकेश सूद और जयंत प्रसाद ने सेनाध्यक्ष नरवणे के बयान को ‘असंवेदनशील’ और ‘अनुचित’ कहा।
नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली का कहना है कि अपने छोटे आकार और अपनी छोटी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद हम किसी को मनमानी नहीं करने देंगे। हाल ही में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि “सीमाओं का निर्धारण द्विपक्षीय संधियों पर आधारित होता है... नक्शे में परिवर्तन कर भारत ने जमीन पर कब्जे की कार्रवाई शुरू की। भारतीय सेना कई साल से कालापानी में जमी हुई है। उस समय के शासकों ने एक खास उद्देश्य के लिए उन्हें वहां रहने की अनुमति दी। लेकिन बगैर किसी संधि के अथवा अस्थाई तौर पर अथवा जबरन कहीं किसी की मौजूदगी उस जमीन पर उसका वैधानिक दावा स्थापित नहीं कर सकती। यह दलील देना कि हम वहां लंबे समय से हैं इसलिए वह इलाका हमारा है, इसका कोई अर्थ नहीं है।” विदेश मंत्री ने यह भी बताया कि नेपाल ने 1955 में संधि की एक सत्यापित प्रतिलिपि संयुक्त राष्ट्र को सौंपी है।
माना कि प्रधान मंत्री के पी ओली ने इस मुद्दे को इस समय इसलिए उठाया कि वह पार्टी के अंदर अपने विरोधियों से घिर गए थे। यह भी माना कि नेपाल की सरकारें अपने क्षेत्र के अतिक्रमण के प्रति उदासीन थीं। यह भी सच हो सकता है कि 2015 की आर्थिक नाकाबंदी के बाद नेपाल का झुकाव अपने दूसरे पड़ोसी चीन की तरफ हो गया। सब सही है, लेकिन इससे क्या कालापानी पर नेपाल अपना दावा खो देता है?
अब इस मसले का समाधान क्या है? समाधान बस एक ही है-बातचीत। दबंगई से या ‘रोटी-बेटी का संबंध’ की दुहाई देने से समस्या नहीं सुलझेगी। अपने-अपने नक्शे ले कर बातचीत की टेबल पर दोनों पक्षों को बैठना होगा। लेकिन भारत सरकार लगातार बातचीत से कतरा रही है। नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार कुंद दीक्षित के अनुसार नेपाल सरकार ने दोनों देशों के विदेश सचिवों की बैठक के लिए दो दो बार तारीखें प्रस्तावित की लेकिन भारत ने कोई जवाब नहीं दिया। 2014 में ही नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा के समय इस बात पर सहमति बनी थी कि दोनों देशों के विदेश सचिवों के स्तर पर इस समस्या को सुलझाया जाएगा। ‘काठमांडो पोस्ट’ के अनुसार भारत स्थित नेपाली राजदूत नीलांबर आचार्य के सामने यह मुश्किल पैदा हो गई है कि भारत के विदेश विभाग के अधिकारियों से किस तरह बात करें। राजदूत ने कई बार प्रयास किए लेकिन अधिकारियों से उनका संपर्क नहीं हो पा रहा है। नेपाली दूतावास के सूत्रों के अनुसार राजदूत ने औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों चैनलों से यह प्रयास किया कि विदेश विभाग के साथ उनका संपर्क हो जाए लेकिन यह संभव नहीं हो सका। रिपोर्ट में बताया गया है कि राजदूत ने विदेश सचिव हर्षवर्धन सिंगला और नेपाल-भूटान डेस्क के इंचार्ज संयुक्त सचिव (उत्तरी) पीयूष श्रीवास्तव से संपर्क का प्रयास किया लेकिन विफल रहे। 9 मई को भारत के विदेश मंत्रालय ने एक वक्तव्य के जरिए यह जानकारी दी कि कोविड-19 का संकट खत्म होने के बाद वह औपचारिक बातचीत के लिए तैयार है... उधर काठमांडो में नेपाली विदेश सचिव शंकर दास बैरागी ने भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा से भेंट की और अनुरोध किया कि जल्दी ही दोनों देशों के विदेश सचिवों के स्तर पर बातचीत का आयोजन किया जाय लेकिन उन्हें कोई सकारात्मक उत्तर नहीं मिला। भारत के विदेश मंत्रालय का कहना है कि बातचीत के लिए नेपाल पहले “अनुकूल वातावरण” का निर्माण करे।
“अनुकूल वातावरण” का खुलासा कौन करेगा—सरकार या न्यूज़ चैनलों के ऐंकर?

आदमी एक बार प्रोफ़ेसर हो जाये तो ज़िन्दगी भर प्रोफ़ेसर ही रहता है , चाहे बाद में वह समझदारी की बातें ही क्यों न करने लगे।

-- मुश्ताक अहमद यूसु़फ़ी
(पाकिस्तानी व्यंग्यकार)

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जब मैं ग़रीबों को खाना देता हूँ, तो वे मुझे संत कहते हैं I जब मैं पूछता हूँ कि ग़रीबों के पास खाना क्यों नहीं है, तो वे मुझे कम्युनिस्ट कहते हैं !
-- डॉम हेल्डर कैमेरा (1909-1999)

(डॉम हेल्डर पेस्सोआ कैमेरा ब्राज़ील के कैथोलिक चर्च के एक आर्चबिशप थे जिन्होंने अमेरिका-समर्थित तानाशाहों के शासन काल के दौरान शोषित-उत्पीडित आम आबादी के बीच काम करते हुए, अमेरिका से ही वित्त-पोषित चर्च से जुड़े और स्वतंत्र एन जी ओ'ज़ की असली भूमिका को पहचाना था I वे इस नतीजे पर पहुँचे थे कि साम्राज्यवादी दाता एजेंसियों के वित्त-पोषण से जितने भी एन जी ओ तमाम चैरिटी और शिक्षा-स्वास्थ्य आदि के क्षेत्र में सुधार का काम कर रहे हैं, वे वस्तुतः इस सिस्टम के असली चरित्र पर ही पर्दा डाल रहे हैं, जनता की विद्रोही चेतना को कुंद कर रहे हैं, वर्ग-अंतरविरोधों को धूमिल कर रहे हैं और 'संत' का मुखौटा लगाकर शैतान की सेवा कर रहे हैं ! कैमेरा आगे चलकर 'लिबरेशन थियोलॉजी' के समर्थक हो गए थे और इस नाते साम्राज्यवादियों के साथ ही वेटिकेन के भी कोपभाजन हो गए थे I ईश्वर और चर्च में आस्था के बावजूद कैमेरा पूँजीवाद के मार्क्स द्वारा किये गए पूँजीवाद के विश्लेषण को सही मानते थे और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करना जन-समुदाय का अधिकार मानते थे I)



































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Thursday, July 23, 2020


(वो कहते हैं न ... 'बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी' ... ! एन जी ओ पर बात निकल ही पड़ी तो मुझे साथी मनबहकी लाल की इस बेहद चुटीली कविता की याद आ गयी और फिर सोचा कि आप सभी को भी इसे पढ़वा ही दूँ I

एनजीओ आज देश के कोने-कोने में पसर गये हैं। ये किसी एक समस्या पर या कुछ समस्याओं (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य ) पर काम करने की बात करते हैं और इनकी फंडिंग मुख्यतया बड़ी बड़ी फण्डिग एजेंसियां करती है। ये सारी फंडिंग एजेंसियां बड़े बड़े कॉर्पोरेट घरानों द्वारा सीधे संचालित होती हैं जैसे फोर्ड फाउंडेशन, गेट्स फाउंडेशन, भारत में नीता अंबानी फाउंडेशन, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन आदि-आदि। ये जनता को बोलते हैं कि आप खुद अपनी समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार हैं और हम कॉर्पोरेट से लायी भीख से आपकी उस समस्या का समाधान कर देंगे। कॉर्पोरेट घराने जनता से सौ रुपये लूटकर चवन्नी वापस जनता को दान कर देते हैं और जनता के बीच ये भ्रम फैलाते हैं कि पूँजीवाद कितना संत है। एनजीओ की राजनीति पर केंद्रित यह कविता पढिए और सोचिए कि एनजीओ कितने खतरनाक हैं।)

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भिखमंगे


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भिखमंगे आये
नवयुग का मसीहा बनकर,
लोगों को अज्ञान, अशिक्षा और निर्धनता से मुक्ति दिलाने ।
अद्भुत वक्तृता, लेखन–कौशल और
सांगठनिक क्षमता से लैस
स्वस्थ–सुदर्शन–सुसंस्कृत भिखमंगे आये
हमारी बस्ती में ।
एशिया–अफ्रीका–लातिनी अमेरिका के
तमाम गरीबों के बीच
जिस तरह पहुंचे वे यानों और
वाहनों पर सवार,
उसी तरह आये वे हमारे बीच ।
भीख, दया, समर्पण और भय की
संस्कृति के प्रचारक
पुराने मिशनरियों से वे अलग थे,
जैसे कि उनके दाता भी भिन्न थे
अपने पूर्वजों से ।
अलग थे वे उन सर्वोदयी याचकों से भी
जिनके गांधीवादी जांघिये में
पड़ा रहता था
(और आज भी पड़ा रहता है)
विदेशी अनुदान का नाड़ा ।

भिखमंगे आये
अलग–अलग टोलियों में ।
कुछ ने अपने पश्चिमी वैभवशाली दाताओं की महिमा बखानी,
तो कुछ का दावा था कि वे
लुटेरों को उल्लू बनाकर
रकम ऐंठ लाये हैं
जनहित के लिए और
जनक्रान्ति की तैयारी के लिए
कुछ का कहना था कि
क्रान्ति की तैयारियों का भारी बोझ
न पड़े इस देश की गरीब जनता पर
इसलिए उन्होंने भीख से
संसाधन जुटाने का नायाब तरीका अपनाया है ।
कुछ का कहना था
कि क्रान्ति अभी बहुत दूर है
इसलिए वे तब तक कुछ सुधार ही
कर लेना चाहते हैं,
संवार देना चाहते हैं
दलितों–शोषितों–वंचितों का जीवन
एक हद तक
और फीस के तौर पर, बिना नेता–नौकरशाह
बनने का पाप किये,
खुद भी जुटा लेना चाहते हैं
घर, गाड़ी वगैरह कुछ अदना–सी चीजें
और अगर खुद वे आ गये हैं
जनता की खातिर इस नर्क जैसे देश में
तो क्या इतना भी चाहना अनुचित है
कि उनके बेटे–बेटी शिक्षा पायें
अमरीका में
कुछ का कहना था कि
अशिक्षा ही हमारे दुर्भाग्य का मूल है
अत: वे हमें शिक्षित करने आये हैं,
स्वास्थ्य और परिवार–नियोजन के बारे में
बताने आये हैं ।
कुछ का कहना था कि
हम सहकारी संस्था बनाकर
उत्पादन करें
तो हल हो जायेंगी हमारी
सारी दिक्कतें ।
कुछ ने कहा कि
जो ट्रेड–यूनियनें न कर सकीं,
वे वह कर दिखायेंगे,
राज्यसत्ता तो चांद मांगना है,
वे हमें चवन्नी–अठन्नी के लिए
नये सिरे से लड़ना सिखायेंगे ।
कुछ ने कहा कि दोष
कोर्ट–कचहरी–कानून और
सरकार का नहीं
हमारे गंवारपन का है
अत: वे हमें हमारे अधिकारों,
संविधान और श्रम–कानूनों के बारे में
पढ़ायेंगे
और जब हम जान जायेंगे कि
हमें सरकार से क्या मांगना है
तो हम मांगेंगे एक स्वर से
और हमारी याचना के तुमुलनाद
से जागकर, डरकर,
सरकार हमें दे देगी वह सब कुछ
जो हम चाहेंगे ।

भिखमंगों ने हमें लताड़ा
कि यदि सरकार अपनी जिम्मेदारियां
पूरी नहीं करती
तो हम उसका मुंह क्यों जोहते हैं
यदि वह नौकरियां नहीं देती
तो हम खुद क्यों नहीं कर लेते
कुछ काम–धाम
यदि वह सभी कारखानों को
पूंजीपतियों को दे रही है
और पूंजीपति हमें रोजगार नहीं दे रहे
तो हम स्वयं मिलकर क्यों नहीं
शुरू कर लेते कोई उद्यम
और फिर भी नहीं चलता काम
तो कम क्यों नहीं कर लेते
अपनी जरूरतें
बन्द क्यों नहीं कर देते
ऊपर की ओर देखना
चरम पर्यावरणवादी बन
चले क्यों नहीं जाते
प्रकृति की गोद में निवास करने

भिखमंगों ने बेरोजगार युवाओं से
कहा-“तुम हमारे पास आओ,
हम तुम्हें जनता की सेवा करना सिखायेंगे,
वेतन कम देंगे
पर गुजारा–भत्ता से बेहतर होगा
और उसकी भरपाई के लिए
‘जनता के आदमी’ का
ओहदा दिलायेंगे,
स्थायी नौकरी न सही,
बिना किसी जोखिम के
क्रान्तिकारी बनायेंगे,
मजबूरी के त्याग का वाजिब
मोल दिलायेंगे ।”
“रिटायर्ड, निराश, थके हुए क्रान्तिकारियो,
आओ, हम तुम्हें स्वर्ग का रास्ता बतायेंगे ।
वामपंथी विद्वानो, आओ
आओ सबआल्टर्न वालो,
आओ तमाम उत्तर मार्क्सवादियो,
उत्तर नारीवादियो वगैरह–वगैरह
आओ, अपने ज्ञान और अनुभव से
एन.जी.ओ. दर्शन के नये–नये शस्त्र और शास्त्र रचो,”
आह्वान किया भिखमंगों ने
और जुट गये दाता–एजेंसियों के लिए
नई रिपोर्ट तैयार करने में ।

भिखमंगों ने भीख को नई गरिमा दी,
भूमण्डलीकरण के दौर में
उसे अन्तरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा दी ।
भिखमंगों ने क्रान्ति और बदलाव की
नई परिभाषाएं रचीं ।
भिखमंगों ने कहा-“भूल जाओ
‘पैबन्द और कुर्ते का गीत’ ¹
वह पुराना पड़ चुका है ।
हम मांगकर लाते रहेंगे तुम्हारे लिए पैबन्द
तुम उन्हें सहेजना,
उन्हें जोड़कर एक दिन तैयार हो जायेगा
एक पूरा का पूरा कुर्ता ।
भूख से तड़पते हुए मर जाओगे
यदि समूची रोटी चाहोगे ।
हम तुम्हारे लिए मांगकर लाते रहेंगे
रोटी के छोटे–छोटे टुकड़े,
तुम उन्हें खाते जाओ
एक दिन तुम्हारे पेट में होगी
एक साबुत रोटी ।
मत करो बातें सारे कारखाने
और कोयला और खनिज और
मुल्क की हुकूमत पर कब्जे की,
ऐसी कोशिशें असफल हो चुकीं ।”
हम पूछते हैं व्यग्र होकर,
“आखिर कब तक चलेगा
इस तरह”
वह तर्जनी उठाकर हमें रोकते हैं,
“हम एक अर्जी लिख रहे हैं ।”
फिर वे एक रिपोर्ट लिखते हैं,
फिर चिन्तन करते हैं,
फिर दौरा करने किसी और दिशा में
चल देते हैं ।
हम पाते हैं, भिखमंगे नहीं वे
अपहरणकर्ता हैं
बदलाव के विचारों के, स्वप्नों और आशाओं के ।
आत्मा की ऊष्मा के खिलाफ
सतत सक्रिय
शीत की लहर हैं ये भिखमंगे ।

-- मनबहकी लाल

¹ ‘पैबन्द और कुर्ते का गीत’-ब्रेष्ट की प्रसिद्ध कविता
का सन्दर्भ

परसों, 21 जून को 'एन जी ओ ब्राण्ड सुधारवाद' का विरोध करते हुए मैंने जो पोस्ट डाली थी, उसपर एक विक्षुब्ध प्रतिक्रिया देते हुए हमारी अग्रज साथी Geeta Gairola दी ने कमेंट किया कि तब तो मुझे कोरोना काल में आपदा राहत कार्य करने वाले 'दून नागरिक राहत समूह' का भी हिस्सा नहीं होना चाहिए था ! इस कमेंट का उत्तर देना मुझे इसलिए ज़रूरी लगा कि बहुतेरे लोग अक्सर हर प्रकार के सुधार या राहत कार्य को सुधारवाद मान बैठते हैं और दूसरी बात, 'एन जी ओ ब्रांड सुधारवाद' आम सुधारवाद से भी बहुत अधिक खतरनाक होता है, उसे देशी-विदेशी पूँजी ने अपनी तथा पूरी बुर्जुआ व्यवस्था की सेवा के लिए ही संगठित किया है -- इस बात को समझना आज बहुत ज़रूरी है ! एन जी ओ सेक्टर के शीर्ष थिंक टैंक अक्सर पुराने रिटायर्ड क्रांतिकारी, अनुभवी, घुटे हुए सोशल डेमोक्रेट और घाघ-दुनियादार बुर्जुआ लिबरल होते हैं जो देशी-विदेशी पूँजी की फंडिंग से जन-असंतोष के दबाव को कम करने वाले सेफ्टी वॉल्व का, एक किस्म के स्पीड-ब्रेकर का निर्माण करते हैं ! साथ ही यह रोज़गार के लिए भटकते संवेदनशील युवाओं को "वेतनभोगी समाज-सुधारक" बनाकर इसी व्यवस्था का प्रहरी बना देने वाला एक ट्रैप भी है I यूँ तो एन जी ओ नेटवर्क पूरे देश में फैला है, लेकिन झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े इलाकों के साथ ही उत्तराखंड के पहाड़ों के नाके-नाके तक ये फ़ैल गए हैं और रेडिकल राजनीतिक चेतना को भ्रष्ट और दिग्भ्रमित करने का काम भयंकर रूप में कर रहे हैं ! "कुलीन मध्यवर्गीय वामपंथ" की इनके साथ बढ़िया पटरी बैठती है और पुराने गांधीवादी-सर्वोदयी टाइप सुधारवादी भी अब इस नए सुधारवाद के सुविधाजनक रास्ते के ही राही बन चुके हैं ! हितों की इस अघोषित एकता पर कहीं से कोई सवाल नहीं उठता ! क्योंकि ऐसे असुविधाजनक सवाल उठाने वालों का हुक्का-पानी बंद कर दिया जाता है ! फिर बर्र के छत्ते में कोई क्यों हाथ डाले ? पर हमने यह जुर्रत की है, क्योंकि इस सवाल को आज नए सिरे से उठाना नए जुझारू जनांदोलनों की ज़मीन तैयार करने के लिए ज़रूरी है !

कामरेड Chandra Prakash Jha ने सुझाव दिया कि इस मुद्दे पर हुए संवाद को एक स्वतंत्र पोस्ट के रूप में डाल दिया जाए ताकि यह बात एन जी ओ में कार्यरत युवाओं की भारी संख्या तक और अन्य बुद्धिजीवियों तक भी पहुँचे और वे भी इस मुद्दे पर सोच सकें और संवाद कर सकें ! यह सुझाव मुझे उचित लगा और उसपर अमल करते हुए गीता दी के साथ हुए संवाद को यहाँ मैं एक स्वतंत्र पोस्ट के रूप में प्रस्तुत कर रही हूँ !

Geeta Gairola दी बेहद जनतांत्रिक प्रकृति और खुले विचारों वाली अनुभवी साथी हैं ! वह मतभेदों, बहसों और संवादों का सम्मान करती हैं और ऐसी शख्स हैं जिनके साथ कई मतभेदों के बावजूद एक न्यूनतम आम सहमति बनाकर कामरेडाना माहौल में काम किया जा सकता है I इसीलिये उन्होंने भी बेलागलपेट अपनी बात रख दी और मैंने भी उसी भरोसे के साथ अपने दो-टूक विचार यहाँ रख दिए हैं !

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Geeta Gairola कविता तुम्हे फिर दून राहत समूह का हिस्सा नहीं बनना चाहिए था।बुरा लगेगा तो कोई बात नहीं।मैंने अपनी बदतमीजियों से बहुत लोगों को खोया है।अब थोड़ा सा पाने का सुख तो होता है खोने का दुख नहीं होता

Kavita Krishnapallavi Geeta दी ! कुछ बातों को स्पष्ट कर लेना बेहद ज़रूरी है ! पहली बात, 'दून राहत समूह' अपने आप में कोई एन.जी.ओ. नहीं है ! कोरोना काल में प्रवासी मज़दूरों और अन्य आपदाग्रस्त मज़दूरों तक फौरी सहायता पहुंचाने के लिए कुछ गणमान्य नागरिकों और 'उत्तराखंड महिला मंच' एवं 'उत्तराखंड पीपल्स फोरम', 'नौभास', स्त्री मुक्ति लीग आदि जन-संगठनों की पहल पर इसका गठन किया गया था ! मुझे नहीं पता, इसमें कुछ फंडिंग एजेंसियों से वित्त-पोषित एन जी ओ भी शामिल हो गए हों, यह मुमकिन है, पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता ! फौरी तौर पर किसी भीषण आपदा की स्थिति में किसी सुधार या राहत कार्य में अगर किसी एन जी ओ के साथ भी खड़ा होना पड़ता है तो जाहिर है कि इसमें हमें कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि यह विचारधारात्मक प्रश्न नहीं है I इससे तमाम देशी-विदेशी फंडिंग एजेंसियों से वित्तपोषित एन जी ओ'ज की प्रतिगामी भूमिका के प्रति हमारी राय में कोई फर्क नहीं पड़ता ! यह कुछ वैसा ही है जैसे तमाम बुर्जुआ चुनावबाज़ पार्टियों के साथ हम कोई मोर्चा नहीं बनाते लेकिन दमन-उत्पीडन या जनवादी अधिकारों के हनन के किसी फौरी सवाल पर उनके साथ, या उनके लिए, खड़ा होने में भी हमें कोई गुरेज़ नहीं होता I यह बहुत साफ़-सी बात है I एन जी ओ की धारणा को भी स्पष्ट कर लेना बहुत ज़रूरी है I पहली बात, जन-संगठन (Mass Organization) और संस्था (Institution) दो चीज़ें होती हैं ! अगर सख्त क़ानूनी परिभाषा के हिसाब से देखें तो सभी पंजीकृत या गैर-पंजीकृत गैर-सरकारी संस्थाएँ -- ट्रस्ट, सोसाइटीज आदि ... -- एन जी ओ कहलाएंगी I पर हमारा तात्पर्य देशी-विदेशी पूँजी- प्रतिष्ठानों द्वारा स्थापित फंडिंग एजेंसियों द्वारा वित्त-पोषित उन दैत्याकार देशव्यापी ढांचों वाले एन जी ओ'ज से है जो भारत ही नहीं, पूरी तीसरी दुनिया -- एशिया, अफ्रीका, लातिन अमेरिका के देशों में अपने पंजे फैलाए हुए हैं !

बहुत सीधा सवाल है कि मुनाफे के लिए मज़दूरों की हड्डियां निचोड़ने वाले और दुनिया को बार-बार विनाशकारी युद्धों में धकेलने वाले साम्राज्यवादी-पूंजीवादी लुटेरों में इतनी मानवता भला क्यों जाग उठती है कि वे गरीब देशों के बच्चों की भूख मिटाने, उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और औरतों की खुदमुख्तारी और आज़ादी के लिए इतने चिंतित हो उठते हैं कि इस काम में सालाना अरबों डॉलर लगा देते हैं ! इसपर सैकड़ों शोध-पत्र और दर्ज़नों किताबें छप चुकी हैं ! पहली बात तो 172 वर्षों पहले कार्ल मार्क्स ने ही स्पष्ट कर दी थी कि दमित-उत्पीडित मज़दूर वर्ग की विकासमान वर्ग-चेतना को कुंद और भ्रष्ट करने के लिए दुनिया भर का पूँजीपति वर्ग अपने निचोड़े गए अधिशेष का एक छोटा-सा हिस्सा सुधार और चैरिटी के कामों पर खर्च करता है I यानी एन जी ओ नेटवर्क का मुख्य काम है वर्ग-संघर्ष के उभारों को रोकना, उनकी भड़कती आँच पर पानी के छींटे मारते रहना ! ये सभी एन जी ओ तीसरी दुनिया के गरीब देशों में इसलिए काम करते हैं क्योंकि यहींपर शोषण-उत्पीडन ज्यादा है और पश्चिम के पूँजीवादी "स्वर्गों" की अपेक्षा क्रान्ति की आग भड़कने का खतरा इन देशों में सबसे अधिक है I जबसे नव-उदारवाद का दौर चला है और राज्य ने किन्सियाई नुस्खों से पीछे हटाते हुए सार्वजनिक राशन-वितरण, शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीब-कल्याण की सभी योजनाओं से हाथ खींचना शुरू कर दिया है, तबसे इन बुनियादी जन-अधिकारों को भीख, दान और दया-धरम की चीज़ बना देने वाले एन जी ओ'ज की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है I एक और काम एन जी ओ वाले यह करते हैं कि बहुत सारे संवेदनशील और ज़हीन युवाओं को "समाज बदलने" का एक सुगम मार्ग बता देते हैं,"वेतनभोगी बनकर कुछ राहत और सुधार के काम करते रहो, मन को तसल्ली देते रहो, क्रांति-व्रांति के जोखिम, तकलीफ और अनिश्चितता भरे काम में ज़िंदगी और कैरियर क्यों तबाह करोगे?' मध्यवर्गीय नौजवानों का एक बड़ा हिस्सा जो बेरोजगारी से परेशान होता है, वह लाखों की तादाद में इस एन जी ओ नेटवर्क में सर्वेयर, मुलाजिम आदि बनाकर बेरोजगारी भत्ते बराबर उजरत में ज़िंदगी काट देता है और रोज़गार के अपने जनवादी अधिकार पर संगठित होकर लड़ने के रास्ते से विरत हो जाता है I यह तो हुआ एन जी ओ'ज का राजनीतिक लक्ष्य ! इसपर भी बहुत साहित्य मौजूद है कि किसप्रकार एन जी ओ अपने आप में बुर्जुआ उत्पादन का एक ऐसा सेक्टर बन गया है, जिसमें सहकारिता आदि का गठन करके श्रमशक्ति का अपार दोहन किया जाता है और विशेषकर स्वावलम्बिता के नाम पर स्त्रियों को ठगा जाता है Iइसके अतिरिक्त एन जी ओ बड़ी पूँजी के लिए बाज़ार-विकास की संभावनाओं का अध्ययन करने और सस्ता श्रम-बाज़ार विकसित करने का भी काम करते हैं ! किसतरह एन जी ओ'ज के ज़रिये बिना लोगों को खतरों और दुष्प्रभावों के बारे में बताये हुए, फार्मास्यूटिकल कम्पनियां दवाओं का परीक्षण करती रही हैं और आम अशिक्षित गरीबों ने उसकी क्या कीमत चुकाई है, इसपर पिछले तीस वर्षों के दौरान दर्ज़नों रपटें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं ! बिल गेट्स और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के काले कारनामों के बारे में आज भला कौन नहीं जानता ?

दुनिया में सांता क्लाज़ का चेहरा लिए घूमने वाले कई विशाल अमेरिकी फंडिंग एजेंसियों और एन जी ओ'ज का वहाँ के मिलिट्री इंडस्ट्रियल काम्प्लेक्स से कितना गहरा रिश्ता है और बहुत "कल्याणकारी बुर्जुआ जनवादी" देश माने जाने वाले स्कैन्देनेवियन देशों की फंडिंग एजेंसियां और एन जी ओ'ज किस तरह वहाँ की फार्मा कंपनियों और हथियार कंपनियों के लिए काम करते हैं, इसपर भी काफी सामग्री और दस्तावेज़ उपलब्ध हैं ! ऐसी बातें केवल क्रांतिकारी वामपंथी कहते हों ऐसी भी बात नहीं है I प्रो. जेम्स पेत्रास और प्रो. हेनरी वेल्तमेयर ने इन एन.जी.ओ'ज के वैचारिक-राजनीतिक कामों के बारे में काफी कुछ लिखा है ! कोई भी जेम्स पेत्रास की ऑफिसियल वेबसाइट पर जाकर पढ़ सकता है ! जेम्स पेत्रास ने तो विस्तार से यह भी बताया है कि वर्ग-संघर्ष की राजनीति को हाशिये पर डालने के लिए किसतरह अमेरिका के बुर्जुआ 'थिंक टैंक्स' ने 'आइडेंटिटी पॉलिटिक्स' की सैद्धांतिकी विकसित की और उसे तीसरी दुनिया की शोषित-उत्पीडित आबादी तक पहुंचाने के लिए मुख्य वाहक की भूमिका एन.जी.ओ'ज ने निभाई ! एन जी ओ'ज़ किसतरह संत का मुखौटा पहने साम्राज्यवादियों और उनके जूनियर पार्टनर देशी पूँजीपतियों के खूनी पंजों पर चढ़े सफ़ेद दस्ताने की भूमिका निभा रहे हैं, इसपर 'मंथली रिव्यू' पत्रिका की नियमित लेखिका जॉन रोयलोव्स भी अबतक कई गंभीर और विस्तृत लेख लिख चुकी हैं ! उनमें से कुछ उनके ब्लॉग 'आर्ट एंड एस्थेटिक्स' पर भी मौजूद हैं जिन्हें कोई पढ़ सकता है I और भी कई राजनीतिक लेखकों और अकादमीशियनों ने इनके काले कारनामों के बारे में लिखा है ! भारत में 1980 के दशक के अंत में ही साम्राज्यवादी एजेंटों के रूप में एन जी ओ की भूमिका पर बहुत अधिक दस्तावेजी साक्ष्यों और तथ्यों के साथ पी.जे.जेम्स की पुस्तक आ चुकी थी ! 'राहुल फाउंडेशन' से भी हमलोग 'एन जी ओ :एक खतरनाक साम्राज्यवादी कुचक्र' लेख-संकलन दो दशक से भी अधिक समय पहले प्रकाशित कर चुके हैं जिसके कई संस्करण हो चुके हैं ! रा.फ़ा. से ही एक पुस्तक 'वर्ल्ड सोशल फोरम' पर भी छपी है जो मुख्यतः एन जी ओ'ज के विश्वव्यापी जाल और उसकी राजनीति को ही एक्सपोज़ करती है ! रा. फ़ा. से ही प्रकाशित उपन्यास 'एक तयशुदा मौत भी एन जी ओ की राजनीति और उसके अन्तःपुरों में व्याप्त घटिया षडयंत्रकारी राजनीति पर केन्द्रित है ! इस उपन्यास के लेखक स्वयं एन जी ओ में काम करते थे ! एन जी ओ में ही काम करने वाले योगेश दीवान की भी एक पुस्तक है,'दास्ताने-स्वयंसेविता'!

एक और भ्रम का निवारण ज़रूरी है ! कुछ लोग सोचते हैं कि हर प्रकार के सुधार के काम अपने आप में एन जी ओ टाइप काम हैं और क्रांतिकारी इन कामों से परहेज़ करते हैं या इन्हें गलत मानते हैं ! यह भ्रांत धारणा अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन और क्रांतियों के इतिहास की नाजानकारी से पैदा हुई है ! चूंकि भारत के संशोधनवादी कम्युनिस्ट चुनाव लड़ने और अर्थवादी-ट्रेड-यूनियनवादी कामों के अतिरिक्त सामाजिक आन्दोलन के काम करते ही नहीं, इसलिए उनका आचरण देख-देखकर कुछ लोग कम्युनिस्टों के बारे में ही गलत धारणा बना लेते हैं ! कम्युनिस्ट आम जनता के बीच राजनीतिक और आर्थिक कामों के साथ-साथ सामाजिक आन्दोलन, सामाजिक और आर्थिक सुधार के भी काम करते हैं और विविध रचनात्मक गतिविधियाँ करते हैं ! सुधार और सुधारवाद में उसीतरह से बुनियादी फर्क है जैसे आर्थिक काम और अर्थवाद में, या ट्रेड-यूनियन कार्य और ट्रेड यूनियनवाद में ! क्रांतिकारी जब सुधार का काम करता है तो उसका मक़सद जनता से निकटता बनाना, उसकी पहलकदमी जगाना, उसे रूढ़ियों से मुक्त करना, उसकी चेतना उन्नत करना या आपदा की स्थिति में उसे फौरी मदद पहुंचाना होता है I क्रांतिकारी के लिए सुधार-कार्य वर्ग-संघर्ष के लिए जन-लामबंदी की प्रक्रिया का एक अंग है, जबकि सुधारवादी के लिए सुधार ही परम लक्ष्य है ! एन जी ओ सुधारवाद का लक्ष्य जनता की क्रांतिकारी चेतना के विकास को रोकना, उसकी वर्ग-चेतना को कुंद करना और उसे सुधारों के गुंजलक में ही फंसाए रखना है ! मैं समझती हूँ कि बहुत संक्षेप में ही सही, एन जी ओ के सवाल पर मैंने हमलोगों का स्टैंड काफी स्पष्ट कर दिया है !

(23जून, 2020)

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(जी, मैं एन.जी.ओ. ब्राण्ड सुधारवाद से तहे-दिल से नफ़रत करती हूँ ! जब हक छीने जा रहे हों और लोग कुचले जा रहे हों तो अवाम को अपने हक के लिए लड़ने की शिक्षा देने और राह बताने की जगह राहतें बाँटने वाले, मलहम लगाने वाले, तसल्ली देने वाले लोग सबसे कुटिल और बदमाश लगते हैं ! दया, करुणा, रहम,,, --- ये सभी शब्द एक शोषण-उत्पीडन भरी दुनिया में गू के माफिक घिनौने लगते हैं ! अन्याय से भरी दुनिया में सबसे मानवीय, सबसे उदात्त, सबसे सुन्दर शब्द है संघर्ष, हर कीमत पर संघर्ष ! जब ज़ुल्मों की धारासार बारिश हो रही हो तो तनकर खडा होने से सुन्दर इंसान की कोई मुद्रा नहीं हो सकती ! शांतिवाद जनता को निश्शस्त्र और बेबस बनाता है !

लुटेरों से ही ग्रांट लेकर गरीबों में राहत बाँटने वाले ये लोग मासूम और मानवतावादी नहीं हैं ! ये रोटी और सुविधाओं की खातिर बिक चुके लोग हैं ! जो जनता को अपने हक के लिए लड़ने की जगह राहत और दान पर जीने का आदी बनाता है, वह जनता का सबसे खतरनाक दुश्मन है ! वह भिखमंगे से भी गया-गुजरा है ! वह धनपतियों के दुआरे हड्डी अगोरता बैठा खजुहा कुत्ता है !

आश्चर्य नहीं कि एन.जी.ओ. पंथ के अन्तःपुरों से लेकर गलियों-कूचों तक चक्कर लगाते लोगों में आपको रिटायर्ड और छद्म-वामपंथी बहुतायत में देखने को मिल जायेंगे ! वाम आन्दोलन के भगोड़े और पथ-च्युत लोग आम लोगों में निराशा और संशय फैलाने वाले और संभ्रम-दिग्भ्रम-मतिभ्रम पैदा करने वाले सांघातिक विषाणु होते हैं !)
(पुरानी पोस्ट एक बार फिर)

Wednesday, July 22, 2020


अन्याय के विरुद्ध विद्रोह सबसे सुन्दर, सबसे मानवीय, सबसे न्यायसंगत, सबसे उदात्त और सबसे काव्यात्मक कर्म है !

बनिये-पंसारी घाटे-मुनाफ़े का हिसाब-किताब लगाकर किसी व्यापार में हाथ डालते हैं I न्याय के लिए संघर्ष जीत की गारण्टी लेकर नहीं किया जाता I यह नफ़ा-नुक्सान का सौदा नहीं है I कुछ दुनियादार, हिसाबी-किताबी, 'लाइमलाइट मेंटालिटी' वाले नौजवानी के फ़ौरी जोश में बिलावजह इस रास्ते आ जाते हैं, फिर जब वापस लौटकर आने-पाई के ठण्डे पानी में सड़ते जीवन में व्यवस्थित हो जाते हैं तो जीवन भर अपनी कायरता और दुनियादारी से पैदा हुई कुंठा के चलते क्रान्ति और क्रांतिकारियों को कोसते और लांछित करते रहते हैं !

हज़ारों भूतपूर्व क्रांतिकारी "वाम" बुद्धिजीवी का मुखौटा लगाए नौकरशाही, मीडिया या अकादमिक दुनिया में व्यवस्थित हैं और इस व्यवस्था के 'थिंक टैंक' का काम करने के साथ ही वाम विचारों की दुनिया में लगातार विभ्रम और मूर्खता का कचरा फैलाते रहते हैं ! उनका दूसरा क्षेत्र एन जी ओ- सुधारवाद का तंत्र होता है जहाँ वे नीति-निर्माता बनकर जा बैठते हैं और इस बात की गारण्टी करते हैं कि देशी-विदेशी पूँजी से संचालित एन जी ओ तंत्र इस व्यवस्था की तीसरी सुरक्षा-पंक्ति के रूप में ज्यादा से ज्यादा प्रभावी ढंग से काम करता रहे I ये पूँजी की अट्टालिका के आगे-पीछे के दरवाजों पर तैनात वफ़ादार कुत्ते बन जाते हैं !

जब हम वाम राजनीति के ऐसे धन्धेबाज़ व्यापारियों-पंसारियों पर हल्ला बोलते हैं तो ये सभी एकजुट होकर कटकटाकर हमारे ऊपर टूट पड़ते हैं और मुँह से कुत्सा-प्रचार का गू उगलने लगते हैं I उधर राजधानियों में कुछ ऐसे बौद्धिक-साहित्यिक "भद्रजन" भी बैठे होते हैं, जो अपने निहित स्वार्थों के चलते इन गलीज़ तत्वों के साथ अक्सर अल्पकालिक या दीर्घकालिक "प्रणय-संबंधों" में जीते रहते हैं या 'वन नाईट स्टैंड' पर जाते रहते हैं ! इन अभिजनों को भी हमारी मुंहफट कबीरी भाषा से चोट लग जाया करती है I कुछ उदारवादी-सुधारवादी बौद्धिक सिसक-सिसककर कहने लगते हैं कि इसतरह वाम अगर आपस में ही लड़ता रहेगा तो फासिज्म के विरुद्ध भला लड़ाई कैसे मज़बूत होगी ? इन बकलोलों को यह मोटी सी बात नहीं समझ आती कि फासिज्म के विरुद्ध जुझारू ज़मीनी संघर्ष संगठित करने की पहली शर्त यह है कि विभीषणों-मीरजाफरों जैसे तमाम भितरघातियों को, तमाम 'ट्रोज़न हॉर्सेज' को, तमाम रँगे सियारों, छद्म-प्रगतिशीलों और कैरियरवादियों को, "वाम" का मुखौटा लगाए तमाम भ्रष्ट-लम्पट सरकारी उच्च-पदस्थ नौकरशाहों को अपनी पांतों से बीन-बीनकर बाहर कर दिया जाए ! अगर आप सोचते हैं कि आई.ए.एस. का चयन करने वाली संस्था में बैठे किसी सत्ताधर्मी लिबरल अकादमीशियन, आबकारी और कस्टम और पुलिस महकमों के पियक्कड़-लम्पट उच्च-पदस्थ अफसर "बौद्धिकों" के साथ मोर्चा बनाकर आप फासिज्म के ख़िलाफ़ जंग लड़ेंगे, तो आप या तो परले दर्जे के भकचोन्हर हैं, या फिर फासिज्म का विरोध आपके लिए महज एक फिकरेबाजी है ! आप भी उन झींगुरों में से ही एक हैं जो अपने बिल के दरवाज़े पर बैठे तेज़ आवाज़ में चीखते रहते हैं, पर पैरों की धमक सुनाई पड़ते ही 'सुट्ट' से बिल में घुस जाते हैं !

(22जून, 2020)

Wednesday, June 17, 2020


एक निचाट कलात्मक रेगिस्तान में भटकती
जब मैं उस भुतहे विकराल सभाभवन में दाखिल हुई
तो वहाँ नशे में धुत्त
इधर-उधर लुढ़के पड़े थे
कुछ गुनाहों के नये-पुराने देवता,
कुछ मलबे के मालिक,
कुछ ख्याति की हवस के पुजारी,
कुछ अमरत्व के दलाल,
कुछ मानवीय मूल्यों के पंसारी,
कुछ लोकप्रियता के कमीशन एजेण्ट,
सपनों के कुछ छलिया सौदागर,
और ऐसे ही कुछ कला के प्रेत,
कविता के ओझा-गुनी,
किस्सागोई के जादूगर ।
नीलामी हो चुकी थी,
बोली लगाने वाले जा चुके थे ।
यह एक खूनी युद्ध जैसे खेल के
बाद की थकान थी जो
सबपर हावी थी।
हत्यारे भी सोने जा चुके थे
कल जल्दी उठकर अपना काम शुरू करने के लिए ।

(16जून, 2020)

Monday, June 15, 2020


उदास तो मैं भी कई बार बहुत अधिक हो जाती हूँ। संघर्ष का लम्बा होना, लक्ष्य का दूर होना या विफलता और हार से कभी हताशा-उदासी नहीं घेरती। क्रान्तिकारी सामाजिक बदलाव और साहित्य-कला की उदात्त मानवीय दुनिया में क्षुद्र, मानवद्रोही, कैरियरवादी, कायर, बौने विदूषकों की धमाचौकड़ी देखकर कभी कभी सघन अवसाद घेर लेता है। पर फिर जल्दी ही उदासी को आत्मिक शक्ति और घृणा में ढालकर सत्ता से और बदमाश अवसरवादी रंगे सियारों से मोर्चा लेने में भिड़ जाती हूँ। प्रकृति, साहित्य और अच्छे दोस्तों की संगत को छककर जीती हूँ। मरने की तो मैं सोच भी नहीं सकती। जिंदगी तमाम कमियों-परेशानियों सहित बहुत प्यारी है। मुझे 200 वर्ष जीना है।
कामरेडो ! बहुत अवसादग्रस्त हो? मेरे साथ आम लोगों की जिंदगी की जद्दोजहद के बीच चलो! मेरे पास ताजगी और जिजीविषा का वायरस है! संक्रमित हो जाओगे।

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हर आत्महत्या पूँजीवाद द्वारा की गयी हत्या होती है -- सिस्टेमिक मर्डर! जब एलियनेशन हद से ज्यादा बढ़ जाता है तो जीना बेमानी लगने लगता है । ज़िन्दगी को एक मक़सद देने का सबसे बढ़िया रास्ता है इस हत्यारी व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ने को ही जीना बना लेना।

(14जून, 2020)

Sunday, June 14, 2020

कुत्सा-प्रचार के ज़हर-मवाद-गंद भरे नाले के किनारे बैठे 'समझदारों का गीत'


लिखने का मन तो नहीं था, पर फिर सोचा कि बता ही दूँ I पंडा के 'मार्क्सिस्ट स्टडी सर्किल' के पाँचो वीडियोज की समालोचना प्रस्तुत करने के बाद से लेकर अबतक मेरे पास सौ से भी अधिक मित्रों के फोन आ चुके हैं जिन्होंने बताया कि पंडा उन्हें फोन करके किस स्तर का कुत्सा-प्रचार करता रहा और मुझे और कुछ अन्य साथियों को अनफ्रेंड करने और ब्लाक तक करने के लिए कन्विंस करता रहा I अभी वह लगातार अपनी वाल पर चरित्र-हनन और कुत्सा-प्रचार करते हुए "सत्यकथा" और "मनोहर कहानियाँ" लिखता चला जा रहा है I यह काम तो वह बीस वर्षों से कर रहा है, पर हर बार की कुत्सा-प्रचार मुहिम में वह अपने चरित्र में आयी गिरावट के अनुपात में ही रसातल की ओर थोड़ा और लुढ़क जाता रहा है I 25 वर्षों पहले एक संघर्ष से पेंट गीली करते हुए भागने वाला जो व्यक्ति घोटा मारकर 'इंडियन रेवेन्यू सर्विस' की परीक्षा पास करके आज 'सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ इनडायरेक्ट टैक्सेज एंड कस्टम्स' में उच्चपदस्थ अधिकारी है, वह न सिर्फ़ साहित्य का मठाधीश और लेखक बनने का आकांक्षी है, न सिर्फ़ मार्क्सवाद का स्वयंभू शिक्षक बन बैठा है, बल्कि क्रांतिकारी वाम आन्दोलन पर भी गंद उछालकर अपने भगोड़ेपन के इतिहास से जन्मी कुंठाओं का शमन रहा है I वस्तुतः अपनी वाल पर वह मवाद और मैले में घोलकर निरंतर ज़हर उगल रहा है I बहरहाल, सूअर की पिटाई के लिए हम खुद तो गंद में नहीं उतर सकते, लेकिन दूर खड़े होकर विचारधारा और राजनीति के डंडे से इसकी पिटाई करते रहेंगे ! यह हमारा विवशतापूर्ण कर्तव्य है क्योंकि बुर्जुआ राज्यसत्ता का यह दो कौड़ी का चाकर अहम्मन्य, आत्मग्रस्त, कैरियरवादी मूढ़ अगर मार्क्सवाद के शिक्षक का लबादा ओढ़कर सैकड़ों युवाओं को दिग्भ्रमित करता रहेगा तो इसके फैलाए कचड़े की सफाई हमें करनी ही पड़ेगी I

पंडा की समालोचना करते हुए जब तर्कों से सिद्ध करने के बाद हम उसे "मूर्ख, झूठा, आत्मग्रस्त" आदि-आदि कहते हैं तो राजधानी के "शिष्ट" "विनम्र" वाम विद्वानों के दिल-जिगर चाक-चाक हो जाते हैं, लेकिन पांडे हमारे एक भी सवाल का जवाब दिए बगैर जब व्यक्तिगत और सांगठनिक कुत्सा-प्रचारों की झड़ी लगाता है, तो ये लोग शुतुर्मुर्गासन करने में तल्लीन हो जाते हैं I बात सिर्फ़ "दरियागंज का दल्ला" कहलाने वाले उस कवि की ही नहीं है, बहुतेरे संजीदा माने जाने वाले महानुभावों की भी है I बहरहाल, हम स्वयं को एक सच्चा वाम क्रांतिकारी मानने के नाते अपने स्तर से नीचे कभी नहीं उतरेंगे और इस गलीज कुत्सा प्रचारक (जो मार्क्सवादियों के बीच राज्यसत्ता का 'प्लांटेड' व्यक्ति भी हो सकता है) के एक भी आरोप का, एक भी कुत्सा-प्रचार का कोई जवाब नहीं देंगे ! हम केवल और केवल राजनीतिक मुद्दों पर केन्द्रित करेंगे I

एक बहुत मोटी-सी बात तमाम 'फेन्ससिटर्स' की मोटी बुद्धि में क्यों नहीं घुस रही है कि जब हम पंडा की इतिहास, दर्शन और मार्क्सवाद की अत्यंत भोंडी और गलत समझदारी को तथ्यों और तर्कों सहित प्रमाणित करते हुए सवाल उठा रहे हैं तो वह आखिरकार उनमें से एक का भी जवाब क्यों नहीं दे रहा है और इसकी जगह हमारे ऊपर लांछनों की ढेरी क्यों लगा रहा है ? चलिए, मान लिया कि कोई पतित किस्म का व्यक्ति ही मार्क्सवाद की आपकी समझदारी को खुलेआम, विस्तार से सोशल मीडिया पर गलत बता रहा है, तो क्या विचारधारा की हिफाज़त के लिए और लोगों को गुमराह होने से बचाने के लिए आपका यह कर्त्तव्य नहीं बनता कि आप उठाये गए सवालों का जवाब दें ? हमने पंडा की पांचो वीडियो की समालोचना करते हुए उसकी पचासों गंभीर गलतियों और झूठों और डींगें हांकने के प्रमाण प्रस्तुत किये ! हमने पंडा को इन प्रश्नों पर बार-बार खुली बहस का आमंत्रण दिया ! आखिर वह हमारे एक भी सवाल का उत्तर क्यों नहीं दे रहा है ? हमने पंडा के जिन गलतियों-मूर्खताओं और झूठों की चर्चा की, उनमें से मात्र कुछ को ही ले लें :

i) पंडा को श्रम और श्रम-शक्ति का फर्क नहीं पता है जो मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र की बुनियाद है I
ii) पंडा ने ऐतिहासिक भौतिकवाद को वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत में रिड्यूस कर दिया है जबकि वह उसका मात्र एक अंग है I
iii) पंडा ने भाववाद को ईश्वरवाद और नियतत्ववाद में रिड्यूस कर दिया है जबकि भाववाद अनिवार्यतः यही रूप नहीं लेता; subjective idealism इसका प्रमुख उदाहरण है I
iv) काम छोटे या बड़े अधिक या कम वेतन की वजह से नहीं माने जाते -- इस प्रश्न पर पण्डे का फंडा एकदम क्लियर नहीं है I
v) पण्डे की फुद्दू समझ देखिये -- चार्वाक और बुद्ध के युग को वह सामंतवाद का युग बताता है I
vi) पण्डे ने प्राचीन जनपदों के उदय को पहली सदी ईसवी में पहुँचा दिया है I
vii) घटनाओं और दर्शनों का काल बताने में कई जगह गंभीर गलतियाँ की हैं पण्डे ने I यही नहीं, किताबों के नाम भी वह गलत-सलत बताता रहा है जैसे दामोदरन की पुस्तक 'भारतीय चिंतन परम्परा' को 'भारतीय दर्शन-परम्परा' बताना, क्रिस हरमन की पुस्तक 'अ पीपल्स हिस्ट्री ऑफ़ दि वर्ल्ड' को हॉवर्ड जिन की पुस्तक बताना (हॉवर्ड जिन की पुस्तक का नाम 'अ पीपल्स हिस्ट्री ऑफ़ यू एस ए' है)I
viii) आत्म-महिमा-मंडन के लिए पण्डे ने कई झूठ बोले, जैसे कि उसने बी ए में पढ़ते समय 'पूँजी' के तीनों खंड सात दिन में पढ़ डाले थे, उसके पास रोज़ा लक्जेमबर्ग की अंग्रेज़ी में सम्पूर्ण रचनाएँ हैं जो उसने पढ़ डाली हैं (अभी अंग्रेज़ी में रोज़ा की सम्पूर्ण रचनाएँ छपी ही नहीं ) ... आदि-आदि !
ix) पण्डे के अनुसार प्राचीन जनपदों के काल में वैश्यों के कारखानों में शूद्र "कम मज़दूरी" पर काम करते थे -- यह है पंडा महाराज की इतिहास की समझ !!
x) पण्डे के अनुसार पितृसत्ता की "रचना" की गई !!
xi) पण्डे के अनुसार ब्राह्मणों ने वर्ण-व्यवस्था का "किस्सा गढ़ा" !!
xii) पण्डे के अनुसार, शूद्र बौद्धिक रूप से कमजोर होने के कारण शूद्र बने ! इसतरह पण्डे का जनेऊ बाहर निकल आया है !!

ये तो पण्डे की "अगाध विद्वत्ता" के सागर से चुने हुए महज कुछ मोती हैं ! हमारा एक बार फिर आग्रह है कि पण्डे की पांचो वीडियोज की हमने जो समालोचनाएँ किश्तवार लिखी हैं, उन्हें आप खुद गंभीरता से पढ़कर देख सकते हैं कि हमने उसके लिये जिन विशेषणों का इस्तेमाल किया है, क्या उनमें रत्ती भर भी अत्युक्ति है ?

हमारा बस इतना कहना है कि पंडा चाहे हमें जितनी गालियाँ दे ले, जितने घिनौने झूठ गढ़ ले, वह हमारी पचासों आलोचनाओं में से चन्द-एक का ही जवाब देकर और हमें गलत साबित करके अपने शिष्यों-मुरीदों और राजधानी के "शिष्ट जनों" के सामने यह सिद्ध तो करे कि वह एक झूठा, आत्म-दम्भी, आत्म-मुग्ध, कैरियरवादी जंतु नहीं है !
रहा सवाल कुत्सा-प्रचार और चरित्र-हनन का, तो उसके बारे में ज़माने पहले सुकरात ने या शायद किसी अन्य ग्रीक दार्शनिक ने (इसपर विवाद है कि यह किसका उद्धरण है) बिलकुल सटीक कहा था कि "जब वाद-विवाद में पराजय हो जाती है तो फिर पराजित व्यक्ति कुत्सा-प्रचार को अपना हथियार बना लेता है I"

एक पुरानी डैनिश कहावत है:"कुत्सा-प्रचारक के डँसे हुए का कोई इलाज नहीं है I" मोलिएर भी कहते हैं कि 'कुत्सा-प्रचार से कोई बचाव नहीं होता !' लेकिन एक कम्युनिस्ट ऐसा नहीं मानता ! वह चाहे तो दो मिनट में कुत्सा-प्रचारक का वैसा ही इलाज कर दे जो गली के कुत्ते का किया जाता है I पर वह ऐसा करने की जगह, प्रायः, एक लम्बे समय तक दूसरा विकल्प चुनना बेहतर समझता है I वह कुत्सा-प्रचारक के एक भी झूठ का जवाब देने की जगह राजनीतिक प्रश्नों पर केन्द्रित करता है क्योंकि जो लोग राजनीति की जगह कुत्सा-प्रचार से प्रभावित होते हैं वे सामान्य नागरिक स्तर से भी काफी गिरे हुए लोग होते हैं और क्रांतिकारियों के लिए किसी काम के नहीं होते !

एक गंदा आदमी, जैसे कोई दुश्चरित्र और लम्पट, बुर्जुआ सत्ता का कोई चाकर, आपके ख़िलाफ़ कुत्सा-प्रचार करता है तो यह आपके ख़िलाफ़ अच्छी बात है ! हेनरी फ़ील्डिंग के अनुसार,"कुछ लोगों द्वारा किया गया कुत्सा-प्रचार उतनी ही शानदार अनुशंसा होती है जितनी दूसरों द्वारा की गयी प्रशंसा I"

अलेक्सांद्र ड्यूमा के अनुसार,"कुत्सा-प्रचार को रोकने का सही तरीका उससे नफ़रत करना है; उससे आगे निकालने और खंडन करने की कोशिश करेंगे, तो यह आपको पीछे छोड़ देगा I"

वोल्तेयर के शब्दों में,"इतिहास के कई कर्त्तव्य होते हैं ... ... पहला है कुत्सा प्रचार नहीं करना; दूसरा है बोर नहीं करना I"

सैमुअल जॉनसन ने कुत्सा-प्रचारकों के बारे में जो बात कही है वह पण्डे के बारे में एकदम सटीक लागू होती है,"कुत्सा-प्रचार कायर का प्रतिशोध होता है और अपने विचारों को छिपाना उसका बचाव होता है I"

बस फिलहाल इतना ही ! एक पुराना फ़िल्मी गीत है,"समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाडी है !" इतनी बातों और तर्कों और पण्डे के तमाम कुकर्मों के बावजूद पण्डे को जो नहीं समझते, वे अनाडी या मूर्ख नहीं हैं, बल्कि खुद ही घाघ हैं, या उसी खेल के खिलाड़ी हैं ! जो सब समझकर भी नहीं समझते, उन्हें कोई नहीं समझा सकता ! गोरख पाण्डेय की एक कविता है,"समझदारों का गीत !" जिसने भी न पढ़ी हो उसे खोजकर पढ़ लेना चाहिए !

(14जून, 2020)

हमारे समाज के सामाजिक ताने-बाने में ही जनवाद नहीं है ! जनवाद नहीं, तो पारदर्शिता नहीं ! स्वस्थ बहस नहीं ! साहित्यिक जगत में भी स्वस्थ मतभेद, उग्र बहसें, वैचारिक विवाद संभव नहीं हो पाते ! आप जैसे ही मतभेद दर्ज़ कराते हैं, या अपनी कोई स्वतंत्र राय रखते हैं, जनवाद और बराबरी का झीना-रेशमी आवरण उतर जाता है I "ऊँचे लोग" आपकी हिमाक़त पर रुष्ट हो जाते हैं ! वे दिल से आपको आपकी औकात दिखा देने के बारे में सोचने लगते हैं ! आप अगर किसी से वैचारिक बहस में निहायत ईमानदारी से उलझ पड़ते हैं तो इसतरह के कयास लगाए जाने लगते हैं कि शायद आप उस व्यक्ति के विरोधी अलां या फलां गुट से जुड़ गए हों ! अगर आप किसी नीच-बेईमान तत्व के विरुद्ध कोई वैचारिक संघर्ष करते हैं तो वह नीच व्यक्ति किसी गुरु या आचार्य के लबादे पीछे जाकर छिप जाता है, जिसे चिकनी-चुपड़ी बातों से उसने पहले से ही पटा रखा होता है ! हिन्दी साहित्य की दुनिया में सज्जन-शालीन लोग भी कटुभाषी स्पष्टवक्ता की जगह चिकनी-चुपड़ी बातें करने वाले और गणेश-परिक्रमा करने वाले घुटे हुए बदमाशों को पसंद करते हैं ! जिस बौद्धिक-साहित्यिक समाज में चापलूसी से काम निकलता हो, वह समाज जनवादी नहीं और जो समाज जनवादी नहीं, वहाँ स्वस्थ बौद्धिक बहस संभव नहीं ! फिर भी हम युवा पीढी और भविष्य के बारे में आशावादी मत रखते हुए सैद्धांतिक बहसें तो चलाते ही रहेंगे और तमाम मदारियों और बेईमानों-बदमाशों को नंगा करते ही रहेंगे !

(12जून, 2020)

Friday, June 12, 2020


कवि के पास जब भाषा का हुनर आ जाता है तो अक्सर उसकी भाषा का जादू जाता रहता है I अक्सर ! हमेशा नहीं !

कवि जब बहुत अनुभवी हो जाता है तो कई बार वह अपनी क्षुद्रताओं, ईर्ष्याओं, विश्वासघातों और आत्मा की मलिनताओं को भी बिम्बों और फंतासियों में लपेटकर उस सागर-तट पर रख देता है, जहाँ रात को कविता मछली का रूप धरकर आती है और उसे चारा समझकर खा जाती है !

फिर एक दिन आता है जब वह मछली समुद्र के वक्षस्थल पर निर्जीव पड़ी सागर के थपेड़े झेलती नज़र आती है, और फिर धीरे-धीरे नज़रों से ओझल हो जाती है I
और फिर एक दिन आता है जब समुद्र से एक घोड़मुँहा दैत्याकार मछली बाहर आती है जो कवि की ही अपनी ज़िंदगी होती है I वह मछली मुँह खोलती है और उस अमरत्व के निकट पहुँच रहे कवि पर अनपची-अधपची तुच्छताओं और पश्चातापों की बौछार कर देती है !

कवि फिर विस्मृति का शिकार हो जाता है ! अनिद्रा उसे स्वप्न भी नहीं देखने देती ! वह बहुत धीरे-धीरे मृत्यु की ओर घिसटता है I

मनुष्यता से विश्वासघात करने वाले कवि और न्याय-समर से भागे हुए योद्धा तमाम लोगों और सुविधाओं और प्रशस्तियों से घिरे हुए बहुत यंत्रणादायी अकेलेपन की मौत मरते हैं !

उनकी आत्मा में इतना अँधेरा, इतना सघन अँधेरा भर जाता है कि वे साँस तक नहीं ले पाते I वे मनुष्य नहीं रह जाते I इसतरह वे मर जाते हैं !

(डायरी के पन्नों से)

(11जून, 2020)

Thursday, June 11, 2020


कल(10जून,2020) Hindi Kavita के पेज पर कवि संजय चतुर्वेदी लाइव थे! मुझे अभी भी याद है, 2016 की 11 जून को दिल्ली में 'अन्वेषा' की ओर से मैंने नरेश सक्सेना, कृष्ण कल्पित और अविनाश मिश्र के साथ संजय जी के कविता-पाठ का आयोजन रखा था। तब मेरी समझ थी कि कुछ अतिरिक्त आवेश और अतिरेक के बावजूद संजय चतुर्वेदी का राजधानी के सुविधाजीवी, छद्म-वामी अभिजन समाज से जो क्षोभ है, वह किसी हद तक जायज़ है और उसके कुछ ठोस वस्तुगत कारण हैं! पर इन चार वर्षों के दौरान मैं उन्हें लगातार पढ़ती रही और फिर उनकी पहले की कविताओं को भी सिलसिलेवार पढ़ा! तब मेरी राय बनी कि छद्म वाम की आड़ लेकर संजय वस्तुतः पूरे वाम को ही निशाना बनाते हैं, या यूँ कहें कि उनके लेखे सारा वाम ही एक छद्म है, एक सत्ताभोगी, सुविधाजीवी फ्रॉड है! वे दिल्ली के सभी वाम बौद्धिकों को फ्रॉड मानते हैं और दिल्ली के विश्वविद्यालयों के सभी वामपंथी युवाओं को 'कुलीन समाज के लफंदर लौंडे' मानते हैं!

बात तब और साफ़ हो जाती है जब आप पाते हैं कि हाल के 6-7 वर्षों के दौरान लगभग उनकी 95 प्रतिशत कविताएँ "वाम" अवसरवाद पर तो (वस्तुतः पूरी वाम धारा पर) चोट करती हैं पर हिन्दुत्ववादी फासिज्म के ऐतिहासिक तांडव पर, मॉब लिंचिंग, दंगों, न्यायालयों की स्थिति, मानवाधिकारकर्मियों के दमन, फर्जी मुठभेड़ों आदि-आदि पर उनकी कविता की दुनिया में एक रहस्यमय हत्यारा सन्नाटा छाया रहता है ! ध्यान से अगर हम संजय के विचारों को देखें तो भारतीय मनीषा, संस्कृति, सभ्यता और इतिहास के बारे में उनके विचार और धारणाएं पूरीतरह से दक्षिणपंथी हैं। आज की तारीख में वह एक हिन्दुत्ववादी कवि का अवतार ले चुके हैं ! उनके लिए सारी आपदाओं का कारण शायद हिन्दी साहित्य की दुनिया में व्याप्त छद्म-वाम का अवसरवाद है, या प्रकृति और समाज को तबाह करता आधुनिकता का वायरस है । संजय चतुर्वेदी आज की तारीख में विद्यानिवास मिश्र या निर्मल वर्मा जैसों के मुकाबले ज्यादा राजनीतिक मुखरता के साथ दक्षिणपंथ की विचारधारा के साथ खड़े हैं I आश्चर्य है कि कुछ हिन्दी कवियों का वैचारिक-दार्शनिक बोध इतना भोथरा हो चुका है कि वे इस चीज़ को अभी भी नहीं देख पा रहे हैं ! बहरहाल, संजय चतुर्वेदी की कविता की वैचारिक ज़मीन पर और उनके विचारों पर आगे कभी हम विस्तार से लिखेंगे ! कल उनका लाइव सुनाने के बाद साथी Dhirendar Nath ने अपनी वाल पर टिप्पणी की थी,"आज तो कोटि आचार्य लजावनहारे एक हुनरमंद विद्वान ने बोल ही दिया कि हिन्दी कवियों के पास न भाषा है न दृष्टि. मने कोई कवि ही नहीं है. खेल खतम ! अब क्या होगा !"

इस टिप्पणी पर मैंने जो कमेंट किया वह यहाँ दे रही हूँ ।

"ये जो सज्जन हैं, छद्म-वाम का विरोध करते-करते पूरी तरह से दक्षिणपंथ की गोद में जा बैठे हैं ! अब ये छद्म नहीं, बल्कि पूरे वाम को ही निशाने पर ले रहे हैं ! इनकी वैचारिकता का असली रंग इसी बात से चल जाता है कि 2014 से लेकर आजतक इनकी व्यंग्यात्मक कविताओं का निशाना कभी भी फासिस्ट सत्ता और उसके काले कारनामे नहीं रहे ! यहाँ तक कि जब देश भर में CAA-CRC-NPA विरोधी जनांदोलन चल रहे थे, उससमय यह व्यक्ति, यानी संजय चतुर्वेदी को इसमें ज ने वि आदि विश्वविद्यालयों के वाम छात्रों का तमाशा नज़र आ रहा था ! अब व्यक्तिगत कुंठा से शुरू हुई संजय चतुर्वेदी की प्रतिक्रियात्मक पश्च-गति उन्हें एक हिन्दुत्ववादी बना चुकी है ! वैसे भी अगर आप उनके विचारों की पड़ताल करें, तो वे मार्क्सवादी नहीं बल्कि उत्तर-आधुनिकतावादी रहे हैं ! दरअसल, अस्सी के दशक में बहुतेरे युवा कवि अपने जनेऊ को उतारकर नहीं, बल्कि भूलकर वाम धारा के युवा तुर्क के रूप में उभरे थे ! नब्बे के दशक में सोवियत संघ की घटनाओं के बाद, उनकी रूमानी, विचार-रिक्त आस्थाएं तेज़ी से टूटीं-दरकीं ! इसी दौर में छद्म-वाम ने भी विचार और साहित्य की दुनिया में अपना बहुत गंदा, सुविधाभोगी, अवसरवादी रंग दिखाया ! इस परिघटना ने ऐसे खोखले, पेटी-बुर्जुआ रूमानी, आत्मग्रस्त, व्यक्तिवादी कवियों की अंतरात्मा को वाम धारा पर हमले करने का एक 'सेल्फ-जस्टीफिकेशन' वाला तर्क भी मुहैय्या करा दिया ! भूला हुआ जनेऊ फिर से याद आ गया ! उधर उत्तर-आधुनिकतावाद का जो तर्कणा-विरोधी, इतिहास-विरोधी, पुनरुत्थानवादी तर्क था, उसने ऐसे लोगों को एक वैचारिक आधार देने का काम किया!अलग-अलग ढंग से यह बात संजय चतुर्वेदी पर भी लागू होती है और उदय प्रकाश पर भी ! बड़ी विडम्बना की बात यह है कि वाम कवियों की दिल्ली बिरादरी से रुष्ट-क्षुब्ध कुछ लोग विचारधारात्मक अवस्थिति को ताक पर रखकर संजय चतुर्वेदी की कविता में हाल के वर्षों में आये ' नेकेड रिएक्शनरी टर्न' की उपेक्षा करके उनकी प्रशंसा करने लगते हैं और अम्बर पाण्डे की कविताओं के शिल्प पर लहालोट होते हुए और उनकी घोर व्यक्तिवादी, प्रतिगामी अंतर्वस्तु की पड़ताल किये बगैर उन्हें भी प्रगतिशील घोषित कर देते हैं ! एक किस्म के अवसरवाद का मुकाबला करते हुए अगर आप दूसरी कोटि के अवसरवाद की गोद में जा गिरते हैं, तो यह और भी निकृष्ट बात है ! कई बार ऐसा लगता है कि हिन्दी साहित्य में कई विवाद सैद्धांतिक कारणों से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों से होते हैं ! यह बात बेहद गंदी और घटिया प्रतीत होती है।"

संजय की कविताई और भाषा के शऊर पर, या अम्बर पाण्डे की कला पर दिलो-जान से फ़िदा होकर उनके वैचारिक स्टैंड की अनदेखी करने वाले कवियों पर भी साथी Dhirendar Nath की आज की यह टिप्पणी बहुत सटीक बैठती है :"प्रिय साथी,यहाँ कोई यह कहने नहीं आएगा कि देश-काल से विच्छिन्न हुनरमंदी और विलक्षणता बहुत काम की चीज़ नहीं । जिन्हें अपने समय के अनगिनत मनुष्यों की अगणित पीड़ाओं से कुछ लेना देना नहीं, वे आपके रचना सामर्थ्य की क्या फ़िक्र करेंगे । किसी उत्कृष्ट विलक्षणता में आपको पड़े रहने दे कर आगे बढ़ जाएँगे ।"

(11जून, 2020)

('हंड्रेड फ्लावर्स मार्क्सिस्ट स्टडी ग्रुप' ने पंडा के "मार्क्सवादी अध्ययन चक्र" की समालोचना करते हुए इस बार उसके पाँचवे वीडियो का वैज्ञानिक पोस्टमार्टम किया है I समालोचना की इस किश्त के बाद भी अगर आहत 'मिडिल क्लास सेंसिबिलिटीज़' वाले हिन्दी बौद्धिक-साहित्यिक समाज के किसी शिष्ट जन को यह अहसास नहीं होता कि पंडा व्यास-पीठ पर बैठा मार्क्सवाद की "सिद्ध-गुटिकाएँ" बाँचता हुआ दर्शन और इतिहास के साथ कितना वीभत्स अतिचार कर रहा है, और उसका तीखा वैचारिक प्रतिकार कितना ज़रूरी है, तो उस महानुभाव को साक्षात् आचार्य वृहस्पति और शुक्राचार्य मिलकर भी नहीं समझा सकते ! जो लोग किन्ही निहित स्वार्थों के वशीभूत होकर चीज़ों को समझते हुए भी नहीं समझना चाहते, उन्हें कोई नहीं समझा सकता !

हम तो एकदम साफ़-साफ़ एक बात समझते हैं कि वैचारिक संघर्ष का मोर्चा भी वर्ग-संघर्ष का एक बुनियादी मोर्चा होता है ! सच्चा मार्क्सवादी विजातीय प्रवृत्तियों और रुझानों के विरुद्ध हमेशा तीखा संघर्ष चलाता है और चीज़ों को उनके गुणधर्म और व्यवहार के हिसाब से ही नाम देता है ! वह हलवा को हलवा और गू को गू कहने में यकीन रखता है I पण्डे के विरुद्ध तीखा संघर्ष चलाते हुए हमने उसे मूर्ख, अहम्मन्य, आत्मग्रस्त, कूपमंडूक आदि-आदि वही विशेषण दिए हैं जो उसे मानते हैं और फिर अपनी समालोचना से यह साबित किया है कि वह ऐसा ही है I अगर आपको यह बुरा लगता है तो आपने अभी क्लासिकल मार्क्सिस्ट पोलेमिकल राइटिंग्स का अध्ययन ही नहीं किया है I कोई भी महानुभाव तर्कशः साबित कर दें कि जिन मुद्दों पर पण्डे के विवरण और व्याख्याओं को पूरीतरह से गलत और मूर्खतापूर्ण बताते हुए हमने उसे मूर्ख आदि-आदि कहा है, उन मुद्दों पर हमारा स्टैंड गलत है, तो हम अपने विशेषण वापस लेकर फ़ौरन माफी माँग लेंगे !

समालोचना की इस किश्त में हम देखेंगे कि पंडा अपनी मूर्खता के लट्ठ से बौद्ध-दर्शन और इतिहास को किसतरह थूर-कूंच रहा है ! इस व्यक्ति को ऐतिहासिक कालों का अनुक्रम तक नहीं पता है, गणराज्यों के काल और सामंती काल में इसे अंतर ही नहीं पता है और बौद्धदर्शन की भयंकर दुर्व्याख्या तो इसने की ही है I आप खुद ही इसकी "विद्वत्ता" की थाह इस समालोचना को पढ़कर ले सकते हैं, मैं कहाँ तक बताऊँ !


यानी चीनी मिट्टी के बर्तनों की दूकान में घुसा अड़ियल सांड अभी भी तोड़-फोड़ मचाये हुए है ! जबतक वह ऐसा करता रहेगा, तबतक हम भी उसकी यथोचित सेवा करते रहेंगे!)

इस तरह आत्‍मग्रस्‍त मूढ़ता के रथ ने रौंद दिया बौद्ध दर्शन और इतिहास को

HUNDRED FLOWERS MARXIST STUDY GROUP·WEDNESDAY, 10 JUNE 2020


इस तरह आत्‍मग्रस्‍त मूढ़ता के रथ ने रौंद दिया बौद्ध दर्शन और इतिहास को
(अशोक कुमार पाण्‍डे द्वारा मार्क्‍सवादी अध्‍ययन चक्र में फैलायी जा धुन्‍ध का आलोचनात्‍मक विवेचन)

(पांचवी किश्‍त)
 हण्‍ड्रेड फ्लावर्स मार्क्सिस्‍ट स्‍टडी ग्रुप, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय, दिल्‍ली


हमारी आलोचना की पहली किश्‍त यहां पढ़ें: (https://bit.ly/3dpLJHB)
हमारी आलोचना की दूसरी किश्‍त यहां पढ़ें: ( https://bit.ly/30342ym )
हमारी आलोचना की तीसरी किश्‍त यहां पढ़ें: ( https://bit.ly/3cD23Dt )
हमारी आलोचना की चौथी किश्‍त यहां पढ़ें: ( shorturl.at/dehES )


अब हम पाण्‍डे जी के पांचवे वीडियो की आलोचनात्‍मक विवेचना पर आते हैं।

पाण्‍डे जी पांचवे वीडियो में थोड़ा 'कांशस' हो गये हैं। हालांकि इस सचेत होने और नरभसाने को उन्‍होंने आक्रामकता के पर्दे में छिपाने की काफी कोशिश की है। लगभग आधे घण्‍टे के वीडियो में पाण्‍डे जी ने कम-से-कम 15 मिनट हवाबाज़ी पर खर्च किये हैं। जैसा कि हमने पहले भी बताया है, पाण्‍डे जी के वीडियो चिप्‍स के पैकेट के समान होते हैं। उसमें सड़े चिप्‍स के अलावा आधी जगह बदबूदार गैस भरी होती है। यह वीडियो भी इस आम नियम का अपवाद नहीं है। पाण्‍डे जी काम की बात करने की बजाय बार-बार हमें याद दिलाते हैं कि उनसे गलती हो सकती है, उन्‍हें ठीक किया जाय, क्‍योंकि सीखना तो एक दो-तरफा प्रक्रिया होती है; कई लोग गुरू-घण्‍टालों के समान जटिल शब्‍दावली में बात करते हैं, मार्क्‍स व हेगेल वगैरह को कोट करते हैं, और अपने ज्ञान से लोगों को आतंकित करते हैं, यह तो कोई मार्क्‍सवादी तरीका नहीं है। पूंजीवादी राज्‍यसत्‍ता के एक चाकर के रूप में पाण्‍डे जी बिल्‍कुल पूंजीवादी राज्‍यसत्‍ता जैसी ही बातें कर रहे हैं! जब पूंजीवादी राज्‍यसत्‍ता किसी से आतंकित होती है, तो वह सबके लिए ही उस चीज़ को आतंककारी बता देती है! उसी प्रकार पाण्‍डे जी जिन आलोचनाओं से आतंकित हो गये हैं, उन्‍हें बौद्धिक आतंककारी करार देने की कोशिश कर रहे हैं! उनका कहना है कि इनको पढ़कर कुछ समझ नहीं आता है, बस आतंक पैदा होता है! अपने आतंकित होने को वह पूरे हिन्‍दी जगत पर ही आरोपित किये दे रहे हैं। कोई ताज्‍जुब की बात नहीं है, ज्‍यादातर मूर्खों को यह लगता ही है कि सभी मूर्ख हैं।
पाण्‍डे जी खुद तो अपना अज्ञान फैलाने की प्रक्रिया में कोई उद्धरण या सन्‍दर्भ बताते नहीं हैं, बस कुछ किताबों के नाम बताते हैं और वह भी गलत बताते हैं, जैसा कि हम इस बार भी देखेंगे। अब चूंकि पाण्‍डे जी अपनी बालकनी पर खड़े होकर अज्ञान का कूड़ा हिन्‍दी जगत के युवाओं, बुद्धिजीवियों आदि पर फेंक रहे हैं, तो हमें उद्धरणों, सन्‍दर्भों व पुस्‍तकों के सही नाम के साथ उनका खण्‍डन करना पड़ता है। वैसे भी, यदि कोई मार्क्‍सवाद या भारतीय दर्शन के बारे में बुनियादी ज्ञान को विकसित करने के लिए कोई स्‍टडी सर्किल लेता है, तो क्‍या उसे उद्धरण पेश नहीं करने चाहिए? क्‍या उसे सही सन्‍दर्भ नहीं बताना चाहिए? और अगर वह गलत-सलत सन्‍दर्भ और किताबों के नाम बताये, तो क्‍या सही सन्‍दर्भों, उद्धरणों व किताबों के नामों के साथ उसका खण्‍डन नहीं किया जाना चाहिए? लेकिन जब हम पाण्‍डे जी को इस तरह से दुरुस्‍त करते हैं, तो पाण्‍डे जी कहते हैं कि 'देखो, देखो! ये लोग मुझे ज्ञान से आतंकित कर रहे हैं!' वह कुत्‍साप्रचार करने लगते हैं, बीमार पड़ जाते हैं, सहानुभूति बटोरने का प्रयास करने लग जाते हैं। बड़ी हास्‍यास्‍पद स्थिति हो गयी है पाण्‍डे जी की।
इस पांचवे वीडियो में जो दूसरी मज़ेदार बात है, वह यह है कि पाण्‍डे जी जिस प्रकार कुछ लोगों के सवालों का शुरू में ही जवाब दिया करते थे, उन्‍होंने इस बार ऐसा कुछ नहीं किया। ऐसा इसलिए हुआ है कि पाण्‍डे जी अपने व्‍याख्‍यान का मूल हिस्‍सा तो टीप-टाप कर लेकर आते थे, लेकिन जो सवाल लोग पूछते थे, वह तो पाण्‍डे जी पहले से तैयार करके आते नहीं थे। इन्‍हीं सवालों का जवाब देने के चक्‍कर में पिछले चार वीडियो में इन महोदय ने अपनी काफी फजीहत कराई थी। वैसे तो जो मूल व्‍याख्‍यान पाण्‍डे जी देते हैं, वह भी वज्र मूर्खताओं से भरा होता है, जैसा कि हम पहले चार वीडियो की समालोचना में देख चुके हैं और इस बार भी देखेंगे, लेकिन स्‍वत:स्‍फूर्त रूप से मौके पर पूछे गये सवालों का जवाब देने के चक्‍कर में तो पाण्‍डे जी अपनी बुरी तरह से भद्द पिटवाते रहे हैं। इस बार एक अच्‍छे ''मार्क्‍सवादी'' के समान उन्‍होंने ''समाहार'' किया और तय किया कि ''बेटा पाण्‍डे, ये सवालों का जवाब देने में विद्वता झाड़ने के चक्‍कर में तो तेरे लग जा रहे हैं, तू इस फण्‍डे में पड़ ही मत! सीधे एकतरफा बोल दे उन खर्रों के आधार पर जो तू बनाकर लाया है!'' लेकिन तुर्रा यह कि पाण्‍डे जी अपने पांचवें व्‍याख्‍यान में ज्ञान-अर्जन की प्रक्रिया को दोतरफा बता रहे हैं!
तो पाण्‍डे जी ने दो नवोन्‍मेष किये हैं इस बार। एक तो उन्‍होंने आधा टाइम यह बताने और भूमिका बांधने में खर्च कर दिया कि किस प्रकार वह सरल शब्‍दों में ज्ञान देते हैं, दोतरफा तरीके से ''प्‍यार लो प्‍यार दो'' की तर्ज पर ज्ञान लेते-देते हैं, और किस प्रकार कुछ लोगों ने अपने उद्धरणों, सन्‍दर्भों व ''जटिल शब्‍दों'' से उनको आतंकित किया है, किस प्रकार उनसे गलती भी हो जाती है और किस प्रकार वह सीखने के लिए तैयार हैं, किस प्रकार वह शिक्षक-विद्याथीं के सम्‍बन्‍ध को नहीं मानते हैं, बल्कि साथियों द्वारा ''प्‍यार दो-प्‍यार लो'' की तर्ज पर ''ज्ञान लो-ज्ञान दो'' के सिद्धान्‍त पर चलते हैं, इत्‍यादि। इस हवाबाज़ी पर पाण्‍डे जी ने लगभग 15 मिनट खर्च कर दिये हैं अपने 30 मिनट से भी कम के वीडियो में! इसके पीछे पाण्‍डे के असली मकसद दो हैं: पहला, कि उनकी अब तक हमारे द्वारा पेश की गयी बेहद बोधगम्‍य और सरल आलोचना के बारे में लोगों को डरा दिया जाय, और वे उसे न पढ़ें, क्‍योंकि अगर लोग पढ़ेंगे तो उन्‍हें पता चलेगा कि पाण्‍डे को मार्क्‍सवाद और साथ ही भारतीय दर्शन व उसके इतिहास का 'क ख ग' भी नहीं पता है। लेकिन अफसोस की ऐसा हो नहीं पा रहा है। दूसरी चाल उन्‍होंने यह चली है कि वह थोड़ा सचेत हो गये हैं और इस बार उसी वक्‍त श्रोताओं की ओर से आने वाले सवालों पर उन्‍होंने कोई जवाब देने की कोशिश नहीं की। इसी चक्‍कर में उनकी सबसे ज्‍यादा मट्टी पलीद हो रही थी।
इन सबके बावजूद, पाण्‍डे जी ने 14 मिनट जो विषय पर बात की है, एक बार फिर से उसमें ही इतनी मूर्खताएं घुसेड़ी हैं कि हम अभी भी ताज्‍जुब में हैं कि इस व्‍यक्ति ने ग्रेजुएशन भी कैसे पास किया। लेकिन फिर हमें एडगर एलन पो की यह बात याद आई, ''गलत धारणाओं को विकसित करने के मामले में मूर्खता एक प्रतिभा होती है।'' मानना पड़ेगा कि इस विशिष्‍ट अर्थ में पाण्‍डे जी निस्‍सन्‍देह रूप से एक प्रतिभा हैं। आइये उदाहरणों समेत देखते हैं।
शुरू में ही पाण्‍डे जी आत्‍ममुग्‍धता का जोरदार प्रदर्शन करते हैं। वह कहते हैं कि मैं माफी मांगता हूं कि इस बार वीडियो बनाने में लम्‍बा गैप हो गया, अब से हफ्ते में एक बना ही दूंगा, शनिवार की रात को डाल दिया करूंगा। देरी के तीन कारण बताते हैं: झाडू-पोंछा, नौकरी, और गांधी पर उनकी आने वाली पुस्‍तक! फिर बोलते हैं कि गांधी की पुस्‍तक में बस वह गांधी की हत्‍या के बारे में लिखने वाले थे लेकिन चूंकि उन्‍हें कुछ ''आर्काइल'' (आर्काइवल क्‍या?) मिल गया है, इसलिए अब वह इस पर भी लिख रहे हैं कि कोई किसी के विचारों से इतना आतंकित कैसे हो जाता है कि उसकी हत्‍या कर देता है! फिर वह बोलते हैं कि इस पुस्‍तक का एक ''खण्‍ड'' उन्‍होंने पिछली रात ही पूरा किया और उसका एक हिस्‍सा फेसबुक पर पोस्‍ट भी किया था, जिसे बहुत से लोगों पढ़ा और शेयर किया!
इतने आत्‍म-प्रचार और आत्‍मअंगमर्दन के बाद, पाण्‍डे जी बोलते हैं कि उनके वीडियो में हफ्ते-दस दिन का फर्क पड़ना ठीक ही है क्‍योंकि ''मैं बहुत से किताबें बताता हूं''; तो इस गैप में लोग इन किताबों को देख सकते हैं। लेकिन हमने देखा कि पाण्‍डे जी किताबों का नाम बताने में कल्‍पनाशक्ति का ज्‍यादा प्रयोग करते हैं। इनके कहे पर पता नहीं कितने बेचारे युवा के. दामोदरन की ''भारतीय दर्शन परम्‍परा'' ढूंढ रहे होंगे; इनके पहले स्‍टडी सर्किल और तीसरे स्‍टडी सर्किल के बीच न जाने कितने श्रोता के. दामोदरन की 'भारतीय दर्शन में क्‍या जीवंत है और क्‍या मृत'' ढूंढ रहे होंगे (यह किताब देवी प्रसाद चट्टोपाध्‍याय की है; इस गलती को पाण्‍डे जी ने बाद में किसी के बताने पर ठीक किया), इसी प्रकार जो लोग पांचवा वीडियो देखेंगे, वे पाण्‍डे जी के बताने पर हावर्ड जिन की पुस्‍तक ''ए पीपल्‍स हिस्‍ट्री ऑफ दि वर्ल्‍ड'' ढूंढने लगेंगे और न जाने कितना परेशान होंगे (गौर करें, कि यह पुस्‍तक क्रिस हरमन की है, न कि हावर्ड जिन की; हावर्ड जिन की पुस्‍तक है 'ए पीपल्‍स हिस्‍ट्री ऑफ यूनाईटेड स्‍टेट्स')। लेकिन इस मूर्ख आदमी की धृष्‍टता और बेशर्मी देखिये। यह शेखी बघार रहा है कि उसके वीडियो में 7-10 दिनों का गैप रहना ठीक ही है क्‍योंकि वह बहुत-सी पुस्‍तकों के नाम बताता है, जिन्‍हें इस गैप में तमाम युवा श्रोता ढूंढ और पढ़ सकते हैं!
आगे पाण्‍डे जी हम पर हमला करते हुए बोलते हैं कि मैं कोई परीक्षा तो दे नही रहा हूं और वैसे भी मेरा भारतीय दर्शन पर बात करने का एक विशेष उद्देश्‍य है, वह मेरी विशेषज्ञता का क्षेत्र नहीं है, उसके बारे में तो मैं सरल शब्‍दों में बता रहा हूं, एक-एक भारतीय दर्शन के बारे में नहीं बता रहा हूं; मेरा मकसद तो बस यह दिखलाना है कि भारतीय दर्शन में एक भौतिकवादी धारा रही है; मेरा मूल मकसद तो मार्क्‍सवाद के बुनियादी सिद्धान्‍त बताना है। लेकिन कुछ गुरूघण्‍टाल लोग (यानी हम लोग!) जटिल शब्‍दों में, मार्क्‍स व हेगेल के उद्धरणों के साथ अपने ज्ञान से आतंकित कर देते हैं, यह मार्क्‍सवादी तरीका नहीं है, जनता को शिक्षित करने का तरीका नहीं है, बस उसे आतंकित करने का तरीका है। मैंने जो कुछ जाना है वह पढ़कर और वरिष्‍ठ लोगों से सुनकर जिन्‍होंने पढ़ा है, उससे जाना है। मुझसे कोई गलती हो जाये तो आप लोग भी मुझे बताइये। आज बौद्ध दर्शन के बारे में कुछ छूट जाये या गलती हो जाये, तो प्रमोद शाह से मैं अपील करूंगा कि वह मुझे विस्‍तार से बताएं कि क्‍या गलती हुई है!
इतनी सी बात में इस शख्‍स ने कितने झूठ बोले हैं और कितनी लफ्फाजियां की हैं, आइये देखते हैं। पहली बात तो यह है कि यदि आपने मार्क्‍सवाद के बुनियादी सिद्धान्‍तों से हिन्‍दी जगत के श्रोताओं को परिचित कराने का उत्‍तरदायित्‍व उठाया है, तो आपको निश्चित तौर पर इसे एक परीक्षा के तौर पर लेना चाहिए। रोज आप रात्रि भोज करके खट्टी डकारों के साथ बकवास नहीं पेल सकते हैं; थोड़ा-पढ़ लिखकर और तैयारी करके यह कार्य करिये। जब तक आप अपने मन में मूर्खतापूर्ण बात सोचते हैं, तो वह आपका मानवाधिकार है। लेकिन आप फेसबुक पर अपना बीबीसी (बुड़बक ब्रॉडकास्टिंग कारपोरेशन) चालू करके अज्ञान का अंधकार फैलाएंगे, तो आपकी असलियत तो लोगों के सामने लानी ही पड़ेगी। पाण्‍डे जी कहते हैं कि भारतीय दर्शन उनका क्षेत्र नहीं है और उसमें तो बस वह यह दिखलाना चाहते हैं कि इसमें भी एक भौतिकवादी परम्‍परा रही है, उसके एक-एक दर्शन के बारे में बताना मेरा उद्देश्‍य नहीं है। किसी ने एक-एक दर्शन के बारे में न बताने के लिए आपकी आलोचना की भी नहीं थी, पाण्‍डे जी! क्‍यों बातों को घुमा रहे हैं। आपको संक्षेप में यह बताने का पूरा अधिकार है कि भारतीय दर्शन में भौतिकवाद की एक धारा रही है। लेकिन सही तो बताइये! चार्वाक दर्शन को आपने गुप्‍त काल में पहुंचा दिया! बौद्ध दर्शन को भी सामन्‍तवाद के दौर में पहुंचा दिया! आपके अनुसार शूद्र इसलिए शूद्र बने क्‍योंकि वे बौद्धिक तौर पर अन्‍य तीन वर्णों से पीछे थे (हालांकि उनके शोषण-दमन पर आपको आपत्ति है!), अस्‍पृश्‍यता और दलित जातियों के उद्भव को आपने वर्ण व्‍यवस्‍था के उद्भव के काल में पहुंचा दिया, वर्ण व्‍यवस्‍था को ब्राह्मणों द्वारा रचा गया ''किस्‍सा'' बता दिया, कबीलाई गणराज्‍यों को आपने पहली सदी ईसवी में पहुंचा दिया, गुप्‍त साम्राज्‍य को भी पहली सदी ईसवी में पहुंचा दिया! इसलिए मूल बात आपके द्वारा भारतीय दर्शन के बारे में पर्याप्‍त विस्‍तार में जाने की नहीं थी; मूल बात यह थी कि आप संक्षेप में जो बता रहे हैं, वह चुगदपने और मूर्खता से भरा हुआ है और यह दिखलाता है कि आपकी इतनी भी औकात नहीं है कि आप संक्षेप में हिन्‍दी जगत के श्रोताओं को यह दिखला सकें कि भारतीय दर्शन में भौतिकवाद की एक परम्‍परा थी।
इसके बाद पाण्‍डे जी बोलते हैं कि उनका बुनियादी क्षेत्र तो मार्क्‍सवाद के सिद्धान्‍तों से लोगों को परिचित कराना है। इस पर हमारी हंसी ही छूट गयी। जिस आदमी को यह लगता है कि पूंजीवादी समाज में मज़दूर को ''मेहनत का पूरा मोल नहीं मिलता'' और यही पूंजीवादी शोषण का कारण है, जिस आदमी को यह नहीं पता कि श्रमशक्ति का क्रय-विक्रय होता है, श्रम का नहीं; जिस आदमी को यह न पता हो कि मज़दूरी किसे कहते हैं और वह दावा करता है कि चार्वाकों के दौर में वैश्‍य कारखाने लगाते थे और उसमें शूद्र मज़दूरों को ''कम मज़दूरी'' मिलती थी, जिस आदमी को यह न पता हो कि ऐतिहासिक भौतिकवादी सिद्धान्‍त को केवल वर्ग संघर्ष के सिद्धान्‍त में अपचयित नहीं किया जा सकता है, वह यह दावा कर रहा है कि मार्क्‍सवाद के बुनियादी सिद्धान्‍तों से परिचित कराना उसकी विशेषज्ञता का क्षेत्र है? मोदी जी को उद्धृत करके कहें तो हिप्‍पोक्रेसी की भी कोई सीमा होती है! विडम्‍बना ने अगर यह बातें सुन ली होतीं, तो निश्चित ही आत्‍महत्‍या कर लेती!
लेकिन इसके बावजूद पाण्‍डे जी इस बात पर नाराज़ हैं कि हमने उद्धरणों, सन्‍दर्भों व पुस्‍तकों का सही नाम पेश करते हुए उनकी आलोचना क्‍यों की! और चूंकि पाण्‍डे जी इससे आतंकित हैं, इसलिए वह हम पर आरोप लगाते हैं कि हम बौद्धिक आतंकवादी हैं! फिर वह कहते हैं कि मैं तो ज्ञान के ''प्‍यार दो-प्‍यार लो'' वाले सिद्धान्‍त में यकीन करता हूं, मुझसे गलती भी हो सकती है, तो मुझे ठीक कर दिया जाय, मैंने तो किताबों से और कुछ वरिष्‍ठ साथियों से सीखा है। इसी में तो हमारी दिलचस्‍पी है कि वे किताबें और वे वरिष्‍ठ लोग कौन हैं, जिन्‍हें पाण्‍डे जी अपना गुरू मानते हैं! ऐसी बेहूदा, सड़कछाप और मूर्खतापूर्ण शिक्षा कौन-सी पुस्‍तकें पढ़कर इस आदमी को मिली हैं, क्‍योंकि यह तो किताबों का नाम भी (एक-दो बार अपवादस्‍वरूप नहीं, बल्कि नियमत:) गलत बताता है?! जिन्‍होंने भी हमारे द्वारा पेश पाण्‍डे की आलोचना की पिछली चार किश्‍तों को पढ़ा है, वे जानते हैं कि न तो हमने जटिल शब्‍दों का इस्‍तेमाल किया है (वैसे जटिल और सरल बेहद सापेक्षिक शब्‍द हैं, जैसे पाण्‍डे के लिए क्‍या जटिल और क्‍या सरल है, यह बताना बहुत मुश्किल है) और न ही हमने आम पाठकों को आतंकित किया है, हां, पाण्‍डे जरूर आतंकित हो गया है, और उसे होना भी चाहिए। लेकिन पाण्‍डे जी यह भी झूठ बोल रहे हैं कि उनके श्रोता जब उनका दुरुस्‍त करते हैं तो वह अपनी गलती ठीक कर लेते हैं। वास्‍तव में, पाण्‍डे झूठ और कठदलीली पर उतर आता है। उसे सिर्फ मुरीदी चाहिए, कोई आलोचना करे तो उसके खिलाफ कुत्‍साप्रचार, झूठ की आंधी चला देता है। आलोचना तो छोड़ दीजिये यदि कोई तथ्‍यात्‍मक भूल भी इंगित कर दे, तो उसके सामने कठदलीली पर उतर आता है। आइये मिसाल देखते हैं। इसके यूट्यूब वीडियो संख्‍या पांच के नीचे एक श्रोता ने पाण्‍डे को दुरुस्‍त करते हुए बताया है कि बौद्ध दर्शन या चार्वाक दर्शन सामन्‍ती काल में नहीं पैदा हुए थे, सामन्‍ती काल से काफी पहले ही पैदा हो चुके थे। इस श्रोता ने स्‍वयं सामन्‍तवाद के पैदा होने का दौर थोड़ा अधिक आगे किया है, लेकिन उसकी टिप्‍पणी सही है। जब इस श्रोता को पाण्‍डे ने कहा कि उसने ऐसा नहीं बोला है, तो श्रोता ने तथ्‍य समेत दिखलाया कि पाण्‍डे ने वास्‍तव में ऐसा बोला है। फिर पाण्‍डे ने क्‍या जवाब दिया? ''असहमत''! यह है पाण्‍डे का तरीका। जब इसे कोई इसकी एकदम चुगदपने वाली गलती भी आंख में उंगली कोचकर बताता है, तो भी यह झूठ बोलता है कि उसने तो ऐसा कुछ कहा ही नहीं, फिर उसे यह साबित करके दिखलाया जाता है कि उसने कहा है, तो वह कहता है: ''असहमत''। यह है पाण्‍डे की विनम्रता की असलियत। इसी प्रकार इसके पहले वीडियो के नीचे ही एक अन्‍य श्रोता ने हमारे ही समान पाण्‍डे जी को गणना करके समझाया कि पूंजी के तीनों खण्‍ड 7 से 10 दिनों में पढ़ी नहीं जा सकती है, तो पाण्‍डे इस से ही मुकर गया कि उसने ऐसा बोला है। पाण्‍डे ने जवाब दिया है कि मैं तो यही कह रहा था कि एक हफ्ते में नहीं पढ़ी जा सकती है! जबकि सच यह है कि पाण्‍डे ने यही बोला था कि एक हफ्ते में उसने पहली बार पढ़ी थी, हालांकि समझी नहीं थी। श्रोता ने प्रश्‍न केवल पढ़ने पर उठाया था, समझने पर नहीं और उसका यही मूल तर्क था कि एक हफ्ते में नहीं पढ़ी जा सकती है। लेकिन पाण्‍डे यह मानने की बजाय कि उसने झूठ बोला था, गोलमाल कर रहा है।
लुब्‍बेलुबाब यह कि पाण्‍डे जी फिर से झूठ बोल रहे हैं कि वह बताने पर गलती ठीक कर लेते हैं। वह बताते पर गलदोदई और सीनाजोरी पर आमादा हो जाते हैं। इसलिए यह विनम्रता नकली है और इस वीडियो में अपने आपको विनम्र व गलतियां मानने के प्रति 'ओपेन' दिखाने का पाण्‍डे का मकसद यह है कि उसके द्वारा मार्क्‍सवाद के और भारतीय दर्शन के इतिहास के गुलगपाड़े की जो फजीहत पिछले कुछ दिनों में हुई है, उससे वह सचेत हो गया है और नौटंकी कर रहा है।
आखिरी बात, विवाद का मूल मुद्दा सरल और जटिल बात कभी थी ही नहीं। पाण्‍डे जी जानबूझकर यह 'फॉल्‍स बाइनरी' पैदा कर रहे हैं। मूल मुद्दा था सही और गलत का। पाण्‍डे इस पर चुप है कि पिछले चार वीडियोज़ में उसने उन विषयों पर कैसी-कैसी मूर्खतापूर्ण, गलत, अज्ञानतापूर्ण बातें कहीं हैं, किस प्रकार उसे उन विषयों के बारे में बुनियादी तथ्‍यों की भी कोई जानकारी नहीं है जिन पर स्‍टडी सर्किल लेने वह बैठा है, यानी मार्क्‍सवाद के बुनियादी सिद्धान्‍त और भारतीय दर्शन में भौतिकवादी परम्‍परा का एक संक्षिप्‍त परिचय। इनके संक्षिप्‍त या सरल होने पर कोई सवाल ही नहीं है। सवाल है इनके सही और गलत होने का। अगर ये परिचय गलत हैं, तो इसकी आलोचना सन्‍दर्भों और तथ्‍यों समेत पेश करना एक मार्क्‍सवादी समूह होने के नाते हमारा कर्तव्‍य था और हम उसी का निर्वाह कर रहे हैं।
आगे बढ़ते हैं।
पाण्‍डे जी बोलते हैं कि मैं ज्ञान अर्जन के दोरफा तरीके को सही मानता हूं। यह दिखलाता है कि पाण्‍डे जी आत्‍मविश्‍वास खो बैठे हैं और अब बस अहम्‍मन्‍यता में स्‍टडी सर्किल चलाये जा रहे हैं! पहले तो यह अपने स्‍टडी सर्किल को गलती से क्‍लास बोल गये थे, और अब अचानक इन्‍हें दो-तरफा ज्ञान अर्जन का बोधिज्ञान प्राप्‍त हो गया है! सच्‍चाई यह है कि सम्‍भवत: पाण्‍डे को भी अपने मस्तिष्‍क के आकार का आभास हो गया है और उसे पता है कि वह लाख मेहनत करके, तैयारी करके बोलने आये, कुछ न कुछ बेवकूफी की बात ज़रूर ही बोलेगा। इसीलिए यह भूमिका बनाई जा रही है कि ''भाइयों, ज्ञान लो-ज्ञान दो। अगर मैं गलत बोलूं तो आप मुझे ठीक कर दीजियेगा।'' यह बकवास पाण्‍डे के आत्‍ममुग्‍ध, अहम्‍मन्‍य और आत्‍मअंगमर्दन की पूरी शैली से मेल नहीं खाते, बस ये शब्‍द प्रतीत होते हैं, जो पाण्‍डे ने अपनी रगड़ाई बाद जोड़ने की आवश्‍यकता महसूस की है। सभी समझदार लोग यह पहले से ही समझ रहे हैं। दोतरफा चर्चा ही करनी है, तो ऑनलाइन चर्चा का आयोजन करो, अन्‍य मार्क्‍सवाद के जानकार व्‍यक्तियों को भी साथ में बिठा लो, ऐसा करोगे तो वे वहीं तुम्‍हारी मूर्खताओं का खण्‍डन कर देंगे। पहले तो पाण्‍डे जी ''मार्क्‍सवाद के अध्‍ययन का माहौल बनाऊंगा'', ''मार्क्‍सवाद मैंने काफी पढ़ा हुआ है'', ''पूंजी दो बार पढ़ रखी है'', ''रोज़ा लक्‍जेम्‍बर्ग की सम्‍पूर्ण रचनाएं अंग्रेजी में पढ़ी हैं'', आदि जैसे झूठे और घमण्‍ड भरे दावे कर रहे थे, लेकिन अब वह कह रहे हैं कि माहौल मैं नहीं बनाऊंगा, कुछ मैं बनाऊंगा, कुछ आप लोग बनाइये, जहां मैं बनाने में गलती कर दूं, वहां आप बना दीजिये। फिर पाण्‍डे जी बोलते हैं कि मैं जिनको गुरू मानता हूं, उन्‍होंने यही शैली अपनाई है और मैं भी इसे ही अपनाता है। मतलब इसके जो भी गुरू हैं, वे भी इसी के समान हैं! वैसे, ये सब नयी बातें हैं। शुरुआत में तो पाण्‍डे ने बहुत अलग प्रकार की बातें बताईं थीं। जाहिर है कि पाण्‍डे डर कर लन्‍तरानी हांक रहा है।
पाण्‍डे बोलता है कि मैं शिक्षक व विद्यार्थी वाले रिश्‍ते को नहीं मानता, बल्कि साथियों वाले रिश्‍ते को मानता हूं। लेकिन सच्‍चाई यह है कि किसी को शिक्षक मानने और उससे सीखने में कोई दिक्‍कत नहीं होती। शिक्षण की प्रक्रिया में जनवाद के साथ एक अनुशासन और केन्‍द्रीयता भी होती है। इसी वजह से मार्क्‍स, एंगेल्‍स व लेनिन ने अध्‍ययन करने और विनम्रता से विज्ञान को सीखने पर इतना बल दिया है। एंगेल्‍स ने यहां तक कहा है कि मार्क्‍सवाद एक विज्ञान है और उसे उसी प्रकार सीखा जाना चाहिए जैसे किसी विज्ञान को सीखा जाता है, यानी मेहनत, अनुशासन और विनम्रता के साथ। निश्चित तौर पर, कॉमरेड्स साथ मिलकर भी सीखते हैं, लेकिन वे उन कॉमरेड्स से विद्यार्थियों के समान अनुशासन व विनम्रता के साथ भी सीखते हैं, जो मार्क्‍सवाद के विज्ञान में अधिक पारंगत होते हैं और उन्‍हें अपना शिक्षक भी मानते हैं। यह अपने आप में कोई गैर-जनवादी चीज़ नहीं है। जनवाद का अर्थ हर मूर्ख की राय को सुनने और उसे एप्रीशियेट करने की बाध्‍यता नहीं है। समझदार लोगों का भी जनवादी अधिकार है कि वे मूर्खों की बातों की आलोचना करें और उसकी मूर्खता को अनावृत्‍त करें। ये ''सारे साथी साथ मिलकर सीखेंगे'' की बात पाण्‍डे इसलिए कर रहा है कि वह अपनी ही भावी मूर्खताओं के प्रति सशंकित और भयभीत है। इसने जानबूझकर एक ''भूल चूक लेनी देनी'' का स्टिकर अपनी ''मार्क्‍सवादी स्‍टडी सर्किल'' सड़े हुए माल के डब्‍बे की रसीद पर चिपका दी है।
असुरक्षा और भय महसूस कर रहे पाण्‍डे जी अपने भविष्‍य को सुरक्षित करने के लिए की गयी इतनी हवाबाज़ी के बाद मुख्‍य चर्चा शुरू करते हैं। हमें वह शुरू में ही बता देते हैं कि उनका भय और असुरक्षा वाजिब है। आइये देखते हैं कैसे। पाण्‍डे जी लाल बहादुर वर्मा की पुस्‍तक 'भारत की जनकथा' का नाम लेते हैं और कहते हैं कि अगर वह इसका अनुवाद करते तो वह 'पीपुल्‍स हिस्‍ट्री ऑफ इण्डिया' करते। वैसे तो हिन्‍दी में भी यह नाम किसी इतिहास की पुस्‍तक के नाम के तौर पर बहुत उपयुक्‍त नहीं है, हालांकि इतिहास की साहित्यिक प्रस्‍तुति के लिए लिखी गयी पुस्‍तक के लिए यह नाम चल सकता है। लेकिन उस सूरत में उसका अनुवाद 'पीपुल्‍स हिस्‍ट्री' नहीं होना चाहिए, लेकिन इसे हम अनुवादक की स्‍वतन्‍त्रता के तौर पर मान लेते हैं, क्‍योंकि इस पर अलग-अलग व्‍यक्तियों की अलग-अलग राय हो सकती है। लेकिन असली मोती तो पाण्‍डे जी इसके बाद लाते हैं। वह कहते हैं कि हावर्ड जिन की पुस्‍तक 'पीपल्‍स हिस्‍ट्री ऑफ दि वर्ल्‍ड' तो आपने पढ़ ही रखी होगी! अब देखिये एक ही वाक्‍य में इस आदमी ने नाजानकारी, झूठ सब घुसा दिया है। पहली बात तो इसे पता नहीं है कि 'ए पीपल्‍स हिस्‍ट्री ऑफ दि वर्ल्‍ड' हावर्ड जिन की पुस्‍तक नहीं है, क्रिस हरमन की पुस्‍तक है। हावर्ड जिन की पुस्‍तक का नाम है 'ए पीपल्‍स हिस्‍ट्री ऑफ दि यूनाईटेड स्‍टेट्स'। दूसरी बात, इसने ऐसे बोला है कि इसने यह किताब पढ़ रखी है। जब हावर्ड जिन की कोई ऐसी पुस्‍तक है ही नहीं तो पाण्‍डे ने उसे पढ़ा कैसे होगा? जाहिर है, पाण्‍डे ने फिर से झूठ बोला है!
इसके आगे पाण्‍डेप्रो. लाल बहादुर वर्मा की उपरोक्‍त पुस्‍तक से एक उद्धरण पेश करता है, जो कि यह है: ''ऋग्‍वेद में भौतिक सुखों, भौतिक गतिविधियों की बातें हैं, सभी देवता भौतिक शक्तियों की प्रतिनिधि हैं, महाभारत भौतिक शक्ति के लिए संघर्ष की बात करता है, वगैरा, इस प्रकार इन सभी ग्रन्‍थों में भौतिकता की ही बात है, भारतीय समाज धार्मिक समाज दिखाई देता है, लेकिन है नहीं। धर्म अपने आप में एक भौतिक परिघटना है, इसमें पराभौतिक तत्‍व बहुत कम हैं।'' पहली बात तो इस उद्धरण पर ही है। यह एक सटीक बात नहीं है। जिस रूप और अर्थ में धर्म एक भौतिक परिघटना है, उस रूप में उसमें कोई भी पराभौतिक तत्‍व नहीं है। थोड़ा-ज्‍यादा पराभौतिक होने की कोई बात ही नहीं है। धर्म एक भौतिक परिघटना है और पूर्ण रूप से भौतिक परिघटना है। और धर्म की विचारधारात्‍मक निर्मितियां भाववादी होती हैं, पराभौतिक अस्तित्‍व या सत्‍ता की बात करती हैं, उन निर्मितियों में अपने आप में कुछ भौतिकवादी नहीं है, हालांकि हम उन्‍हें डीकंस्‍ट्रक्‍टकरके यह देख सकते हैं कि कौन-सी निर्मितियां किन भौतिक सन्‍दर्भों में निर्मित हुई हैं, और वे जैसी हैं, वैसी ही क्‍यों हैं। यानी, जिस रूप में धार्मिक ग्रन्‍थों में टोने-टोटके, कर्मकाण्‍डों और भाववादी सत्‍ता की बात है, उसमें भौतिकवादी कुछ नहीं है, हालांकि इन निर्मितियों का एक भौतिक आधार है। चूंकि पाण्‍डे जी आगे प्रो. वर्मा की पुस्‍तक में उद्धृत 'ऋग्‍वेद' के एक श्‍लोक को पढ़ते हैं इसलिए यह जान लेना आवश्‍यक है कि स्‍वयं 'ऋग्‍वेद' को दो हिस्‍सों में बांटा जा सकता है, एक आरंभिक ऋग्‍वेद और दूसरा बाद के दौर के श्‍लोक व ऋचाएं; असल में, 'पुरुषसूक्‍त', जिसमें कि वर्ण व्‍यवस्‍था का पहली बार जिक्र किया गया है, बाद के दौर का है। उसकी निर्मिति भाववादी है, हालांकि वह एक भौतिक पदानुक्रम के वैधीकरण के लिए बनाई गई थी। 'ऋग्‍वेद' के प्राचीनतम हिस्‍से ऐसे भी हैं, जिनमें एक आद्य-भौतिकवाद को स्‍पष्‍ट रूप में देखा जा सकता है। उसकी निर्मितियां भी अनगढ़ और आदिम हो सकती हैं, लेकिन भाववादी नहीं है। जैसे-जैसे वैदिक समाज में वर्ग विभाजन सुदृढ़ होता गया, वैसे-वैसे उसके वैधीकरण के लिए विचारधाराएं भी निर्मित होती गयीं और वैसे-वैसे में उसमें पराभौतिक सत्‍ता और ईश्‍वर आदि की बातें भी आने लगीं। खैर, ऋग्‍वेद के एक श्‍लोक को प्रो. वर्मा ने कोट किया है, उसे पाण्‍डे जी पढ़ते हैं। उसमें ईश्‍वर से सारी भौतिक चीजें मांगी गयी हैं। इसके आधार पर प्रो. वर्मा कहते हैं कि हमारा समाज बेशक धार्मिक व आध्‍यात्मिक समाज दिखता है लेकिन यह भौतिक सुख-सुविधाओं का आकांक्षी समाज रहा है। यह नतीजा भी सटीक नहीं है। यदि धर्म में केवल आध्‍यात्मिक चीज़ों जैसे कि मोक्ष, आत्मिक शान्ति आदि की कामना की गयी हो, तो समाज को भाववादी मानना और अगर भौतिक सुखों की कामना की गयी हो, तो समाज को भौतिकवादी मानना, दो चीज़ों को गड्डमड्ड कर देने के समान है। धर्म भाववादी है क्‍योंकि उसका विश्‍व दृष्टिकोण भाववादी है। यदि समाज में उसका प्रभाव है और उसकी वजह से लोग भौतिक सुखों के ही लिए ईश्‍वर की स्‍तुति करते हैं, कर्मकाण्‍ड करते हैं, इत्‍यादि तो इससे उस समाज का भौतिकवादी चरित्र नहीं, बल्कि भाववादी चरित्र ही प्रकट होता है। भाववादी से भाववादी लोग अपने भौतिक अस्तित्‍व को तो बनाए रखने की चाहत रखते ही हैं, तो इससे क्‍या वह भौतिकवादी माने जाएंगे? उसके लिए वे भौतिक प्रयास भी कर सकते हैं, तो क्‍या वे भौतिकवादी माने जाएंगे? नहीं। कोई समाज वैसे भी अपने आप में भौतिकवादी या भाववादी नहीं होता है। किसी समाज में भोंड़े भौतिकवाद का अधिक असर हो सकता है तो किसी समाज में भाववाद का अधिक प्रभाव हो सकता है। जहां तक विश्‍व दृष्टिकोण का प्रश्‍न है, तो इस सच्‍चाई से इंकार नहीं किया जा सकता है कि जिन समाजों में पुनर्जागरण, धार्मिक सुधार आन्‍दोलन, प्रबोधन, वैज्ञानिक क्रान्तियां और जनवादी क्रान्तियां नहीं हुईं हैं, उनमें धर्म का प्रभाव अधिक होता है, उसमें अपने जीविकोपार्जन के लिए एकदम ठोस भौतिक गतिविधि में लगे लोग, सुख-सम्‍पत्ति की इच्‍छा रखने और उसे पूरा करने के लिए भौतिक प्रयास करने वाले लोग भी अन्‍धविश्‍वासों, टोने-टोटके का शिकार होते हैं, ताबीज़ बांधते हैं, किसी बाबा की फोटो लगाते हैं, आदि। उनका विश्‍व दृष्टिकोण ये सारी भौतिक चीज़ें करने के बावजूद भाववादी ही होता है। अगर आज कोई 'सुख-सम्‍पत्ति घर आवे' भजन गाता है, और इस रूप में भौतिक सुखों की कामना करता है, तो वह उसके भौतिकवाद को नहीं दिखलाता है। केवल सन्‍यास, मोक्ष, निर्वाण और आत्मिक शान्ति की कामना करने से कोई भाववादी नहीं होता। न ही कोई समाज इस वजह से भौतिकवादी या भाववादी माना जायेगा कि वह भौतिक सुखों की कामना रखता है या नहीं। इसलिए प्रो. वर्मा की व्‍याख्‍या सही दिशा में जाना तो चाहती है, लेकिन अतिसरलीकरण करने के प्रयासों के कारण सटीकता नहीं रखती।
लेकिन पाण्‍डे जी इससे कहीं ज्‍यादा आगे जाते हैं! पाण्‍डे जी इस गलत व्‍याख्‍या पर अपनी मूर्खता की चाशनी डाले बिना आपको अपने सड़े हुए बौद्धिक दही-भल्‍ले खिलाए बिना कैसे मानेंगे! पाण्‍डे ने इसका नतीजा यह निकाला है कि चार वर्णों की व्‍यवस्‍था में आध्‍या‍त्मिकता का डोज़ तो जनता को दिया गया लेकिन ब्राहमण व क्षत्रिय अपने लिए भौतिक सुख जुटाते रहे, जैसे पुरानी कहानियों में हम सुनते हैं कि सोने का महल था, हाथी पर चलते हैं, 50 लाख की सेना है, सोने के गद्दे (??) पर सोते हैं, तो ये सब भौतिक सुख ही तो है। तो राजनय वर्ग तो सुखसुविधा में जीता था, उसको हासिल करने की फिराक में रहता था और शूद्रों को सुखसुविधा उनके लिए जुटाने का काम दे दिया गया था। उनको एक बूटी खिला दी गयी थी कि इस जनम में यह सब करोगे तो अगले जनम में खुशी मिलेगी। और कहा जाता है कि समाज धार्मिक है! पाण्‍डे जी जिस तर्क को आगे बढ़ा रहे हैं उसके अनुसार ब्राह्मण व क्षत्रिय तो भौतिक सुखों को जुटा रहे थे, तो वह भौतिकवादी थे, और एक षड्यंत्र रचकर उन्‍होंने बौद्धिकता का डोज़ आम शूद्रों व अन्‍य दमित लोगों को दे दिया, वे आध्‍यात्मिकता में फंस गये, तो वे भाववादी हो गये! कैसा मूर्खतापूर्ण तर्क है। पाण्‍डे जी को लगता है कि भौतिक सुख और सम्‍पत्ति के पीछे भागने वाले ब्राह्मण और क्षत्रिय भौतिकवादी हैं, जबकि सच्‍चाई यह है कि वे भी भाववादी ही थे, टोने-टोटके और यज्ञ इत्‍यादि करते थे। तमाम राजा युद्ध में विजय के लिए, पुत्र प्राप्ति के लिए, सूखे में बारिश आदि के लिए सैंकड़ों गायों व जानवरों की बलि देकर यज्ञ करवाया करते थे; यही बात ब्राह्मण शासकों पर भी लागू होती है। भाववादी नज़रिया कोई षड्यंत्र नहीं होता। शासक वर्ग के बुद्धिजीवी आम तौर पर इन विचारधाराओं को षड्यंत्र के रूप में नहीं रचते हैं, बल्कि उनके सामूहिक वर्ग हित स्‍वयं उन्‍हें ऐसी विचारधाराओं की रचना की ओर ले जाते हैं। इसके बारे में एंगेल्‍स की यह उक्ति विशेष तौर पर ध्‍यान देने योग्‍य है:
“यह सही है कि विचारधारा ऐसी प्रक्रिया है जिसे तथाकथित विचारक सचेतन रूप से पूरा करता है, लेकिन वह एक मिथ्‍या चेतना से ऐसा करता है। उसे उत्‍प्रेरित करने वाली वास्‍तविक प्रेरक शक्तियाँ उसे अज्ञात रहती हैं; अन्‍यथा यह विचारधारात्‍मक प्रक्रिया नहीं रह जाएगी। इसलिए वह मिथ्‍या या प्रतीत होने वाली प्रेरक शक्तियों की कल्‍पना करता है। चूँकि यह एक विचार-प्रक्रिया है; वह इसके रूप और अंतर्वस्‍तु दोनों को विशुद्ध चिंतन से नि:सृत करता है, चाहे स्‍वयं के या अपने पूर्ववर्तियों के। वह केवल चिंतन सामग्री के साथ काम करता है, जिसे वह चिंतन के उत्‍पाद के रूप में बिना किसी परीक्षण के स्‍वीकार करता है, और चिंतन के अधिक सुदूरवर्ती स्‍वतंत्र स्रोत के लिए और अन्‍वेषण नहीं करता; बेशक उसे ऐसा ही लगता है, कारण कि, चूँकि समस्‍त क्रियाएँ विचार के माध्‍यम द्वारा संभव बनायी जाती हैं, इसलिए उसे ऐसा लगता है कि अंतत: यह विचार पर आधारित है।” (एंगेल्‍स, मेहरिंग को पत्र, 14 जुलाई, 1893)
लेकिन चूंकि पाण्‍डे जी खुद हिन्‍दी जगत में अन्‍धकार युग लाने के षड्यंत्र में लगे हुए हैं, इसलिए उन्‍हें वर्ण व्‍यवस्‍था की रचना और अध्‍यात्‍मवाद/भाववाद, ये सब शासक वर्ग के षड्यंत्र लगते हैं। पाण्‍डे जी के इस पाण्डित्‍य पर हम पिछली किश्‍त में भी लिख चुके हैं, इसलिए उसे यहां दुहराना आवश्‍यक नहीं है। आगे बढ़ते हैं।
पाण्‍डे जी ऊपर की गयी मूर्खताओं के आधार पर प्रतीत्‍य समुत्‍पाद के नियम को अपनी तरह से लागू करते हुए पुरानी मूर्खताओं के कारण के प्रभाव के रूप में नयी-नयी मूर्खता को जन्‍म देते जाते हैं। वह कहते हैं कि इसीलिए मेरा मानना है कि मार्क्‍सवादी विश्‍लेषण सामाजिक-आर्थिक स्थितियों की जांच करता है और दर्शनों की भी जांच करता है। पाण्‍डे जी कहते हैं कि उनका मानना है कि अभी दो स्‍टडी सर्किल और लगेगी जिसमें वह भारतीय दर्शन पर बात करेंगे क्‍योंकि उन्‍होंने अपनी किताब में भी लिखा है कि अगर भारतीय दर्शन परम्‍परा से जोड़कर मार्क्‍सवाद को न समझा जाय तो फायदा नहीं है, बहुत से लोग मार्क्‍स, हेगेल वगैरा को कोट कर देंगे, किसी के समझ में कुछ नहीं आयेगा! वह कहते हैं कि 'मेरा ये तरीका नहीं है, मैंने अपनी किताब में भी यही कहा है और मेरी दूसरी किताब भी डेढ़ दो महीने में छप कर आ जायेगी, उसमें भी मैंने यही कहा है। मेरा तो यही तरीका है मैं ऐसे ही बताऊंगा, आप कमेण्‍ट्स में बताइये आपको सही लगता है या गलत तो मैं उस पर अपनी बात कहूंगा!'
मतलब पाण्‍डे जी के मस्तिष्‍क पर हमारी आलोचनाओं का इतना गहरा असर पड़ा है कि बार-बार हमें कोसते रहते हैं कि तुम लोग तो उद्धरण देते हो, जटिल भाषा में बात करते हो, कुछ समझ नहीं आता है, आतंक फैल जाता है, आदि। लेकिन पाण्‍डे जी को पता नहीं है कि एक आतंक मूर्खता और अज्ञान का भी होता है जो उन्‍होंने फैला रखा है! दूसरी बात, भारतीय दर्शन से जोड़कर मार्क्‍सवाद के बारे में बात करना तो बड़ी अच्‍छी बात है। लेकिन यह करने आना भी तो चाहिए। न तो पाण्‍डे को मार्क्‍सवाद के बारे में पता है (बस याद कर लीजिये कि अतिरिक्‍त मूल्‍य के बारे में, ऐतिहासिक और द्वन्‍द्वात्‍मक भौतिकवाद के बारे में, राजनीतिक अर्थशास्‍त्र के मूलभूत सिद्धान्‍तों के बारे में पाण्‍डे की क्‍या समझदारी है) और न ही भारतीय दर्शन के बारे में (बस याद कर लीजिये कि इस आदमी ने सामन्‍तवाद को चार्वाकों व बौद्ध दर्शन के युग में घुसा दिया, प्राचीन कबीलाई गणतंत्रों को शुंग वंश के काल में घुसा दिया और चरक को गुप्‍त काल में पहुंचा दिया था)। इसलिए पाण्‍डे जानबूझकर बात को सरल-जटिल, उद्धरण देकर आतंकित करने आदि पर घुमा रहा है। असलियत यह है कि हिन्‍दी जगत के सामने इस आदमी की वज्र मूर्खता, अज्ञान, झूठ, करियरवाद बेनकाब हो रहा है, तो यह बिलबिलाकर कभी इधर तो कभी उधर भाग रहा है और बातें बना रहा है।
आगे बढ़ते हैं।
मूल चर्चा पर वापस आते हुए पाण्‍डे जी बोलते हैं कि छठीं सदी ईसा पूर्व का दौर वह दौर था जबकि दुनिया में कई जगहों पर बौद्धिक उथल-पुथल हो रही थी। इसी समय कन्‍फ्यूशियस अपना व्‍यावहारिक धर्म दर्शन देते हैं, जोरोएस्ट्रियनिज्‍म की पुस्‍तक अवेस्‍ता जिन्‍दा (???) इसी वक्‍त आई, पेरीक्‍लीज ने यूनान में एक नयी सभ्‍यता का नींव रखी और भारत में बौद्ध व जैन दर्शन पैदा हुए। इसमें फिर पाण्‍डे जी ने अपना अद्भुत इतिहास ज्ञान पेश किया है। पहली बात तो यह है कि जोरोएस्‍टर या जरथुस्‍ट्र सम्‍भवत: छठीं सदी में पैदा हुआ था, लेकिन 'अवेस्‍ता' लम्‍बे समय तक मौखिक परम्‍परा के रूप में थी, यानी जरथुस्‍ट्र से भी पहले से। जरथुस्‍ट्र ने 'अवेस्‍ता' के टेक्‍स्‍ट्स के प्रमुख हिस्‍से यास्‍ना में पांच गाथाएं जोड़ी थीं। यह शब्‍द संस्‍कृत के 'गाथा' से ही आता है और इसे समझा जा सकता है क्‍योंकि संस्‍कृत इण्‍डो-इरानियन परिवार की भाषा है और इनका एक साझा इतिहास रहा है। खैर, मूल बात यह है कि 'अवेस्‍ता जेंद' (इसमें 'जेंद' का अर्थ है व्‍याख्‍या, इसलिए मूल ग्रंथ को आम तौर पर सिर्फ 'अवेस्‍ता' कह दिया जाता है) ससानियन साम्राज्‍य के दौर में यानी तीसरी सदी ईसवी से छठीं सदी ईसवी के बीच में लिखित रूप में आई, हालांकि यह पाण्‍डुलिपि खो गयी। लेकिन पहली बार लिखित रूप में यह तभी आयी। दूसरी बात, आज जो 'अवेस्‍ता' का संस्‍करण मौजूद है, वह 9वीं से 11वीं सदी ईसवी में तैयार हुआ था और माना जाता है कि यह मूल 'अवेस्‍ता' का मात्र एक चौथाई है। ऐसा लगता है कि पाण्‍डे जी फिर से छठी सदी ईसवी और छठी सदी ईसा पूर्व में भ्रमित हो गये हैं। जिस प्रकार राहुल ने 'दर्शन-दिग्‍दर्शन' लिखा था वैसे पाण्‍डे जी को 'भ्रम-दिग्‍भ्रम' नामक पुस्‍तक लिखनी चाहिए! आखिरी बात, इस अनपढ़ आदमी को इतना तक नहीं पता है कि पारसियों की पुस्‍तक का नाम 'अवेस्‍ता जेंद' है, 'अवेस्‍ता जिन्‍दा' नहीं! पाण्‍डे को सुन लिया होता तो अवेस्‍ता जिन्‍दा होती न होती, जरथुस्‍ट्र जरूर जिन्‍दा हो गये होते! लेकिन स्‍टडी सर्किल यह ज़रूर लेगा। पाण्‍डे कहता भी है कि मैं तो ऐसे ही स्‍टडी सर्किल लूंगा!
आगे बढ़ते हैं।
पाण्‍डे जी बोलते हैं कि बौद्ध धर्म कितना अहम था यह इससे पता चलता है कि एंगेल्‍स ने 'लुडविग फायरबाख' में बौद्ध धर्म को अलग से कोट किया है और वह लिखते हैं कि महान ऐतिहासिक मोड़ों के साथ आये धार्मिक परिवर्तनों के वाहक विश्‍व धर्मों में बौद्ध धर्म, इस्‍लाम और ईसाइयत के साथ शामिल है। गलत! एंगेल्‍स का उद्धरण पहले देख लीजिये:
“फ़ायरबाख़़ का यह दावा कि ”मानव युगों की पृथक पहचान केवल धार्मिक परिवर्तनों से ज़ाहिर होती है” सर्वथा असत्य है। महान ऐतिहासिक मोड़ केवल उन धार्मिक परिवर्तनों के साथ-साथ आये हैं, जो वर्तमान काल तक विद्यमान तीन विश्व धर्मों—बौद्ध, ईसाई तथा इस्लाम—से सम्बन्धित हैं।” (एंगेल्‍स, लुडविग फ़ायरबाख़ और क्‍लासिकी जर्मन दर्शन का अन्‍त)
पाण्‍डे जी ने इस पूरे उद्धरण की मनमानी व्‍याख्‍या कर दी है। पहली बात तो एंगेल्‍स ने यहां बौद्ध धर्म को उद्धृत नहीं किया है, बल्कि उसका जिक्र किया है। दूसरी बात, एंगेल्‍स यहां यह नहीं बता रहे हैं कि बौद्ध धर्म कितना महत्‍वपूर्ण है बल्कि फायरबाख की इस दलील का खण्‍डन कर रहे हैं कि हर-हमेशा महान ऐतिहासिक परिवर्तन धार्मिक परिवर्तन में अभिव्‍यक्‍त होते हैं और इस रूप में उन्‍हें धार्मिक परिवर्तनों से मापा या पहचाना जा सकता है। एंगेल्‍स बताते हैं कि ऐसा केवल इन तीन धर्मों के साथ हुआ है और इतिहास में बहुत से ऐसे प्रमाण हैं, जबकि ऐतिहासिक परिवर्तन धार्मिक परिवर्तन में अभिव्‍यक्‍त नहीं हुए हैं। एंगेल्‍स का मकसद यहां इन धर्मों का महत्‍वपूर्ण होने या न होने को रेखांकित करना नहीं है। पाण्‍डे जी का कहना है कि एंगेल्‍स के इस उद्धरण से यह साबित हो जाता है कि बौद्ध धर्म का महत्‍व केवल भारत की दार्शनिक परम्‍पराओं में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की दार्शनिक परम्‍पराओं के लिए है। ऐसा भी एंगेल्‍स यहां कुछ नहीं कह रहे हैं। मार्क्‍स व एंगेल्‍स ने 'विश्‍व धर्म' की अवधारणा का प्रयोग अपनी कई रचनाओं में किया है, जिनसे आम तौर पर उनका अर्थ था ऐसे धर्म जो कि समूची सभ्‍यताओं और उनमें राज्‍यसत्‍ता का आधार बने। इसका इन धर्मों के दर्शन का अन्‍तरराष्‍ट्रीय महत्‍व हो जाने या न होने का कोई रिश्‍ता नहीं है। लेकिन पाण्‍डे ने 'विश्‍व धर्म' शब्‍द पढ़ा तो न्‍याय-वैशेषिक दर्शन से आगे जाने हुए 'शब्‍द प्रमाण' और 'अनुमान प्रमाण' को मिश्रित कर 'शब्‍दानुमान प्रमाण' (अन्‍दाजिफिकेशन!) का तीर चला दिया!
फिर पाण्‍डे जी बताते हैं कि बुद्ध के जीवन का वह किस्‍सा कि कैसे उन्‍होंने विभिन्‍न प्रकार के दुख देखे और फिर बाद में इन दुखों पर चिन्‍तन करते हुए कैसे उन्‍हें बोधिज्ञान की प्राप्ति हुई, इतनी बड़ी ऐतिहासिक घटना, यानी बौद्ध दर्शन के उदय की व्‍याख्‍या नहीं कर सकता है। अब देखिये कि पाण्‍डे जी इस ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि के बारे में क्‍या ढेले फेंकते हैं। पाण्‍डे जी बोलते हैं कि यह वह दौर था जब कि ब्राह्मणों व उनके कर्मकाण्‍डों का बोलबाला था, राजा भी उससे परेशान थे, मगर बोलते नहीं थे, क्‍योंकि उनकी सत्‍ता का वैधीकरण ब्राह्मण ही करते थे; व्‍यापार बढ़ रहा था, वैश्‍य वर्ग जो पैदा हुआ था (??) वह व्‍यापारी वर्ग था। राजाओं के लिए सामन्‍ती व्‍यवस्‍था को बनाए रखना जरूरी था और चार्वाकों का हमला केवल ब्राह्मणों के ऊपर नहीं बल्कि पूरी सामन्‍ती व्‍यवस्‍था पर था इसलिए उनका मामला अलग था और बौद्ध धर्म का मामला अलग है। पाण्‍डे जी जब भी इतिहास में जाते हैं, तो बौद्धिक लीद करके चले आते हैं।
पहली बात तो यह है कि बौद्ध धर्म के उदय के दौर में राजा ब्राह्मणों से दुखी थे, लेकिन उनके खिलाफ बोलते नहीं थे, यह बात ही गलत है। तथ्‍य यह है कि उस समय क्षत्रियों और ब्राह्मणों के बीच खुला संघर्ष चल रहा था और रामशरण शर्मा ने इसके बारे में चर्चा भी की है। लेकिन अभी हम यह मान लेते हैं कि ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच अन्‍तरविरोध थे। व्‍यापार इस दौर में बढ़ रहा था क्‍योंकि खेती द्वारा नियमित अधिशेष उत्‍पादन के बूते ही शहरीकरण और वाणिज्‍य-व्‍यापार का विकास हो रहा था। लेकिन पाण्‍डे जी का यह विचार कि वैश्‍य इस दौर में पैदा हुआ, मूर्खतापूर्ण बात है। दूसरी बात, बुद्ध के समय में वैश्‍यों का एक हिस्‍सा व्‍यापार में जाने लगा था, लेकिन वैश्‍य अभी भी मुख्‍यत: खेती में लगे थे। लेकिन असली रहस्‍योद्घाटन पाण्‍डे जी इसके बाद करते हैं। सामन्‍तवाद से इन्‍हें न जाने क्‍या प्‍यार है कि हर युग में उसे घुसेड़ देते हैं! अब इनका कहना है कि चार्वाकों का हमला पूरी सामन्‍ती व्‍यवस्‍था पर था, लेकिन बौद्ध धर्म ने पूरे सामन्‍तवाद पर हमला नहीं किया बल्कि क्षत्रिय राजाओं और वैश्‍य व्‍यापारियों को ब्राह्मणवाद का एक विकल्‍प मुहैया कराया। हमने पहले भी दिखलाया था कि इस आदमी को भारतीय इतिहास के बारे में शून्‍य जानकारी है। सामन्‍तवाद का दौर ही भारतीय इतिहास में पहली सदी ईसवी से शुरू होता है। बौद्ध धर्म के उदय का दौर वह था जिस समय कबीलाई समाज विघटित होने की प्रक्रिया में था, पहली केन्‍द्रीकृत राज्‍यसत्‍ताएं व राजतन्‍त्र पैदा हो रहे थे, हल आधारित खेती का विकास हो रहा था, और पशुधन का महत्‍व बढ़ रहा था। इस दौर में ब्राह्मणवादी कर्मकाण्‍ड इतिहास के लिए एक बाधा बन गये थे क्‍योंकि इस दौर तक कई ऐसे भी कर्मकाण्‍ड थे जिनमें कई बार हज़ारों गायों तक की बलि दी जाती थी। बौद्ध दर्शन ने सभी जीवों के प्रति अहिंसा का जो सिद्धान्‍त दिया वह उस समय के समाज की आवश्‍यकता थी। बौद्ध धर्म के उदय की ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि की चर्चा करते हुए पाण्‍डे ने एक भी काम की बात नहीं की है, बस हवाबाज़ी की है।
बौद्ध दर्शन के उदय की ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि के दो पहलू थे, जिनकी प्रो. रामशरण शर्मा और प्रो. देवीप्रसाद चट्टोपाध्‍याय ने विशेष तौर पर चर्चा की है। पहला पहलू, जिसकी ओर विशेष तौर पर प्रो. शर्मा ने ध्‍यानकर्षण किया है, वह है एक नयी आर्थिक व्‍यवस्‍था और राजनीतिक व्‍यवस्‍था का उदय, जिसकी बुनियाद में हल आधारित खेती की व्‍यवस्‍था थी। प्रो. चट्टोपाध्‍याय ने इसके दूसरे पहलू की चर्चा की है, जो था कबीलाई समाज का पतन और उसके साथ समानता, भाईचारे और स्‍वतंत्रता के दौर का समापन और एक वर्ग समाज का उदय। इसके साथ बौद्ध दर्शन ने सामूहिक स्‍मृति में मौजूद समानता की भावना के पतन पर एक रूमानी अतीतोन्‍मुखी यूटोपिया पेश किया जो कि बुद्ध के संघों में रूप में सामने आया। इन दोनों विद्वानों ने बौद्ध धर्म के उदय की ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि के विषय में जो लिखा है, उसे बेहद संक्षेप में पेश किया जा सकता है और इसके लिए किसी विशेष प्रतिभा या पाण्डित्‍य की कोई आवश्‍यकता नहीं है। आइये देखते हैं कि इन दोनों विद्वानों ने इस पर क्‍या लिखा है।
प्रो. चट्टोपाध्‍याय लिखते हैं:
''इस प्रकार बौद्धकाल एक ऐसा युग था जब जनजातीय संगठनों के गर्भ में राज्य संगठनों का विकास होना आरम्भ हुआ था और मागधों तथा कौशलों के सन्दर्भ में वे जनजातीय संगठनों के अवशेषों पर पहले ही उद्भूत हो चुके थे। किंतु ये दो राजसत्ताएं अब भी जनजातीय समाज से घिरी हुई थीं। जैसाकि हम देखेंगे कि इन जातियों का स्वतंत्र अस्तित्व बहुत अधिक समय तक नहीं रह सका। इस दृष्टि से बुद्धकाल में गंगा की घाटी में अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक उथल पुथल हुई।'' (देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, ‘लोकायत’, 371)
आगे प्रो. चट्टोपाध्‍याय लिखते हैं:
''इसलिए बुद्ध के संदेश की वास्तविक सफलता को समझने के लिए इस बात को स्पष्ट रूप से जान लेना आवश्यक है कि जनजातीय समाज के अवशेषों पर राजसत्ता के उदय से जनजातीय जीवन के पुराने मूल्य नष्ट हो गये होंगे।'' (देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, ‘लोकायत’, 377)
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''इस बात के पक्ष में दो स्पष्ट आधार हैं। पहला, बौद्ध काल की परंपरा में उस विलुप्त सामूहिक जीवन की स्मृति सदा बनी रही जिसे अतीत का स्वर्ण युग समझा जाता था। दूसरा जो जनजातीय लोकतांत्रिक व्यवस्था तब भी विद्यमान थी, उसी के ढंग पर बहुत सोच समझकर बुद्ध अपने संघ को रूप दे रहे थे। इन दो आधारों में से दूसरा आधार निर्णायक है, यद्यपि पहले आधार का भी अपना ही महत्व है।'' (देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, ‘लोकायत’, 379)
प्रो. चट्टोपाध्‍याय विस्‍तार से समझाते हैं:
''इस प्रकार भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण चरण में उस समय की स्वतंत्र जनजातियों को बड़ी निर्दयता के साथ समाप्त किया जा रहा था और विस्तृत हो रही राजसत्ताओं के अंदर लोग पुरानी जनजातीय क्षमता के अवशेषों पर नये मूल्यों को उदय होते देख रहे थे, और इधर दूसरी ओर बुद्ध अपने संघ को जनजातीय समाज के मूल सिद्धान्तों के अनुरूप बना रहे थे और भिक्षुओं को परामर्श दे रहे थे कि वे इन्हीं सिद्धान्तों के अनुसार अपने अपने जीवन को ढालें। यह एक प्रमुख बात है। अपने संघों का निर्माण करते हुए बुद्ध को अपने काल के लोगों को जनजातीय सामूहिक जीवन की विलुप्त हो रही सभ्यता का एक विकल्प देने का अवसर मिल रहा था। केवल बुद्ध जैसा अति विलक्षण प्रज्ञा का धनी व्यक्ति ही ऐसा तर्कसंगत और पूर्ण विभ्रम निर्मित कर सकता था।'' (देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, ‘लोकायत’, 383)
बौद्ध दर्शन के उदय की ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि के विषय में अपने तर्कों का समाहार करते हुए प्रो. चट्टोपाध्‍याय लिखते हैं:
''बुद्ध का युग एक ऐसा युग था जिसमें उत्पादन शक्ति के विकास के परिणामस्वरूप भारत के उत्तरी क्षेत्रों में जनजातीय समाज के भग्नावशेषों पर क्रूर राजसत्ता का उदय हो रहा था। व्यापार और युद्ध से साधारण जन का जीवन इतना दयनीय हो चुका था जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती; निजी संपत्ति बटोरने के लोभ की कोई सीमा नहीं रही। फिर भी उत्पादक शक्तियाँ इतनी विकसित नहीं हुई थीं कि सबकी आवश्यकताएँ पूरी हो सकें। इसकी बजाय उत्पादक शक्तियों के और विकास से जहाँ अंततः वास्तविक सुख मिल सकता था वहाँ यह भी निश्चित था कि और अधिक क्रूरता के साथ शोषण हुआ होगा और इसके साथ ही लोगों की और दुर्दशा हुई होगी। ऐसी परिस्थियों में ‘उस परिस्थिति को, जिसके लिए विभ्रम की आवश्यकता हो, छोड़ देने की मांग’ ऐतिहासिक दृष्टि से बड़ी हास्यास्पद थी। दूसरा विकल्प, वास्तव में उस समय के अनुरूप एकमात्र संभव विकल्प यही था, कि उस युग के लिए सही ढंग का भ्रम उत्पन्न किया जाये जो ‘उसकी सांत्वना तथा औचित्य के लिए उत्साह, नैतिक अनुमोदन, समग्रता का सार्वभौम आधार बने।’ और बुद्ध ने ऐसा ही भ्रम उत्पन्न किया, ‘एक विवेकहीन स्थिति के लिए विवेक’ का सृजन किया।'' (देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, ‘लोकायत’, 394)
अब देखते हैं कि प्रो. रामशरण शर्मा ने बौद्ध दर्शन के उदय की भौतिक पृष्‍ठभूमि के विषय में क्‍या लिखा है। प्रो. शर्मा लिखते हैं:
''लेकिन इन नए धर्मों का वास्‍तविक कारण उत्तर-पूर्वी भारत में एक नई कृषि अर्थव्‍यवस्‍था के प्रसार में निहित था।'' (रामशरण शर्मा, इंडियाज़ एंशंट पास्‍ट)
प्रो. शर्मा आगे लिखते हैं:
“जैसा कि हमने देखा है, ब्राह्मणवादी समाज में वैश्‍यों की स्थिति ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बाद तीसरे स्‍थान पर थी। स्‍वाभाविक रूप से वे एक ऐसे धर्म की खोज में थे जो उनकी स्थिति में सुधार लाता। क्षत्रियों के अलावा, वैश्‍यों ने महावीर और गौतम बुद्ध दोनों को उदारतापूर्वक सहयोग किया। व्‍यापारी, जिन्‍हें सेट्टी कहा जाता था, गौतम बुद्ध और उनके शिष्‍यों को मूल्‍यवान उपहार देते थे। इसके कई कारण थे। पहला, आरंभिक अवस्‍था में जैन और बौद्ध दोनों ही धर्मों ने अस्तित्वमान वर्ण व्‍यवस्‍था को कोई महत्‍व नहीं दिया। दूसरे, वे अहिंसा का उपदेश देते थे जिससे अलग-अलग राज्‍यों के बीच युद्धों का अंत हो जाता और परिणास्‍वरूप वाणिज्‍य और व्‍यापार को बढ़ावा मिलता। तीसरे, ब्राह्मण संहिताएँ, जिन्‍हें धर्मसूत्र कहा जाता था, ब्‍याज पर धन उधार देने की निंदा करती थीं, और ब्‍याज पर जीने वालों की भर्त्‍सना करती थीं। इसलिए, अपने फलते-फूलते वाणिज्‍य-व्‍यापार के कारण धन उधार देने वाले वैश्‍यों को नीची निगाह से देखा जाता था और वे अपनी सामाजिक स्थिति बेहतर बनाना चाहते थे।”
(उपरोक्‍त)
और देखें:
”दूसरी ओर, हम निजी संपत्ति के विभिन्‍न रूपों के विरुद्ध कठोर प्रतिक्रिया भी देखते हैं। पुराने विचारों के लोग सिक्‍कों के प्रयोग और संचय को पसंद नहीं करते थे जो निश्‍चय ही चांदी और तांबे के, और संभवत: सोने के बने होते थे। वे नये घरों और कपड़ों, परिवहन की नई विलासितापूर्ण व्‍यवस्‍थाओं और युद्ध तथा हिंसा को नापसंद करते थे। संपत्ति के नये रूपों ने सामाजिक असमानताएँ पैदा कीं, और जनसाधारण के लिए निर्धनता और दुख-तकलीफ़ लेकर आये। इसलिए आम लोग आदिम जीवनशैली की ओर, उस सादगीपूर्ण आदर्श की ओर लौटने की चाह रखते थे जो संपत्ति के नये रूपों और नयी जीवन शैली के आने के साथ लुप्‍त हो गया था। जैन और बौद्ध दोनों ही धर्म सीधे-सादे, शुद्धतापूर्ण, संयमी जीवन का विचार प्रतिपादित करते थे।” (उपरोक्‍त)
जैसा कि आप देख सकते हैं, पाण्‍डे जी ने बौद्ध धर्म के उदय की भौतिक पृष्‍ठभूमि के विषय में कोई ठोस अध्‍ययन किये बिना हवा छोड़ दी है और हमेशा की तरह सामन्‍तवाद को यहां भी पहुंचा दिया है, जबकि जिस भौतिक पृष्‍ठभूमि में बौद्ध दर्शन का उदय हुआ उसका सामन्‍तवाद से दूर-दूर तक कोई लेना-देना ही नहीं था।
इसके बाद पाण्‍डे जी बौद्ध दर्शन के मुख्‍य सिद्धान्‍तों पर आते हैं। इस मामले में इन्‍होंने सिर्फ राहुल की पुस्‍तक से टीपा-टीपी कर दी है। अगर आप इस विषय पर स्‍टडी सर्किल ले ही रहे थे, तो आपको कुछ पुस्‍तकों को और पढ़ लेना चाहिए था। ऐसा न करने की वजह से पाण्‍डे जी ने एक पुस्‍तक से बनाया गया अपना खर्रा पढ़ कर सुना दिया है। लेकिन पाण्‍डे जी ने यह खर्रा भी ठीक से नहीं बनाया है। बौद्ध धर्म के मूल सिद्धान्‍त क्‍या थे, जैसे कि आठ सम्‍यकों का सिद्धान्‍त, प्रतीत्‍य समुत्‍पाद का सिद्धान्‍त, इत्‍यादि, किसी भी पाठ्यपुस्‍तक से पढ़ कर सुनाया जा सकता है। पाण्‍डे जी ने बस वही पढ़कर सुना दिया है। वह बताते हैं कि बुद्ध मध्‍यमार्ग बताते हैं, ईश्‍वर की सत्‍ता का नकार करते हैं, विचारधारात्‍मक तौर पर वर्ण व्‍यवस्‍था का नकार करते हैं। फिर पाण्‍डे जी ने शुरू में जो सुरक्षाबोध और फिर से फजीहत करवाने के प्रति चिन्‍ता प्रकट की थी, उसे कुछ समय के लिए खो बैठते हैं। वह कहते हैं कि अगर ''मजेदार तरीके से सोचा जाय'' (जब से पाण्‍डे जी का स्‍टडी सर्किल शुरू हुआ है, तब से ''मजेदार तरीके से सोचने'' के अलावा रास्‍ता ही क्‍या बचा है!?) तो मुझे ईश्‍वर की अवधारणा अफसर की अवधारणा से मिलती हुई लगती है। जैसे कि हम ईश्‍वर को खुश करने में लगे रहते हैं, रिश्‍वत देने में लगे रहते हैं कि वह नाराज न हो जाये, हमें तकलीफ न दे, हमारा बुरा न कर दे! उसी प्रकार हम अफसरों को भी खुश करने के लिए रिश्‍वत से लेकर सारे यत्‍न करते हैं, ताकि वह नाराज़ न हो जाये, हमारा खराब जगह ट्रांसफर न कर दे, इत्‍यादि! माने कि पाण्‍डे जी ने अपनी स्‍वानुभूति का अति-सामान्‍यीकरण कर दिया है। यह स्‍वानुभूति दो प्रकार की हो सकती है: एक तो यह कि पाण्‍डे जी अपने आपको ही ईश्‍वर समझते हैं और अपने अधीनस्‍थों के साथ ऐसा बर्ताव करते हैं। या फिर उनके ऊपर के अफसरों ने पाण्‍डे जी को भक्‍त बनाकर ठीक से उनकी लगाई है! यह हम पाठकों पर छोड़ देते हैं कि पाण्‍डे जी के साथ क्‍या हुआ होगा। दिक्‍कत यह है कि पाण्‍डे जी दर्शन के स्‍थान पर कॉमन सेंस को रख देते हैं। पाण्‍डे जी की प्रवृत्ति के अनुसार भारत के बच्‍चों को छोड़कर बाकी 90 करोड़ से 1 अरब लोग दार्शनिक हैं! जैसे कि पाण्‍डे जी हैं! फिर पाण्‍डे जी बोलते हैं कि हमने ईश्‍वर को ऐसी ही ''एण्‍टाइटी'' (??!!) बना दिया है। इसकी वजह से कार्य-कारण सम्‍बन्‍ध नज़रों से ओझल हो जाता है। बुद्ध का कार्य-कारण सम्‍बन्‍ध को बताने वाला प्रतीत्‍य समुत्‍पाद का सिद्धान्‍त इसी को उजागर करता है।
अब देखिये कि पाण्‍डे जी इस सिद्धान्‍त को समझाने में बुद्ध की किस प्रकार मदद करते हैं। पाण्‍डे जी कहते हैं कि मान लीजिये कि हमें बुखार हो गया, तो हम पैरासिटामोल खा लेते हैं तो माने कि हम समझ गये कि बुखार का कारण क्‍या है और फिर हमने उसका निवारण कर दिया, यानी पाण्‍डे जी के अनुसार जो cause और affect (??!!) है उसको हम समझ गये और ईश्‍वर की आवश्‍यकता समाप्‍त हो गयी। यह इतना बचकाना तर्क है कि इसका खण्‍डन करने की कोई आवश्‍यकता नहीं है, लेकिन फिर भी इसके बारे में दो शब्‍द। इस स्‍तर के कार्य-कारण सम्‍बन्‍ध को जो मानते हैं, वे भी ईश्‍वर में यकीन करते हैं। यहां तक कि न्‍यूटन भी ईश्‍वर में यकीन करते थे। उनका कहना था कि प्रकृति कुछ नियमों के तहत काम करती है, ईश्‍वर ने एक दफा बस इस मैकेनिज्‍म को चालू कर दिया है, और उसके बाद प्रकृति इन्‍हीं नियमों के अनुसार चलती रहती है। भारत के वैज्ञानिक तो पीएसएलवी को भी तिलक करवाने के लिए पहले बालाजी ले जाते हैं। लेकिन सच्‍चाई यह है कि इस स्‍तर का कार्य-कारण सम्‍बन्‍ध समझने से ईश्‍वर का नकार नहीं होता है। ईश्‍वर के अस्तित्‍व का आधार एक ओर तो आदिम युग में अज्ञान था और वर्ग समाज में असुरक्षा, अनिश्चितता, दमन, उत्‍पीड़न और शोषण है। जब तक ये चीज़ें रहेंगी, तब तक पूंजीवादी समाज में रोज़मर्रा के जीवन में लोग पैरासिटामोल खाकर बुखार भगाने जितना कार्य-कारण सम्‍बन्‍ध की समझदारी विकसित कर लेंगे और ईश्‍वर की सत्‍ता को अपने आप में इससे कोई खतरा नहीं है। बुद्ध के प्रतीत्‍य समुदत्‍पाद ने कार्य-कारण सम्‍बन्‍ध की जो समझदारी दी थी, वह इससे कहीं ज्‍यादा गहरी और व्‍यापक थी और पाण्‍डे के पिग्‍मी दिमाग ने इसे पैरासिटामोल पर लाकर खत्‍म कर दिया! अब आप देख सकते हैं कि इतना अपढ़ और बौना आदमी स्‍टडी सर्किल लेने लग जाय तो वह क्‍या गुल खिलाएगा।
इसके बाद पाण्‍डे जी बताते हैं कि बुद्ध का यह सिद्धान्‍त हर चीज़ की क्षणभंगुरता के सिद्धान्‍त पर ले जाता है और यह सिद्धान्‍त ईश्‍वर और इस प्रकार वर्ण व्‍यवस्‍था पर भी चोट करता है। यही सही बात है, हालांकि इस पर और स्‍पष्‍टता से चर्चा हो सकती थी। लेकिन इसके बाद पाण्‍डे जी पूछते हैं कि क्‍या इन चीज़ों के आधार पर बौद्ध दर्शन को भौतिकवादी कहा जा सकता है? पाण्‍डे जी स्‍वयं ही जवाब देते हैं: नहीं! लेकिन यह सटीक बात नहीं है। दरअसल पाण्‍डे जी ने बौद्ध दर्शन पर वीडियो बनाने के लिए बस सरसरी निगाह से राहुल सांकृत्‍यायन की पुस्‍तक 'दर्शन दिग्‍दर्शन' को उलट-पलट लिया है और अपने खर्रे बना लिये हैं। लेकिन अगर उन्‍हें इस विषय पर स्‍टडी सर्किल लेनी ही थी तो कम-से-कम उन्‍हें बताना चाहिए था, कि इस विषय पर एक मतान्‍तर है, जिसमें राहुल की अवस्थिति मार्क्‍सवादी दृष्टिकोण से सन्‍तुलित नहीं है। राहुल ने अपनी पुस्‍तक में दर्शन की विभिन्‍न शाखाओं में मूल बंटवारा ईश्‍वरवाद और अनीश्‍वरवाद के बीच बताया है, जिसमें से बौद्ध दर्शन को अनीश्‍वरवादी भाववाद/अभौतिकवाद की श्रेणी में रखा है। याद रखें यहां हम बुद्ध के दर्शन की बात कर रहे हैं, न कि बाद के बौद्ध दर्शन की भाववादी धाराओं की, जैसे कि महायान बौद्ध दर्शन। बुद्ध के दर्शन में देवीप्रसाद चट्टोपाध्‍याय के अनुसार भौतिकवाद की एक आदिम और प्रारंभिक किस्‍म की अभिव्‍यक्ति है। देवीप्रसाद के इस उद्धरण पर गौर करें:
''किंतु इस बौद्ध कथा के संबंध में विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि इसमें कहीं भी ईश्वर या सृजनकर्ता के लिए कोई स्थान नहीं है। सारी कथा में घोर भौतिकवादी दृष्टिकोण की प्रमुखता है यद्यपि यह आदिम भौतिकवाद था।'' (देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, ‘लोकायत’, 381)
इसी प्रकार बौद्ध दर्शन में जो आरंभिक धाराएं थीं, जैसे सौत्रान्तिक व वैभाषिक, वे भी भाववाद-विरोधी थीं और एक प्रकार के आदिम भौतिकवाद का ही प्रतिनिधित्‍व करती थीं। देखिये प्रो. चट्टोपाध्‍याय इसके बारे में क्‍या लिखते हैं:
''श्रीलाभ और उनके दर्शनवेत्ता-बांधव सौत्रांतिक बौद्धों के रूप में प्रसिद्ध हैं। श्रीलाभ का जन्म नागार्जुन से कुछ पहले हुआ था। सौत्रांतिक मत बौद्ध दर्शन का एक प्रारंभिक रूप है, जो आदर्शवाद के प्रति अपने विरोध-भाव के कारण महायानी आदर्शवादियों के आक्रमण का अत्यंत महत्वपूर्ण लक्ष्य बन गया।''
(देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, ‘भारतीय दर्शन में क्या जीवंत है और क्या मृत’, 213)
और देखें:
''लगभग 7वें-8वें ईसवी सन् में शुभगुप्त हुए। वह वैभाषिक बौद्धों के विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनकी मुख्य कृति का लक्ष्य आदर्शवाद की—विशेष रूप से विज्ञानवाद की—धज्जियाँ उड़ाना है।''
(देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, ‘भारतीय दर्शन में क्या जीवंत है और क्या मृत’, 214)
और यह भी:
''शुभगुप्त की बाह्यार्थ-सिद्धि की प्रमुखता का कारण यह है कि वह आदर्शवाद का खंडन करती है। उसके नाम से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कृति बाह्य वस्तुओं अथवा इतर-मनोगत वस्तुओं की वास्तविकता को प्रमाणसम्मत मानती है, अथवा, हम भारतीय परंपरा के अनुसार कहें तो, बाह्यार्थ-सिद्धि की परिकल्पना के अनुसार दृश्य जगत की वस्तुओं पर ही हमारा ज्ञान आधारित है। शुभगुप्त ने अपनी पुस्तक में विज्ञानवाद का तर्कसंगत खंडन प्रस्तुत किया है। विज्ञानवादी अपने विषय को प्रमाणित करने का एक महत्वपूर्ण उपाय चूंकि परमाणुवाद का खंडन मानते हैं, इसलिए शुभगुप्त द्वारा आदर्शवाद के खंडन में परमाणुवाद का समर्थन सन्निहित है। इसका तात्पर्य यह कि बाह्य जगत को, जिसकी वास्तविकता सिद्ध करने को वह इतने उत्सुक हैं, शुभगुप्त मूलतः भौतिक मानते हैं। कारण यह कि परमाणुओं की सत्ता स्पष्ट ही भौतिक है।''(देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, ‘भारतीय दर्शन में क्या जीवंत है और क्या मृत’, 216)
इसी प्रकार प्रो. चट्टोपाध्‍याय कहते हैं:
''मेरा उद्देश्‍य प्रचीन भारतीय दर्शन में सभी भौतिकवादी प्रवृत्तियों के सम्‍यक अध्‍ययन का प्रयास करना नहीं रहा है; बल्कि मैं उस पर केंद्रित करना चाहता था जिसे प्राचील ग्रंथों में विशिष्‍ट रूप से ‘लोकायत’ कहा गया है। जैसे, उदाहरण के तौर पर, वैशेषिकों और सर्वस्तिवादी बौद्धों के परमाणुवाद में भारतीय भौतिकवाद के महत्‍वपूर्ण तत्‍व मिलते हैं।'' (डी. पी. चट्टोपाध्‍याय, 'लोकायत', भूमिका, पृ. xv, अंग्रेज़ी संस्‍करण)
लुब्‍बेलुबाब यह कि बौद्ध धर्म को सीधे पूर्णत: भौतिकवाद से रिक्‍त बताना, उसे पूर्णत: अभौतिकवादी या भाववादी बताना एक सन्‍तुलित दृष्टिकोण नहीं है। बौद्ध दर्शन के कुछ अन्‍तर्निहित अन्‍तरविरोध थे। वह विचारधारात्‍मक धरातल पर भाववाद और ब्राह्मणवाद को चुनौती देता था। उसने शुरुआती दौर में बहुत बड़े पैमाने पर शूद्रों, दासों, ऋणी लोगों को आकृष्‍ट भी किया। लेकिन जैसे ही बौद्ध धर्म राजकीय धर्म बनने लगा, वैसे-वैसे बुद्ध के जीवन-काल से ही उसमें तमाम समझौतों की शुरुआत हो गयी। इसकी वtह से बौद्ध धर्म ने वास्‍तविक और भौतिक सामाजिक व आर्थिक स्‍तर पर वर्ग शोषण को चुनौती नहीं दी। चट्टोपाध्‍याय के अनुसार, यह युग द्वारा उपस्थित की गयी सीमाएं थीं, न कि बौद्ध दर्शन में जैविक तौर पर उपस्थित सीमाएं। ऐसा इसलिए नहीं था कि बौद्ध दर्शन बुद्ध के ही काल में राजाओं और व्‍यापारियों का संरक्षण प्राप्‍त करने लगा था, इसीलिए बुद्ध ने जानबूझकर भाववाद को अपने दर्शन में घुसा दिया। यह उस युग की सीमा थी। प्रो. चट्टोपाध्‍याय लिखते हैं:
''किंतु आरंभिक बौद्ध धर्म के प्रति ये दोनों दृष्टिकोण ऐतिहासिक दृष्टि से संतोषजनक नहीं हैं। यह सच है कि आरंभिक दिनों से ही बौद्ध धर्म को राजाओं और व्यापारियों का संरक्षण तथा प्रोत्साहन मिला हुआ था। यह भी सच है कि बुद्ध के अग्रणी साथियों में उस समय के बहुत से संपन्न और कुलीन परिवारों के लोग थे। इसके अलावा जैसाकि हम देखेंगे, बौद्ध धर्म ने मगध साम्राज्य और मगध के व्यापार के विस्तार में सहायता भी की। फिर भी बौद्ध धर्म में केवल यही बातें थीं, ऐसा विचार बड़ा अपरिपक्व होगा। अन्य शब्दों में, बौद्ध तो अनजाने ही इतिहास का एक साधन मात्र बन गये थे और बुद्ध धर्म की स्थापना ही ऐसी परिस्थितियों में हुई थी कि उसे भारतीय इतिहास में संभवतः सबसे बड़ा सामाजिक-धार्मिक आन्दोलन बनना था। राजाओं और व्यापारियों का संरक्षण इतना अधिक नहीं था कि वह इस की उल्लेखनीय सफलता का मूल आधार बनता। क्योंकि बौद्ध धर्म के पवित्र ग्रंथों ने इस धर्म के अनुयायियों में साधारण जनों की संख्या भले ही बढ़ा चढ़ा कर दी गयी हो तो भी इस तथ्य को मानना ही होगा कि जनसाधारण इस धर्म की ओर आकृष्ट तो हुआ ही था। हो सकता है कि वर्गभेद अर्थात जात-पात प्रणाली के कारण होने वाले अन्याय या ब्राह्मणों के कर्मकांड की निरर्थकता के प्रति बुद्ध के विचारों के कारण ही साधारण जन इसकी ओर आकृष्ट हुए हों। किंतु प्रारंभिक बौद्ध धर्म की सफलता का वास्तविक कारण नहीं और खोजना होगा।'' (देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, ‘लोकायत’, 367-68)
आगे प्रो. चट्टोपाध्‍याय लिखते हैं:
''इस प्रकार भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण चरण में उस सभय की स्वतंत्र जनजातियों को बड़ी निर्दयता के साथ समाप्त किया जा रहा था और विस्तृत हो रही राजसत्ताओं के अंदर लोग पुरानी जनजातीय क्षमता के अवशेषों पर नये मूल्यों को उदय होते देख रहे थे, और इधर दूसरी ओर बुद्ध अपने संघ को जनजातीय समाज के मूल सिद्धान्तों के अनुरूप बना रहे थे और भिक्षुओं को परामर्श दे रहे थे कि वे इन्हीं सिद्धान्तों के अनुसार अपने अपने जीवन को ढालें। यह एक प्रमुख बात है। अपने संघों का निर्माण करते हुए बुद्ध को अपने काल के लोगों को जनजातीय सामूहिक जीवन की विलुप्त हो रही सभ्यता का एक विकल्प देने का अवसर मिल रहा था। केवल बुद्ध जैसा अति विलक्षण प्रज्ञा का धनी व्यक्ति ही ऐसा तर्कसंगत और पूर्ण विभ्रम निर्मित कर सकता था।'' (देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, ‘लोकायत’, 383)
अन्‍त में प्रो. चट्टोपाध्‍याय लिखते हैं:
''इस प्रकार बुद्ध ने अपने युग की सबसे विकट समस्या को पूर्णतया मनोगत स्वरूप प्रदान कर दिया; उन्होंने अपने काल के अन्य प्राणियों के ठोस भौतिक दुख को शाश्वत दुख के सार्वभौम सिद्धान्त में बदल दिया और इसे एक प्रकार का भावात्मक या तत्वमीमांसीय दुख बना दिया।'' (देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, ‘लोकायत’, 398)
लेकिन पाण्‍डे जी ने बस राहुल की किताब उठाकर टीपा-टीपी कर दी है, जबकि एक संक्षिप्‍त परिचय देते हुए भी इतने बड़े मुद्दे पर भारतीय दर्शन परम्‍परा के दो बड़े विद्वानों प्रो. चट्टोपाध्‍याय और राहुल के बीच के मतान्‍तर का जिक्र करना अनिवार्य था, विशेष तौर पर इसलिए क्‍योंकि इस प्रश्‍न पर प्रो. चट्टोपाध्‍याय का दृष्टिकोण मार्क्‍सवादी अप्रोच से ज्‍यादा सन्‍तुलित है। लेकिन पाण्‍डे जी ने राहुल की पुस्‍तक को उलट-पलट कर कर दिया स्‍टडी सर्किल! पाण्‍डे जी राहुल के इस दृष्टिकोण को शब्‍दश: कोट करते हैं (और बताते भी नहीं हैं कि ये राहुल के शब्‍द हैं! बौद्धिक चोरी करना पाण्‍डे जी की आदत है, यह हम आपको तब भी दिखलाएंगे, जब इनकी पुस्‍तक 'कश्‍मीरनामा' की आलोचना पेश करेंगे) कि बुद्ध को अपने ध्‍यान, समाधि और ब्रह्मचर्य के सिद्धान्‍त को भौतिकवाद से ख़तरा लगा और यही वजह है कि बुद्ध ने अपने दर्शन को अनात्‍मवादी अभौतिकवाद की श्रेणी में रखा था। यह अवस्थिति गलत है, जैसा कि हम ऊपर दिखला चुके हैं। लेकिन पाण्‍डे जी को तो स्‍टडी सर्किल अभी ही करनी थी क्‍येांकि गैप ज्‍यादा हो गया था, तो बस उन्‍होंने लीद कर दी।
इसके बाद पाण्‍डे जी कहते हैं‍कि बुद्ध का मध्‍यमार्ग दरअसल समझौतों की वजह से पैदा हुआ था और वह दुखों का समाधान आध्‍यात्मिक दुनिया में करता है और वास्‍तविक दुनिया में उसका कोई समाधान नहीं बताता। इसके लिए वह दुखों को सबके लिए समान बताते हैं, जबकि वर्ग विभाजित समाज में ऐसा नहीं होता है। यह बात मोटे तौर पर ठीक है लेकिन प्रो. चट्टोपाध्‍याय के अनुसार यह केवल एक पहलू है। दूसरा पहलू बुद्ध के युग की सीमाएं थीं, और वह ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण सीमा थी। इसीलिए प्रो. चट्टोपाध्‍याय कहते हैं कि कोई पैगम्‍बर और महान शिक्षक भी अपने युग की सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर सकता है। लेकिन पाण्‍डे जी इनके बारे में कुछ नहीं समझते क्‍योंकि उन्‍होंने आनन-फानन में एक किताब उठाई और जल्‍दबाज़ी में खर्रे बनाकर हवाबाज़ी कर दी।
इसके बाद पाण्‍डे जी कहते हैं कि उपरोक्‍त कमज़ोरियों की वजह से ही बौद्ध धर्म का पतन होता गया, उसमें तंत्र-मंत्र, टोना-टोटका सब घुस गया। हालांकि, पाण्‍डे जी का इन कमज़ोरियों और कारणों का विश्‍लेषण दरिद्र है, लेकिन वह साथ में यह कहते हैं कि इस पतन की प्रक्रिया को समझने के लिए उनका ''ऑल टाइम फेवरिट'' उपन्‍यास है शिवप्रसाद सिंह का उपन्‍यास 'नीला चांद'। यह सच है कि इस उपन्‍यास में इस पतन की प्रक्रिया का चित्रण है। लेकिन शिवप्रसाद सिंह की विचारधारात्‍मक अवस्थिति को देखते हुए यह अलग से एक चर्चा का विषय बनता है कि किसी मार्क्‍सवादी होने का दावा करने वाले के लिए यह ''ऑल टाइम फेवरिट'' उपन्‍यास कैसे हो सकता है। लेकिन यह परिधिगत मसला है, इसे छोड़ देते हैं।
इसके बाद पाण्‍डे जी दावा करते हैं कि अम्‍बेडकर द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने के बाद बौद्ध धर्म के पुनरुद्धार की उम्‍मीदें पैदा हुईं, मगर ऐसा नहीं हो सका और मैंने बहुत से बौद्ध मन्दिरों का दौरा किया है और वहां कुछ सीखने योग्‍य नहीं था। हमने सोचा कि बौद्ध मन्दिरों ने भी पाण्‍डे जी की 'विजिट' पर ऐसा ही सोचा होगा! बहरहाल, यह उम्‍मीद करना ही मूर्खतापूर्ण है कि अम्‍बेडकर द्वारा बौद्ध धर्म को अपनाने से इसका उद्धार होने की कोई सम्‍भावना थी। इसकी वजह यह है कि अम्‍बेडकर का द‍ृष्टिकोण खुद ही धर्म के विषय में बेहद भाववादी था और वह उन्‍होंने जॉन ड्यूई के 'कॉमन फेथ' नामक लेख से लिया था। वह यह था कि मानव समाज को एक साझा आस्‍था की आवश्‍यकता होती है, जो कि जनवाद, स्‍वतन्‍त्रता आदि के विचारों में भरोसा करती हो। उन्‍होंने कहा था जब मैं सारनाथ गया तो एक आध्‍यात्मिक ट्रांस में चला गया था। जब अम्‍बेडकर ने लाखों महारों के साथ बौद्ध धर्म में धर्मान्‍तरण किया था, तो ही सभी संजीदा प्रेक्षक जानते थे कि न तो इससे दलितों का भला होने वाला है और न ही बौद्ध धर्म का। लेकिन पाण्‍डे जी न जाने किस ट्रिप पर हैं। बहरहाल, पाण्‍डे जी अन्‍त में कहते हैं कि ''मेरी यह समझदारी है कि बौद्ध धर्म ने शोषण की मूल व्‍यवस्‍थाओं पर कोई हमला नहीं किया, जो साथी मुझसे असहमत हों, वे मुझे बताएं और यह भी बताएं कि मैं क्‍या पढूं।'' कितना बेईमान और ढीठ आदमी है यह! यह पाण्‍डे का नहीं बल्कि तमाम असहमतियां रखने के बावजूद मार्क्‍सवादी अध्‍येताओं का आम सहमति का मुद्दा है। लेकिन चूंकि हिन्‍दी जगत में तमाम ज्ञानपिपासु व गम्‍भीर युवा भी इससे वाकिफ नहीं होंगे, इसलिए पाण्‍डे इसे ''अपना निष्‍कर्ष'' बनाकर पेश कर रहा है।
इसके बाद पाण्‍डे जी अपनी पुरानी असुरक्षा पर वापस आ जाते हैं कि लोग बताएंगे तो वे पढ़ेंगे और अपनी कमज़ोरियों को दूर करेंगे क्‍योंकि ज्ञान तो ''प्‍यार लो-प्‍यार दो'' वाला मामला है और जो ऐसा नहीं करता है वह ''मार्क्‍सवाद का धंधा'' कर रहा है। हमारे रूपक के लिए हमें क्षमा करें, लेकिन बस अपनी बात समझाने के लिए हम यह कहेंगे कि सच्‍चाई तो यह है कि हिन्‍दी जगत के बाज़ार में मार्क्‍सवाद के ज्ञान की मांग बहुत है लेकिन आपूर्ति की समस्‍या है और पाण्‍डे उसमें अपना फफूंद लगा फर्जी माल लेकर अपनी एक दुकान चला रहा है। अक्‍सर ही यह बिना पढ़े-लिखे या चौर्यलेखन करके एक किताब लिख रहा है और लोगों को मूर्ख बना रहा है। सभी संजीदा लोग इस सच्‍चाई को जानते हैं। अन्‍त में, पाण्‍डे धमकी देता है कि अगला स्‍टडी सर्किल वेदान्‍त पर होगा! अभी तक अधिकांश संजीदा युवा, बुद्धिजीवी जो कि इस अपढ़, मूर्ख और बौने करियरवादी की बौद्धिक चार सौ बीसी को समझ गये होंगे, वह इससे दूर ही रहेंगे। जो नहीं समझे हैं, उनसे हम यही कहेंगे कि इस बौद्धिक बहरूपिये और पिग्‍मी से सावधान रहें और मार्क्‍सवाद समझने के लिए मार्क्‍सवादी क्‍लासिक्‍स का अध्‍ययन करें और अच्‍छी पाठ्यपुस्‍तकें भी हैं जिनका अध्‍ययन किया जा सकता है। लेकिन ऐसे फ्रॉड्स के चक्‍कर में न पड़ें, जिनके बारे में हम विस्‍तार से दिखला चुके हैं कि उन्‍हें मार्क्‍सवाद, इतिहास, भारतीय दर्शन परम्‍परा के बारे में कुछ नहीं पता है।