Thursday, May 18, 2017

काश ! ऐसा होता !




काश ! ऐसा होता !

धीरज हमारे लिए
एक निष्क्रिय प्रतीक्षा का नाम नहीं
एक सुदूर, दुर्गम लक्ष्‍य की तैयारी
होना चाहिए।

विनम्रता हमारे लिए
हर विरोधी विचार पर
पूर्वाग्रह मुक्‍त सोच-विचार करने का
समय होना चाहिए
और अपने विचारों के परिष्‍कार के लिए
सहायता लेने का यत्‍न होना चाहिए।
साहस हमारे लिए
जन संग ऊष्‍मा का
अंगीकार होना चाहिए।
तार्किकता हमारे लिए
उत्‍पादन के साधनों जैसा
उपयोगी औज़ार होना चाहिए।
संवेदना हमारे लिए
सामाजिक सरोकार होना चाहिए।
इतिहास बोध हमारा
इतिहास बदलने के लिए होना चाहिए।
स्‍वप्‍न हमारे
भविष्‍य के मानचि‍त्र होने चाहिए।

-- कविता कृष्‍णपल्‍लवी






जो ज़िंदगी और अपने लक्ष्य के प्रति सच्चे और एकनिष्ठ होते हैं , जिनका जीवन मानव-मुक्ति के मार्ग-संधान और परियोजना को सच्चे अर्थों में समर्पित होता है , निजी ज़िंदगी में भी वे टूटकर प्यार करते हैं, वक़्त की आंच-गर्मी से उनके प्यार का रंग कभी फीका नहीं पड़ता | 1856 में 38वर्षीय कार्ल मार्क्स ने 42 वर्षीय जेनी को, जो कई बच्चों की माँ हो चुकी थीं, एक प्रेमपत्र लिखा था |इस लंबे पत्र में जेनी के प्रति उन्होने वही कोमल और उत्कट प्रेम प्रकट किया है जैसा वह छात्र-जीवन में महसूस करते थे | इस पत्र का एक अंश यहाँ प्रस्तुत है :

"मेरी प्रियतमा,
"मैं तुम्हें फिर लिख रहा हूँ , इसलिए कि मैं अकेला हूँ और इसलिए कि मेरे मन में हमेशा तुम्हारे साथ बातचीत करना मुझे परेशान किए दे रहा है , जबकि तुम इसके बारे में न कुछ जानती हो , न कुछ सुनती हो और न ही मुझे उत्तर दे सकती हो ... मैं तुम्हें अपने सामने साक्षात देखता हूँ , मैं तुम्हें अपनी गोद में उठा लेता हूँ , मैं तुम्हें सिर से पाँव तक चूमता हूँ , मैं तुम्हारे सामने घुटने टेक देता हूँ और आह भरता हूँ : 'मैं आपको प्यार करता हूँ मदाम !' और मैं तुम्हे सचमुच बहुत-बहुत प्यार करता हूँ , उससे भी ज्यादा प्यार करता हूँ, जितना 'वेनिस के मूर' ने कभी किया था | मिथ्या और भ्रष्ट दुनिया लोगों को मिथ्या और भ्रष्ट रूप में ही देखती है | मेरे अनेकानेक निंदकों और चुगलखोर शत्रुओं में से किसने कभी मेरी इस बात के लिए भर्त्सना की कि मैं किसी द्वितीय श्रेणी के थिएटर में प्रथम श्रेणी के प्रेमी की भूमिका अदा करने के योग्य हूँ ? और फिर भी यह सही है ! यदि इन बदमाशों के पास बुद्धि होती , तो उन्होने एकतरफ 'उत्पादन और विनिमय सम्बन्धों' को और दूसरी तरफ मुझे तुम्हारे चरणों में चित्रित कर दिया होता | 'इस चित्र को देखिये और उस चित्र को देखिये' -- उन्होने नीचे लिख दिया होता | लेकिन वे मूढ़ बदमाश हैं और मूढ़ ही रहेंगे in seculam seculorum (हमेशा के लिए -- अनु ) |
"...केवल अंतराल ही हमें एक दूसरे से अलग करता है और मुझे फौरन विश्वास हो जाता है कि समय ने मेरे प्यार की मदद ही की है , वैसे ही जैसे धूप और बारिश से पौधे के बढ़ने में मदद मिलती है | ज्यों ही तुम मुझसे दूर हटती हो , तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम विराट रूप ग्रहण कर लेता है , इसमें मेरे आत्मा की सारी ओजस्विता और मेरे हृदय की सारी शक्ति संकेंद्रित हो जाती है | मैं पुनः अपने को शब्द के पूरे अर्थ में मनुष्य महसूस करने लगता हूँ , क्योंकि मैं एक प्रचंड मनोवेग अनुभव करने लगता हूँ | विविधता का , जिसे आधुनिक अध्ययन और शिक्षा हममें विकसित करते हैं , और संदेहवाद का , जिससे हम अनिवार्यतः सभी आत्मगत और वस्तुगत प्रभावों की आलोचना करते हैं , अभिप्राय हमें छोटा , शक्तिहीन , शिकायती और असंकल्पशील बनाना है | लेकिन प्रेम फायरबाख के पुरुष के लिए नहीं , मोलेशेत के चयापचय के लिए नहीं , सर्वहारा के लिए नहीं , बल्कि प्रेयसी के लिए , तुम्हारे लिए प्रेम मनुष्य को पुनः मनुष्य बना देता
है |
" तुम हँसोगी , मेरी प्रियतमा , और पूछोगी कि क्यों मैंने सहसा अपने को आलंकारिक भाषा में झोंक दिया है ? लेकिन यदि मैं तुम्हारे मधुर , निर्मल हृदय को अपने हृदय से लगा सकता , तो मैं खामोश रहता और मेरे ज़ुबान पर एक शब्द नहीं आता | चूंकि मैं तुम्हें अपने होठों से नहीं चूम पा रहा हूँ , इसलिए मुझे अपनी जिह्वा से चूमना पड़ता है और शब्द लिखने पड़ते हैं | बेशक मैं कवितायें भी लिख सका होता ...
" निस्संदेह दुनिया में अनेकानेक औरतें हैं और उनमें से कुछ सुंदर भी हैं | लेकिन मुझे ऐसा चेहरा पुनः कहाँ मिल सकेगा , जिसका हरेक रंग-रूप , जिसकी हरेक झुर्री मेरे जीवन की सबसे शक्तिशाली स्मृतियाँ जगाती हो ? तुम्हारे मधुर मुखड़े में मैं अपने असीम दुखों , अपनी "अपूरणीय क्षतियों " को (यहाँ मार्क्स अपने बेटे एडगर की मृत्यु की ओर इशारा कर रहे हैं ) पढ़ता हूँ और जब तुम्हारे मधुर चेहरे को चूमता हूँ , तो मेरे सारे दुख-दर्द गायब हो जाते
हैं | 'उसकी बाँहों में दफ्न , उसके चुंबनों द्वारा पुनरुज्जीवित' -- अर्थात तुम्हारी बाँहों में और तुम्हारे चुंबनों द्वारा , और मुझे ब्राह्मणों और पायथागोरस की , पुनर्जन्म के बारे में उनकी शिक्षा की तथा ईसाई धर्म और पुनरुज्जीवन के बारे में उसकी शिक्षा की कोई ज़रूरत नहीं है | "



जैसा कि वह पहले ही बार-बार बता चुका है, वह हजार वर्ष की उम्र वाला ऐसा साम्राज्‍य बना रहा है जो संस्‍कृति सहित सभी अतिरिक्‍त चीज़ों से भरपूर हो। जाहिर है, इस विषय पर उसकी अपनी राय है।

-- बेर्टोल्‍ट ब्रेष्‍ट ('सभी कलाकारों में महानतम')


 हालाँकि कुछ लोग अभी भी इतिहास को वैसे ही ले सकते हैं जैसा वे उसे पाते हैं
आप लोगों में से ज्‍यादातर लोग परवाह नहीं करते याद दिलाये जाने की।
अब, सज्‍जनो और देवियो, निश्‍चय ही यह दिखाता है कि
उभर आये फोड़ों को ज़रूरत है सटीक निदान की
जो व्‍यक्‍त किया गया हो किसी घुमावदार भाषा में नहीं
बल्कि ऐसी सीधी-सपाट भाषा में जो गू को गू ही कहती हो।
 

-- बेर्टोल्‍ट ब्रेष्‍ट (आर्तुरो उई का प्रतिरोध्‍य उत्‍थान)




ग्राम्शी ने कहा था : मनुष्य प्रकृति की नहीं,इतिहास की उपज है | बात बिलकुल ठीक है | हम प्राकृतिक जीव होने से दसियों हज़ार साल आगे निकाल आए हैं |एक सामाजिक प्राणी के रूप में हमारी नियति समाज के साथ जुड़ी हुई है | लेकिन अलगावग्रस्त आत्मकेंद्रित मानस आज भी सामाजिकता से विमुख होकर केवल अपने बारे में और अपने स्वजनों के बारे में सोचता है | एक प्राकृतिक जीव की तरह वह आत्मरक्षा , संतानोत्पत्ति और वंशबेलि को आगे बढ़ाने को ही परमलक्ष्य की प्राप्ति मानता है | बुर्जुआ समाज के पढे- लिखे नागरिक भी एक प्राकृतिक जीव की तरह अपने जैविक पुनरुत्पादन के फ़लितार्थ को लेकर चिंतित रहते हैं | एक स्वस्थ सामाजिक प्राणी के रूप में हमारी सर्वोपरि चिंता सामाजिक सृजनशीलता को लेकर होनी चाहिए, न कि जैविक सृजनशीलता को लेकर | जीवन-संघर्ष के तमाम दुखों-कष्टों से हम सामाजिक-आत्मिक सृजन की ऊर्जा जुटते हैं और पुनर्नवा होते रहते हैं | कालिदास की इस उक्ति को इसी भांति नया अर्थ देना होता है --' क्लेशः फलेन हि पुनर्नवता विद्यते |' यह अमरत्व-प्राप्ति की भी नयी प्रविधि है : वंशबेलि को आगे बढ़ाने की जगह समूची आने वाली पीढ़ी के बारे में सोचना, उसके लिए कुछ करना और उसे एक बेहतर दुनिया सौंप जाने की कोशिश करना !




Ever since ROME, OPEN CITY, I have maintained a conscious, determined endeavor to try to understand the world in which I live, in a spirit of humility and respect for the facts and for history. What as the meaning of ROME, OPEN CITY? We were emerging from the tragedy of the war. We had all taken part in it, for we were all its victims. I sought only to picture the essence of things. I had absolutely no interest in telling a romanticized tale along the usual lives of film drama. The actual facts were each more dramatic than any screen cliche.
---Roberto Rossellini