Wednesday, December 05, 2018


(एक साहित्यिक मित्र हैं, आये दिन मेरे लेखन की "अव्यावहारिक दुस्साहसिकता", मेरे "झगड़ालूपन", मुँहफटपन और "अतिक्रान्तिकारिता" को लेकर नाराज़ रहते हैं और शिकायतें करते रहते हैं I अभी पिछली पोस्ट में मैंने एक कविता डाली थी, तब फिर उन्होंने मुझे इसी किस्म के कुछ सुझाव दिए और लताड़ लगाई I मैंने उन्हें जो जवाब दिया है उसे वे समझने की कोशिश कत्तई नहीं करेंगे, पर मैंने सोचा कि उस जवाब को सार्वजनिक कर दूँ क्योंकि यह बहुतों की शिकायतों और सवालों को मेरा जवाब है ! )

"माफ़ करें ! मेरा जीवन ही गद्यात्मक है I मेरे जीवन की जो भी काव्यात्मकता है, वह गद्यात्मक है I इसमें प्यार, करुणा, मित्रता, दुःख, और उल्लास की अन्तःसलिलाएँ हैं, लेकिन संतोष और गतिहीन सुख की अंधी बावड़ियाँ नहीं हैं I मैं एक असंतुष्ट प्रेतात्मा हूँ I उसमें न लोकगीतों की अतीतजीवी लिसलिसी लोकरागात्मकता है, न छायावाद की वायवीयता, न ही नवगीतों जैसी आत्मनिष्ठ रूमानियत ! आज का समाज और जीवन गद्यात्मक है क्योंकि इसमें एलियनेशन और वस्तुकरण है I मेरे जीवन की गद्यात्मकता इसके आगे की है I
मेरा जीवन गद्यात्मक है क्योंकि वह भविष्य-स्वप्नों का रूमानी संधान मात्र न होकर उनकी व्यावाहारिक परियोजना पर काम करने की एक कोशिश है I वर्तमान जीवन की शुष्क-नीरस अलगावग्रस्त गद्यात्मकता का प्रतिकार मैं अतीत की भावुकतावादी दलदली ज़मीन पर खड़ा होकर नहीं करती, बल्कि और उन्नत स्तर की, भविष्य की गद्यात्मक काव्यात्मकता से करती हूँ Iइसीलिये, किसी लोकरागी, या निम्न-बुर्जुआ भावुकतावादी भारतीय मानस को मैं शुष्क, झगड़ालू, बहसू या मीनमेखी लग सकती हूँ I पर मैं क्या करूँ ? ज़माने की लहर और समाज के चलन के हिसाब से ढलना मेरी फितरत नहीं I मेरे हृदय के तल तक पहुँचने और मेरी भावनाओं की उत्ताल तरंगों के साथ बहने के लिए आपको 'ब्रह्मराक्षस का सजल-उर-शिष्य' बनना होगा, पंखों में लगे दुनियादारी और "सद्गृहस्थपन" के कीचड़ को धोना होगा, मस्त-मलंग यायावर बनना होगा, अतीत की जगह भविष्य की और देखना सीखना होगा, बस्ती-बस्ती पर्वत-पर्वत गाते चले जाने वाला बंजारा बनना होगा और विद्रोह करने का साहस करना होगा I आपकी शुभेच्छाओं की मैं कद्र करती हूँ, पर आपकी अपेक्षाओं की कसौटी पर मैं कभी खरी नहीं उतर सकती I कृपया अन्यथा न लें और मुझे क्षमा करें !"

(30नवम्‍बर,2018)

Monday, December 03, 2018

स्त्रियों की प्रेम कविताओं के बारे में एक अप्रिय, कटु यथार्थवादी कविता


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आम तौर पर स्त्रियाँ जब प्रेम कविताएँ लिखती हैं

तो ज़्यादातर, वे भावुकता से लबरेज

और बनावटी होती हैं क्योंकि

उनमें वे सारी बातें नहीं होती हैं

जो वे लिख देना चाहती हैं और

लिखकर हल्का हो लेना चाहती हैं |

इसलिए प्रेम कविताएँ लिखने के बाद

उनका मन और भारी, और उदास हो जाता है |

स्त्रियाँ जब अपने किसी सच्चे प्रेमी के लिए भी

प्रेम कविताएँ लिखती हैं

तो उसमें सारी बातें सच्ची-सच्ची नहीं लिखतीं

चाहते हुए भी |

शायद वे जिससे प्रेम करती हैं

उसे दुखी नहीं करना चाहतीं

या शायद वे उसपर भी पूरा भरोसा नहीं करतीं,

या शायद वे अपनी ज़िंदगी की कुरूपताओं को

किसी से बाँटकर

और अधिक असुरक्षित नहीं होना चाहतीं,

या फिर शायद, वे स्वयं कपट करके किसी अदृश्य

अत्याचारी से बदला लेना चाहती हैं |

स्त्रियाँ कई बार इस डर से सच्ची प्रेम कविताएँ नहीं लिखतीं

कि वे एक लंबा शोकगीत बनने लगती हैं,

और उन्हें लगता है कि दिग-दिगन्त तक गूँजने लगेगा

एक दीर्घ विलाप |

स्त्रियाँ चाहती हैं कि एक ऐसी

सच्ची प्रेम कविता लिखें

जिसमें न सिर्फ़ मन की सारी आवारगियों, फंतासियों,

उड़ानों का, अपनी सारी बेवफ़ाइयों और पश्चातापों का

बेबाक़ बयान हो, बल्कि यह भी कि

बचपन से लेकर जवान होने तक

कब, कहाँ-कहाँ, अँधेरे में, भीड़ में , अकेले में,

सन्नाटे में, शोर में, सफ़र में, घर में, रात में, दिन में,

किस-किस ने उन्हें दबाया, दबोचा, रगड़ा, कुचला,

घसीटा, छीला, पीसा, कूटा और पछींटा

और कितनों ने कितनी-कितनी बार उन्हें ठगा, धोखा दिया,

उल्लू बनाया, चरका पढ़ाया, सबक सिखाया और

ब्लैकमेल किया |

स्त्रियाँ प्रेम कविताएँ लिखकर शरीर से भी ज़्यादा

अपनी आत्मा के सारे दाग़-धब्बों को दिखलाना चाहती हैं

लेकिन इसके विनाशकारी नतीज़ों को सोचकर

सम्हल जाती हैं |

स्त्रियाँ अक्सर प्रेम कविताएँ भावनाओं के

बेइख्तियार इजहार के तौर पर नहीं

बल्कि जीने के एक सबब, या औज़ार के तौर पर लिखती हैं |

और जो गज़ब की प्रेम कविताएँ लिखने का

दावा करती कलम-धुरंधर हैं

वे दरअसल किसी और चीज़ को प्रेम समझती हैं

और ताउम्र इसी मुगालते में जीती चली जाती हैं |

कभी अपवादस्वरूप, कुछ समृद्ध-कुलीन स्त्रियाँ

शक्तिशाली हो जाती हैं,

वे प्रेम करने के लिए एक या एकाधिक

पुरुष पाल लेती हैं या फिर खुद ही ढेरों पुरुष

उन्हें प्रेम करने को लालायित हो जाते हैं |

वे स्त्रियाँ भी उम्र का एक खासा हिस्सा

वहम में तमाम करने के बाद

प्रेम की वंचना में बची सारी उम्र तड़पती रहती हैं

और उसकी भरपाई प्रसिद्धि, सत्ता और

सम्भोग से करती रहती हैं |

स्त्रियाँ सच्ची प्रेम कविताएँ लिखने के लिए

यथार्थवादी होना चाहती हैं,

लेकिन जीने की शर्तें उन्हें या तो छायावादी बना देती हैं

या फिर उत्तर-आधुनिक |

जो न मिले उसे उत्तर-सत्य कहकर

थोड़ी राहत तो मिलती ही है !

सोचती हूँ, एस.एम.एस. और व्हाट्सअप ने

जैसे अंत कर दिया प्रेम-पत्रों का,

अब आवे कोई ऐसी नयी लहर

कि नक़ली प्रेम कविताओं का पाखण्ड भी मिटे

और दुनिया की वे कुरूपताएँ थोड़ी और

नंगी हो जाएँ जिन्हें मिटा दिया जाना है

प्रेम कविताओं में सच्चाई और प्रेम को

प्रवेश दिलाने के लिए |

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(27-28 नवम्बर, 2018)

Sunday, December 02, 2018

बेर्टोल्ट ब्रेष्ट के कुछ उद्धरण


हालाँकि दुनिया उठ खड़ी हुई और उसने उस हरामज़ादे की नकेल कस दी, लेकिन उसे जनम देने वाली कुतिया अब फिर से गरमाई हुई है I

-- (ब्रेष्ट ने यह कहा था उन्नीस सौ पचास के दशक में कभी ! आज हम देख रहे हैं कि विश्व-पूँजीवाद की बूढ़ी कुतिया ने कई फासिस्ट पिल्ले जने हैं जो मरियल हैं पर बेहद खूँख्वार हैं !)


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कोई हर कमज़ोरी से कैसे मुक्त रह सकता है, और सबसे बढ़कर उस घातक कमज़ोरी से, यानी प्यार से ?
(The Good Woman of Szechwan )


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रस्सी टूट चुकी है; एक गाँठ
इसे फिर से जोड़ सकती है, लेकिन
यह टूट चुकी है I

शायद हम फिर मिलेंगे, लेकिन
तुम मुझे उसी जगह
नहीं पाओगे जहाँ से हमारी राहें जुदा हुई थीं I


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यह बरसों पहले की बात है और एक यह समय है कि मैं कुछ नहीं जानता उसके बारे में अब और, जो कभी मेरे लिए सब कुछ हुआ करती थी लेकिन सबकुछ गुजर जाता है I ( ग्यारहवाँ स्तोत्र )
 ( लव पोयम्स )


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दुनिया की दुष्टता इतनी ज़बरदस्त है कि तुम्हें लगातार भागते रहना पड़ता है कि कहीं तुम्हारे नीचे से तुम्हारी टाँगें ही न चोरी चली जाएँ I
( थ्री पेनी ऑपेरा )


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कमज़ोरियाँ
तुम्हारी कोई नहीं थी
मेरी थी एक :
मैं प्यार करता था I
( लव पोयम्स )


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जो आदेश देते हैं उनकी तीखी आवाज़ें
भय से भरी होती हैं, कसाई के छुरे का इंतज़ार करते
सूअरों के बच्चों की किंकियाहट की तरह,
ऑफिस की कुर्सियों में में धँसे उनके चर्बीदार चूतड़
दुश्चिंता में पसीने से लथपथ होते हैं ...
भय सिर्फ़ उनपर ही शासन नहीं करता जो शासित हैं, बल्कि
शासकों पर भी करता है I


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चूँकि समय कम है और अज्ञात हमें घेरे हुए है; इसलिए महज़ इतना काफ़ी नहीं होगा कि हम कुछ भी न सोचते हुए और खुश रहते हुए जियें, शांतिपूर्वक उत्पीड़न बर्दाश्त करें और सिर्फ़ बढ़ती उम्र के साथ ही अक्लमंदी हासिल करें I
( Antigone -- In a Version by Brecht )


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वह दर्शन में कमजोर था और शानदार ड्राइवर था, लेकिन उसकी ड्राइविंग उसके दर्शन से बहुत अधिक ख़तरनाक थी I


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जब अटलांटिस में पानी भर रहा था, उससमय भी धनी लोग अपने गुलामों के लिए चीख रहे थे।
-- ( ब्रेष्ट का यह उद्धरण आज की दुनिया के लिए बेहद प्रासंगिक है जब मेहनतकशों की हड्डियाँ निचोड़ने के साथ ही कच्चे माल के अंधाधुंध दोहन और अराजक-अनियोजित पूँजीवादी विकास ने पृथ्वी की पारिस्थितिकी को इस क़दर तबाह कर दिया है कि इस बात का खतरा पैदा हो गया है कि यदि पूँजीवाद बना रहा तो इस पृथ्वी से इस सदी का अंत होने से पहले ही मानव जीवन का ही खात्मा हो जाएगा I लेकिन मुनाफे की अंधी होड़ में लगे पूँजीपति पृथ्वी के विनाश के बारे में नहीं, मज़दूरों को लूटने और कुचलने की नयी-नयी तरकीबों के बारे में सोचने में दिन-रात एक किये हुए हैं ! अटलांटिस डूब रहा है, पर वे अपने गुलामों को लेकर परेशान हैं ! )

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बैठे रहने और बग़ावत करने में कोई मेल नहीं है I


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सोचना मानव जाति का सबसे बड़ा सुख है I
( गैलीलियो )


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काफ़ी कुछ तभी जीत लिया जाता है जब एक अकेला आदमी भी अपने पैरों पर उठ खड़ा होता है और कहता है, " नहीं I"
(गैलीलियो)

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फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की के कुछ उद्धरण



बड़ी मेधा और गहरे हृदय के लिए पीड़ा और दुःख अपरिहार्य होते हैं !

( अपराध और दंड )

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वह इंसान जो खुद से झूठ बोलता है और अपने खुद के झूठ को सुनता है, वह एक ऐसे दर्रे में जा पहुँचता है जहाँ वह अपने भीतर की, या अपने आसपास की सच्चाई को भी पहचान नहीं पाता, और इसतरह अपने लिए और दूसरों के लिए उसके भीतर सम्मान की कोई भावना नहीं रह जाती I जब उसके भीतर सम्मान नहीं रह जाता तो फिर वह प्यार करने की क्षमता खो देता है, और प्यार की इस रिक्तता की भरपाई करने और इससे अपना ध्यान हटाने के लिए वह मनोविकारों और भोंड़ी-कामुक आनंदानुभूतियों को अपना शरण्य बनाता है, और फिर अपने ही दुराचारों की पाशविकता में डूब जाता है, और यह सब कुछ होता है लगातार दूसरों से और खुद अपने आप से झूठ बोलते रहने से I

(The Brothers Karamazov)

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मुझे माफ़ करना ... मेरे प्यार के लिए ... अपने प्यार से तुम्हें तबाह कर देने के लिए I

(The Brothers Karamazov)


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बहुत सारा दुःख तो दुनिया में किंकर्तव्यविमूढ़ता के कारण है और महज़ इस वज़ह से है कि चीज़ें अनकही रह जाती हैं I

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जब तर्कणा विफल हो जाती है, मदद करने को शैतान हाज़िर हो जाता है I

('अपराध और दण्ड')

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लेकिन यह कैसे मुमकिन है कि तुमने एक ज़िंदगी जी और तुम्हारे पास सुनाने के लिए कोई कहानी नहीं ?

('White Nights')

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सही हो या गलत, समय-समय पर कुछ तोड़ते रहना बड़ा आनंददायी होता है I

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एक नया कदम उठाना, एक नया शब्द बोलना, यही वह चीज़ है जिससे लोग सबसे अधिक डरते हैं I

( Crime and Punishment )

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दुःख के कारणों को जानना सबसे बड़ा सुख है I

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एक बात है ! अपने घृणित-बर्बर कुकृत्यों से क्रोध, तनाव और चिंता पैदा करने के साथ ही फासिस्ट अपने "ज्ञान" और "विवेक" के प्रदर्शन से हँसाते भी इतना हैं बीच-बीच में कि दम फूल जाये I 'एंटायर पोलिटिकल साइंस' वाला गंजेड़िया अपने इतिहास-ज्ञान से बहुत मनोरंजन कर रहा था, फिर उसका रिकॉर्ड तोड़ने वह त्रिपुरा का चवन्नी छाप आ गया ! और अब गोरखपुर का कनफटा गुंडा मैदान में है ! उसने तो गजब ही कर दिया ! तो जान लो भाई लोगो, हनुमान जी दलित थे ! पर सवाल अभी भी जस का तस है ! कौन दलित --- चूड़ा, जाटव, चमार, महार, दुसाध, डोम, माला, मादिगा ... सैकड़ों दलित जातियाँ हैं ! हर दलित जाति को एक देवता माँगता I पर चिंता की बात नहीं I 33 करोड़ में से डेढ़-दो सौ ज्ञात देवी देवताओं को छाँट लिया जाये तो भैरव, काली, संतोषी माता, जिउतिया माता,छठी माता आदि को अन्य दलित जातियों को अलॉट किया जा सकता है I मध्य जातियों के लिए भी लिस्ट बनाकर देवता अलॉट करने पड़ेंगे ! शिव हो जायेंगे अनुसूचित जनजातियों के देवता, पर वहाँ भी कई अनुसूचित जातियों में रार मच सकता है I ब्रह्मा (मिसिर/पांडे/सुकुल/आदि) हो गए बाम्हनों के, सिरीराम (सिंह) ठाकुरों के, किसुनजी (यादव) अहीरों के, विश्वकर्मा बढइयों-लुहारों-कुम्हारों के और चित्रगुप्त कायस्थों के पहले से ही हैं I हाँ, उस लम्पट इंद्र को कौन लेगा, जो जिस-तिस ऋषि के घर में घुसकर ऋषि-पत्नियों की इज्ज़त बिगाड़ता रहता है ! कामदेव की जाति क्या थी, और अग्नि,वरुण, मरुत, अश्विनी कुमारों आदि की ? मंडल कमीशन तो क्या, संविधान सभा से भी बड़ा कोई आयोग बनाना होगा और उसकी सहायता के लिए कई शोध समितियाँ, सर्वेक्षण टीमें आदि बनानी पड़ेंगी, फिर धर्म संसद के कई सत्र बुलाने पड़ेंगे ! एक बार यह महान कार्य संपन्न हो जाए, फिर देखना हमारे प्यारे भारतवर्ष की तरक्की की रफ़्तार ! हाँ नहीं तो !

हा...हा ...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा... ... ... बाप रे बाप ...पेट फूल गया !

ताज्जुब है कि बहुतेरे पढ़े-लिखे गधों का फिर भी हिंदुत्व की इस विदूषकीय राजनीति से मोहभंग नहीं होता !

हिटलर-मुसोलिनी ऐतिहासिक-राजनीतिक ईडियट थे, पर इतने सर्वांगीण ईडियट फासिस्ट तो भारत में, और खासकर हिन्दू धर्म में ही पैदा हो सकते थे !
इतिहास को जब पीछे की और ठेला जाएगा तो सारे ज्ञान-विज्ञान को कूड़ेदान में फेंककर मूर्खता और चपंडुकपना के अन्धकार युग की ओर ही तो जाना होगा !

(29नवम्‍बर,2018)

अतीत जारी रहता है I

हम दुस्वप्न की तरह

उससे पीछा छुड़ाना चाहते हैं I

लेकिन यह संभव हो सकता है तभी

जब हम कुछ नए सपने देखें,

वर्त्तमान के मानचित्र से

अतीत को हटाकर हाशिये पर ले जाएँ

और वहाँ भविष्य को जगह दें !

(29नवम्‍बर,2018)

फासिस्ट तानाशाह क्रूर, मूर्ख, जाहिल, बेशर्म, असभ्य और मनोरोगी टाइप तो होते हैं, पर क्या इस हद तक ? लगता है, सभी रिकॉर्ड टूट गए !

(26नवम्‍बर,2018)


***

ख़ुदा से होड़ लेने की ग़रज़ से कभी-कभी शैतान भी कुछ जोड़ियाँ बनाता है, जैसे वो 'मंकी बाथ' वाला भाई और उसका जोड़ीदार अमिट स्याह !

(27नवम्‍बर,2018)

उस मॉल के बीचोबीच जो एक विशाल हॉल था

उसके बीचोबीच खड़े होकर

मैंने चीखकर कहा," सुनो लोगो, मेरी स्मृतियाँ, छायाएँ, सपने और मंसूबे

न बिकने के लिए हैं, न शोकेसों में सजने के लिए हैं !"

फिर कई लोग मुझे किनारे ले जाकर कहते रहे,

"कभी इरादा बदल जाये तो बताना !"

वे खरीद-फरोख्त के अनुभवी लोग थे

बाज़ार की रग-रग से वाक़िफ़ !

बाज़ार की रग-रग से वाक़िफ़ लोग ख़ुद को

इंसान की रग-रग से भी वाक़िफ़ समझते हैं

पर हमेशा नहीं तो कम से कम कई बार वे

ग़लत भी साबित होते हैं !

(26नवम्‍बर,2018)

फासिस्टों के सरगना अयोध्या में ढाई-तीन लाख पीले-बीमार चेहरे वाले उन्मादियों की विवेकहीन बर्बर भीड़ जुटाना चाहते थे, लेकिन अभीतक पहुँचे हैं सिर्फ़ 7-8 हज़ार ! काठ की हाँडी फिर चढ़ नहीं पा रही है I गंजेड़ी, तड़ीपार और कनफटा गुंडा बदहवास हैं ! नागपुर के अन्तःपुर में नयी रणनीति पर मंत्रणा हो रही है I पर निश्चिन्त होने की ज़रूरत नहीं है ! इनके तरकस में अभी भी कई और अमोघ अस्त्र सुरक्षित हैं I सड़कों पर धार्मिक उन्माद की खूनी लहर मुट्ठीभर गुंडों की भीड़ द्वारा भी उकसाया जा सकता है I और फिर तृणमूल स्तर पर संघियों का पूरा तानाबाना है ही !

न्यायपालिका, आई.बी.,सी.बी.आई., ई.डी., समूची नौकरशाही और मुख्य धारा की मीडिया के बड़े हिस्से का फासिस्टीकरण किया जा चुका है Iसेना में भी शीर्ष पर फासिस्ट प्रतिबद्धता वाले लोगों को बैठाया जा रहा है ! देश पहले से ही आपातकाल से भी अधिक संगीन अँधेरे में जी रहा है ! अब ई.वी.एम. की बोतल से विजय का जिन्न निकालने की पूरी तैयारी है , इन विधानसभा चुनावों में नहीं तो अगले लोकसभा चुनावों में तो ज़रूर ! समस्या यह है कि ई.वी.एम. हथकंडे का भी सेलेक्टिव इस्तेमाल ही संभव हो पायेगा ! अगर बड़े पैमाने पर होगा तो नतीजे सामने आते ही जन-असंतोष सड़कों पर भड़क सकता है और हालात तेज़ी से एक क्रांतिकारी संकट की शक्ल अख्तियार कर सकते हैं ! फिर जितना दमन होगा, प्रतिरोध उतना ही बढ़ता जाएगा I

संघी फासिस्ट अगर चुनाव हार भी जायेंगे तो सड़कों पर अपना खूनी खेल जारी रखेंगे और फिर से सरकार बनाने के लिए क्षेत्रीय बुर्जुआ वर्ग की चरम पतित और अवसरवादी पार्टियों के साथ गाँठ जोड़ने की कोशिश करते रहेंगे ! वे भी भलीभाँति इस तथ्य को जानते हैं कि कांग्रेस या बुर्जुआ पार्टियों का कोई भी गठबंधन अगर सत्तारूढ़ होगा तो उसके सामने भी एकमात्र विकल्प होगा नव-उदारवादी विनाशकारी नीतियों को लागू करना I इन नीतियों को एक निरंकुश बुर्जुआ सत्ता ही लागू कर सकती है, अतः दमन और भ्रष्टाचार का रास्ता तो भा.ज.पा. विरोधी बुर्जुआ पार्टियों की सत्ता को भी चुनना ही पड़ेगा I ऐसे में भा.ज.पा. फिर धार्मिक कट्टरपंथ, अंधराष्ट्रवाद और पुनरुत्थानवाद के नारे देते हुए मध्य वर्ग के एक धुर-प्रतिक्रियावादी रोमानी उभार को हवा देगी और उस लहर पर सवार होकर तथा क्षेत्रीय बुर्जुआ दलों को साथ लेकर सत्ता तक पहुँचाने के कुलाबे भिड़ायेगी I कांग्रेस जो नरम हिंदुत्व की लाइन ले रही है, उसका भी लाभ अगली पारी में भा.ज.पा. को ही मिलेगा I

तात्पर्य यह कि फासिज्म-विरोधी मोर्चे का सवाल किसी इलेक्टोरल फ्रंट का सवाल नहीं है I फासिज्म-विरोधी संघर्ष सड़कों पर होगा I फासिस्ट सत्ता में रहें या न रहें, इनका उत्पात तबतक जारी रहेगा जबतक पूँजीवादी व्यवस्था बनी रहेगी I सड़कों पर फासिज्म-विरोधी लड़ाई के मोर्चे में कोई भी बुर्जुआ पार्टी साथ नहीं आने वाली है I बंगाल और त्रिपुरा के बाद भी, सारी उम्मीद चुनावी हार-जीत पर टिकाये पतित सामाजिक जनवादियों (संशोधनवादियों) ने अपने आचरण से साबित कर दिया है कि इतिहास से कोई सबक न लेते हुए वे 1920 और 1930 के दशक का ही इतिहास दुहराने वाले हैं ! आज फासिज्म- विरोधी किसी जुझारू संयुक्त मोर्चे में मज़दूर वर्ग के सभी क्रांतिकारी संगठनों और मंचों के अतिरिक्त कुछ निम्न-बुर्जुआ रेडिकल संगठन ही शामिल हो सकते हैं I सडकों के संघर्ष में पॉपुलर फ्रंट जैसी कोई रणनीति काम नहीं आयेगी I बेशक जबतक बुर्जुआ जनवाद है, तबतक बुर्जुआ चुनावों का भरपूर टैक्टिकल इस्तेमाल किया जाना चाहिए लेकिन चुनावी हार-जीत से फासिज्म को ठिकाने लगा देने की खामख़याली आत्मघाती मूर्खता होगी I

असल बात यह है कि हमें तृणमूल स्तर पर कामों को संगठित करना होगा, एक जुझारू प्रगतिशील श्रमिकवर्गीय सामाजिक आन्दोलन खडा करना होगा और मज़दूरों और रेडिकल प्रगतिशील युवाओं के फासिस्ट-विरोधी दस्ते बनाने होंगे I किसी को लग सकता है कि मज़दूर वर्ग के आन्दोलन और क्रांतिकारी संगठनों की स्थिति को देखते हुए यह एक दूर की कौड़ी है I पर हमें यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि यदि परिस्थितियों का आकलन और उसपर आधारित कार्यदिशा सही हो तो तो व्यवस्था का संकट बढ़ने के साथ ही उस लाइन पर अमल के नतीजे चमत्कारी गति से सामने आते हैं, क्रांतिकारी कामों का तेज़ी से विस्तार होता है और व्यवस्था का संकट एक क्रांतिकारी संकट में तबदील हो जाता है I इसी बात को संसदीय जड़वामन और दुनियादार "प्रगतिशील" शुतुरमुर्ग नहीं समझ पाते और अपने घोंसलों के दरवाजे पर बैठे हुए क्रांतिकारी मंसूबों को 'हवाई पुलाव' बताते रहते हैं !

(25नवम्‍बर,2018)

Monday, November 26, 2018

मेरा नाम अपनी मित्र-सूची से काट दें, भाई !


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माफ़ करें भाई ! मैं आपकी पार्टी में कल नहीं आ सकती I

तीन-चार घंटे यूँ ही दांत चियारने और बिलावजह खें-खें-खें-खें करते रहने से

जबड़े दर्द करने लगते हैं और दो दिनों तक

अपनी ही शक्ल बकाटू जैसी लगती रहती है I

और फिर मेरे पास सुनाने के लिए संता-बंता टाइप कोई चुटकुला होना तो दूर

उन्हें सुनकर मुझे मतली आने लगती है I

ठिठोली मुझे आती नहीं और ऐसी महफिलों में स्त्रियों से जिन नखरों

और अदाओं की अपेक्षा की जाती है उनसे मुझे घिन आती है I

*

मेरी असामाजिकता के लिए मुझे माफ़ करें मेरे भाई !

उन्माद और आतंक और हत्याओं की जब बाहर बारिश हो रही हो

तो 'आर्ट ऑफ़ लिविंग' और विपश्यना और सूफी संगीत के बारे में

घंटों बातें करना और ठिठोलियाँ करना

और बस यूँ ही चेमगोइयाँ करना

मुझे हद दरज़े तक फूहड़ और अश्लील लगता है I

*

ऐसा नहीं कि मेरे पास कुछ अच्छे सपनों

और ख़ुशगवार मौसम और

प्यार के बारे में कुछ बातें नहीं हैं,

पर इनपर मैं आपलोगों की तरह न सोच पाती हूँ

और न बातें कर पाती हूँ स्कॉच की चुस्कियों के साथ !

इनपर बात करने से पहले मैं आपकी संभ्रांत, प्रबुद्ध, सेक्युलर

और प्रगतिशील होने का दावा करने वाली मंडली में

सडकों पर क़ब्ज़ा जमाये हत्यारे यथार्थ और मनुष्यता के

दुस्वप्नों के बारे में कुछ बातें करना चाहती हूँ

पर इससे आपकी पार्टी बदमज़ा हो जायेगी, मैं जानती हूँ I

*

ब्रेष्ट ने कहा था,'वह जो हँस रहा है

उसतक बुरी खबर अभी पहुँची नहीं है !'

लेकिन जो बेहद बुरी खबरों के बीच भी अपने लिए

तनाव-मुक्ति और आनंद के कुछ क्षण खोज रहे हैं

वे या तो जलते हुए जहाज़ पर जश्न मना रहे पागल हैं,

या फिर हत्यारों से उनकी कोई साठगाँठ है

या फिर वक़्त आने पर वे उनके चरणों में लोट जाने के लिए तैयार हैं !

*

आप कहते हैं,'बीच-बीच में कुछ तनाव ढीला कर लेना

और गम गलत कर लेना भी ज़रूरी होता है !'

मानती हूँ भाई, पर मैं यह काम

कहीं जंगलों-पहाड़ों-रेगिस्तानों में भटकते हुए,

या कहीं समुद्र-तट पर लेटे हुए अपना मनपसंद

संगीत सुनते हुए करती हूँ,

जब भी कोई मौक़ा हाथ आता है I

समृद्धि, सुविधा और सुरक्षा के बीमार नीम-अँधेरे में

कामुकता और छद्म-बौद्धिकता के नशे की ख़ुराक पर जीने वाले

खोखले और अकेले लोगों के बीच

मुखौटे लगाकर किसी फंतासी में जीने का

और खुश होने का गंदा खेल

मेरे लिए असहनीय होता है !

*

आप बुरा न मानकर मेरी मज़बूरी समझिएगा

मेरी साफ़गोई के लिए मुझे माफ़ कीजियेगा

और आगे से अपनी महफिलों में मुझे

आमंत्रित मत कीजियेगा !

**--**

(24नवम्‍बर,2018)

Sunday, November 25, 2018


... ... ...
जैसाकि कहा जाता है –
"मामला सुलझ गया है"
प्रेम की नाव
जीवन से टकराकर टूट गई।
मैंने जीवन का सारा ऋण चुका दिया है
और अब ऋण-सूची में कुछ भी बाक़ी नहीं रहा है
आपसी दर्द
मुसीबतें
और नाराज़गियाँ

सब ख़ुश रहें (और यह जीवन जीएँ)
... ... ...

-- व्लदीमिर मयाकोवस्की
( अनुवाद : अनिल जनविजय )

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( ये मयाकोवस्की की अंतिम कविता की कुछ पंक्तियाँ हैं जो उन्होंने 14 अप्रैल 1930 को ख़ुद को गोली मारकर आत्महत्या करने से दो दिन पहले यानी 12 अप्रैल को लिखी थी।हिन्दी में मयाकोवस्की की अंतिम कविता के कई अनुवाद देखने में आये हैं, पर यह अनुवाद अभी-अभी मास्कोवासी रूसी-हिन्दी विद्वान और हिन्दी कवि Anil Janvijay ने किया है और Shashi Sharma की 22 नवम्बर की एक पोस्ट के कमेन्ट बॉक्स में दिया है I जाहिर है कि इस अनुवाद को सर्वाधिक प्रामाणिक मानकर भरोसा किया जा सकता है I वसीयत और अंतिम सन्देशनुमा इस कविता में मयाकोवस्की कहते हैं कि उनकी मृत्यु के लिए कोई दोषी नहीं, और यह कोई तरीका नहीं, और वह किसी दूसरे को ऐसा करने की सलाह नहीं देते, पर उनके सामने और कोई रास्ता नहीं था ! तो इसतरह, एक आपवादिक काव्य-प्रतिभा ने एक आपवादिक क़दम उठाकर आने जीवन का अंत कर लिया ! आश्चर्य कि उन्हीं मयाकोवस्की ने कुछ ही दिनों पहले आत्महत्या करने वाले अपने कवि-मित्र सेर्गेई येस्येनिन को एक कविता लिखकर प्यार भारी झिड़की दी थी ! जो भी हो, मयाकोवस्की की आत्महत्या एक रहस्य नहीं, बल्कि एक दार्शनिक गुत्थी है ! आम तौर पर हम आत्महत्या का विरोध करते हैं, लेकिन क्या असामान्य प्रतिभाओं को इस मामले में उनके विशेष निजी फैसले के साथ अकेला छोड़ दिया जाना चाहिए ? सोचें ज़रा ... )
ये बुर्जुआ नारीवादी और उत्तर-मार्क्सवादी नारीवादी वीरांगनाएँ मुँह से अजदहे की तरह चाहे जितना भी आग उगल लें, अपनी फूहड़ "साहसिक" कविताओं-कहानियों से चाहे जितनी वाहवाही बटोर लें, वे किसी न किसी रूप में स्त्री मुक्ति के व्यापक सरोकारों और आन्दोलन के मुद्दों को स्त्री-यौनिकता की मुक्ति में 'रिड्यूस' कर देती हैं I ईव एन्सलर के धारावाहिक नाटक 'वेजाइना मोनोलौग्स' की नक़ल पर हमारे यहाँ भी साहित्य में विस्फोटक "साहसिकता" के बिंदास नमूने पेश किये जाने लगे हैं !

या तो जानबूझकर, या नाजानकारी के चलते, या पूर्वाग्रहों के कारण, सभी कोटि की अग्निवर्षी नारीवादी कागज़ी "दहशतगर्द" स्त्री-दासता की सामाजिक-ऐतिहासिक जड़ों की पूरीतरह अनदेखी करती हैं और इसीलिये इस ऐतिहासिक प्रश्न का ऐतिहासिक समाधान प्रस्तुत कर पाने में विफल रहती हैं I वे सिर्फ़ समस्या को खंडित रूप में देख पाती हैं, या मात्र उसके लक्षणों-अभिव्यक्तियों की शिनाख्त कर पाती हैं I

दार्शनिक सारवस्तु की दृष्टि से ये वीर बालिकाएँ या तो अराजकतावादी होती हैं, या फिर अकर्मक विमर्शवादी ! ये किसिम-किसिम की बुर्जुआ नारीवादी प्रजातियाँ गहरे कुलीनतावादी पूर्वाग्रहों से लबालब भरी होती हैं, प्रतीकात्मक आन्दोलनों से आगे जाने में इनकी नानी मरती है, और बहुसंख्यक आम मेहनतक़श स्त्रियों की समस्याएँ और सवाल तो इनके एजेंडा पर कहीं होते ही नहीं ! बहुत ऐसी भी हैं जो ज़मीनी काम का दम भरती हैं, पर उनकी सारी सरगर्मियाँ एन.जी.ओ.पंथी सुधारवाद की टुकड़खोरी की चौहद्दी में महदूद रहती हैं I

जो संशोधनवादी वामपंथी हैं, वे स्त्री-मुक्ति के मुद्दों पर, या तमाम पुरुष-स्वामित्ववादी प्रतिक्रियावादी रूढ़ियों-मूल्यों-संस्थाओं के विरुद्ध कोई आमूलगामी रेडिकल सामाजिक आन्दोलन खड़ा करने की या तो ज़रूरत नहीं समझते, या फिर अपनी यथास्थितिवादी और सुधारवादी मानसिकता के कारण इतनी कूव्वत ही नहीं रखते I जो बिखरी हुई क्रांतिकारी वाम शक्तियाँ हैं, वे अपनी वैचारिक कमजोरी और कठमुल्लावाद के चलते स्त्री-मुक्ति के प्रश्न पर 'क्लास-रिडक्शनिस्ट' अप्रोच अपनाती हैं I कुछ नव-मार्क्सवादी हैं, जो जब स्त्री-प्रश्न पर बात करते हैं तो वफादारी तो मार्क्सवाद के साथ दिखाते हैं, लेकिन रातें 'आइडेंटिटी पॉलिटिक्स' के बिस्तर में बिताते हैं !

आप कहेंगे कि मैं सिर्फ़ समस्याएँ ही गिनाये चली जा रही हूँ ! बात ठीक है, लेकिन समस्याओं की सटीक पहचान से ही समाधान की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता खुलता है ! समाधान और सही राह के बारे में तफ़सील से बातचीत की ज़रूरत है I वह फिर कभी ...

(23नवम्‍बर,2018)

Saturday, November 24, 2018


समय कुछ ऐसा है कि

कुछ कवि-लेखक-आलोचक

इतने बड़े, इतने बड़े हो गए हैं,

ऐसी ऊँचाइयों तक ऊपर उठ गए है कि

परिभाषाओं और श्रेणियों का अतिक्रमण कर गए हैं

और सत्तासीन फासिस्ट हत्यारे भी मज़बूर हो गए हैं

उनका क़ायल हो जाने के लिए

और उन्हें सम्मानित-पुरस्कृत करने के लिए !

ऐसे कवि-लेखक जब जुटते हैं संगोष्ठियों में

तो अक्सर ऐसा भ्रम हो जाता है कि

माता का जगराता हो रहा है

और कभी-कभी इंक़लाबी जोश में भरकर

जब वे 'लाल सलाम' बोलते हैं

तो उसमें 'जय श्रीराम' की अनुगूँज

सुनाई देती है !
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(सत्ता के संस्कृति प्रतिष्ठानों के तमाम "वामपंथी" घुसपैठियों को, और विशेष तौर पर, नीतीश कुमार की पार्टी से राज्यसभा में पहुँचे पुराने "समाजवादी" पत्रकार हरिवंश के घनिष्ठ मित्र "वामपंथी" आलोचक रविभूषणजी को सादर समर्पित, जिन्होंने पदीदउ के 'एकात्म मानववाद' में कुछ दिनों पहले प्रगतिशीलता के तत्व ढूँढ निकाले थे )

(23नवम्‍बर,2018)

Friday, November 23, 2018

कम्प्यूटर पर बैठे हुए प्रेम के बारे में सोचना



जब हम कठिन उदास मौसम में

सोचते हैं प्यार के बारे में फिर से

निरंतर दुःख देने वाला कोई प्रसंग 'हैंग' कर जाता है

स्मृतियों के स्क्रीन पर I

'शटडाउन' करने के निश्चय के साथ

हम 'पॉवर' को क्लिक करते हैं I

फिर कुछ सोचकर चीज़ों को 'स्लीप' या 'हाइबरनेट' पर

डाल देते हैं I

उस दुखद प्रसंग को हम

'रीस्टार्ट' कत्तई नहीं करना चाहते

लेकिन जब भी हम खोलते हैं

अपना हृदय

वह फिर से 'अपडेट' होकर शुरू हो जाता है I

(22नवम्‍बर,2018)


किसी भी बुद्धिमत्तापूर्ण विचार को तबतक आम स्वीकार्यता नहीं हासिल होती जबतक कि उसमें थोड़ी मूर्खता की मिलावट न कर दी जाये I

-- फर्नान्दो पेसोआ
(पोर्चुगीज़ कवि, 1888-1935)