Friday, September 15, 2017

भीड़ की हिंसा – बेचेहरा हत्यारा या समाज का हत्यारा चेहरा?




(इस लेख का एक संक्षिप्त और संपादित रूप 'रविवार डाइजेस्ट' के अगस्त'2017 अंक में मेरे स्तम्भ 'रहगुज़र' के अंतर्गत प्रकाशित हुआ है । पूरा लेख यहाँ दे रही हूँ । )

--कविता कृष्णपल्लवी

हसन नाम जानलेवा हो सकता है
अमृत यह नाम भी निरापद नहीं रहा
बहुत सुरक्षित नहीं हैं आप
महंगू नाम के साथ
बलबीर सिंह नाम के ख़तरे तमाम हैं
इस तंत्र में सिर्फ आपका नाम
आपकी हत्‍या का सबब हो सकता है
-- देवी प्रसाद मिश्र
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हमारे देश का राष्ट्रीय अपराध भीड़ द्वारा हत्‍या (लिं‍चिंग) है। यह एक घण्‍टे की सृष्टि नहीं है, यह अनियंत्रित क्रोध का आकस्मिक विस्फोट या किसी पागल भीड़ की अकथनीय निर्ममता भी नहीं है।
-- इदा बी. वेल्‍स (1862-1931)
(अश्‍वेत अमेरि‍की पत्रकार और नागरिक अधिकार कर्मी)
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भीड़ का क़ानून असामान्‍य या विरूपित जनमत की सर्वाधिक बलसम्‍पादित अभिव्‍यक्ति है; यह दिखलाता है कि समाज भीतर तक सड़ चुका है।
-- टिमोथी थॉमस फॉर्चुन (1856-1928)
(अमेरिकी लेखक-पत्रकार-नागरिक अधिकार कर्मी)
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राष्‍ट्रीय घृणा एक विलक्षण चीज़ होती है, यह सर्वाधिक मज़बूत और सर्वाधिक हिंसक वहीं होती है जहाँ संस्‍कृति का स्‍तर निम्नतम होता है।
-- जोहान्‍न वोल्फगांग गोयठे
(जर्मन महाकवि, दार्शनिक)
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फासीवाद अपनी प्रकृति से भीड़ का आन्दोलन होता है।
-- पी.जे.ओ' रूर्के
(अमेरिकी पत्रकार और व्यंग्‍यकार)
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कथित गोरक्षकों की भीड़ द्वारा अख़लाक़ और पहलू खान की हत्‍या के बाद, हरियाणा में बल्लभगढ़ रेलवे स्टेशन पर इस वर्ष 22जून को 15 वर्षीय जुनैद को एक भीड़ ने चाकुओं से गोदकर मार डाला। जुनैद ईद की ख़रीदारी करके अपने भाई और दोस्‍तों के साथ दिल्‍ली से वापस अपने गाँव जा रहा था। भीड़ ने उसे गोमांस भक्षक कहा और चाकू मारने से पहले उसकी टोपी उतारकर फेंक दी। इस घटना ने पूरे देश के अमनपसंद नागरिकों की अन्‍तरात्‍मा और विवेक को मानो झकझोरकर रख दिया। सोशल मीडिया पर की गयी एक पहल ने पूरे देश में विरोध की स्‍वत:स्फूर्त लहर सी पैदा कर दी। पचासों शहरों में 'नॉट इन माइ नाम' नाम से नागरिकों ने विरोध प्रदर्शन किये। प्रधान मंत्री ने भी कथित गोरक्षकों के इस जघन्‍य कुकृत्‍य की निन्‍दा की, पर इससे हालात और माहौल में शायद ही बदलाव आये। 5 दिनों बाद ही 27 जून को झारखण्‍ड में क़रीब सौ लोगों ने दूध उत्पादक उस्मान अंसारी की पिटाई करके उसके घर में आग लगा दी। 29जून को राँची के नज़दीक रामगढ़ में अलीमुद्दीन नाम के एक व्यापारी पर हमला करके भीड़ ने उसकी हत्‍या कर दी।
पिछले आठ वर्षों के भीतर सिर्फ गाय के नाम पर भीड़ की हिंसा की 63 ऐसी घटनाएँ घटीं, जिनमें 28लोगों की जान चली गयी। इनमें से 97प्रतिशत घटनाएँ सिर्फ पिछले तीन वर्षों के भीतर घटी हैं। 'इण्डिया स्‍पेण्‍ड' की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में गाय से जुड़ी हिंसा के मामले में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी हुई। इस साल के पहले छ: महीनों में गाय से जुड़ी 20 हिंसात्मक घटनाएँ घटीं, जो 2016 में हुई ऐसी कुछ घटनाओं के दो तिहाई से ज्‍़यादा हैं। कथित गोरक्षकों की भीड़ द्वारा हिंसा की इन घटनाओं में मुसलमानों के अतिरिक्‍त दलित आबादी भी निशाने पर रही है और कहीं-कहीं ईसाई और आदिवासी भी। ग़ौरतलब है कि विगत लगभग दो दशकों के दौरान भीड़ की हिंसा की अभिव्‍यक्तियाँ केवल गाय को लेकर ही सामने नहीं आयी हैं। 'लव जेहाद', धर्मान्तरण आदि की अफ़वाहों से प्रभावित भीड़ की हिंसा की घटनाओं का सिलसिला लगातार चलता रहा है।
ऐसी छिटफुट छोटी-बड़ी घटनाएँ तो देश में पहले भी घटती रही हैं, लेकिन हाल के वर्षों में ऐसी घटनाओं का लगातार जारी रहना हर संवेदनशील और तार्किक चेतना वाले नागरिक को यह सोचने पर मज़बूर करता है कि निरर्थक हिंसा के प्रतीकात्मक और ''भीड़ के उत्‍सव'' जैसे रूप हमारे दैनन्दिन सामाजिक जीवन में किस हद तक और क्‍यों, इस क़दर जड़ें जमाते जा रहे हैं और आम प्रवृत्ति बनते जा रहे हैं!
भीड़ की हिंसा (‘मॉब वॉयलेंस’) और ‘मॉब लिंचिंग’ एक सामाजिक परिघटना है, जो अलग-अलग देशों के इतिहास में, अलग-अलग वक्‍तों में, कई बार विविध रूपों में सामने आती रही हैं। इसके सामाजिक कारणों की पड़ताल करते हुए हमें अतिसामान्‍यीकरण की प्रवृत्ति से बचना होगा। हिंसक भीड़ का मनोविज्ञान अलग-अलग देश कालों में अलग-अलग कारणों से निर्मित होता रहा है। समाजशास्त्रियों, राजनीति विज्ञानियों और सामाजिक मनोविश्‍लेषकों ने इस विषय पर काफी कुछ लिखा है।
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बेशक भीड़ की हिंसा की बर्बरता को कोई भी सभ्‍य नागरिक उचित नहीं ठहरा सकता, लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि इसके पीछे कुछ वास्तविक, औचित्यपूर्ण और न्‍यायसंगत कारण मौज़ूद रहते हैं। कई बार लम्‍बे समय से जारी शासक वर्गों का दमन, आम जनता की असहनीय जीवन-स्थितियाँ, धनिक वर्गों के असीम भोग-विलास, चरम भ्रष्टाचार आदि के चलते भी, किसी संतृप्‍त बिंदु पर पहुँचकर, समाज में एक विस्फोट की तरह भीड़ की हिंसा सामने आती है और सड़कों पर अराजकता फैल जाती है। प्राय: ऐसा तभी होता है जब गहराते जन-असंतोष को एक सुव्यवस्थित जनान्दोलन की शक्‍ल में ढालकर आगे ले जा पाने में सक्षम कोई नेतृत्‍वकारी राजनीतिक शक्ति परि‍दृश्‍य पर मौजूद नहीं होती है। इन स्थितियों में हम कह सकते हैं कि भीड़ की हिंसा ‘वास्तविक चेतना की स्‍वयंस्‍फूर्त विरूपित अभिव्‍यक्ति’ होती है। इसके विपरीत, कुछ स्थितियाँ ऐसी होती हैं जब भीड़ की हिंसा एक ‘मिथ्‍या चेतना’ से जन्‍म लेती है और उसीकी अभिव्‍यक्ति होती है। इस ‘मिथ्‍या चेतना’ के भी कई रूप होते हैं। जिस समाज में धर्म, जाति, गोत्र की ''शुद्धता'' की सहस्राब्दियों पुरानी प्राक् आधुनिक सोच जड़ें जमाये बैठी हो, वहाँ यदि माँ-बाप या खाप पंचायतें जाति-गोत्र-धर्म के बाहर प्रेम या शादी करने पर युवकों-युवतियों को सार्वजनिक तौर पर यदि हिंसक दण्‍ड सुनाते हों तो यह आश्चर्य की बात नहीं है। यह ‘मिथ्‍या चेतना’ का एक उदाहरण है जो प्रतिगामी, मध्‍ययुगीन, सामाजिक-सांस्‍कृतिक मूल्‍यो’-मान्‍यताओं-संस्‍थाओं के रूप में क्रियाशील होती है। जो समाज ऐतिहासिक तौर पर ‘पुनर्जागरण-प्रबोधन-जनवादी क्रांति’ की प्रक्रिया से गुज़रकर मध्‍ययुगीनता के अंधकार से एक झटके से बाहर न आ सके, वहाँ मूल्‍यों-संस्‍कारों के रूप में क्रियाशील ऐसी 'मिथ्‍या चेतना' और उससे पैदा होने वाली भीड़ की हिंसा के रूप प्राय: देखने को मिलते हैं। भारतीय समाज एक ऐसा ही समाज है, जो अपनी स्‍वतंत्र स्‍वाभाविक आंतरिक गति से आधुनिक बुर्जुआ समाज बनने की दिशा में आगे बढ़ने के पहले ही उपनिवेश बन गया। दो सौ वर्षों की ग़ुलामी और 70 वर्षों की आज़ादी के दौरान आधुनिकता और वैज्ञानिक तर्कणा भारतीय जीवन में किसी आमूलगामी सामाजिक क्रांति की प्रक्रिया में नहीं, बल्कि क्रमिक और मंथर गति से आई है। इसलिए ये सतही और विकृत हैं तथा आम सामाजिक जीवन में तमाम प्राक्-आधुनिक मूल्‍यों-संस्‍थाओं की मौज़ूदगी भी बनी हुई है। ऐसे समाज में यदि डायन होने के संदेह में भीड़ किसी स्‍त्री को पीट-पीट कर मार डालती है, या कोई खाप पंचायत जाति या गोत्र के बाहर शादी करने पर किसी को मौत की ''सज़ा'' दे देती है, तो यह आश्‍चर्य की बात नहीं है। ग़ौर से देखें, तो ये संस्‍थाएँ केवल इतिहास की ही देन होने के नाते जीवित नहीं हैं। ये जीवित हैं, क्‍योंकि हमारे देश के जन्‍मना रुग्‍ण और विकलांग पूँजीवाद ने बहुतेरे मध्‍ययुगीन मूल्‍यों-संस्‍थाओं को पुन:संस्‍कारित करके अपना लिया है।
जन समुदाय की 'मिथ्‍या चेतना' का दूसरा रूप वह है, जिसे मज़बूत और व्‍यापक बनाने में, और कई बार तो, उत्‍पादित करने में, शासक वर्ग की प्रचार-तंत्र की प्रमुख भूमिका होती है। दुनिया के विभिन्‍न देशों में नस्‍लवाद, रंगभेद, धार्मिक कट्टरता, अंधराष्‍ट्रवाद, जातिवाद आदि के आधार पर जन-समुदाय को बाँटने के लिए शासक वर्ग ‘मिथ्‍या चेतना’ पैदा करता रहा है। इस आधार पर गहराने वाले अलगाव का विस्‍फोट प्राय: भीड़ की हिंसा के रूप में होता रहा है। नस्‍लवाद, धार्मिक कट्टरपंथ और अंधराष्‍ट्रवाद के आधार पर जनता में जुनूनी मानसिकता पैदा करने का काम विशेष तौर पर, और सबसे सुनियोजित ढंग से फासिस्‍ट शक्तियाँ करती रही हैं, इतिहास इसका गवाह है। फासिस्‍ट शक्तियों की एक अभिलाक्षणिक विशिष्‍टता यह रही है कि वे न सिर्फ जुनूनी हिंसक मानसिकता और भीड़ की हिंसा की ज़मीन तैयार करती हैं, बल्कि वे राजकीय हिंसा के साथ ही भीड़ की हिंसा का एक राजनीतिक उपकरण के तौर पर सुनियोजित ढंग से इस्‍तेमाल भी करती हैं। फासिस्‍टों द्वारा विनिर्मित-प्रेरित भीड़ की हिंसा की चर्चा मैं अलग से लेख के अगले भाग में करूँगी। इसके पहले इतिहास में वास्‍तविक चेतना की विरूपित, स्‍वयंस्‍फूर्त अभिव्‍यक्ति और ‘मिथ्‍या चेतना’ की अभिव्‍यक्ति -- इन दोनों ही प्रकृति की भीड़ की हिंसा के कुछ प्रतिनिधि उदाहरणों की चर्चा कर ली जाये, तो बेहतर होगा।
14 जुलाई, 1789 को आम ग़रीबों की एक भीड़ ने फ्रांस में बास्‍तीय के किले पर हमला करके गवर्नर और कई अधिकारियों तथा सैनिकों की हत्‍या कर दी थी और किले की ईंट से ईंट बजा दी थी। इस दौरान भीड़ में शामिल 83 लोग भी मारे गये थे। ऐतिहासिक तौर पर यही घटना आगे चलकर फ्रांसीसी क्रांति का प्रस्‍थान-बिन्‍दु बन गयी। बास्‍तीय दुर्ग पर जिस हिंसक भीड़ ने धावा बोला था, वह लुई सोलहवें के भ्रष्‍ट और निरंकुश प्रशासन से तंग थी और भुखमरी तथा घनघोर अभाव की शिकार थी। बास्‍तीय की घटना जनता की वास्‍तविक चेतना का एक हिंसक विस्‍फोट थी।
1814 में मिलान में दंगा फैला और भीड़ ने मनमाने ढंग से कर लगाने वाले नेपोलियन के निरंकुश वित्‍त मंत्री गिस्‍पे प्रीना की बेरहमी से हत्‍या कर दी। भीड़ का यह आतंक भयानक था, पर इसके पीछे भी जेनुइन कारण थे। अत: यह भी वास्‍तविक चेतना की विरूपित स्‍वत:स्‍फूर्त अभिव्‍यक्ति था।
अठारहवीं शताब्‍दी के अंत से लेकर उन्‍नीसवीं शताब्‍दी के तीसरे दशक तक अमेरिका में बड़े पैमाने पर मेक्सिकी आप्रवासी मज़दूर भीड़ की हिंसा के शिकार हुए। 1780 में अमेरिका में श्‍वेतों-अश्‍वेतों की हिंसक भीड़ के टकराव में 5 हजार लोग मारे गये। 1903 से 1906 के बीच, रूस में जार अलेक्‍सान्‍द्र द्व‍ितीय के शासन काल के दौरान 2000 से अधिक यहूदी हिंसक भीड़ द्वारा मार डाले गये। 1919 में लीवरपूल में एक अफ्रीकी द्वारा दो गोरों को चाकू मार देने के बाद पूरे ब्रिटेन में नस्‍ली दंगे भड़क उठे थे और राह चलते आम अश्‍वेतों को बड़े पैमाने पर भीड़ की हिंसा का शिकार होना पड़ा था। 1949 में दक्षिण अफ्रीका में 142 भारतीयों को और फिर 1985 में 55 भारतीयों को भीड़ ने मौत के घाट उतार दिया था। ये ऐसी अंधी-बर्बर हिंसा की घटनाएँ थीं, जिनमें निराशा में उन्मत्‍त या प्रतिशोध की भावना से पागल आम लोगों की भीड़ ने उन आम लोगों को अपना शिकार बनाया जिन्‍हें वे ‘पराया’ या ‘बाहरी’ समझते थे और अपनी ज़ि‍न्‍दगी की समस्‍याओं के लिए ज़िम्‍मेदार मानने के नाते अपना शत्रु समझते थे। ये ‘मिथ्‍या चेतना’ की प्रातिनिधिक अभिव्‍यक्तियाँ थीं। 1984 में श्रीमती इन्दिरा गाँधी की हत्‍या के बाद दिल्‍ली में और देश के बहुतेरे शहरों में सिखों के विरुद्ध बर्बर हिंसा का जो नंगा नाच हुआ था, वह भी ऐसी ही परिघटना का एक प्रतिनिधि उदाहरण था।
हाइती में तानाशाह दुबालियर की सत्‍ता के पतन से पहले आलम यह था कि अराजक भीड़ सड़कों पर अमीर लोगों को उनकी मँहगी अमेरिकी गाड़ि‍यों से बाहर खींच लेती थी और उनके गले में जलता टायर डालकर उन्‍हें मार डालती थी। यह हिंसा बर्बर थी, लेकिन यह दशकों से जारी धनिक अल्‍पतंत्र के विलासी, भ्रष्‍ट, दमनकारी शासन के विरुद्ध खौलते गुस्‍से का स्‍वयंस्‍फूर्त विस्‍फोट था। दुनिया के कई देशों में और औपनिवेशिक काल में हमारे देश में भी अकाल और भुखमरी के दौर में खाद्यान्‍न दंगों का इतिहास मिलता है, जब भूखी भीड़ ने सड़कों पर हिंसा का ताण्‍डव किया था, पर इस अंधी हिंसा के पीछे के कारणों को सहज ही समझा जा सकता है। इसके पीछे अन्‍याय के विरुद्ध विद्रोह की वास्तविक चेतना काम कर रही थी, जो दिशाहीन और अराजक थी।
लेकिन जुनैद, पहलू खान, अख़लाक और अलीमुद्दीन जैसे आम लोग भीड़ की जिस हिंसा का शिकार हुए, वह एक सर्वथा अलग परिघटना है। ग़ौर से देखें तो उस बेचेहरा हिंसक भीड़ के पीछे हमें एक सुनिश्चित विचारधारा और राजनीति का चेहरा दिखाई देता है, जिसकी सटीक ढंग से शिनाख्‍़त करने के लिए फासिज्‍़म की परिघटना को समझना ज़रूरी है। फासिज्‍़म के दौर में राजकीय हिंसा, संगठित फासिस्‍ट गुण्‍डा-वाहिनियों की हिंसा और भीड़ की हिंसा का एक विचित्र सहमेल स्‍थापित हो जाता है। फासिज्‍़म सुव्‍यवस्थित प्रचार द्वारा उन्‍मादी हिंसक भीड़ की ‘मिथ्‍या चेतना’ का निर्माण करता है। फासिज्‍़म के दौर में भीड़ की ‘मिथ्‍या चेतना’ स्‍वयंस्‍फूर्त नहीं होती, बल्कि उसे व्‍यवस्थित ढंग से गढ़ा जाता है। इसे समझने के लिए फासिज्‍़म की संरचना और सामाजिक आधार को समझना ज़रूरी है।
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चलती ट्रेन के खचाखच भरे डिब्‍बे में
चाकुओं से गोद-गोद कर मार दिया गया
क्‍योंकि वह जुनैद था
झगड़ा भले ही हुआ हो बैठने की जगह के लिए
लेकिन वह मारा गया
क्‍योंकि वह जुनैद था
न उसके पास कोई गाय थी
न ही फ्रिज में मांस का कोई टुकड़ा
फिर भी मारा गया क्‍योंकि वह जुनैद था
सारे तमाशबीन डरे हुए नहीं थे
लेकिन चुप सब थे क्‍योंकि वह जुनैद था
डेढ़ करोड़ लोगों की रोजी छिन गयी थी
पर लोग नौकरी नहीं जुनैद को तलाश रहे थे
जितने नये नोट छापने पर खर्च हुए थे
उतने का भी काला धन नहीं आया था
पर लोग गुम हो गये पैसे नहीं
जुनैद को खोज रहे थे
सबको समझा दिया गया था
बस तुम जुनैद को मारो
नौकरी नहीं मिली जुनैद को मारो
खाना नहीं खाया जुनैद को मारो
वायदा झूठा निकला जुनैद को मारो
माल्‍या भाग गया जुनैद को मारो
अडाणी ने शान्तिग्राम बसाया जुनैद को मारो
जुनैद को मारो
जुनैद को मारो
सारी समस्‍याओं का रामबान समाधान था
जुनैद को मारो
ज्ञान के सारे दरवाजों को बंद करने पर भी
जब मनुष्‍य का विवेक नहीं मरा
तो उन्‍होंने उन्‍माद के दरवाज़े को और चौड़ा किया जुनैद को मारो!!
... ...
-- मदन कश्‍यप
(कविता का एक अंश)
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बहाना कुछ भी करो
और जुनैद को मार डालो।
... ...
ज़रूरी नहीं कि हर बार तुम्‍हीं जुनैद को मारो
तुम सिर्फ एक उन्‍माद पैदा करो, एक पागलपन
हत्‍यारे उनमें से अपनेआप पैदा हो जायेंगे
और फिर वो एक जुनैद तो क्‍या, हर जुनैद को
मार डालेंगे।
भीड़ हजारों की हो या लाखों की क्‍या फर्क पड़ता है
अंधे-बहरों की भीड़ गवाही नहीं देती
... ...
जुनैद को मारना उनका मकसद नहीं
पर क्‍या करें तानाशाही की सड़क
बिना लाशों की नहीं बनती।
-- राजेश जोशी
(कविता का एक अंश)
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यह नयी राजनीतिक शैली है
कि हत्‍या की नहीं जाती
वह माहौल बनाया जाता है
जिसमें हत्‍या
एक स्‍वाभाविक कर्म हो
जो इस माहौल के जनक हैं
वे हत्‍या पर
अफ़सोस करते हैं
-- पंकज चतुर्वेदी
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पहली बार जब ख़बर आयी कि हमारे दोस्‍तों का कत्‍ल किया जा रहा है, हाहाकार के स्‍वर उठे। लेकिन जब एक हज़ार मारे गये और हत्‍याओं का यह सिलसिला रुका नहीं, चारों ओर ख़ामोशी छा गयी। जब दुष्‍टताएँ वर्षा की तरह गिरने लगती हैं, उन्‍हें कोई नहीं रोकता। जब अपराध इकट्ठा होने लगते हैं, वे नज़र आना बंद हो जाते हैं। जब पीड़ाएँ असहनीय हो जाती हैं, सिसकियाँ सुनायी नहीं देतीं। सिसकियाँ भी ग्रीष्‍म की वर्षा की तरह गिरने लगतीं हैं।
-- बेर्टोल्‍ट ब्रेष्‍ट
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हमारे देश की सड़कों पर भीड़ की हिंसा के जो रूप आज देखने को मिल रहे हैं, उन्‍हें समझने के लिए 1930 के दशक के ज़र्मनी की एक संक्षिप्‍त इतिहास-यात्रा की जानी चाहिए। ज़र्मन पूँजीवाद को तब ऐसे आक्रामक राष्‍ट्रीय नेता और पार्टी की ज़रूरत थी जो सैन्‍य शक्ति के बल पर यूरोपीय साम्राज्‍यवादी देशों से दुनिया के बाज़ार का बड़ा हिस्‍सा छीनकर मन्‍दी के संकट से निज़ात दिला सके और साथ ही, संगठित मज़दूर आन्‍दोलन और कम्‍युनिस्‍ट आन्‍दोलन की कमर तोड़कर समाजवाद के भूत से भी छुटकारा दिला सके। हिटलर और उसकी नात्‍सी पार्टी ने इसी ज़रूरत को पूरा किया। हिटलर ने आर्य नस्‍ल की “श्रेष्‍ठता” और “शुद्धता” पर आधारित ज़र्मन अन्‍धराष्‍ट्रवाद का नारा बुलन्‍द किया। राष्‍ट्र की एकता के लिए मज़दूर आन्‍दोलन और कम्‍युनिस्‍टों को बाधक बताते हुए उन्‍हें सबसे पहले निशाना बनाया गया। इसमें राज्‍य मशीनरी के साथ ही नात्‍सी पार्टी की गुण्‍डा वाहिनियों की अहम भूमिका थी। आर्य नस्‍ल की श्रेष्‍ठता आधारित ज़र्मन राष्‍ट्रवाद के अन्‍तर्निहित तर्क के हिसाब से नात्सियों का अगला निशाना यहूदियों को बनना ही था जो आर्य नहीं थे और जिनकी आबादी रूस और पोलैण्‍ड से लेकर सभी यूरोपीय देशों में बिखरी थी। फलत: ज़र्मन यहूदियों की देशभक्ति को संदिग्‍ध प्रचारित कर देना भी सुगम था। 1930 के दशक के प्रारम्‍भ से ही सरकार और नात्‍सी पार्टी की प्रोपेगैण्‍डा मशीनरी यहूदियों के ख़िलाफ़ शेष ज़र्मन आबादी के दिलो-दिमाग़ में लगातार ज़हर घोल रही थी और उन‍की छवि ‘पराये’, ‘अन्‍य’ और ‘बाहरी’ के रूप में स्‍थापित कर रही थी। यहूदियों पर और उनके घरों-दुकानों पर यहाँ-वहाँ हमलों की शुरुआत पहले एस.एस.(नात्‍सी पार्टी की गुण्‍डा वाहिनी) के दस्‍तों ने की। फिर जगह-जगह भीड़ भी उनपर हमले करने लगी। ‘क्रिस्‍टल नाइट’ नाम से इतिहास-प्रसिद्ध 9-10 नवम्‍बर 1938 की रात वह निर्णायक रात थी जब यहूदियों के क़त्‍लेआम के मंसूबे को पूरी ताक़त और तैयारी के साथ अमली जामा पहनाया गया। यह काम केवल एस.एस. के दस्‍तों ने ही नहीं किया। प्रचार-सम्‍मोहित हिटलर-समर्थक आम आबादी एक बर्बर भीड़ में तब्‍दील हो चुकी थी। सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं। प्रेस को चुप रहना था। पुलिस को किनारे खड़ा रहना था और भीड़ को उसका काम करने देना था। दस साल के भीतर हिटलर ने ज़र्मनी को यहूदियों से खा़ली करने का निर्देश गोयबेल्‍स को दिया था। 9-10 दिसम्‍बर 1938 की रात इसे फैसलाकुन अंजाम तक पहुँचा दिया गया। रक्‍तपात, आगज़नी और तोड़फोड़ की वह रात इतिहास के पन्‍नों पर हमेशा के लिए दर्ज़ हो गयी।
हिटलर नाम का व्‍यक्ति तो इतिहास के क़ब्रिस्‍तान में कभी का दफ़्न हो चुका है, लेकिन उसकी विचारधारा जीवित है और पूँजीवाद के वर्तमान असाध्‍य ढाँचागत संकट के दौर में दुनिया के बहुतेरे देशों में सत्‍ताधारी नस्‍लवाद, अंधराष्‍ट्रवाद और धार्मिक कट्टरपंथ के हिटलरी नुस्‍खों को तरह-तरह से आज़मा रहे हैं। अतीत से सबक़ लेकर पूँजीपति वर्ग फासिज्‍़म को एकदम खुला नहीं छोड़ रहा है, बल्कि जंज़ीर से बँधे हुए खूँखा़र भेडि़ये की तरह इस्‍तेमाल कर रहा है। फासिस्‍ट संस्‍थाओं की प्रोपेगैण्‍डा मशीनरी लगातार विविध रूपों में ऐसी भीड़ के सामूहिक मानस का निर्माण कर रही है जो ‘पराया’ या ‘अन्‍य’ समझी जाने वाली किसी भी धार्मिक, भाषाई, नस्‍ली या आप्रवासी अल्‍पसंख्‍यक आबादी पर झपट पड़ने के लिए तैयार है। यह मानसिकता स्‍वनिर्मित नहीं है, बल्कि ‘मैन्‍युफैक्‍चर्ड’' है। अलग-अलग देशों में इसके रूप अलग-अलग हैं। फासिज्‍़म की अन्‍तर्वस्‍तु को समझे बिना इस बात को समझना मुश्किल है कि गाय की रक्षा या ‘लव जेहाद’, वैलेण्‍टाइन डे आदि के विरोध के नाम पर जो भीड़ सड़कों पर हिंसा का ख़ूनी खेल खेलती है, वह बेचेहरा लगती है, पर दरअसल वह अपने आप में एक राजनीति-विशेष का चेहरा है। यह राजनीति है, फासिज्‍़म की राजनीति।
फासिज्‍़म वित्‍तीय पूँजी के आर्थिक हितों की सर्वाधिक प्रतिक्रियावादी राजनीतिक अभिव्‍यक्ति होता है, पर यह केवल निरंकुश राज्‍यसत्‍ता या तानाशाही के रूप में ही नहीं होता है, बल्कि मध्‍यवर्ग का एक प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्‍दोलन होता है। यह परेशानहाल मध्‍यवर्ग के पीले-बीमार चेहरे वाले युवाओं को लोकलुभावन नारे देकर और “गढ़े गये” शत्रु के विरुद्ध उन्‍माद पैदा करके उन्‍हें अपने साथ गोलबन्‍द करता है। उत्‍पादन की प्रक्रिया से बाहर धकेल दिये गये विमानवीकृत (डीह्यूमनाइज्‍़ड) और लम्‍पट सर्वहाराओं की भी यह अपनी गुण्डावाहिनियों में भरती करता है। फासिज्‍़म तृणमूल स्‍तर पर नाना प्रकार के कैडर-आधारित सांगठनिक ढाँचों के ज़रिए काम करता है जो इस प्रतिक्रिया‍वादी सामाजिक आन्‍दोलन के स्‍नायुतंत्र के समान होते हैं।
फासिज्‍़म हमेशा उग्र अन्‍धराष्‍ट्रवादी नारे देता है। वह संस्‍कृति का लबादा ओढ़कर आता है, संस्‍कृति का मुख्‍य घटक धर्म या नस्‍ल को बताता है और सांस्‍कृतिक राष्‍ट्रवाद का नारा देता है। इस तरह देश-विशेष में बहुसंख्‍यक धर्म या नस्‍ल का “राष्‍ट्रवाद” ही मान्‍य हो जाता है और धार्मिक या नस्‍ली अल्‍पसंख्‍यक स्‍वत: “पराये” या “बाहरी” हो जाते हैं। एक आधुनिक परिघटना के रूप में राष्‍ट्रवाद की वैज्ञानिक अवधारणा को अस्‍वीकारने के लिए सभी फासिस्‍ट अपने राष्‍ट्र को प्राचीन काल से ही ‘महान राष्‍ट्र’ के रूप में मौज़ूद बताते हैं, मिथकों को ऐतिहासिक यथार्थ बताते हैं और इतिहास का मिथकीकरण करते हैं। धार्मिक या नस्‍ली अल्‍पसंख्‍यकों को निशाना बनाने के लिए फासिस्‍ट संस्‍कृति और इतिहास का विकृतिकरण करने के लिए तृणमूल स्‍तर पर मौज़ूद शिक्षा और प्रचार के अपने वैकल्‍पिक तंत्र का तथा धार्मिक प्रतिष्‍ठानों का निरंतर इस्‍तेमाल करते हैं। सत्‍ता में आने के बाद, वे मुख्‍य धारा की मीडिया के बड़े हिस्‍से को, सरकारी प्रचार तंत्र को और शिक्षा तंत्र को भी इस काम में सन्‍नद्ध कर देते हैं। पिछड़े समाजों में मौज़ूद रूढि़यों और मध्‍ययुगीन मूल्‍यों का भी वे जमकर अपने पक्ष में इस्‍तेमाल करते हैं। इन दिनों सोशल मीडिया का इस्‍तेमाल करने में भी फासिस्‍ट सबसे आगे हैं। आज के फासिस्‍ट हिटलर की तरह यहूदियों के सफ़ाये के बारे में नहीं सोचते। दंगों, राज्‍य-प्रायोजित नरसंहारों और कुशल ढंग से उकसायी गयी भीड़ की हिंसा के ज़रिए आतंक पैदा करके वे धार्मिक अल्‍पसंख्‍यकों को ऐसा दोयम दर्जे का नागरिक बना देना चाहते हैं, जिनके लिए क़ानून और जनवादी अधिकारों का कोई मतलब न रह जाये और अर्थव्‍यवस्‍था में भी उनकी भागीदारी ज्‍़यादातर निकृष्‍टतम श्रेणी के उजरती ग़ुलामों के रूप में ही रह जाये। साथ ही, धार्मिक अलगाव के ज़रिए, वे आम मेहनतक़श जनता की एकजुटता को भी तोड़ने का काम करते हैं।
भारत के राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्‍य पर एक खाँटी फासिस्‍ट संगठन के रूप में आर.एस.एस.1925 से ही मौज़ूद रहा है और लगातार सक्रिय रहा है। लेकिन स्‍वातंत्र्योत्‍तर भारत के पूँजीवादी समाज में सापेक्षिक अर्थों में जबतक विकास की आंतरिक त्‍वरा बची हुई थी, इसका अनुषंगी राजनीतिक संगठन संसदीय राजनीति में और समाज में हाशिए पर ही बना रहा। व्‍यवस्‍था का संकट बढ़ने के साथ ही राजनीति और समाज में इसका प्रभाव-विस्‍तार होता गया। अपने असाध्‍य ढाँचागत संकट और गतिरोध से निजात पाने के लिए भारतीय पूँजीवाद ने 1990 के दशक में जब नवउदारवाद की राह पकड़ी, तो इसी दौर में संघ और भाजपा का तेजी से विस्‍तार हुआ। जो नवउदारवाद का दौर रहा है, वही आडवाणी की रथयात्रा, बाबरी मस्जिद ध्‍वंस, और गुजरात-2002 से लेकर मोदी के सत्‍तारूढ़ होने तक का भी दौर रहा है। 2014 के बाद से लगातार राजकीय हिंसा, हिन्‍दुत्‍ववादी गुण्‍डा वाहिनियों की हिंसा और भीड़ की हिंसा के त्रिभुज की काली छाया पूरे देश पर फैलती जा रही है। धार्मिक अल्‍पसंख्‍यकों के बीच भी जो कट्टरपंथी तत्‍व हैं, उनकी सरगर्मियों और निरुपाय निराशा में की जाने वाली छिटफुट आतंकवादी गतिविधियों से भी हिन्‍दुत्‍ववादी बहुलतावादी फासिस्‍ट धारा को ही और मज़बूती मिलती है।
निचोड़ के तौर पर, कहा जा सकता है कि इस समय सड़कों पर उन्‍मादी भीड़ की अंधी हिंसा का जो “पैशाचिक उत्‍सव” जारी है, वह फासिज्‍़म के वर्चस्‍व के दौर की ही एक परिघटना है। इस भीड़ का कोई चेहरा नहीं है, बल्कि यह भीड़ स्‍वयं फासिज्‍़म की विचारधारा और राजनीति का एक चेहरा है। जैसा कि हमने पहले ही कहा है, फासिज्‍़म तृणमूल स्‍तर से संगठित, मध्‍यवर्ग का एक धुर-प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्‍दोलन होता है। केवल बौद्धिक दायरे तक सीमित रहकर और प्रतीकात्‍मक कार्रवाइयों या शांति और सर्वधर्मसमभाव की अपीलों से हम फासिज्‍़म प्रायोजित भीड़ की हिंसा का मुक़ाबला नहीं कर सकते। केवल, तृणमूल स्‍तर से एक प्रगतिशील सामाजिक आन्दोलन संगठित करके ही इसका प्रतिरोध किया जा सकता है।
सवाल सिर्फ़ संसदीय चुनावों में किसी पार्टी विशेष को हराने का नहीं है, बल्कि एक आन्‍दोलन-विशेष के सामाजिक आधार को नष्‍ट करने का है।

हत्यारे का चेहरा

(रविवार डाइजेस्‍ट के अगस्‍त,2017 अंक में 'रहगुज़र' कॉलम में प्रकाशित मेरी टिप्‍पणी)

-- कविता कृष्णपल्लवी
 
कथित गोरक्षकों की भीड़ द्वारा अखलाक और पहलू खान की हत्या के बाद हरियाणा में बल्लभगढ़ रेलवे स्टेशन पर इस वर्ष 22 जून को पंद्रह साल के जुनैद को एक भीड़ ने चाकुओं से गोदकर मार डाला। जुनैद ईद की खरीदारी करके अपने भाई और दोस्तों के साथ दिल्ली से वापस अपने गाँव जा रहा था। भीड़ ने उसे गोमांस भक्षक कहा और चाकू मारने से पहले उसकी टोपी उतारकर फेंक दी। इस घटना ने पूरे देश की अन्तरात्मा और विवेक को मानो झकझोरकर रख दिया। सोशल मीडिया पर की गयी एक पहल ने पूरे देश में विरोध की स्वत:स्फूर्त लहर-सी पैदा कर दी। पचासों शहरों में 'नॉट इन माइ नेम' नाम से नागरिकों ने विरोध प्रदर्शन किये। प्रधानमंत्री ने भी इस जघन्य कुकृत्य की निन्दा की, पर इसके पाँच दिन बाद ही 27 जून को झारखंड में करीब सौ लोगों ने दूध विक्रेता उस्मान अंसारी की पिटाई कर उसके घर में आग लगा दी। 29 जून को राँची के नजदीक रामगढ़ में अलीमुद्दीन नाम के एक व्यापारी पर हमला कर भीड़ ने उसकी हत्या कर दी।
पिछले आठ वर्षों के भीतर सिर्फ गाय के नाम पर भीड़ की हिंसा की 63 ऐसी घटनाएँ घटीं, जिनमें 28 लोगों की जान चली गयी। इनमें से 97 प्रतिशत घटनाएँ सिर्फ पिछले तीन वर्षों के भीतर घटी हैं। 'इण्डिया स्पेण्ड' की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में गाय से जुड़ी हिंसा के मामलों में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई। इस साल के पहले छह महीनों में गाय से जुड़ी 20 हिंसात्मक घटनाएँ घटीं, जो 2016 में हुई ऐसी कुछ घटनाओं के दो तिहाई से ज्यादा हैं। कथित गोरक्षकों की भीड़ द्वारा हिंसा की इन घटनाओं में मुसलमानों के अतिरिक्त दलित आबादी भी निशाने पर रही है और कहीं-कहीं ईसाई और आदिवासी भी। गौरतलब है कि पिछले लगभग दो दशकों के दौरान भीड़ की हिंसा की अभिव्यक्तियाँ केवल गाय को लेकर ही सामने नहीं आयी हैं। 'लव जेहाद', धर्मान्तरण आदि की अफवाहों से प्रभावित भीड़ की हिंसा की घटनाओं का सिलसिला लगातार चलता रहा है।
बेशक, भीड़ की हिंसा की बर्बरता को कोई भी सभ्य नागरिक उचित नहीं ठहरा सकता, लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि इसके पीछे कुछ वास्तविक, औचित्यपूर्ण और न्यायसंगत कारण मौजूद रहते हैं। कई बार लम्बे समय से जारी शासक वर्गों का दमन, आम जनता की असहनीय जीवन-स्थितियाँ, धनिक वर्गों के असीम भोग-विलास, चरम भ्रष्टाचार आदि के चलते भी, किसी संतृप्त बिंदु पर पहुँचकर, समाज में एक विस्फोट की तरह भीड़ की हिंसा सामने आती है और सड़कों पर अराजकता फैल जाती है। प्राय: ऐसा तभी होता है, जब गहराते जनअसंतोष को एक सुव्यवस्थित जनान्दोलन की शक्ल मंर ढालकर आगे ले जा पाने में सक्षम कोई नेतृत्वकारी राजनीतिक शक्ति परिदृश्य पर मौजूद नहीं होती है। इन स्थितियों में हम कह सकते हैं कि भीड़ की हिंसा 'वास्तविक चेतना की स्वतःस्फूर्त विरूपित अभिव्यक्ति' होती है। इसके विपरीत, कुछ स्थितियाँ ऐसी होती हैं जब भीड़ की हिंसा एक 'मिथ्या चेतना' से जन्म लेती है और उसी की अभिव्यक्ति होती है। जिस समाज में धर्म, जाति, गोत्र का 'शुद्धता' की सहस्राब्दियों पुराना प्राक्-आधुनिक सोच जड़ें जमाये बैठा हो, वहाँ यदि माँ-बाप या खाप पंचायतें जाति-गोत्र-धर्म के बाहर प्रेम या शादी करने पर युवकों-युवतियों को सार्वजनिक तौर पर हिंसक दण्ड सुनाते हों तो यह आश्चर्य की बात नहीं है। जो समाज ऐतिहासिक तौर पर 'पुनर्जागरण-प्रबोधन-जनवादी क्रांति' की प्रक्रिया से गुजरकर मध्ययुगीनता के अंधकार से एक झटके से बाहर न आ सके, वहाँ मूल्यों-संस्कारों के रूप में क्रियाशील ऐसी 'मिथ्या चेतना' और उससे पैदा होने वाली भीड़ की हिंसा के रूप प्राय: देखने को मिलते हैं। भारतीय समाज एक ऐसा ही समाज है, जो अपनी स्वतंत्र स्वाभाविक आंतरिक गति से आधुनिक बुर्जुआ समाज बनने की दिशा में आगे बढ़ने के पहले ही उपनिवेश बन गया। दो सौ वर्षों की ग़ुलामी और 70 वर्षों की आजादी के दौरान आधुनिकता और वैज्ञानिक तर्कणा भारतीय जीवन में किसी आमूलगामी सामाजिक क्रांति की प्रक्रिया में नहीं, बल्कि क्रमिक और मंथर गति से आयी है। इसलिए यह सतही और विकृत है तथा आम सामाजिक जीवन में तमाम प्राक्-आधुनिक मूल्यों-संस्थाओं की मौजूदगी भी बनी हुई है। ऐसे समाज में यदि डायन होने के संदेह में भीड़ किसी स्त्री को पीट-पीट कर मार डालती है या कोई खाप पंचायत जाति या गोत्र के बाहर शादी करने पर किसी को मौत की 'सज़ा'दे देती है, तो यह आश्चर्य की बात नहीं है। गौर से देखें, तो ये संस्थाएँ केवल इतिहास की देन होने के नाते जीवित नहीं हैं। ये जीवित हैं, क्योंकि हमारे देश के जन्मना रुग्ण और विकलांग पूँजीवाद ने बहुतेरे मध्ययुगीन मूल्यों-संस्थाओं को पुन:संस्कारित करके अपना लिया है।
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14 जुलाई 1789 को गरीबों की एक भीड़ ने फ्रांस में बास्तीय के किले पर हमला कर गवर्नर और कई अधिकारियों तथा सैनिकों की हत्या कर दी थी और किले की ईंट से ईंट बजा दी थी। इस दौरान भीड़ में शामिल 83 लोग भी मारे गये थे। यही घटना आगे चलकर फ्रांसीसी क्रांति का प्रस्थान बिन्दु बन गयी। बास्तीय दुर्ग पर जिस हिंसक भीड़ ने धावा बोला था, वह लुई सोलहवें के भ्रष्ट और निरंकुश प्रशासन से तंग थी और भुखमरी तथा घनघोर अभाव का शिकार थी। 1814 में मिलान में दंगा फैला और भीड़ ने मनमाने ढंग से कर लगाने वाले नेपोलियन के निरंकुश वित्त मंत्री गिस्पे प्रीना की बेरहमी से हत्या कर दी। भीड़ का यह आतंक भयानक था, पर इसके पीछे भी जेनुइन कारण थे। यह भी वास्तविक चेतना की विरूपित स्वत:स्फूर्त अभिव्यक्ति था।
अठारहवीं शताब्दी के अंत से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक तक अमेरिका में बड़े पैमाने पर मेक्सिकी अप्रवासी मजदूर भीड़ की हिंसा के शिकार हुए। 1780 में अमेरिका में श्वेतों-अश्वेतों की हिंसक भीड़ के टकराव में 5 हजार लोग मारे गये। 1903 से 1906 के बीच, रूस में जार अलेक्सान्द्र द्वितीय के शासन काल के दौरान 2000 से अधिक यहूदी हिंसक भीड़ द्वारा मार डाले गये। 1919 में लीवरपूल में एक अफ्रीकी द्वारा दो गोरों को चाकू मार देने के बाद पूरे ब्रिटेन में नस्ली दंगे भड़क उठे थे और राह चलते आम अश्वेतों को बड़े पैमाने पर भीड़ की हिंसा का शिकार होना पड़ा था। 1949 में दक्षिण अफ्रीका में 142 भारतीयों को और फिर 1985 में 55 भारतीयों को भीड़ ने मौत के घाट उतार दिया था। ये ऐसी अंधी-बर्बर हिंसा की घटनाएँ थीं, जिनमें निराशा में उन्मत्त या प्रतिशोध की भावना से पागल आम लोगों की भीड़ ने उन आम लोगों को अपना शिकार बनाया, जिन्हें वे 'पराया' या 'बाहरी' समझते थे और अपनी जिंन्दगी की समस्याओं के लिए जिम्मेदार मानने के नाते अपना शत्रु समझते थे। ये 'मिथ्या चेतना' की प्रतिनिधिक अभिव्यक्तियाँ थीं। 1984 में श्रीमती इन्दिरा गाँधी की हत्या के बाद दिल्ली में और देश के बहुतेरे शहरों में सिखों के विरुद्ध बर्बर हिंसा का जो नंगा नाच हुआ था, वह भी ऐसी ही परिघटना का एक प्रतिनिधि उदाहरण था।
लेकिन, जुनैद, पहलू खान, अखलाक और अलीमुद्दीन जैसे आम लोग भीड़ की जिस हिंसा का शिकार हुए, वह एक सर्वथा अलग परिघटना है। गौर से देखें तो उस बेचेहरा हिंसक भीड़ के पीछे हमें एक सुनिश्चित विचारधारा और राजनीति का चेहरा दिखाई देता है, जिसकी सटीक ढंग से शिनाख्त करने के लिए फासिज्म की परिघटना को समझना जरूरी है। फासिज्म के दौर में राजकीय हिंसा, संगठित फासिस्ट गुण्डा-वाहिनियों की हिंसा और भीड़ की हिंसा का एक विचित्र सहमेल स्थापित हो जाता है। फासिज्म सुव्यवस्थित प्रचार द्वारा उन्मादी हिंसक भीड़ की 'मिथ्या चेतना' का निर्माण करता है। फासिज्म के दौर में भीड़ की 'मिथ्या चेतना' स्वतःस्फूर्त नहीं होती,बल्कि उसे व्यवस्थित ढंग से गढ़ा जाता है।
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हमारे देश की सड़कों पर भीड़ की हिंसा के जो रूप आज देखने को मिल रहे हैं, उन्हें समझने के लिए 1930 के दशक के जर्मनी की एक संक्षिप्त इतिहास यात्रा की जानी चाहिए। जर्मन पूँजीवाद को तब ऐसे आक्रामक राष्ट्रीय नेता और पार्टी की जरूरत थी जो सैन्य शक्ति के बल पर यूरोपीय साम्राज्यवादी देशों से दुनिया के बाजार का बड़ा हिस्सा छीनकर मन्दी के संकट से निजात दिला सके और साथ ही, संगठित मजदूर आन्दोलन और कम्युनिस्ट आन्दोलन की कमर तोड़कर समाजवाद के भूत से भी छुटकारा दिला सके। हिटलर और उसकी नात्सी पार्टी ने इसी जरूरत को पूरा किया। हिटलर ने आर्य नस्ल की 'श्रेष्ठता' और 'शुद्धता' पर आधारित जर्मन अंधराष्ट्रवाद का नारा बुलन्द किया। राष्ट्र की एकता के लिए मजदूर आन्दोलन और कम्युनिस्टों को बाधक बताते हुए उन्हें सबसे पहले निशाना बनाया गया। इसमें राज्य मशीनरी के साथ ही नात्सी पार्टी की गुण्डा वाहिनियों की अहम भूमिका थी। आर्य नस्ल की श्रेष्ठता पर आधारित जर्मन राष्ट्रवाद के अन्तर्निहित तर्क के हिसाब से नात्सियों का अगला निशाना यहूदियों को बनना ही था, जो आर्य नहीं थे और जिनकी आबादी रूस और पोलैण्ड से लेकर सभी यूरोपीय देशों में बिखरी थी। फलत: जर्मन यहूदियों की देशभक्ति को संदिग्ध प्रचारित कर देना भी सुगम था। 1930 के दशक के प्रारम्भ से ही सरकार और नात्सी पार्टी की प्रोपेगैण्डा मशीनरी यहूदियों के खिलाफ शेष जर्मन आबादी के दिलो-दिमाग में लगातार जहर घोल रही थी और उनकी छवि 'पराये', 'अन्य' और 'बाहरी' के रूप में स्थापित कर रही थी। यहूदियों पर और उनके घरों-दुकानों पर यहाँ-वहाँ हमलों की शुरुआत पहले एसएस (नात्सी पार्टी की गुण्डा वाहिनी) के दस्तों ने की। फिर जगह-जगह भीड़ भी उनपर हमले करने लगी। 'क्रिस्टल नाइट' नाम से इतिहास-प्रसिद्ध 9-10 नवम्बर 1938 की रात वह निर्णायक रात थी जब यहूदियों के कत्लेआम के मंसूबे को पूरी ताकत और तैयारी के साथ अमली जामा पहनाया गया। यह काम केवल एसएस के दस्तों ने ही नहीं किया। प्रचार-सम्मोहित हिटलर-समर्थक आम आबादी एक बर्बर भीड़ में तब्दील हो चुकी थी। सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं। प्रेस को चुप रहना था। पुलिस को किनारे खड़ा रहना था और भीड़ को उसका काम करने देना था। दस साल के भीतर हिटलर ने जर्मनी को यहूदियों से खाली करने का निर्देश गोयबेल्स को दिया था। 9-10 दिसम्बर 1938 की रात इसे फैसलाकुन अंजाम तक पहुँचा दिया गया। रक्तपात, आगजनी और तोड़फोड़ की वह रात इतिहास के पन्नों पर हमेशा के लिए दर्ज हो गयी।
हिटलर नाम का व्यक्ति तो इतिहास के कब्रिस्तान में कभी का दफ्न हो चुका है, लेकिन उसकी विचारधारा जीवित है। अतीत से सबक लेकर आज का पूँजीपति वर्ग फासिज्म को एकदम खुला नहीं छोड़ रहा है, बल्कि जंजीर से बँधे हुए खूँखार भेड़िये की तरह इस्तेमाल कर रहा है। फासिस्ट संस्थाओं की प्रोपेगैण्डा मशीनरी लगातार विविध रूपों में ऐसी भीड़ के सामूहिक मानस का निर्माण कर रही है, जो 'पराया' या 'अन्य' समझी जाने वाली किसी भी धार्मिक, भाषायी, नस्ली या अप्रवासी अल्पसंख्यक आबादी पर झपट पड़ने के लिए तैयार है। फासिज्म की अन्तर्वस्तु को समझे बिना इस बात को समझना मुश्किल है कि गाय की रक्षा या 'लव जेहाद', वैलेण्टाइन डे आदि के विरोध के नाम पर जो भीड़ सड़कों पर हिंसा का खूनी खेल खेलती है, वह बेचेहरा लगती है, पर दरअसल वह अपने आप में एक राजनीति-विशेष का चेहरा है। यह राजनीति है, फासिज्म की राजनीति।
फासिज्म वित्तीय पूँजी के आर्थिक हितों की सर्वाधिक प्रतिक्रियावादी राजनीतिक अभिव्यक्ति होता है, पर यह केवल निरंकुश राज्यसत्ता या तानाशाही के रूप में ही नहीं होता है, बल्कि मध्यवर्ग का एक प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन होता है। यह परेशानहाल मध्यवर्ग के पीले-बीमार चेहरे वाले युवाओं को लोकलुभावन नारे देकर और 'गढ़े गये' शत्रु के विरुद्ध उन्माद पैदा करके उन्हें अपने साथ गोलबन्द करता है। उत्पादन की प्रक्रिया से बाहर धकेल दिये गये विमानवीकृत (डीह्यूमनाइज्ड) और लम्पट सर्वहाराओं को भी यह अपनी गुण्डावाहिनियों में भर्ती करता है। फासिज्म तृणमूल स्तर पर नाना प्रकार के कैडर-आधारित सांगठनिक ढाँचों के जरिये काम करता है, जो इस प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन के स्नायुतंत्र के समान होते हैं।
फासिज्म हमेशा उग्र अन्धराष्ट्रवादी नारे देता है। वह संस्कृति का लबादा ओढ़कर आता है, संस्कृति का मुख्य घटक धर्म या नस्ल को बताता है और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा देता है। इस तरह देश-विशेष में बहुसंख्यक धर्म या नस्ल का 'राष्ट्रवाद' ही मान्य हो जाता है और धार्मिक या नस्ली अल्पसंख्यक स्वत: 'पराये'या 'बाहरी' हो जाते हैं। एक आधुनिक परिघटना के रूप में राष्ट्रवाद की वैज्ञानिक अवधारणा को अस्वीकार करने के लिए सभी फासिस्ट अपने राष्ट्र को प्राचीन काल से ही 'महान राष्ट्र' के रूप में मौजूद बताते हैं, मिथकों को ऐतिहासिक यथार्थ बताते हैं और इतिहास का मिथकीकरण करते हैं। धार्मिक या नस्ली अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के लिए फासिस्ट संस्कृति और इतिहास का विकृतिकरण करने के लिए तृणमूल स्तर पर मौजूद शिक्षा और प्रचार के अपने वैकल्पिक तंत्र का तथा धार्मिक प्रतिष्ठानों का निरंतर इस्तेमाल करते हैं। सत्ता में आने के बाद, वे मुख्य धारा की मीडिया के बड़े हिस्से को, सरकारी प्रचार तंत्र को और शिक्षा तंत्र को भी इस काम में सन्नद्ध कर देते हैं। इन दिनों सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने में भी फासिस्ट सबसे आगे हैं।
भारत के राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य पर एक खाँटी फासिस्ट संगठन के रूप में आरएसएस 1925 से ही मौज़ूद रहा है और लगातार सक्रिय रहा है। लेकिन स्वातंत्र्योत्तर भारत के पूँजीवादी समाज में सापेक्षिक अर्थों में जबतक विकास की आंतरिक त्वरा बची हुई थी, इसका अनुषंगी राजनीतिक संगठन संसदीय राजनीति में और समाज में हाशिये पर ही बना रहा। व्यवस्था का संकट बढ़ने के साथ ही राजनीति और समाज में इसका प्रभाव-विस्तार होता गया। अपने असाध्य ढाँचागत संकट और गतिरोध से निजात पाने के लिए भारतीय पूँजीवाद ने 1990 के दशक में जब नवउदारवाद की राह पकड़ी, तो इसी दौर में संघ और भाजपा का तेजी से विस्तार हुआ। जो नवउदारवाद का दौर रहा है, वही आडवाणी की रथयात्रा, बाबरी मस्जिद ध्वंस और गुजरात-2002 से लेकर मोदी के सत्तारूढ़ होने तक का भी दौर रहा है। 2014 के बाद से लगातार राजकीय हिंसा, हिन्दुत्ववादी गुण्डा वाहिनियों की हिंसा और भीड़ की हिंसा के त्रिभुज की काली छाया पूरे देश पर फैलती जा रही है।
निचोड़ के तौर पर कहा जा सकता है कि इस समय सड़कों पर उन्मादी भीड़ की अंधी हिंसा का जो 'पैशाचिक उत्सव'जारी है, वह फासिज्म के वर्चस्व के दौर की ही एक परिघटना है। इस भीड़ का कोई चेहरा नहीं है, बल्कि यह भीड़ स्वयं फासिज्म की विचारधारा और राजनीति का एक चेहरा है। केवल बौद्धिक दायरे तक सीमित रहकर और प्रतीकात्मक कार्रवाइयों या शांति और सर्वधर्म समभाव की अपीलों से हम फासिज्म-प्रायोजित भीड़ की हिंसा का मुकाबला नहीं कर सकते। केवल, तृणमूल स्तर से एक प्रगतिशील सामाजिक आन्दोलन संगठित करके ही इसका प्रतिरोध किया जा सकता है। सवाल सिर्फ संसदीय चुनावों में किसी पार्टी विशेष को हराने का नहीं है, बल्कि एक आन्दोलन विशेष के सामाजिक आधार को नष्ट करने का है।

स्त्री मुक्ति में कहाँ है स्त्री मजदूर की आवाज

(रविवार डाइजेस्‍ट के सितम्‍बर, 2017 के 'रहगुज़र' कालम में प्रकाशित मेरी टिप्‍पणी)


-- कविता कृष्णपल्लवी
 
मजदूर स्त्रियाँ यदि संगठित नहीं की जायेंगी तो स्त्री मुक्ति की बौद्धिक आवाजें नक्कारखाने में तूती की आवाज बनी रहेंगी और शहरी मध्यकवर्गीय दायरों तक सीमित तमाम आन्दोरलनात्मतक सरगर्मियाँ कुछ फौरी रियायतों से ज्याददा कुछ भी नहीं हासिल कर पायेंगी।

हाल के कुछ वर्षों के दौरान देश के विभिन्नग महानगरों की सड़कों पर शिक्षित मध्यक वर्ग की जागरूक युवा स्त्रियाँ पुरुष वर्चस्वि के प्रतिरोध के नये रूपों और नारों के साथ उतरती देखी गयी हैं। पिछले महीने चण्डीपगढ़ में एक वरिष्ठे आईएएस अधिकारी की बेटी के साथ भाजपा के हरियाणा राज्यी के अध्यीक्ष के बेटे और उसके दोस्तों द्वारा छेड़खानी की घटना के बाद italमेरी रात मेरी सड़कital नाम से एक मुहिम शुरू हुई। इस मुहिम के तहत कई शहरों में स्त्रियों, विशेषकर लड़कियों ने सड़कों पर देर रात तकश समय बिता कर बढ़ते स्त्री -विरोधी अपराधों और पुरुषवर्चस्वंवादी वर्जनाओं का प्रतीकात्मयक विरोध किया और सामाजिक स्पेीस में अपने हिस्सेु के दावे का इजहार किया।
इसके पहले, पिछले दो वर्षों के दौरान italपिंजड़ा तोड़ो अभियानital पंजाब और दिल्लीह से शुरू हो कर देश के दर्जनों महानगरों, विशेषकर कैम्पासों तक फैल चुका था और काफी प्रसिद्धि पा चुका था। पिछले वर्ष महानगरों की युवा स्त्रियों, विशेषकर छात्राओं ने एक और अभियान italहैप्पील टु ब्ली डital नाम से चलाया था जिसका उद्देश्या स्त्रियों के मासिक स्राव से जुड़ी धार्मिक और मर्दवादी रू‍ढ़ि‍यों-वर्जनाओं-पूर्वाग्रहों का विरोध करना था।
निःसंदेह, पहले के हालात की तुलना में यह परिदृश्य् महानगरों में युवा स्त्रियों की विकासमान नयी विद्रोही चेतना का सूचक है और इसलिए सभी प्रगति‍चेता स्रीं य-पुरुष नागरिक लाजिमी तौर पर इसका स्वाेगत करेंगे। लेकिन यदि हम वास्तरव में स्त्री मुक्ति के प्रश्नु और स्त्रीो मुक्ति आंदोलन की दिशा को ले कर संजीदा हैं तो हमें इन आंदोलनों की सीमाओं और समस्या ओं के बारे में भी सोचना ही होगा।
यह सही है कि स्त्री उत्पीचड़न, पुरुषस्वाओमित्व वादी रूढ़ि‍यों-परम्प्राओं और घरेलू गुलामी के विरुद्ध उग्र प्रतिवादी स्वउरों की अभिव्यइक्ति लगभग एक दशक पहले तक मुख्यीत: अकादमिक विमर्शों और साहित्यिक लेखन के दायरों तक ही सिमटी हुई थी। पहचान-राजनीति (आइडेण्टिटी पॉलिटिक्सत) आधारित 'नव सामाजिक आंदोलन' (न्यूढ सोशल मूवमेण्ट्सम) के अंग के तौर पर, गत शताब्दी के अंतिम दशक में स्त्री आंदोलन की जो नयी धारा फूटी थी, उसके बड़े हिस्से, को एनजीओ सुधारवाद ने खा-पचा लिया और शेष बचा हिस्सा सेमिनारों-वर्कशॉपों के कर्मकाण्डीस अनुष्ठाधनों में खप गया। यह नया फेमिनिज्म स्त्री उत्पीड़न और पुरुषवर्चस्व वाद की ऐतिहासिक जड़ों और सामाजिक-आर्थिक कारणों की अनदेखी करने में 1950 और 1960 के दशक के नारीवाद से भी आगे थे। केवल 'जेण्डअर आइडेण्टिटी' को 'एसर्ट' करने और दिशाहीन विद्रोह से आगे इसके पास की कोई सांगोपांग और व्याइवहारिक परियोजना नहीं थी। साथ ही, इस अकर्मक विमर्शवादी नारीवाद के भीतर एक किस्मख का मध्योवर्गीय कुलीनतावादी पूर्वाग्रह या अभिनति (बॉयस) भी मौजूद था। सच पूछें तो यह मध्योवर्गीय कुलीनतावाद की प्रवृत्ति संसदीय वामपंथी दलों से संबद्ध स्त्री संगठनों में भी दीखती है जो उसूली तौर पर स्त्री मुक्ति के संघर्ष को सामाजिक मुक्ति के संघर्ष को जोड़ने की बात करते हैं और अपने चार्टर में मजदूर स्त्रियों की माँगों को (भले ही रस्मीष तौर पर, और प्राथमिक क्रम में नीचे) स्थामन देते हैं, लेकिन मजदूर स्त्रियों तक उनकी वास्तकविक पहुँच लगभग नगण्य है।
अभी, विगत दो-तीन वर्षों के भीतर महानगरों की मध्यजवर्गीय शिक्षित युवा स्त्रियों के भीतर जो स्वचत:स्फूवर्त रैडिकल उभार जैसी स्थिति देखने में आ रही है, उसका सकारात्म क पहलू यह है कि इसका चरित्र अकर्मक-अकादमिक न हो कर जनान्दोालनात्मिक है। इसका मंच सभागारों में नहीं, बल्कि सड़कों पर है। एक और सकारात्मजक बात यह है कि धार्मिक कट्टरपंथी फासिस्टं ताकतों द्वारा पोषित-प्रोत्सारहित स्त्री -विरोधी रूढ़ि‍यों-वर्जनाओं का विरोध करते हुए आज की ये युवा स्त्रियाँ फासिस्ट उभार के प्रतिरोध के लिए प्रयासरत सेकुलर-प्रगतिशील शक्तियों के साथ खड़ी हो रही हैं। लेकिन साथ ही, इस नये उभार के कुछ नकारात्मुक पहलू भी हैं और इससे जुड़े कुछ विचारणीय प्रश्नन भी हैं। यह उभार एक स्वकत:स्फूमर्त उभार है। किसी भी स्व त:स्फूीर्त उभार को यदि कोई दृष्टि सम्पेन्नत, विचारशील नेतृत्वी सुनिश्चित दिशा के आधार पर सुस्प‍ष्ट: स्वररूप और सुव्य वस्थित ढाँचा नहीं देता है, तो कालान्तेर में अपनी ऊष्माि और ऊर्जा क्षरित करते हुए वह विसर्जित हो जाता है। दूसरा सवाल जिसे अधिक महत्वा देते हुए मैं यहाँ उठाना चाहती हूँ, वह यह है कि स्त्रियों का कोई भी स्वात:स्फूहर्त उभार एक व्या पक और दीर्घकालिक स्त्री आन्दोजलन की सुनिश्चित शक्लो तभी अख्तियार कर सकता है जब वह आम स्त्रीा समुदाय की अधिकतम सम्भलव आबाचदी तक अपने कार्यक्रम और अमली कार्रवाइयों के जरिये पहुँच बनाये और उन्हें गोलबन्दम और संगठित करने में कामयाबी हासिल करे। मध्या वर्ग की रैडिकल परिवर्तनकामी चेतना वाली शिक्षित-प्रबुद्ध युवा स्त्रियों को इस प्रश्नक पर सोचना ही होगा। यदि वे स्त्री मुक्ति संघर्ष की दीर्घकालिक परियोजना के प्रति गम्भी र हैं तो उन्हें अपनी और अपने आन्दोसलन की वर्गीय सीमाओं को तोड़ कर बहुसंख्यमक मेहनतकश स्त्रियों तक पहुँचना ही होगा और उनकी माँगों को अपने एजेण्डाो पर प्रमुखता के साथ स्था न देना होगा। समूची स्त्री आबादी में कम से कम अस्सीा फीसदी गाँवों और शहरों की मेहनतकश वर्गों की स्त्रियाँ हैं। शेष बीस फीसदी आम मध्य वर्गीय और उच्ची कुलीन स्त्रियाँ हैं। उच्च् कुलीन स्त्रियाँ भी किसी हद तक जेण्डेर-आधारित उत्पीगड़न की शिकार और दोयम दर्जे की नागरिक हैं, पर अपनी विशेष वर्गीय स्थिति के कारण स्त्रीर आन्दो लन में उनकी भागीदारी सम्भ व नहीं। जो गाँवों-शहरों की आम मध्य वर्गीय गृहिणियाँ हैं, उनका बड़ा हिस्सा अपनी दिमागी गुलामी और रूढ़ि‍ग्रस्तरता के चलते आने वाले लम्बेह समय तक स्त्री आन्दोालन में सक्रिय भागीदारी के लिए तैयार नहीं होगा। तब जाहिर है कि मध्यआवर्गीय शिक्षित शहरी युवा स्त्रियों का बहुलांश भी यदि सड़कों पर उतरने को तैयार हो तो वह कुल स्त्रीय आबादी का तीन या पाँच प्रतिशत ही होगा। इससे यही सिद्ध होता है कि कोई भी स्त्री आन्दोकलन सुदृढ़ और सशक्तच हो कर तभी आगे डग भर सकेगा जब उसके चार्टर में मेहनतकश स्त्रियों की माँगों को प्रमुख स्था़न मिलेगा और मेहनतकश स्त्रियाँ उसकी भागीदार बनेंगी।
आज इस प्रश्नर पर विशेष तौर पर जोर देने की जरूरत इसलिए भी है क्योंरकि भारतीय स्त्रियों का जितना बड़ा हिस्सा आज शहरों के विभिन्न उद्योगों में उजरती मजदूर के रूप में काम कर रहा है, उतना पहले कभी नहीं करता था और यह रुझान लगातार तेजी से बढ़ रहा है। सामंती भूमि सम्बान्धोंन के जमाने में खेतों में व पशुपालन जैसे कामों में स्त्रीस श्रम बहुतायत में लगता था। अब मशीनीकरण और किसान जातियों में 'संस्कृ तिकरण' (समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवास के शब्दोंर में) की प्रवृत्ति के चलते गाँवों में स्त्रीं श्रम कम लग रहा है। दूसरी और उद्योग में स्त्री मजदूरों की आबादी लगातार बढ़ती जा रही है। औपनिवेशिक काल में भी, 1880 के दशक से ले कर 1930 के दशक में स्त्रियाँ कपड़ा मिलों, जूट मिलों और खदानों आदि में बड़ी संख्यार में काम करती थीं। उन्हें सामाजिक दृष्टि से बहुत हेय माना जाता था, तनख्वाहें पुरुषों के मुकाबले कम होती थीं, काम की स्थितियाँ कठिन थीं, पर उनमें एक सामूहिक ताकत का अहसास था। यूनियनों में पुरुष आधिपत्यम का माहौल था, लेकिन मजदूर आन्दोालनों में स्त्री मजदूरों ने जुझारू भूमिका निभायी और अपनी (स्त्रीा मजदूरों की) विशिष्ट माँगों को ले कर भी कई संघर्ष किये। पहले इस विषय पर बहुत कम इतिहास लेखन हुआ था। हाल के वर्षों में इस पर कई नये शोध 'लेबर हिस्ट्री ' के शोधकर्ताओं ने किये हैं। मजदूर संघर्षों की बदौलत, कई महत्वेपूर्ण अधिकार जब मजदूर वर्ग को हासिल हो गये तो 1930 के दशक से स्त्री मजदूरों को कारखानों से बाहर धकेला जाने लगा और उनकी संख्या 1950 तक काफी घट चुकी थी। नेहरूकालीन सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों में लगी श्रम शक्ति में भी स्त्रियों को नगण्य। स्था न मिला। 1980 के दशक से विकासमान इलेक्ट्रॉ निक सेक्टमर और मशीनरी सेक्टकर में स्री् मजदूरों की संख्या बढ़ने लगी। इसका एक कारण यह भी था कि पूँजी की मार से गाँवों के छोटे किसान अब उजड़ कर सपरिवार शहर आने लगे थे और गृहस्थीज चलाने के लिए स्त्रियों का भी काम करना जरूरी हो गया था, मजदूरी चाहे जितनी कम मिले। नवउदारवाद के दौर में जब छोटे-छोटे वर्कशॉपों में काम को बिखेर कर ठेका, पीस रेट और दिहाड़ी पर, सस्तीब से सस्तीे दरों पर काम कराने का चलन शुरू हुआ, तो 1990 के दशक से उद्योगों में स्त्री मजदूरों की संख्यां तेजी से बढ़ने की शुरुआत हुई और यह रुझान आज तक जारी है।
लेकिन एक विशिष्ट ता यह है कि 1880-1930 के दौरान कारखानों-खदानों में काम करने वाली स्त्री मजदूरों की आबादी एक दृश्य और प्रेक्षणीय आबादी थी, जब कि आज मैन्यूाफैक्चझरिंग और असेम्बकलिंग में लगी यह आबादी काफी हद तक अदृश्यज और अप्रेक्ष्ाैणीय है। ये स्त्रियाँ बड़े-बड़े कारखानों की असेम्बसली लाइन पर काम नहीं करतीं, बल्कि पीस रेट पर घरों में काम करती हैं, छोटे-छोटे वर्कशॉपों में ठेके पर काम करती हैं, सब से खराब किस्मि के कैजुअल वर्कर ('जीरो रिकार्ड वर्कर' या 'वाउचर वर्कर') के रूप में काम करती हैं, या 'बदली मजदूर' के रूप में कारखानों में काम करती हैं। काम के घण्टेव, न्यूूनतम मजदूरी या किसी भी किस्मल के श्रम कानून के दायरे से ये बाहर होती हैं और निकृष्टघतम कोटि की उजरती गुलाम होती हैं। नियोक्ता्ओं के रिकार्ड्स पर आधारित श्रम सांख्यिकी के आँकड़ों से इनकी वास्ततविक संख्याै का सही पता भी नहीं चलता। ये स्त्रियाँ घरों और छोटे-छोटे वर्कशॉपों में बिखरी हुई, 'भूमण्डनलीय असेम्बीली लाइन' पर खट रही हैं और 'पूँजी के परिपथ' का हिस्साय हैं, लेकिन ज्याभदातर मामलों में, उनकी मजदूर पहचान न सामाजिक रूप से स्पोष्टी है, न ही स्वायं उनकी नजर में। ये श्रम शक्ति का सब से सस्ताम ही नहीं, बल्कि सब से लचीना हिस्सा हैं जिसे मंदी के किसी हल्केे या 'सेक्टोीरल' दौर में भी सब से पहले बेकार कर दिया जाता है। जिसे 'फेमिनाइजेशन ऑफ लेबर' कहा जाता है, वह स्त्री करण, ठेकाकरण और 'कैजुअलाइजेशन' का कुल योग है, क्यों कि संगठित मजदूर आबादी को (जो खुद भी लगातार घटती जा रही है) में पुरुष मजदूरों का स्थाबन स्त्रीं मजदूर नहीं ले रही है, बल्कि वह लगातार बढ़ते ठेका, कैजुअल और पीस रेट मजदूरों की सब से निजली कोटि है, जिसकी श्रम शक्ति सब से सस्तीब है और काम करने की परिस्थितियाँ सब से कठिन हैं। इन सभी स्त्री मजदूरों के अतिरिक्तै शहरों के लगातार बढ़ते खुशहाल मध्य वर्गीय घरों में झाड़ू-पोंछा-बरतन-बासन, खाना बनाने और आया का काम करने वाली घरेलू मजदूर औरतें हैं, जिनकी संख्याप (केन्द्री य श्रम मंत्री के अनुसार) दो करोड़ के आसपास है और जिन्हें कोई भी श्रम सुरक्षा कानूनी तौर पर हासिल नहीं है।
इससे इनकार नहीं कि पुरुष स्वाऔमित्वशवाद की पारिवारिक-सा‍माजिक संरचना में मध्य वर्गीय स्त्रियाँ भी आधुनिक घरेलू गुलाम ही होती हैं, और यदि वे आर्थिक रूप से स्वा वलम्बीस हों, तो भी घर के भीतर और बाहर सड़क पर बराबर की नागरिक नहीं होतीं। लेकिन एक मजदूर स्त्री को सस्तीि मज़दूरी और कठिन काम के साथ-साथ स्त्रीित्वन की जो कीमत चुकानी पड़ती है और यौन उत्पी ड़न तथा भेदभाव के जिन रूपों का सामना करना पड़ता है, उनसे मध्य़वर्गीय स्त्रीो समुदाय का साबका कभी नहीं पड़ता। वैसे तो ज्या दातर अनौपचारिक मजदूर आज ट्रेड यूनियनों में हैं ही नहीं, पर जो थोड़ी-बहुत यूनियनें हैं भी, वे स्त्री मजदूरों की माँगों को दरकिनार ही करती हैं और उन्हेंी अपने दायरे में ही नहीं लेतीं। दूसरी ओर, जो रैडिकल नारीवादी संगठन और संसदीय वाम दलों से सम्बसद्ध स्त्रीम संगठन हैं उनके चार्टरों में मजदूर स्त्रियों की माँगों और मसलों की मौजूदगी या तो होती ही नहीं या महज रस्म अदायगी के तौर पर होती है। यूँ कहें कि मजदूर आन्दोमलन के भीतर मजदूर स्त्रियाँ जेण्डीर-आधारित पूर्वाग्रहों और भेदभाव का शिकार हो जाती हैं तथा स्त्रीी आन्दोरलन में वे वर्ग-आधारित पूर्वाग्रहों और उपेक्षा का शिकार हो जाती हैं।
मजदूर स्त्रियाँ यदि संगठित नहीं की जायेंगी तो स्त्री मुक्ति की बौद्धिक आवाजें नक्काीरखाने में तूती की आवाज बनी रहेंगी और शहरी मध्यावर्गीय दायरों तक सीमित तमाम आन्दोनलनात्माक सरगर्मियाँ कुछ फौरी रियायतों से ज्यांदा कुछ भी नहीं हासिल कर पायेंगी। दूसरे विश्व्युद्ध के बाद पश्चिम में जो नारीवादी आन्दोसलन शुरू हुआ था (जिसकी लहर बाद में पूरब तक भी पहुँची), वह ज्याोदातर बौद्धिक विमर्श तक सीमित था और पढ़ी-लिखी मध्यपवर्गीय स्त्रियों के प्रबुद्ध हिस्सेन तक ही इसकी पहुँच थी। इसके विपरीत, उन्नी सवीं शताब्दीी में यूरोप-अमेरिका में जिस स्त्रीध आन्दो लन की शुरुआत हुई थी, उसमें मजदूर स्त्रियों की व्याापक भागीदारी थी। बल्कि यह कहना सही होगा कि उसकी शुरुआत ही स्त्री मजदूरों के संगठित और आन्दो लित होने से हुई थी। उस स्त्री आन्दोतलन ने स्त्रीज मताधिकार और कई सारे सामाजिक-राजनीतिक अधिकार हासिल किये और स्त्री मजदूरों के लिए भी कई कानून बने। बीसवीं शताब्दी की सर्वहारा क्रांतियों में स्त्री मजदूरों ने बढ़-चढ़ कर हिस्साी लिया और नये समाज में समूचे स्रीसि समुदाय को बराबरी के अभूतपूर्व अधिकार मिले तथा घरेलू गुलामी से लगभग पूरी तरह छुटकारा मिल गया।
इस इतिहास से यही सबकअ निकलता है कि जेण्ड र-उत्पी ड़न के सवाल को वर्गीय शोषण से जोड़ना होगा और मेहनतकश स्त्रियों को संगठित करके उन्हेंत स्त्री मुक्ति आन्दोालन की मुख्यस शक्ति बनाना होगा। इसके बिना सारा स्त्री मुक्ति विमर्श एक बौद्धिक जुगाली से अधिक कुछ भी नहीं होगा और समय-समय पर उभड़ने वाले शहरी मध्य वर्गीय युवा स्त्रियों के स्व त:स्फू-र्त आन्दोालन भी कालान्त र में दिशाहीन और ऊर्जाहीन हो कर अंधी गली में पहुँचते रहेंगे और बिखरते रहेंगे। इन आन्दोफलनों के बीच से रैडिकल, मुक्तिकामी, प्रबुद्ध स्त्रियों की जो नयी पीढ़ी उभरकर सामने आ रही है, उन्हीं में से शायद एक नया नेतृत्वक निकलेगा जो इन बुनियादी सवालों पर गम्भीररता और गहराई से सोचेगा और गतिरोध को तोड़ने के लिए कोई सार्थक पहल करेगा।

Monday, September 04, 2017

आधुनिक उद्योग और खेती



आधुनिक उद्योग ने खेती में और खेतिहर उत्पादकों के सामाजिक सम्बन्धों में जो क्रांति पैदा कर दी है, उसपर हम बाद में विचार करेंगे। इस स्थान पर हम पूर्वानुमान के रूप में कुछ परिणामों की ओर संकेत भर करेंगे। खेती में मशीनों के प्रयोग का मजदूरों के शरीरों पर फैक्ट्री-मजदूरों के समान घातक प्रभाव नहीं होता, किन्तु जैसाकि हम बाद में विस्तार से देखेंगे, मजदूरों का स्थान लेने में मशीनें यहाँ फैक्ट्रियों से ज़्यादा तेज़ी दिखाती हैं और यहाँ इसका विरोध भी कम होता है। मिसाल के लिए, कैम्ब्रिज और सफ़ोक की काउंटियों में खेती का रकबा पिछले बीस वर्षों में (1868 तक ) बहुत अधिक बढ़ गया है, पर इसी काल में देहाती आबादी न केवल तुलनात्मक, बल्कि निरपेक्ष दृष्टि से भी घट गई है। संयुक्त राज्य अमेरिका में खेती की मशीनें अभीतक केवल संभावित मजदूरों का ही स्थान लेती हैं; दूसरे शब्दों में, उनकी मदद से किसान पहले से बड़े रक़बे में खेती कर सकता है, लेकिन उनकी वजह से पहले से काम करने वाले मजदूरों को जवाब नहीं मिल जाता। 1861 में इंगलैंड और वेल्स में खेती की मशीनों को बनाने में लगे हुए व्यक्तियों की संख्या 1,043 थी, जबकि खेती की मशीनों और भाप की इंजनों का इस्तेमाल करने वाले खेतिहर मजदूरों की संख्या 1,205 से अधिक नहीं थी।
खेती की ज़मीन पर आधुनिक उद्योग का जैसा क्रांतिकारी प्रभाव पड़ता है, वैसा और कहीं नहीं पड़ता। इसका कारण यह है कि आधुनिक उद्योग पुराने समाज के आधार-स्तम्भ -- यानी किसान -- को नष्ट कर देता है और उसके स्थान पर मजदूरी लेकर काम करने वाले मजदूर को स्थापित करता है। इसप्रकार सामाजिक परिवर्तनों की चाह और वर्गों के विरोध गावों में भी शहरों के स्तर पर पहुँच गए हैं। खेती के पुराने, अविवेकपूर्ण तरीकों के स्थान पर वैज्ञानिक तरीके इस्तेमाल होने लगते हैं। खेती और मैन्यूफैक्चर के शैशवकाल में जिस नाते ने इन दोनों को साथ बांध रखा था, पूंजीवादी उत्पादन उसे एकदम तोड़कर फेंक देता है। परंतु इसके साथ-साथ वह भविष्य में सम्पन्न होने वाले एक अधिक ऊंचे समन्वय -- यानी अपने अस्थायी अलगाव के दौरान प्रत्येक ने जो अधिक पूर्णता प्राप्त की है, उसके आधार पर कृषि और उद्योग के मिलाप -- के लिए भौतिक परिस्थितियाँ भी तैयार कर देता है। पूंजीवादी उत्पादन आबादी को बड़े-बड़े केन्द्रों में जमा करके और शहरी आबादी का पलड़ा अधिकाधिक भारी बनाकर एक ओर तो समाज की ऐतिहासिक चालक शक्ति का संकेन्द्रण कर देता है, और दूसरी ओर, वह मनुष्य तथा धरती के बीच पदार्थ के परिचालन को अस्त-व्यस्त कर देता है, अर्थात भोजन-कपड़े के रूप में मनुष्य धरती के जिन तत्वों का उपयोग कर डालता है, उन्हें धरती में लौटने से रोक देता है, और इसलिए वह उन शर्तों का उल्लंघन करता है, जो धरती को सदा उपजाऊ बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। इसतरह वह शहरी मजदूर के स्वास्थ्य को और देहाती मजदूर के बौद्धिक जीवन को एक साथ चौपट कर देता है। परंतु पदार्थ के इस परिचलन के जारी रहने के लिए जो परिस्थितियाँ खुद-ब-खुद तैयार हो गईं थीं, उनको अस्त-व्यस्त करने के साथ-साथ पूंजीवादी उत्पादन बड़ी शान के साथ इस बात का तक़ाज़ा करता है कि इस परिचलन को एक व्यवस्था के रूप में, सामाजिक उत्पादन के एक नियामक कानून के रूप में, और एक ऐसी शक़्ल में पुनः क़ायम किया जाए कि जो मानव जाति के पूर्ण विकास के लिए उपयुक्त हो। मैन्यूफैक्चर की तरह खेती में भी पूंजी के नियंत्रण में उत्पादन के रूपान्तरण का अर्थ साथ ही यह होता है कि उत्पादक की हत्या हो जाती है; श्रम का औज़ार मजदूर को ग़ुलाम बनाने, उसका शोषण करने और उसको ग़रीब बनाने का साधन बन जाता है, और श्रम प्रक्रियाओं का स्वाभाविक संयोजन और संगठन मजदूर की व्यक्तिगत जीवन-शक्ति, स्वतन्त्रता और स्वाधीनता को कुचलकर खत्म कर देने की संगठित पद्धति का रूप ले लेते हैं। देहाती मजदूर पहले से बड़े रक़बे में बिखर जाते हैं, जिससे उनकी प्रतिरोध-शक्ति क्षीण हो जाती है, जबकि उधर शहरी मजदूरों की शक्ति संकेन्द्रण के कारण बढ़ जाती है। शहरी उद्योगों की भांति आधुनिक खेती में भी गतिशील किए हुए श्रम की उत्पादकता में वृद्धि तो होती है, पर इस कीमत पर कि श्रम शक्ति खुद तबाह और बीमारियों से नष्ट हो जाती है। इसके अतिरिक्त पूंजीवादी खेती में जो भी प्रगति होती है, वह न केवल मजदूर को, बल्कि धरती को लूटने की कला की भी प्रगति होती है; एक निश्चित समय के वास्ते धरती की उर्वरता बढ़ाने के लिए उठाया जाने वाला हर कदम साथ ही इस उर्वरता के स्थायी स्रोतों को नष्ट कर देने का कदम होता है। मिसाल के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह जितना अधिक कोई देश आधुनिक उद्योग की नींव पर अपने विकास का श्रीगणेश करता है, वहाँ विकास की यह प्रक्रिया उतनी ही अधिक तेज़ होती है। इसलिए पूंजीवादी उत्पादन प्रौद्योगिकी का और उत्पादन की विभिन्न प्रक्रियाओ को जोड़कर एक सामाजिक इकाई का रूप देने की कला का विकास तो करता है, पर यह काम केवल समस्त धन-संपदा के मूल स्रोतों को -- धरती को और मजदूर को -- सोखकर करता है।
--- कार्ल मार्क्स, 'पूंजी' खंड-1, (पृष्ठ-535-538) प्रगति प्रकाशन, मास्को, तीसरा संशोधित संस्करण (1987)

Friday, August 25, 2017




" हमसे मार्क्सवाद के अध्ययन का अनुरोध करना द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी सृजन-शैली की ग़लती को फिर से दोहराने के समान होगा , और इससे हमारे सृजनात्मक मूड को हानि पहुंचेगी ।" मार्क्सवाद का अध्ययन करने का मतलब यह है कि हम दुनिया को , समाज को और कला-साहित्य को द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी और ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टिकोण से देखें , इसका मतलब यह नहीं कि हम अपनी साहित्यिक रचनाओं और कलाकृतियों में दर्शनशास्त्र के लेक्चर झाड़ते फिरें । साहित्यिक व कलात्मक सृजन के कार्य में मार्क्सवाद यथार्थवाद को हटाकर उसकी जगह नहीं ले सकता बल्कि उसे अपने अंदर समाविष्ट करता है , ठीक उसीतरह जैसे वह भौतिक विज्ञान में परमाणु और विद्युत-अणु संबंधी सिद्धांतों को हटाकर उनकी जगह नहीं ले सकता बल्कि उन्हें अपने अंदर समाविष्ट करता है । । कोरे , नीरस कठमुल्लावादी फार्मूले सृजनात्मक मूड को नष्ट कर देते हैं ; यही नहीं वे सबसे पहले मार्क्सवाद को ही नष्ट कर देते हैं । कठमुल्लावादी "मार्क्सवाद" मार्क्सवाद नहीं होता , वह मार्क्सवाद-विरोधी होता है । तो क्या मार्क्सवाद सृजनात्मक मूड को नष्ट नहीं कर देता ? हाँ , कर देता है । वह निश्चित रूप से हर ऐसे सृजनात्मक मूड को जो सामंती , पूंजीवादी , निम्न-पूंजीवादी , उदारतावादी , व्यक्तिवादी , शून्यवादी , "कला कला के लिए" के सिद्धान्त को मानने वाला , अभिजातवर्गीय , पतनशील अथवा निराशावादी होता है, और हर ऐसे सृजनात्मक मूड को जो विशाल जनसमुदाय और सर्वहारा वर्ग का नहीं है , नष्ट कर देता है । जहाँतक सर्वहारा वर्ग के लेखकों और कलाकारों का संबंध है , क्या उन्हें इसप्रकार के सृजनात्मक मूडों को नष्ट नहीं कर देना चाहिए ? मैं समझता हूँ कि उन्हें ज़रूर ऐसा करना चाहिए , इन सबको पूरीतरह नष्ट कर देना चाहिए , और इन्हें नष्ट करने के साथ ही नई चीजों की रचना की जा सकती है ।
-- माओ त्से-तुंग
(येनान की कला-साहित्य गोष्ठी में भाषण)