Monday, October 14, 2019


कवि की प्रतिभा सूक्ष्मग्राही थी I तलस्पर्शी और तत्वदर्शी भी ! वह जीवन के सूक्ष्म से सूक्ष्म अंतरविरोधों को पहचान लेती थी, तमाम गौण प्रश्नों को विमर्श के केन्द्र में ला देती थी, हाशिये के मुद्दों को मुख्य धारा में स्थापित कर देती थी, दैनंदिन तुच्छता से उदात्तता के महाख्यान रच डालती थी !

लेकिन कवि कभी समाज के बुनियादी अंतरविरोधों की, या मुख्य अंतरविरोध की चर्चा तक नहीं करता था I जलते प्रश्न-चिह्नों की ओर पीठ करके खड़ा होता था I केन्द्र में आये मुद्दों से कतराकर पतली गली से निकल लेता था I इसतरह लगातार वह कुछ तरल, कुछ वाष्पीय, कुछ लोकोत्तर, कुछ उदात्त, कुछ ऐतिहासिक और अमरत्व की संभावनाओं से युक्त रचता चला जा रहा था I

आखिरकार एक दिन मैंने उसे एक भव्य कला अकादमी के पिछवाड़े की पतली गली में घेर ही लिया और फिर यह घिसा-पिटा सवाल पूछ ही डाला,"पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?" कवि ने नाक-भौं सिकोड़े और बोला,"ये जो तुम्हारे जैसे लोग हैं न ! ये लोग जीवन और कविता के सूक्ष्म-अमूर्त प्रश्नों को बेहद भोंड़े-भद्दे ढंग से 'पोलिटिसाइज़' कर देते हैं !"

मैंने फिर प्लेखानोव को उद्धृत किया,"ज़िन्दा लोग ज़िन्दा सवालों पर सोचते हैं !"

कवि ने तर्जनी उठाकर मुझे रोका और फिर क्षितिज की और ताकते हुए बोला,"मेरी कविता मृत्यु में जीवन का संधान करती है ! यह ज़िन्दगी की अकाव्यात्मक समस्याओं से टकराने में खुद को ख़र्च नहीं करती I यह क्रूरता के समय में काव्यात्मक ढंग से और कुरूपता के समय में सौन्दर्यात्मक ढंग से जीना सिखाती है ! यह मृत्यु की घाटी से उठती वह आवाज़ है जो जीवित सुनेंगे कुछ शताब्दी बाद !"

फिर वह मुड़कर यूँ चलने को हुआ ज्यों उसका अगला कदम सीधे बाईसवीं सदी की छाती पर धम्म से पड़ने वाला हो !

(12अक्‍टूबर, 2019)

“मेरी आकांक्षाएँ कुछ नहीं है। इस समय तो सबसे बड़ी आकांक्षा यही है कि हम स्वराज्य संग्राम में विजयी हों। धन या यश की लालसा मुझे नहीं रही। खानेभर को मिल ही जाता है। मोटर और बंगले की मुझे अभिलाषा नहीं। हाँ, यह ज़रूर चाहता हूँ कि दो चार उच्चकोटि की पुस्तकें लिखूँ, पर उनका उद्देश्य भी स्वराज्य-विजय ही है। मुझे अपने दोनों लड़कों के विषय में कोई बड़ी लालसा नहीं है। यही चाहता हूँ कि वे ईमानदार, सच्चे और पक्के इरादे के हों। विलासी, धनी, खुशामदी सन्तान से मुझे घृणा है। मैं शान्ति से बैठना भी नहीं चाहता। साहित्य और स्वदेश के लिए कुछ-न-कुछ करते रहना चाहता हूँ। हाँ, रोटी-दाल और तोला भर घी और मामूली कपड़े सुलभ होते रहें।”
-- प्रेमचंद का एक पत्र बनारसी दास चतुर्वेदी के नाम, 3 जुलाई,1930.

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“जो व्यक्ति धन-सम्पदा में विभोर और मगन हो, उसके महान् पुरुष होने की मै कल्पना भी नहीं कर सकता। जैसे ही मैं किसी आदमी को धनी पाता हूँ, वैसे ही मुझपर उसकी कला और बुद्धिमत्ता की बातों का प्रभाव काफूर हो जाता है। मुझे जान पड़ता है कि इस शख्स ने मौजूदा सामाजिक व्यवस्था को – उस सामाजिक व्यवस्था को, जो अमीरों द्वारा गरीबों के दोहन पर अवलम्बित है – स्वीकार कर लिया है। इस प्रकार किसी भी बड़े आदमी का नाम, जो लक्ष्मी का कृपापात्र भी हो, मुझे आकर्षित नहीं करता।
बहुत मुमकिन है कि मेरे मन के इन भावों का कारण जीवन में मेरी निजी असफलता ही हो। बैंक में अपने नाम में मोटी रकम जमा देखकर शायद मैं भी वैसा ही होता, जैसे दूसरे हैं – मैं भी प्रलोभन का सामना न कर सकता, लेकिन मुझे प्रसन्नता है कि स्वभाव और किस्मत ने मेरी मदद की है और मेरा भाग्य दरिद्रों के साथ सम्बद्ध है। इससे मुझे आध्यात्मिक सान्त्वना मिलती है।”
-- प्रेमचंद का एक और पत्र बनारसी दास चतुर्वेदी के नाम, 1 दिसंबर,1935.

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प्रेमचंद के इन पत्रों की रोशनी में हम आज के साहित्यकारों के जीवन और कृतित्व के बीच के रिश्ते की पड़ताल कर सकते हैं ! स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद जो नया भारतीय समाज निर्मित हुआ है, उसमें एक खुशहाल मध्यवर्ग की परत का तेज़ी से फैलाव हुआ है Iसाहित्यकारों सहित भारत के बौद्धिकों का एक बड़ा हिस्सा इसी सुरक्षित और सुविधा-संपन्न जीवन वाले मध्य वर्ग से आता है I राष्ट्रीय मुक्ति का काम पूरा हो जाने के बाद इस मध्य वर्ग की आम मेहनतकश जनता के हितों-आकांक्षाओं के साथ साझेदारी ख़त्म हो चुकी है ! यह खंडित सपनों और असह्य जीवन वाले दबे-कुचले लोगों के साथ "ऐतिहासिक विश्वासघात" कर चुका है ! यह अगर सत्ता और अन्याय का विरोध भी करता है तो वहीं तक, जहाँतक कोई जोखिम न हो और सुविधाओं पर कोई आँच न आये ! जन-संघर्षों में आम लोगों के साथ लेखकों-कवियों के लाठी-गोली खाने और जेल जाने के दिन बीत चुके हैं ! बस इतना ही काफी होता है कि प्रेमचंद, नेरूदा, नाजिम हिकमत आदि के नाम लेते रहो, कुछ प्रतीकात्मक धरना-प्रदर्शनों और हस्ताक्षर अभियानों में हिस्सा लेते रहो, अकादमियों के चक्कर लगाते रहो, विदेश यात्रा के कुलाबे भिड़ाते रहो और तमाम प्रशस्ति-पत्रों के बीच प्रगतिशीलता का भी तमगा लटकाए रखो ! जानती हूँ, ये बातें ज़हर जैसी कड़वी हैं, पर जो बात सच लगे वह कह ही देनी चाहिए ! जनता के पक्ष में खड़े महान लेखकों के कृतित्व से वही सीख सकता है जो उनके जीवन से भी सीखे !
अपने जीवन और कृतित्व के बारे में आलोचनात्मक होना बेहद कठिन होता है, पर बेहद ज़रूरी होता है !

(10अक्‍टूबर, 2019)

Saturday, October 12, 2019

विदुषक -2014


विदुषक सिंहासनमा बसेर
थरि थरिका तमासा देखाउँछ
दरबारीयाहरू ताली पिट्दै हाँस्छन्,
डराएका भद्र नागरिक त्यसलाई साथ दिन्छन्,
तिनीहरू बुझ्छन् ,
विदुषक एउटा हत्यारा हो
र दरबारमा रगतको आहाल माथि
ओछ्याइएको छ रातो गलैंचा !
विदुषकको सबैभन्दा प्यारो रुची हो,
सडकमा युग पुरुष बनेर निस्कने स्वाङ्ग रच्नु,
विशाल र भव्य मञ्चबाट राम्रो दिनको घोषणा गर्नु,
जसलाई सुनेर सम्मोहित भीड नारा लाउन थाल्छन्,
सदगृहस्थ असल मान्छे डराउँछन्,
बाठाहरू आफू जोगिने जुक्ति निकाल्न थाल्छन्,
विवेकीहरू चिन्तापूर्वक
आउने दिनको बर्बादीको बारेमा सोच्न थाल्छन्,
शताब्दियौं पहिले जो बर्बर आक्रमणकारी बनेर आएका थिए
ती अतिथि बनेर आइरहेका छन्,
विदुषकले यस्तो जादू चलाएको छ !
विदुषक आफू सामान्यबाट महान बनेको
अगणित संस्मरण सुनाउँछ,
ऊ जूनलाई जादू वाला डोरी फ्याँकेर
पृथ्वीमा तानेर ल्याउने दावी गर्छ !
विदुषक शब्दसँग खेल्छ
र अलङ्कार-वैचित्र्यको बाढी लगाउँछ !
शब्द होस् या परिधान या लुट र दमनको विधान
या सामुहिक नरसंहार रच्नको लागि
विकसित गरिएको संकेत विज्ञान !
विदुषक सबै कुरा सुबिचारित-परिष्कृत तरिकाले गर्छ
र क्रूरताको नयाँ सौन्दर्य शास्त्र रच्छ !
विदुषक, सर्कसको मालिक बनेर बसेको छ,
जनमत उसको पक्षमा छ भन्नको लागि
गणितीय तर्क उसँग छ !
फेरि पनि व्यग्र तथा उद्विग्न छ विदुषक !
किल्ला बन्द नगर जस्तै विशाल
बन्द सर्कसको पाल बाहिर
अहिले पूरै सुनसान छ, चर्को गर्मी छ
र यहाँ त्यहाँ केही धूलो उडेको छ !
विदुषक रहस्यमय सन्नाटालाई बुझ्दैन,
बच्चाहरूको त्यो मुस्कानसम्म पनि पचाउन सक्दैन,
जुन हाँसोमा विवशता हुँदैन, डर हुँदैन
तमाम आश्वासनहरूका बाबजूद
अतीतको प्रेतले विदुषकलाई सताइरहेको छ !
विदुषक डराई रहन्छ ।

('मसखरा-2014 का नेपाली भाषा में अनुवाद I अनुवादक: नेपाल के वाम ऐक्टिविस्ट और कवि बलराम तिमलसिना I)



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(भारतकी क्रान्तिकारी कवि ,लेखक तथा योध्दा कविता कृष्णपल्लवीको कविता तथा किस्साहरूको संकलन
"नगर मे बर्बर" भित्रको कविता-" मसखरा-2014" को नेपाली अनुवाद गरेर प्रस्तुत गरेको छु )
मलाई आशा छ - नेपाली पाठकहरूलाई यो कविता नेपाली सन्दर्भमा पनि मिल्दो जुल्दो लाग्ने छ ।

तानाशाहको रहर !

तानाशाहको रहर थियो
जुन कुरा पनि-

सबैभन्दा राम्रो, सबैभन्दा ठूलो,
सबैभन्दा धेरै , सबैभन्दा टिकाऊ

र सबैभन्दा सुन्दर जे हुन्छ,
त्यो उसलाई प्राप्त होस I

ऊ सबैभन्दा विशाल साम्राज्य,
सबैभन्दा सुन्दर महलहरू

सबैभन्दा ठूलो सेना,
सबैभन्दा खुङ्खार मण्डलेहरू,
सबैभन्दा उन्मादी अनुयायीहरू

सबैभन्दा ठूला नरसंहार,
सबैभन्दा धेरै यात्रा,
सबैभन्दा सुन्दर पोशाकहरू

सबैभन्दा सम्मोहक मिथकहरू,
सबैभन्दा भव्य मंचहरू र आयोजनसँग
सबैभन्दा लामो समयसम्म
शासन गर्न चाहन्थ्यो I

*

इतिहासमा सवै तानाशाहहहरूले
सँधै यस्तै नै चाहे ।

आखिरमा एउपा समय आयो

जब मान्छेहरूले हरेक तानाशाहलाई
सबैभन्दा ठूलो र सबैभन्दा कठोर सजाय दिए
र भने-
सवैभन्दा धेरै मान्छेको हीतमा
यही सबैभन्दा न्यायपूर्ण,
सबैभन्दा राम्रो र सबैभन्दा सुन्दर काम हो ।

लखेटिएका केहि तानाशाह
आफ्नो संरक्षक देशको राजधानीमा
बुढा छचुन्द्राझैं
फोहोरको ढलमा डुवेर मरे ।

अनि वाँकिलाई
मान्छेहरूले सडकमा घिसारे
र चौबाटोमा
उँधो मुन्टो पारेर झुण्ड्याइदिए ।

--- कविता कृष्णपल्लवी 

('तानाशाह की चाहत' का नेपाली भाषा में अनुवाद I अनुवादक : नेपाल के वाम ऐक्टिविस्ट और कवि बलराम तिमलसिना I)


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Friday, October 11, 2019

एक मुद्दे पर अपने विचारों को एकदम दोटूक साफ़ कर देना चाहती हूँ!


ये जितने मुसंघी और कठमुल्ले हैं, जितने भी वहाबी-सलाफ़ी या शिया धार्मिक कट्टरपंथ के खुले-छिपे अनुगामी हैं, ये आम मुस्लिम अल्पसंख्यक आबादी और आम मेहनतकश जनों के वैसे ही दुश्मन हैं, जैसे हिन्दुत्ववादी धार्मिक कट्टरपंथी ! ये भी वैसे ही फासिस्ट हैं जैसे संघी हिन्दुत्ववादी ! फर्क सिर्फ इतना है कि भारत में हिन्दुत्ववादियों का बहुसंख्यावादी फासिज्म ही मुख्य चुनौती और मुख्य खतरा हो सकता है, अल्पसंख्यकों का धार्मिक कट्टरपंथी फासिज्म नहीं ! हिन्दुत्ववादी फासिज्म ही यहाँ सत्ता पर काबिज हो सकता है ! पूँजीपति वर्ग अपनी हित-सेवा के लिए उन्हींपर भरोसा कर सकता है और तमाम धार्मिक अल्पसंख्यकों को अलगाव में डालने, उनका 'घेटोकरण' करने और उनपर आतंक-राज स्थापित करने का काम हिंदुत्ववाद ही कर सकता है ! भारत में 'हिन्दू राज' स्थापित करने का ही नारा दिया जा सकता है, 'इस्लामी राज' का नहीं !

लेकिन फिर भी भारत में इस्लामी कट्टरपंथ के घोर जन-विरोधी और फासिस्ट चरित्र को समझना होगा ! हिन्दू बहुसंख्यावादी फासिज्म का मुकाबला सिर्फ और सिर्फ, तर्कणा और सेकुलरिज्म की ज़मीन पर खड़ा होकर ही किया जा सकता है ! सिर्फ और सिर्फ, एक सच्चे सेक्युलर और सच्चे जनवादी भारत में ही (और समग्र रूप में ऐसा सच्चा जनवाद तो अब सिर्फ समाजवाद ही दे सकता है) धार्मिक अल्पसंख्यक सुरक्षित रह सकते हैं और बराबरी और आज़ादी के साथ ज़िंदगी बसर कर सकते हैं ! लेकिन जितने भी मुसंघी कट्टरपंथी हैं, वे खुद ही सेकुलरिज्म और आधुनिकता का विरोध करते हैं, एक से एक सड़ी-गली और अहमक़ाना बातें करते हैं, जहालत भरे फ़तवे जारी करते हैं, कम पढी-लिखी गरीब मुस्लिम आबादी की बहुसंख्या को धार्मिक संकीर्णता और जहालत के जाल में फंसाते हैं और हिन्दुत्ववादियों को इस प्रचार का मौक़ा देते हैं कि सारे मुस्लिम होते ही कट्टर और जाहिल हैं ! ये मुसंघी नास्तिकों से उतनी ही नफ़रत करते हैं जितने हिन्दू धार्मिक कट्टरपंथी ! जाहिर सी बात है कि एक सेक्युलर भारत में ही सभी धार्मिक अल्पसंख्यक सुरक्षित रह सकते हैं, लेकिन मुसंघी सेकुलरिज्म को धर्म का दुश्मन बताते हैं, जबकि सेकुलरिज्म किसी भी धर्म के व्यक्ति को आस्था और पूजा-पाठ के निजी अधिकार को पूरी मान्यता देता है I वह सिर्फ सामाजिक-राजनीतिक जीवन से धर्म को अलग, निजी दायरे में रखने की बात करता है ! सेकुलरिज्म को कुफ़्र घोषित करते हुए मुसंघी मुस्लिम आबादी को राजनीतिक-सामाजिक दायरे में धर्म के झंडे तले संगठित करते हैं ! अब भारत में 'इस्लामी राज्य' तो बनने से रहा, लेकिन धार्मिक आधार पर संगठित मुस्लिम राजनीति का पूरा-पूरा लाभ हिन्दुत्ववादियों को मिलता है और वे ऐसा ज़हरीला प्रचार कर पाने में सफल हो जाते हैं कि हिन्दुस्तान के मुसलमान यहाँ इस्लामी राज्य स्थापित करना चाहते हैं, अतः भारत में 'हिन्दू राज' की स्थापना ही एकमात्र रास्ता है ! इसतरह, मुसंघी फासिज्म संघी फासिज्म का ही हित साधता है, यह उसी की सेवा करता है ! मुसंघियों की बातें हिन्दुत्ववादियों को अपने उन्मादी प्रचार को हवा देने में भरपूर मदद करती हैं ! भारतीय समाज और राजनीति में मुसंघी विचार संघी विचार के पूरक हैं, सहायक हैं !

इस्लामी धार्मिक राज का आदर्शीकरण करने वाले ये मुसंघी वास्तव में पश्चिमी साम्राज्यवाद के घृणित टट्टू होते हैं ! ये सऊदी अरब के बर्बर, विलासी और भ्रष्ट तानाशाहों के ख़िलाफ़ कभी कुछ नहीं बोलते जो अमेरिका की गोद में बैठे हुए यमन के अपने ही धर्म के लोगों पर बमबारी करते हैं, लीबिया, इराक और सीरिया की तबाही में अमेरिका का साथ देते हैं और फिलिस्तीनियों का बर्बर दमन करने वाले जायनवादियों से भी अंदरखाने समझौते करते हैं ! इनके पास इसका कोई जवाब नहीं है कि तमाम इस्लामी राज्य एक-दूसरे से ही क्यों लड़ते रहते हैं, इस्लामी देशों के तानाशाह अपने ही देशों की समान धर्म वाली आम जनता पर जुल्म क्यों ढाते हैं और तमाम तेल-धनी देशों के शेख और शाह पश्चिमी साम्राज्यवादियों के चरण क्यों चूमते रहते हैं ?

हिन्दुत्ववादी बहुसंख्यावादी फासिस्ट लहर का प्रभावी मुकाबला तभी किया जा सकता है जब ग्रासरूट स्तर पर धार्मिक और जातिगत पार्थक्य की दीवारों को गिराकर व्यापक मेहनतकश आबादी की जुझारू एकजुटता क़ायम की जाए ! आम ग़रीब मुस्लिम आबादी को धार्मिक दिमागी गुलामी, संकीर्णता और जहालत के जाल में फंसाकर मुस्लिम धार्मिक कट्टरपंथी हिन्दुत्ववादी फासिज्म के विरुद्ध व्यापक आम आबादी की लड़ाई को कमजोर कर रहे हैं, आम मुसलमानों को फासिज्म का चारा बना रहे हैं और हिन्दुत्ववादियों के अहम मददगार की भूमिका निभा रहे हैं !

आम मुस्लिम आबादी को यह बात समझनी ही होगी कि भारत में एक धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के तौर पर अपनी आज़ादी, बराबरी और अधिकारों के लिए संघर्ष अगर धार्मिक झंडे तले संगठित होकर करने की कोशिश वे करेंगे तो कत्तई कामयाब नहीं हो सकेंगे ! उलटे वे बहुसंख्यावादी फासिस्टों के ही हाथ मज़बूत करेंगे ! वे सिर्फ और सिर्फ, सेकुलरिज्म और समाजवाद के झंडे तले संगठित होकर ही अपना लक्ष्य हासिल कर सकते हैं ! केवल समाजवाद ही सच्चा सेक्युलर और सच्चा जनवादी समाज होता है, जहां सभी के बराबर अधिकार होते हैं, राजनीति और सामाजिक जीवन में धर्म का कोई दखल नहीं होता, लेकिन सभी नागरिकों को निजी विश्वास और पूजा-पाठ की पूरी आज़ादी होती है !

आज ज़रूरत इस बात की है कि मुस्लिम आबादी के बीच से ऐसे साहसिक, तार्किक और प्रबुद्ध लोग आगे आयें जो मुसंघी कट्टरपंथियों की हर रंग-रूप की राजनीति के ख़िलाफ़ बुलंद आवाज़ में बोलें औए व्यापक आम मेहनतकश मुस्लिम आबादी के बीच हर प्रकार की धार्मिक कट्टरपंथ की राजनीति के विरुद्ध प्रचार करते हुए जुझारू सेकुलरिज्म की आवाजों को बुलंदी और ताक़त दें !

(9अक्‍टूबर, 2019)

Thursday, October 10, 2019


भारतीय आम जन के खून-पसीने की कमाई से और मज़दूरों की मेहनत से बिछाई गयी भारतीय रेल की पटरियों पर निजी क्षेत्र की पहली ट्रेन जब गुज़री तो लोगों ने उसपर पत्थर फेंके और कुछ रेलकर्मी नारे लगते हुए पटरियों पर बैठ गए !

यह एक प्रतीक-घटना है, भविष्य का एक रूपक है !

एक न एक दिन ऐसा ज़रूर होगा कि पूँजी की जिस ट्रेन में आज फासिज्म का इंजन लगा हुआ है और जो हमारी ज़िन्दगी को रौंदती हुई, धड़धड़ाती हुई गुज़र रही है, लोग उसपर पत्थर फेंकेंगे, फिर उसकी पटरियों को जाम कर देंगे !

अभी वह दिन दूर लग रहा है, लेकिन ज़िन्दगी की इस कदर तबाही को लोग आखिरकार कबतक बर्दाश्त करेंगे ?

(7अक्‍टूबर, 2019)

Wednesday, October 09, 2019


अक्सर ज़िंदगी की सुविधाएँ और सुरक्षाएँ हमें काहिल,कायर, स्वार्थी और समझौतापरस्त बना देती हैं, केंचुआ की तरह रीढ़विहीन बना देती हैं, और फिर धूर्त, कमीना और बेशर्म भी बना देती हैं !

फासिज्म की काली आँधी अपने असली रंग में आती जा रही है ! जो भी इसके ख़िलाफ़ तनकर खड़ा होने और हर कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं, हम उन्हें दिल से सलाम करते हैं ! ये जो राजधानियों के साहित्य-कला के उत्सवों और मेलों में विहार करते बौद्धिक रसिक जन हैं, जो विभिन्न आयोजनों में हत्यारी फासिस्ट पार्टी भाजपा के मंत्रियों-नेताओं के साथ मंचासीन होते और झुककर, दांत चियारकर उनका अभिवादन करते लेखक-गण हैं, ये जो म.प्र. में कांग्रेस की सरकार आते ही छत्तीसगढ़ के आदिवासियों पर जारी बघेल सरकार के कहर को भूलकर भोपाल की तीर्थयात्रा करते और पुरस्कृत-सम्मानित होते कथित सेक्युलर और प्रगतिशील महामहिम हैं, ये सभी के सभी कठिन समय में माँदों में दुबक जायेंगे, झुकने को कहने पर रेंगने लगेंगे I

ज़रूरत एक लम्बे संघर्ष की तैयारी के लिए सड़कों पर उतरने की है I ज़रूरत आम मेहनतक़श अवाम को जागृत, शिक्षित, एकजुट और संगठित करने की अनवरत, अहर्निश कोशिशों में लग जाने की है ! यह समय का आसन्न तकाजा है कि कवि-लेखक-कलाकार विविध रचनात्मक-सांस्कृतिक-शैक्षिक कार्यक्रमों के जरिये गाँवों-शहरों के आम मेहनतक़श गरीबों की झुग्गी-झोंपड़ियों तक जाएँ और उनके भीतर जाति-धर्म की राजनीति और धार्मिक कट्टरपंथी फासिज्म के विरुद्ध राजनीतिक चेतना पैदा करने में लग जाएँ ! हमें इन तरीकों से फासिस्टों के प्रचार एवं शिक्षा के ज़मीनी नेटवर्क का मुकाबला करना होगा !

आप संगीत की मधुर स्वर-लहरियों पर पी जाने वाली सुबह की चाय, दोपहर की नींद और शाम की महफ़िलों से समय निकालिए और आस-पास की मज़दूर बस्तियों में जाइए ! वहाँ अपने मित्रों और मज़दूरों की मदद से चलता-फिरता या स्थायी जगह वाला पुस्तकालय-वाचनालय बनाइये, सांस्कृतिक आयोजनों को बच्चों, युवाओं और नागरिकों की शिक्षा का माध्यम बनाइये, खेलकूद क्लब बनाइये, शहीदों की जयंतियों पर आयोजन कीजिए, कोर्स की पढ़ाई-लिखाई में मज़दूरों की बच्चों की मदद के लिए अंशकालिक पाठशालाएँ लगाइए, स्त्री मज़दूरों और अन्य मज़दूरों के लिए रात्रि-पाठशालाएँ लगाइए, मज़दूरों को उनके अधिकारों के बारे में और पतित-निठल्ली ट्रेड यूनियनों के बरक्स नए सिरे से जुझारू मज़दूर आन्दोलन खड़ा करने के रास्तों के बारे में बताइये, रूढ़ियों, अंधविश्वास और जाति-व्यवस्था तथा धर्मान्धता के विरुद्ध ज़मीनी तौर पर एक जुझारू सामाजिक आन्दोलन खड़ा करने के लिए शिक्षा एवं प्रचार का काम कीजिए !

अगर आप सच्चे दिल से एक वाम, जनवादी, प्रगतिशील और सेक्युलर विचारों के व्यक्ति हैं, तो आपको यह करना ही होगा ! वक्तृता और लेखन से वाम प्रतिबद्धता का दम भरने वाला व्यक्ति अगर आरामतलब, सुविधाभोगी, कैरियरवादी, कायर और सत्ता से नैकट्य का आकांक्षी हो, तो उससे घृणित और कमीना और कोई नहीं होता ! आम लोगों के बीच जाइए, अपने अलगाव को समाप्त कीजिए, ह्रदय तब स्वतः अभय हो जाएगा !

फासिज्म के विरुद्ध बीसवीं शताब्दी जैसी ही विकट और बीहड़ लड़ाई सर पर है ! याद रखिये, अकेले भारत की आबादी पूरे यूरोप से लगभग दूनी है, और संघ एक नव-क्लासिकी ढंग की फासिस्ट पार्टी है ! यह भी याद रखिये कि विश्वपूँजीवाद के असाध्य ढाँचागत संकट के इस दौर में फासिज्म का उभार और पूँजीवादी जनवाद का क्षरण-विघटन एक 'ग्लोबल ट्रेंड' है !

इतिहास के इस दौर में फिलहाल क्रान्ति की लहर पर उलटाव और प्रतिक्रान्ति की लहर हावी है ! बेशक यह निराशा, विभ्रम, ठहराव-बिखराव का दौर है ! पर यह दौर स्थायी नहीं है ! छोटे-छोटे प्रयासों और उद्यमों की कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए प्रतिरोध की अप्रतिरोध्य शक्ति तैयार की जा सकती है !

माना कि हम अपने काम में काफी पीछे हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पहले से ही हार मान लें ! पहले से ही हार मान लेने और हथियार डाल देने का मतलब होगा सभ्यता और मनुष्यता के विनाश पर अपने हाथों मुहर लगा देना ! फासिस्टों और निरंकुश बुर्जुआ सत्ताओं को अगर अपना खेल खेलने के लिए खुल्ला छोड़ दिया जाएगा तो वे नरसंहारों, दंगों, युद्धों और पर्यावरण-विनाश के द्वारा मनुष्यता को ही तबाह कर देंगे ! इसलिए, लड़ना तो होगा ही ! और कोई विकल्प नहीं है ! अपने तईं कुछ पहल तो लीजिये, कुछ छोटी-छोटी शुरुआतें तो कीजिए ! एक बड़ी शुरुआत की ज़मीन खुद ही तैयार होने लगेगी !

(7अक्‍टूबर, 2019)

मेरी एक पोस्ट का कामरेड शिशिर द्वारा किया गया अंग्रेज़ी अनुवाद

Those who never get sad, are scary. Many a times, sadness is the dawn of a creative explosion or a new beginning. Sadness is not synonymous to hopelessness. Warriors, creators, philosophers, who are visionaries, they see the periods of sadness in their lives. Let us give sadness its due respect and dignity and understand this law of dialectics that everything, after reaching a certain stage, transforms into its opposite.

~ Kavita Krishnapallavi
(Originally in Hindi)


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मेरी एक और पोस्ट अंग्रेज़ी में I अनुवादक:का. शिशिर I

Our whole life, we fight many battles, we lose, we win, we sustain many wounds. They heal with time and the scars redolent of those wounds remain on our bodies as witnesses to our past. But the battles we run away from, their wounds latch on to our souls forever and ooze like cancer. They spread to our heart and fill it with poison and pus. Not the battles we lost, but the battles we fled from are the ones that wipe out our human essence.

By Kavita Krishnapallavi
(Originally in Hindi)

Tuesday, October 08, 2019

तानाशाह की चाहत


तानाशाह की चाहत थी कि जो भी

सबसे अच्छा, सबसे बड़ा, सबसे अधिक, सबसे टिकाऊ

और सबसे सुन्दर हो, वह उसे हासिल हो I

वह सबसे बड़े साम्राज्य, सबसे अच्छे दरबारियों,

सबसे बड़ी सेना, सबसे खूंख्वार दंगाइयों, सबसे उन्मादी अनुयाइयों,

सबसे बड़े नरसंहारों, सबसे ज़्यादा सैर-सपाटों, सबसे सुन्दर पोशाकों,

सबसे सम्मोहक मिथकों और सबसे भव्य मंचों और आयोजनों के साथ

सबसे ज़्यादा लम्बे समय तक शासन करना चाहता था I

*

इतिहास में सभी तानाशाहों ने

हमेशा ऐसा ही चाहा

और आखिरकार एक समय आया

जब लोगों ने हर तानाशाह को

सबसे बड़ी और सबसे कठोर सज़ा दी

और फिर कहा कि यही सबसे न्यायपूर्ण,

सबसे अच्छा और सबसे सुन्दर काम है

सबसे ज़्यादा लोगों के हित में I

खदेड़े गए कुछ तानाशाह

अपने संरक्षक देशों की राजधानियों में

बूढ़े छछूंदरों की तरह बिलों-नालियों में दुबके हुए मरे

और शेष को लोगों ने सड़कों पर घसीटा

और चौराहों पर उलटा टांग दिया I

(6अक्‍टूबर, 2019)

राह अभी काफ़ी लम्बी है, और विकट कठिनाइयों और चढ़ावों-उतारों भरी भी !

आत्मधर्माभिमानी, आत्मतुष्ट, अहम्मन्य या निश्चिन्त क्रांतिकारियों को हालात की ठोकरें अभी काफ़ी सबक सिखायेंगीI जो बहुत जल्दी आसमान के तारे तोड़ लेने को उतावले हैं, वे भी यथार्थ की कठोर सतह पर उतर आयेंगे!

फासिज्म का कहर बरपा होना शुरू हो चुका है I क्या हम संजीदगी से मुकाबले के लिए तैयार हो रहे हैं ? क्या हम हर कीमत चुकाने और सब कुछ झेलने को तैयार हैं ?

बहरहाल, राह लम्बी है तो है ! कठिन है तो है ! हमें निरंतर, अनथक, अपनी यात्रा जारी रखनी है ! अपना काम करते जाना है ! अंतरात्मा के साथ किया अपना करार निभाते रहना है !

क्रांतियाँ टाइम-टेबल बनाकर तो की नहीं जातीं ! ऐतिहासिक बदलावों का कालखंड अगर अपेक्षा से अधिक लंबा है, तो क्या ?

ऐसे समय होते हैं जब इतिहास चन्द दिनों के काम को सदियों में पूरा करता है ! और फिर ऐसे भी समय आते हैं जब इतिहास सदियों का काम चन्द दिनों में निपटा देता है !

(29सि‍तम्‍बर, 2019)

Monday, October 07, 2019

आयेंगे,उजले दिन ज़रूर आयेंगे



आयेंगे,उजले दिन ज़रूर आयेंगे

आतंक सरीखी बिछी हुई हर ओर बर्फ़
है हवा कठिन, हड्डी-हड्डी को ठिठुराती
आकाश उगलता अन्धकार फिर एक बार
संशय विदीर्ण आत्मा राम की अकुलाती

होगा वह समर, अभी होगा कुछ और बार
तब कहीं मेघ ये छिन्न -भिन्न हो पाएँगे

तहखानों से निकले मोटे-मोटे चूहे
जो लाशों की बदबू फैलाते घूम रहे
हैं कुतर रहे पुरखों की सारी तस्वीरें
चीं-चीं, चिक-चिक की धूम मचाते घूम रहे

पर डरो नहीं, चूहे आखिर चूहे ही हैं
जीवन की महिमा नष्ट नहीं कर पाएँगे

यह रक्तपात यह मारकाट जो मची हुई
लोगों के दिल भरमा देने का ज़रिया है
जो अड़ा हुआ है हमें डराता रस्ते पर
लपटें लेता घनघोर आग का दरिया है

सूखे चेहरे बच्चों के उनकी तरल हँसी
हम याद रखेंगे, पार उसे कर जाएँगे

मैं नहीं तसल्ली झूठ-मूठ की देता हूँ
हर सपने के पीछे सच्चाई होती है
हर दौर कभी तो ख़त्म हुआ ही करता है
हर कठिनाई कुछ राह दिखा ही देती है

आए हैं जब चलकर इतने लाख बरस
इसके आगे भी चलते ही जाएँगे

आएँगे उजले दिन ज़रूर आएँगे

-- वीरेन डंगवाल


छोटी-छोटी बातें
हज़ारों दुख गाथाएँ
समझने में सीधी और आसान
कहीं सिर्फ़ एक या दो मामूली सी
पहचान।
धूलकण
एक पेड़ का गिरना
कहीं से थोड़ा सा रिसाव ,
चूल्‍हे का ऊष्‍म धुआँ।
हमारी आवाज़ शर्मिन्‍दा होकर
छुप जाती है मशीनों के बाज़ार में ।

सिर्फ वेदनाएँ
दुख की गाथाएँ
चलती रहेंगी अनंत काल तक
या
हम उठ खड़े होंगे
अंतिम क्षणों में?
अन्‍त नहीं होगा
जहाँ अन्‍त होना था,
वहीं शुरुआत की सुबह खिल उठेगी।

-- शंकर गुहा नियोगी 

Sunday, October 06, 2019

राष्ट्रपिता बनने की तानाशाह की चाहत के बारे में



बहुत सारी चमत्कारी और रिकॉर्डतोड़ सफलताओं

और उपलब्धियों के बाद,

तानाशाह अब पूरे देश का बाप बनना चाहता था

और राष्ट्रपिता कहलाना चाहता था I

यह लोगों से उसका प्रतिशोध था क्योंकि

वह जानता था कि बहुत लोग उसके बारे में कहते हैं कि

'देश जैसे इसके बाप का है !'

समस्या यह थी कि जिनकी थैली की ताक़त ने

जनतंत्र को तमाशा और उसको तानाशाह बनाया था

वे लोग तो खुद ही अपने को सभी राजनीतिज्ञों का बाप समझते थे

जिनमें तानाशाह भी शामिल था !

और जो आम लोग थे वे सोचते थे कि यह तो

सूअर को बाप बनाने से भी बदतर होगा !

लेकिन जितने भी सड़क के गुण्डे, लफंगे, गंजेड़ी, लम्पट,

जेबकतरे, रहजन, बटमार, ठग, चोर, डाकू,

तड़ीपार, हत्यारे, बलात्कारी और दंगाई-बलवाई थे

वे सभी तानाशाह पर अपार श्रद्धा रखते थे,

यानी वे सभी जिनके पास बुद्धि बस नाम की होती थी, जो तर्क और मनुष्यता

और लोकतंत्र और सेकुलरिज्म जैसी चीज़ों से रोम-रोम से

घृणा करते थे और जो ताक़त के आगे श्रद्धापूर्वक

साष्टांग हो जाते थे, वे सभी तानाशाह को अपना पिता मानते थे !

तानाशाह के लिए यह बहुत क्लेश की बात थी कि

आम नागरिक उसे पिता मानने को तैयार नहीं थे I

उसके भीतर पूरी जनता के प्रति जो प्रतिशोध की आग

धधकती रहती थी वह तमाम अत्याचार करने के बावजूद

शांत नहीं हो पाती थी और वह सोचता था कि वह पूरे देश को ऐसे

गुंडों, दंगाइयों, हत्यारों और तमाम किस्म के बदमाशों से भर देगा

जिनके लिए वह पितातुल्य है,

और पूरे देश के आम लोगों को तबाह कर देगा

जो उसकी भक्ति नहीं करते !

समस्या यह थी कि यह असंभव था !

इतिहास में पहले भी जब किसी तानाशाह ने ऐसा सोचा

तो तबाह होते आम लोगों ने एक दिन अपनी तबाही के बारे में

फैसलाकुन ढंग से सोचा

और तानाशाह को ही तबाह कर दिया उसके तमाम

लाव-लश्कर के साथ और उसके लग्गू-भग्गुओं के साथ !

(26 सितम्‍बर, 2019)

Tuesday, September 24, 2019


कुछ लोग अक्सर इस किस्म की बातें करते रहते हैं कि 'फेसबुक पर सबकुछ फेक है', 'यहाँ उपस्थिति की कोई उपयोगिता नहीं है', 'हमें ज़मीनी राजनीतिक कामों पर ध्यान देना चाहिए' ... वगैरह-वगैरह ! और मज़े की बात यह है कि वे फेसबुक पर उपस्थिति का प्रलोभन छोड़ भी नहीं पाते, जाते और फिर आते रहते हैं, 'जैसे उड़ि जहाज का पंछी पुनि जहाज पे आवै !' इससे भी दिलचस्प बात यह है कि अपने उपरोक्त विचार वे फेसबुक पर ही प्रकट करते रहते हैं !

भइये ! यह कहता कौन है कि फेसबुक की आभासी दुनिया राजनीतिक कामों की वास्तविक दुनिया का विकल्प है ! इस "फेक" दुनिया से पूरीतरह विदा लेकर राजनीतिक कामों में पिल ही क्यों नहीं पड़ते ! शायद, देर-सबेर कुछ ठोस नतीज़ा हाथ आ ही जाए !

और भइये ! यह 'अ-ब-स' तो सभी जानते हैं कि सोशल मीडिया एक बुर्जुआ जनवादी स्पेस है और हर बुर्जुआ जनवादी स्पेस की तरह इसकी भी एक स्पष्ट चौहद्दी है ! आप भी जान लो !

(23सितम्‍बर, 2019)


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ज़िन्दगी की ठोकरें खाकर कई बार आप जैसे एक विरेचन (कैथार्सिस) और उदात्तीकरण की प्रक्रिया से गुज़रते हैं (हालाँकि हमेशा और हर व्यक्ति के साथ ऐसा नहीं होता) I आप स्वयं क्षुद्रताओं-तुच्छताओं से जैसे-जैसे मुक्त होते जाते हैं, वैसे-वैसे आप अपने आसपास की क्षुद्रताओं-तुच्छताओं को बेहतर ढंग से देखने-जानने-समझने लगते हैं I और तब आप ओछी, या त्वरित, या आवेशित प्रतिक्रिया नहीं देते, बल्कि असम्पृक्त और वीतरागी भाव से लोगों की टुच्चइयों-चालाकियों-खुदगर्ज़ियों के बारे में सोचने लगते हैं और सिर्फ तभी उनका विरोध करते हैं जब कोई बहुत बड़ा उसूली मामला हो I अन्यथा, अपनी आँखों के सामने जारी क्षुद्रता-तुच्छता के सिनेमा को बस अन्यमनस्क दर्शक की तरह देखते रहते हैं I उस दर्शक की तरह, जिसे उसके साथ वाले कोई सी-ग्रेड सोशल ड्रामा देखने के लिए ज़बरदस्ती सिनेमा-हॉल में घसीट लाये हों I

(23सितम्‍बर, 2019)


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मुखौटों का स्थान कला की दुनिया में होता है I ज़िंदगी में वे वितृष्णा और विरक्ति पैदा करते हैं I

आप एक निहायत स्वार्थी, मतलबी, आत्मकेंद्रित और घमंडी इंसान हैं तो कोई बात नहीं ! ऐसे लोग तो आज समाज में बहुतायत में पाए जाते हैं I समस्या तब होती है जब आप एक परोपकारी, सरोकारी, सहृदय और विनम्र होने का मुखौटा लगा लेते हैं और हमें पता होता है कि इस मुखौटे के पीछे चेहरा तो वही पहले ही वाला है !


उदात्त मानवीय गुणों को रोजमर्रा के व्यवहार में 'डिप्लोमेसी' या 'टैक्टिस' बना देना घटिया ही नहीं, अमानवीय लगता है I ऐसा व्यक्ति डरावना लगने लगता है !

(25सितम्‍बर, 2019)



Monday, September 23, 2019


अच्छी लेकिन पुरानी चीज़ से नहीं, बल्कि खराब लेकिन नयी चीज़ से नयी शुरुआत करें!
-- बेर्टोल्ट ब्रेष्ट (वाल्टर बेंजामिन के हवाले से)

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बाहरी दृष्टि से सत्पथ पर ले जाने वाली निर्बुद्ध निष्ठा कुमार्ग पर ले जाने वाली स्वतंत्र बुद्धि से अधिक हानिकारक होती हैI
-- गजानन माधव मुक्तिबोध