Monday, February 18, 2019

देश फिर एक ख़तरनाक दिशा में जा रहा है...



देश फिर एक ख़तरनाक दिशा में जा रहा है ! पुलवामा की घटना के बाद अखबारों, न्यूज़ चैनलों से लेकर सोशल मीडिया तक पर "देशभक्ति" का जुनून उबाल पर है ! चारो ओर एक के बदले दस सर लाने, पाकिस्तान पर अभी हमला करके उसे नेस्तनाबूद कर देने और "गद्दार कौम" के लोगों को सबक सिखाने का शोर गूँज रहा है ! नतीजे भी आने लगे हैं ! जम्मू में हिन्दुत्ववादी गुंडों ने मुस्लिम बस्तियों पर हमले किये I देहरादून के विभिन्न शिक्षा-संस्थानों में पढ़ने वाले 700 छात्र शहर आतंक के साये तले जीते हुए शहर छोड़ने के बारे में सोच रहे हैं ! एक जगह करीब 20 कश्मीरी छात्राओं ने जुनूनी भीड़ से बचने के लिए अपने को हॉस्टल में भीतर से बंद कर लिया I बंगलुरु और देश के अधिकांश शहरों में जहाँ कश्मीरी छात्र पढ़ते हैं, उन्हें धमकियाँ दी जा रही हैं ! कश्मीर की तबाह अर्थ-व्यवस्था के कारण हजारों की तादाद में जो कश्मीरी देश के महत्वपूर्ण पर्यटन-स्थलों पर शिल्प और दस्तकारी की दूकानें चलाकर परिवार का पेट पालते हैं, उन्हें धमकाया जा रहा है !

मैंने कुछ ही दिनों पहले एक पोस्ट डाली थी कि लोकरंजक नारों के फुस्स होने के बाद मोदी सरकार ने राम मंदिर का मुद्दा उछाला है, लेकिन अगर यह काठ की हाँडी दुबारा नहीं चढ़ी तो चुनावों से पहले पाकिस्तान-विरोधी लहर उभाड़ी जा सकती है और सीमा पर तनाव पैदा हो सकता है, क्योंकि अंधराष्ट्रवादी जूनून फासिस्टों का अंतिम शरण्य होता है और भारत की ठोस परिस्थितियों में तो इसके साथ-साथ धार्मिक ध्रुवीकरण भी आसान हो जाता है ! आश्चर्य है (यानी नहीं है ) कि जल्दी ही ये हालात पैदा हो गए ! आश्चर्य तो इस बात पर भी होता है कि आतंकी हमले के अंदेशे की खुफिया रिपोर्ट के बाद भी CRPF के इतने बड़े काफिले को एक साथ भेजा गया और सभी जानते हैं कि जिसतरह सेना के काफिले के गुजरने के लिए पूरा हाईवे खाली कराया जाता है, वैसा CRPF के मामले में नहीं होता ! तो क्या यह ऐसे ही किसी वारदात को न्योता देना नहीं था ? और इस लापरवाही पर अब कोई चर्चा नहीं हो रही है ! होने को कुछ भी हो सकता है ! फासिस्ट सत्ताओं के षडयंत्रों-कुचक्रों का इतिहास उठाकर देख लीजिये !

जो लोग पूरे कश्मीर की जनता को सबक सिखाना चाहते हैं, उन्हें ज़रा रुककर सोचना चाहिए कि आखिर वहाँ ये हालात कैसे पैदा हुए कि घाटी की 90 फीसदी आबादी में भारत-विरोधी भावनाएँ सुलग रही हैं ! उन्हें पता करना चाहिए कि घाटी में सेना और अर्ध-सैनिक बलों के हाथों कितने लोग मारे गए हैं, कितने लोग ग़ायब हुए हैं, कुनान-पोशपुरा जैसी कितनी घटनाएँ घटी हैं, और कितनी गुमनाम कब्रें हैं ! यह सच है कि पाकिस्तान-परस्त अलगाववादी भी इस आँच पर अपनी रोटियाँ सेंक रहे हैं और पाकिस्तानी शासक वर्ग भी ! पर समूची जनता सिर्फ़ और सिर्फ़ गलत और दमनकारी नीतियों के चलते उस मुकाम पर पहुँची है कि अब आतंकी पाकिस्तान से नहीं आते बल्कि लोकल आबादी में से आते हैं और आम ग़रीब के बच्चे-बच्चियाँ भी ग्रुप बनाकर सेना पर पत्थरबाजी करते हैं ! यह अटल सत्य है कि कश्मीर-समस्या का समाधान बन्दूक की नोक पर नहीं होगा, न ही वहाँ के स्वयंभू दलाल नेताओं से सौदेबाजी करके होगा, बल्कि आम अवाम को भरोसे में लेकर ही हो सकता है ! तबतक क़त्लो-गारत का यह सिलसिला चलता रहेगा I जैसे कश्मीर की आम जनता मर रही है, वैसे ही सेना और अर्ध-सैनिक बलों के जो जवान मर रहे हैं वे भी आम गरीब घरों से ही आते हैं ! युद्ध देश के भीतर हो या सीमा पर, तोपों का चारा तो आम घरों के गरीब ही बनते हैं ! पर ठन्डे दिमाग से यह भी सोचिये कि जो लोग जीवन-यापन के लिए सेना में भरती होते हैं, उनका जनता के प्रति क्या रवैया होता है ! असम रेजिमेंट के मुख्यालय के बाहर मणिपुर की माओं का वह नग्न प्रदर्शन याद है या नहीं ? CRPF का जो काफिला घाटी में जा रहा था वह वहाँ के लोगों के लिए गुलदस्ते लेकर नहीं जा रहा था ! यह एक नंगा और बदसूरत सच है !

एक और बात गौरतलब है ! इससमय अंधराष्ट्रवादी जुनून की जितनी भारत के शासकों को ज़रूरत है, उतना ही पाकिस्तान के शासकों के लिए भी ज़रूरी है कि भारत के साथ तनाव कुछ विस्फोटक रूप में पैदा हो ! पाकिस्तान में भी इमरान खान के सारे लोकरंजक वायदे फुसफुसे पटाखे साबित हुए हैं और उन्हें परम भ्रष्ट पाकिस्तानी सेना की कठपुतली माना जा रहा है I वहाँ की अर्थ-व्यवस्था ध्वस्त हो रही है, बेरोज़गारी और महंगाई आसमान छू रही है ! ऐसे में सरकार को वहाँ भी देशभक्ति के जुनून, युद्ध के माहौल, या सीमित स्तर के युद्ध की ज़रूरत है !

और इस प्रश्न का एक अंतरराष्ट्रीय पहलू भी है ! साम्राज्यवादी देशों का आर्थिक संकट इससमय विस्फोटक रूप लेता जा रहा है ! बदहवास ट्रम्प वेनेजुएला सहित कई लैटिन अमेरिकी देशों में सीधे सैनिक कार्रवाई या गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करने के बारे में सोच रहा है ! युद्ध और हथियारों की बिक्री से साम्राज्यवादियों को हमेशा ही अपना आर्थिक संकट दूर करने में मदद मिलती है I पश्चिमी देशों के हथियारों के सबसे बड़े खरीदार या तो मध्य-पूर्व के देश हैं, या फिर भारत और पाकिस्तान ! भारतीय उपमहाद्वीप में अशांति पैदा होने के साथ ही साम्राज्यवादियों की तो चाँदी कटने लगेगी !

ये सारी बातें हार्डकोर जुनूनियों को नहीं समझाई जा सकतीं, पर जो आम भोले-भाले नागरिक ऐसी घटनाओं के बाद बिना अधिक आगा-पीछा सोचे हुए अंधराष्ट्रवादी "देशभक्ति" के भावोद्रेक और प्रतिशोधी प्रतिहिंसा की लहर में बहने लगते हैं, उनसे थोड़ा रुककर पूरे सवाल पर सोचने की अपील तो की ही जा सकती है और उनसे यह अपेक्षा भी की जा सकती है ! याद रखिये, देश कागज़ पर बना नक्शा नहीं होता ! देश आम लोगों से बनता है! देश के आम लोगों के हित से सरोकार रखना ही सच्ची देशभक्ति है !

(16फरवरी, 2019)

एदुआर्दो गालेआनो के कुछ उद्धरण....



पहले चुम्बन और वाइन के दूसरे गिलास तक हम सभी नश्वर प्राणी होते हैं।

🤪🤪😃😃
(अमरत्व और मोक्ष-प्राप्ति का यह मार्ग गालेआनो अगर लैटिन अमेरिका की जगह भारत में पैदा होकर बताते तो सोचिये, संस्कारी लोग उन्हें कितना धिक्कारते और बजरंगिये और श्रीराम सेने वाले किसतरह उनके पीछे पड़ जाते !)



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बुराई के विरुद्ध अच्छाई की लड़ाई के नाम पर जब भी कोई नया युद्ध छिड़ता है तो उसमें जो मारे जाते हैं, वे सभी ग़रीब होते हैं I और हमेशा यही कहानी दुहराई जाती है, बार-बार, बार-बार ।


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इतिहास दरअसल कभी भी अलविदा नहीं कहता I इतिहास कहता है,'फिर मिलेंगे ।'



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अगर अतीत को वर्तमान से कुछ भी नहीं कहना रहता, तो इतिहास उस अलमारी में चैन की नींद सोने के लिए चला जाता जिसमें व्यवस्था अपने भेस बदलने वाले कपड़े रखती है ।



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राजनीति जब कवि का ध्यान खींचती है, तो वह कविता से कहता है कि वह अपने को धातु या आटे की तरह उपयोगी बनाए, कि वह अपने चेहरे को कोयले की गर्द से मैला करने और आमने-सामने की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हो जाए।



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उन जहाज़ियों के लिए जो हवाओं से प्यार करते हैं, स्मृति प्रस्थान करने के लिए एक अच्छा बंदरगाह होती है ।


Sunday, February 17, 2019



मुहब्बत, बग़ावत, ख़ुद्दारी और इंसानियत की जीत में यकीन के बेमिसाल शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की यह नज़्म जो, लगता है, देश के आज के हालात पर ही लिखी गयी है :



निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ

चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले

जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले

नज़र चुरा के चले जिस्म ओ जाँ बचा के चले

है अहल-ए-दिल के लिए अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद

कि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद

बहुत है ज़ुल्म के दस्त-ए-बहाना-जू के लिए

जो चंद अहल-ए-जुनूँ तेरे नाम-लेवा हैं

बने हैं अहल-ए-हवस मुद्दई भी मुंसिफ़ भी

किसे वकील करें किस से मुंसिफ़ी चाहें

मगर गुज़ारने वालों के दिन गुज़रते हैं

तिरे फ़िराक़ में यूँ सुब्ह ओ शाम करते हैं

बुझा जो रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो दिल ये समझा है

कि तेरी माँग सितारों से भर गई होगी

चमक उठे हैं सलासिल तो हम ने जाना है

कि अब सहर तिरे रुख़ पर बिखर गई होगी

ग़रज़ तसव्वुर-ए-शाम-ओ-सहर में जीते हैं

गिरफ़्त-ए-साया-ए-दीवार-ओ-दर में जीते हैं

यूँही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़

न उन की रस्म नई है न अपनी रीत नई

यूँही हमेशा खिलाए हैं हम ने आग में फूल

न उन की हार नई है न अपनी जीत नई

इसी सबब से फ़लक का गिला नहीं करते

तिरे फ़िराक़ में हम दिल बुरा नहीं करते

गर आज तुझ से जुदा हैं तो कल बहम होंगे

ये रात भर की जुदाई तो कोई बात नहीं

गर आज औज पे है ताला-ए-रक़ीब तो क्या

ये चार दिन की ख़ुदाई तो कोई बात नहीं

जो तुझ से अहद-ए-वफ़ा उस्तुवार रखते हैं

इलाज-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार रखते हैं

Thursday, February 14, 2019


राजा नंगा है !

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राजा गधा है ! उसके लिए दूसरे सोचते हैं !

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राजा झुट्ठा है !

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राजा सेठों का कुत्ता है ! राजा के पास भी कई सारे नस्लों के ढेरों कुत्ते हैं !

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राजा लम्पट और दुराचारी है, नशेड़ी और व्यभिचारी है !

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राजा हत्यारा है ! उसके महल की आलमारियों में कंकाल भरे हैं ! महल से बाहर निकलने वाली नालियों से अहर्निश खून बहता रहता है I

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राजा अबतक का सबसे भीषण भ्रष्टाचारी राजा है !

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राजा अपने को प्रजा का सेवक और चौकीदार कहता रहता है I हक़ीक़त में वह एक उन्मादी,पागल और बर्बर जालिम शासक है, जो हत्यारों के गिरोह से घिरा रहता है !

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राजा डर के मारे हर रात पसीने से लथपथ उठ बैठता है और थरथर कांपता रहता है ! कभी वह सपना देखता है कि लोगों ने उसे सड़कों पर दौड़ाकर पकड़ लिया है और चौराहे पर नंगा उल्टा टांग दिया है और आते-जाते लोग उसपर थूक रहे हैं ! कभी वह सपना देखता है कि उसीके लोगों ने उसे घेर लिया है और ताबड़तोड़ उसे खंजर घोंपे चले जा रहे हैं !

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जो भी हो, एक बात तय है ! इस रजवा की बड़ी दुर्गत होने वाली है ! देख लेना !

(11फरवरी, 2019)

Saturday, February 09, 2019

प्रेम के बारे में बाल्ज़ाक के कुछ विचारप्रवण, कुछ भावप्रवण और कुछ विनोदपूर्ण विचार



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( बाल्ज़ाक समाज की सतह के नीचे सक्रिय आर्थिक संबंधों, सामाजिक संबंधों और अपने समय के राजनीतिक परिदृश्य के अनन्य चितेरे थे और इस नाते उन्होंने अपने लेखन के ज़रिये बुर्जुआ समाज की ऐतिहासिक समालोचना प्रस्तुत की ! बेशक उनके यथार्थवाद में नागरिकों के अंतर्जगत या मनोजगत के द्वंद्वों और जटिलताओं का स्तान्धाल या दोस्तोयेव्स्की जैसा भूदृश्य-सरीखा विस्तार देखने को नहीं मिलता, लेकिन उनकी औपन्यासिक कृतियों में यहाँ-वहाँ आये संक्षिप्त संवादों, प्रसंगों, घटनाओं और वक्तव्यों से ही यह जाहिर हो जाता है कि मानवीय भावनाओं और रिश्तों की दुनिया के बारे में भी वह एक युगद्रष्टा कलाकार और तत्ववेत्ता की समझ रखते थे ! उनके उपन्यासों में सैकड़ों स्थानों पर प्रेम के बारे में कुछ वक्तव्य पढ़ने को मिलते हैं, जिनमें से कुछ भावनाओं की गहराई लिए हुए हैं तो कुछ बेहद विनोदपूर्ण भी हैं ! इनमें से कुछ यहाँ प्रस्तुत हैं, जिन्हें पढ़कर आप सोचिये भी और आनंदित भी होइए !)

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प्यार इन्द्रिय-बोधों की कविता है I

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सच्चा प्यार अनश्वर होता है, असीम होता है और हमेशा बस अपनी तरह का होता है I यह समानतापूर्ण होता है और शुद्ध होता है और इसे उग्र प्रदर्शनों की ज़रूरत नहीं होती : यह सफ़ेद बालों के साथ भी देखा जाता है और हृदय से हमेशा युवा होता है I

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एक स्त्री उस व्यक्ति के चेहरे को, जिसे वह प्यार करती है, यूँ जानती है जैसे एक नाविक खुले समुद्र को जानता है I

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जो जितना अधिक आँकता है, उतना ही कम प्यार करता है I

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प्यार हो सकता है या नहीं हो सकता है, लेकिन जहाँ प्यार है, वहाँ उसे स्वयं को अपरिमित रूप में प्रकट करना चाहिए I

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एक पुरुष एक स्त्री को हमेशा प्यार नहीं कर सकता, यह कहना उतना ही बेतुका है जितना यह कि एक वायलिन-वादक को संगीत का वही टुकड़ा बजाने के लिए कई वायलिनों की ज़रूरत होगी I

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तथ्य यह है कि प्यार दो किस्म के होते हैं, एक जो निर्देश देता है और दूसरा जो आज्ञा मानता है I दोनों काफ़ी अलग किस्म के होते हैं, और एक से जो भावावेग उभरते हैं, वे दूसरे से पैदा होने वाले भावावेग से भिन्न होते हैं I

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जब स्त्रियाँ हमें प्यार करती हैं, तो हमें हर चीज़ के लिए, यहाँतक कि हमारे अपराधों के लिए भी माफ़ कर देती हैं; जब वे हमें प्यार नहीं करतीं, तो किसी चीज़ के लिए, यहाँतक कि हमारी खूबियों के लिए भी हमें श्रेय नहीं देतीं I

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एक प्रेमी हमेशा अपनी प्रेमिका के लिए पहले और अपने लिए बाद में सोचता है I पति के साथ ठीक उल्टी बात होती है I

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पहला प्यार वह टीकाकरण होता है जो इंसान को दूसरी बार यह बीमारी पकड़ने से बचाता है I

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प्यार एक खेल है जिसमें इंसान हमेशा धोखा देता है I

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दो लोग जो हमेशा साथ रहते हैं, उनके बीच प्यार या घृणा लगातार बढ़ती ही रहती है; हर क्षण बेहतर ढंग से प्यार या घृणा करने के ताज़ा कारण मिल जाया करते हैं I

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कोई व्यक्ति अगर संवाद करता है तो वह प्रेमी है, और अगर चुप रहता है तो पति I

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'कुछ नहीं' -- इन शब्दों का प्रेमीगण इसतरह इस्तेमाल करते हैं कि उनका अर्थ ठीक उल्टा होता है I

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एक पति के मुकाबले एक प्रेमी होना आसान होता है I इसका सीधा सा कारण यह है कि समय-समय पर कुछ ख़ूबसूरत बातें कहते रहने की तुलना में हर रोज़ विनोदी और हाज़िर-जवाब बने रहना अधिक कठिन होता है I

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महान प्रेम-प्रसंग शैम्पेन के साथ शुरू होते हैं और टिज़ान ( Tisane -- जड़ी-बूटियों वाली एक किस्म की फ़्रांसीसी चाय ) के साथ ख़तम हो जाते हैं I

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Friday, February 08, 2019


दलाल ( ब्रोकर ) को मैं मानव जाति का सदस्य नहीं मानता !
-- बाल्ज़ाक



बाल्ज़ाक बुर्जुआ समाज और राजनीति के मानवद्रोही चरित्र और व्यावसायिक गतिविधियों के सूक्ष्म पर्यवेक्षक और तीक्ष्ण आलोचक थे I पर बुर्जुआ समाज के चरित्रों में शायद वह सबसे अधिक घृणा दलालों और सूदखोरों से करते थे I सूदखोरों से मेरा वास्ता कभी नहीं पड़ा और सट्टा बाज़ार तथा सत्ता बाज़ार के दलालों का भी कोई प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है I इनके बारे में अनुभवी साथियों से सुनकर और पढ़कर बस अनुमान लगा पाती हूँ कि बाल्ज़ाक इस प्रजाति से इतनी नफ़रत क्यों करते थे ! दिल्ली और विभिन्न शहरों में किराए की जगह ढूँढते हुए प्रॉपर्टी डीलर्स से साबका खूब पड़ा और यह देखने का मौक़ा मिला कि दलाल चाहे जैसा भी हो, वह मनुष्य तो कत्तई नहीं रह जाता ! वह नीचता, पशुता, झूठ-फरेब, आने-पाई और हृदयहीनता के बदबूदार बजबजाते रसातल में पड़ा कोई सरीसृप होता है I

कला-साहित्य-संस्कृति की दुनिया में भी सत्ता और पूँजी अपना घिनौना खेल दलालों के जरिये ही खेलती हैं ! ये दलाल भी कई किस्म के होते हैं I जो पद-पीठ-प्रतिष्ठा-पुरस्कार से अघा चुके मठाधीश होते हैं, वे राजनेताओं के साथ मंच सुशोभित करते हैं, साहित्य-संस्कृति के ट्रस्ट चलाने और किताबें छपने वालें सेठों के घरों के 'रामू काका' होते हैं और विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागों के अधिपति होते हैं, उनका अपना साहित्यिक-सांस्कृतिक साम्राज्य होता है, पर मूलतः वे सत्ता और पूँजी की दुनिया के दलाल ही होते हैं जो ज्यादा से ज्यादा लेखकों-कवियों-कलाकारों को सत्तासेवी और जन-विमुख बनाने का काम करते हैं ! जो इनके जाल में फँसकर इनके दरबार में हाजिरी बजा आता है, या वहाँ का स्थायी नागरिक हो जाता है, वह फिर दूसरों को इस ट्रैप में फँसाने का काम करने लगता है ! कभी इनका विरोध करने वाला भी कई बार इनकी पांतों में ठीक उसीतरह शामिल हो जाता है जिसतरह ड्रेक्युला से लड़ने वाले व्यक्ति के गले में ड्रेक्युला जब दांत धँसा देता है तो वह भी ड्रेक्युला बन जाता है !

जो लोग वैचारिक कमजोरी के कारण इस सिस्टम को नहीं समझते और यूटोपियाई किस्म के आदर्शवादी होते हैं, वे अक्सर इनके ट्रैप में फँस जाते हैं और पद-पुरस्कार-ख्याति की थोड़ी सी पंजीरी फाँकने के बाद उनकी निष्ठाएँ बदल जाती हैं और नसों में खून की जगह रंगीन शरबत बहने लगता है ! आदमी को पता ही नहीं चलता कि दलालों का विरोध करते-करते कब वह भी उन्हीं में से एक हो गया !

सत्ता और पूँजी के ऐसे सांस्कृतिक-साहित्यिक दलालों की मंडी में इन दिनों खुले दक्षिणपंथियों से कईगुना अधिक पूछ उन छद्मवेषी वामपंथियों की है जो ज्यादा विभ्रमकारी और भ्रष्टकारी क्षमता रखते हैं ! ये साहित्यिक-सांस्कृतिक दलाल ज्यादा ख़तरनाक इसलिए भी हैं कि बोली-भाषा और हाव-भाव से ये दलालों जैसे नहीं लगते ! ये मानवता, मानवीय मूल्य,और सौन्दर्य आदि की ही नहीं, मंच और मौक़ा देखकर बर्बरता, दमन आदि के विरोध की भी बातें करते हैं और बहुत संवेदनशील और ईमानदार दीखने का नाटक बहुत कुशलता से कर लेते हैं !

पूँजी की आततायी सत्ता सिर्फ़ दमन-तंत्र के बूते नहीं चल सकती ! उसे प्रचार-तंत्र के अतिरिक्त एक विराट बौद्धिक-सांस्कृतिक मशीनरी की ज़रूरत होती है ! लेकिन इतने से भी काम नहीं चलता ! उसे ऐसे बौद्धिक दलाल चाहिए जो जनता के शिविर में घुसकर जनता की भाषा में सत्ता के दूरगामी हित की बातें और काम करें ! तमाम ऐसे भगोड़े, रिटायर्ड वामपंथी हैं, छद्म-वामपंथी लम्पट-पियक्कड़ हैं, नाज़ुक मसलों पर चुप रहने वाले चतुर-चालाक सोशल डेमोक्रैट्स और जर्जर गांधीवादी-समाजवादी मुखौटों वाले बुर्जुआ डेमोक्रैट लिबरल्स हैं जो आज यही काम कर रहे हैं ! जो भले लोग इनके ख़िलाफ़ बोलने से बच रहे हैं या इनकी सच्चाई को समझ नहीं पा रहे हैं, वस्तुगत तौर पर वे भी जनता के दुश्मनों के शिविर को ही लाभ पहुँचा रहे हैं !

(6फरवरी, 2019)

Thursday, February 07, 2019


"दिन दहाड़े जुआ खेलने वाले और रात को खेलने वाले के बीच वही फ़र्क़ होता है जो एक बेपरवाह पति और अपनी प्रेमिका की खिड़की के नीचे बेसुध पड़े प्रेमी के बीच होता है !" -- बाल्ज़ाक

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साहित्य-कला-संस्कृति की दुनिया में खुले दक्षिणपंथी सत्ताधर्मियों और छद्म-वामपंथी सत्ताधर्मियों में भी बस इतना ही फ़र्क़ होता है I

पहले कुछ लोग होते थे जो धूप में चटाई बिछाकर सुड़क-सुड़क कर घी पीते थे, सबके सामने ! और कुछ कम्बल ओढ़कर पीते थे I धीरे-धीरे सभी जान गए कि कौन-कौन घी पी रहा है !

तब यह तर्क दिया जाने लगा कि ड्योढ़ी से जब घी बँट ही रहा है, तो पीने में कोई बुराई नहीं है ! अब जब भी किसी ड्योढ़ी से घी बँटता है, सभी मंदिर के बाहर बैठे भिखमंगों की तरह कतार लगाकर घी पीने बैठ जाते हैं ! कहते हैं कि घी पीने से हमारे कंठ में बहुत ताक़त आ जायेगी और हम और अधिक दहाड़ भरी आवाज़ में जनता के गीत गायेंगे !

(5 फरवरी, 2019)

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बाल्ज़ाक ने लिखा था कि 'हर संपत्ति-साम्राज्य के पीछे कोई बड़ा अपराध होता है !' बाल्ज़ाक का यह कथन पूँजीवादी समाज के एक ऐसे अन्तर्निहित तर्क को उद्घाटित करता है, जिसे हम जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी विस्तारित कर सकते हैं ! अपवादों को अगर छोड़ दें, तो यश-ख्याति, सामाजिक प्रतिष्ठा तथा सत्ताधारियों और सेठों द्वारा प्राप्त प्रशंसा, पुरस्कार, पद आदि के भी जो साम्राज्य एक रुग्ण-पतित-अत्याचारी-अनैतिक बुर्जुआ समाज में जीते हुए कुछ भद्र-कुलीन-बौद्धिक जन सामाजिक-राजनीतिक जीवन या साहित्य-कला-संस्कृति-थियेटर आदि के क्षेत्र में खड़े कर लेते हैं, उनके जीवन की नीम-अँधेरी पार्श्वभूमि में यदि झाँका जाए और उनकी रंगशाला के तलघर की खोजबीन की जाए; तो वहाँ शातिर अपराधी के तमाम सरंजाम -- दस्ताने, नकाब, छुरे, नक़बजनी और ठगी के सामान, भेस बदलनेके सामान आदि मिल जायेंगे ! वहाँ दरबारी पोशाकें भी मिलेंगी और स्टाम्प पेपर्स पर टंकित आत्मा और ज़मीर को गिरवी रखने के दस्तावेज़ भी !

(5 फरवरी, 2019)





Wednesday, February 06, 2019


पहले ही स्पष्ट कर दूँ कि मैं यहाँ आम प्रवृत्ति की बात कर रही हूँ, सामान्य परिदृश्य की बात कर रही हूँ और तमाम चेतावनियों, दुराग्रहों-पूर्वाग्रहों, वितंडा-विवादों के बावजूद, इतना कहने से मैं स्वयं को रोक नहीं सकती !

एक सड़ते हुए, बेहद बीमार बुर्जुआ समाज में, फासिस्टी उत्पात के दशकों लम्बे दौर में, राज्यसत्ता की लगातार बढ़ती निरंकुशता, दमन-तंत्र की बढ़ती खूनी बर्बरता और रहे-सहे बुर्जुआ जनवाद की उड़ती चिंदियों के बीच, आपकी कविताओं-कहानियों पर भव्य सभागारों में आयोजन होते हैं, सत्ता और पूँजी के संस्कृति-प्रतिष्ठानों द्वारा, और सीधे सत्ता द्वारा भी, आप आमंत्रित, सम्मानित और पुरस्कृत होते रहते हैं, हत्यारों द्वारा प्रायोजित एवं संदिग्ध स्रोतों से वित्त-पोषित अति-कुलीन साहित्य-महोत्सवों में आप नक्षत्रों की तरह चमकते हैं; तो आपकी प्रगतिशीलता, आपका वामपंथ -- मेरे लिए संदिग्ध है ! आप या तो गधेपन की हद तक मूर्ख हैं जिसका कोई भी इस्तेमाल कर सकता है ( और यह भी कम ख़तरनाक बात नहीं है !) या फिर प्रतिष्ठित, प्रसिद्ध, प्रभावशाली और शक्तिशाली होने की आपकी दबी-छुपी मध्यवर्गीय कुण्ठित लिप्सा ने आपको बेहद असंवेदनशील,धूर्त, शातिर और निर्मम बना दिया है ! और आम लोग देर से ही सही, लेकिन अपने अनुभव से एक न एक दिन इस सच्चाई को जान ही जाते हैं कि सबसे भयावह और ख़तरनाक वह क्रूरता होती है जो संवेदनात्मक और सौन्दर्यात्मक मुखौटा लगाए रहती है और कविता की भाषा में मनुष्यता के बारे में चिन्ताएँ प्रकट किया करती है !

आप जानते हैं, नाजिम हिक़मत, पाब्लो नेरूदा, न्गूगी वा थ्योंगो, चिनुआ अचेबे, ब्रेष्ट, लोर्का, वाल्टर बेंजामिन, अर्नेस्तो कार्देनाल, ओत्तो रेने कास्तीयो, विक्तोर खारा, प्रमोद्य अनंत तूर आदि-आदि सैकड़ों महान रचनाकारों को अपनी ईमानदार, बेलाग-लपेट, समझौताहीन प्रतिबद्धता और वाम विचारों की क्या कीमत चुकानी पड़ी ! आप शायद यह भी जानते होंगे कि दूसरे विश्वयुद्ध से लेकर अबतक, लातिन अमेरिका और अफ्रीका के देशों में किसी विदेशी सत्ता द्वारा नहीं, बल्कि देशी बुर्जुआ सत्ताओं द्वारा क़त्ल कर दिए गए, जेलों में ठूँस दिए गए और अमानुषिक यातना का शिकार बनाए गए कवियों-लेखकों-संस्कृतिकर्मियों की संख्या हज़ार की सीमारेखा पार कर जायेगी ! आप भारत में आज़ादी से पहले जेल, यातना और बेहद विपन्नता का जीवन बिताने वाले राष्ट्रवादी और जनवादी चेतना के लेखकों-पत्रकारों के बारे में बखूबी जानते होंगे और उन बहादुर युवा क्रांतिकारी वामपंथी कवियों-लेखकों से भी परिचित होंगे जिन्हें '70के दशक में अपनी जन-निष्ठा और उसूलों की कीमत असह्य यंत्रणा झेलकर या प्राण देकर चुकानी पड़ी ( आप आज साहित्य और राजनीति की उनकी यांत्रिक या कमजोर समझ पर सवाल उठा सकते हैं लेकिन उनकी वीरता और ईमानदार प्रतिबद्धता पर तो कोई परम पतित पुरातन पापी ही सवाल उठा सकता है ) I मुक्तिबोध की कविता को आज फासिस्टों की सरकार का एक मंत्री बजट-भाषण के दौरान कोट करता है, छत्तीसगढ़ में एक हत्यारा पुलिस अधिकारी कवि मुक्तिबोध पर आयोजन करता है, तमाम समारोहों में सुधी साहित्य-चिन्तकगण उन्हें निर्जीव प्रतिमा में बदलकर हत्यारों और लफंगों की सोहबत में उनपर धूप-दीप-नैवेद्य चढ़ाते हैं, उनके ऊपर "प्राध्यापकीय आलोचना" के कूपमंडूकतापूर्ण मोटे-मोटे ग्रन्थ लिखे जाते हैं और शोध होते हैं, लेकिन अपने जीवन-काल में मुक्तिबोध हमेशा सत्ता-प्रतिष्ठानों और अकादमिक जगत के मठाधीशों की उपेक्षा के शिकार रहे, उनकी एक कृति पर प्रतिबन्ध भी लगा और फासिस्ट हिन्दुत्ववादी गुंडे हमेशा उन्हें आतंकित करने, मारने-पीटने की कोशिश करते रहे I तो क्या यह महज एक इत्तेफ़ाक़ है, या सत्तासीन फासिस्टों और अन्य बुर्जुआ राजनेताओं की मूर्खता है, कि कलबुर्गी-दाभोलकर-पानसारे-गौरी लंकेश की जघन्य ह्त्या के दौर में भी आपको ये दुर्दांत अत्याचारी भव्य आयोजनों में बुला रहे हैं, शाल, नारियल, प्रशस्ति-पत्र और मोटे लिफ़ाफ़े दे रहे हैं और शाम-ढले रस-रंजन भी करा रहे हैं ?

हम जानते हैं कि आप ये सारे सवाल उठाने वाले पर ही, या उसकी "यांत्रिक", "अति-क्रांतिकारी", "परम-शुद्धतावादी" सोच पर सवाल उठा देंगे, या इस टाइप कोई बेशर्म तर्क गढ़ने लग जायेंगे कि 'हमें हर उस जगह जाना चाहिए जहाँ हमारी बात सुनी जाए', या,'इन आयोजनों और प्रतिष्ठानों में जनता का पैसा लगा है अतः यह सब जनता का है', या यह कि, 'हम सत्ता के दरबार में भी जनता के गीत गाते हैं'... वगैरह-वगैरह...! अरे छोड़िये भी, किसे सूतिया बना रहे हैं ! ये बेशर्मी भरे आत्म-रक्षा के तर्क काफ़ी घिन पैदा करते हैं ! इन कुकर्मों में शामिल जो सबसे घृणित और पतित तत्व हैं, वे उलटे खुद ही आक्रामक तेवर में आकर सवाल उठाने वालों पर सवाल उठाने लगते हैं और उसीप्रकार कुत्सा-प्रचार की गंद उगलने लगते हैं जैसे दिल्ली के सारे गंदे नाले यमुना में महानगर की सारी गन्दगी उड़ेलते रहते हैं !

फासिस्टों, उनके सहयोगियों, उनके चम्पू अखबारोंऔर चन्द सेठिया घरानों के सांस्कृतिक-साहित्यिक आयोजनों में जाकर गाने-बजाने और ईनाम पाने वाले वामपंथियों पर सवाल उठाने पर लगातार जो बेशर्मी भरे कुतर्क और प्रत्याक्रमण करने जैसी हरक़तें सामने आ रही हैं, वे इन "वाम-जनवादी" मुखौटों के पीछे के गंदे चेहरों को खुद ही सामने ला दे रही हैं ! इसमें अब कोई संदेह रह ही नहीं जाता कि "वाम-जनवादी" मुखौटे वाले ये लोग दरअसल पतित सोशल-डेमोक्रैट और बुर्जुआ लिबरल्स हैं जो आतताइयों के आतंक के सामने हथियार डालने के बाद अब 'ट्रोज़न हॉर्स' की भूमिका में आ गए हैं ! चारों और नज़र घुमाकर देखने पर लगता है कि इनदिनों वाम-जनवादी कहे जाने वाले भूभाग के एक बड़े हिस्से पर 'अय्याश प्रेतों के उत्सव' हो रहे हैं !

निश्चित ही, इन जगहों से हम किसी नयी शुरुआत की, किसी नवोन्मेष की उम्मीद कदापि नहीं पाल सकते I गोर्की, ब्रेष्ट, नेरूदा, हिकमत, रॉल्फ फॉक्स, मयाकोव्स्की,लू शुन, एदुआर्दो गालियानो, न्गूगी आदि की परम्परा के सच्चे वारिसों को नयी शुरुआत के लिए अपनी नयी ज़मीन तैयार करनी होगी ! निश्चय ही, प्रतिक्रिया और विपर्यय के इस युग में, यह बहुत लंबा और दुष्कर काम लगता है ! तो ? क्या बैठे रहेंगे ? यह किसी जीवित हृदय को भला बर्दाश्त कैसे होगा ? तो अब, जब करना है, तो करना है ! एक नयी शुरुआत कहीं न कहीं से तो करनी ही होगी !

(4फरवरी, 2019)

Tuesday, February 05, 2019

बाल्ज़ाक के कुछ उद्धरण...



जिनके लिए राजनीति नहीं रह जाती, उनके लिए सिर्फ़ अमूर्त चिन्तन बचा रह जाता है !



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बैठे रहना और चीज़ों पर गौर करते रहना आसान होता है Iजो कठिन होता है, वह है उठ खड़ा होना और कार्रवाई में उतरना।



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राजनीतिक स्वतन्त्रता, किसी राष्ट्र की शान्ति और विज्ञान -- ये अपने आप में ऐसे उपहार हैं जिनके लिये नियति भारी टैक्स माँगती है -- खून का टैक्स !



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अधिकांश पति मुझे उस ओरांग उटान की याद दिलाते हैं जो वायलिन बजाने की कोशिश कर रहा हो।




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हमारा अन्तर्विवेक एक त्रुटिहीन जज होता है, जबतक कि हम उसका गला नहीं घोंट देते ।



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नौकरशाही एक विराट मेकेनिज्म है जिसे बौने चलाते हैं।




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क़ानून मकड़ी का जाला है जिसमें से बड़ी मक्खियाँ निकल जाती हैं और छोटी फँस जाती हैं।



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क्षुद्रात्माएँ निरंकुशता पसंद करती हैं ताकि अपनी ताक़त दिखा सकें, जबकि महान आत्माएँ समानता की प्यासी होती हैं ताकि अपने हृदय को सक्रियता का प्रांगण दे सकें I



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प्रकृति सिर्फ़ मूक जानवर बनाती है I मूर्खों के लिए हम समाज के ऋणी हैं I



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जब कोई पेशा हम चुनना चाहते हैं और नहीं चुन पाते, तो हमारे पूरे अस्तित्व के रंग खून की तरह हमारे शरीर से रिसते रहते हैं और हम निचुड़ते रहते हैं I



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क़ानून जब निरंकुश हो जाता है, नैतिकताएँ ढीली पड़ जाती हैं, और, इसके उलटा भी होता है I



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अध्ययन हमारे आसपास के माहौल में एक किस्म का जादुई प्रभाव पैदा कर देता है I



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महान इच्छा-शक्ति के बिना महान मेधा कोई चीज़ नहीं होती I




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हम अपने दुःख और अपनी खुशी -- दोनों को सामान रूप से अतिरंजित करते हैं I हम कभी उतनी बुरी हालत में नहीं होते या उतने खुश नहीं होते जितना हम बताते हैं I



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एकान्त उम्दा चीज़ है, लेकिन कोई होना चाहिए जो आपको यह बताये कि एकान्त उम्दा चीज़ है I




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सद्गुण शायद और कुछ नहीं होता, आत्मा की विनम्रता के अतिरिक्त I




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ऐसा देखा गया है कि भावावेग (Passion) अपने साथ अंतर्दृष्टि लाता है; यह सीधे-सादे लोगों, मूर्खों और बौड़मों को भी, खासकर नौजवानी के दिनों में, एक किस्म की बुद्धिमत्ता प्रदान कर देता है I



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आनंद की तली तक गोता लगाने के बाद हम मोती से अधिक कंकड़-पत्थर लेकर ऊपर आते हैं I



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लोग निराशा में मर जाते हैं और आत्माएँ आनन्दातिरेक में I



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जो आदमी, जान-बूझकर, अपनी धन-संपत्ति के जरिये ही जीता है, उसकी ज़िन्दगी सट्टे का खेल बन जाती है; उसके दोस्त, उसकी इच्छाएँ, उसके संरक्षक और परिचित लोग उसकी पूँजी होते हैं I



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Monday, February 04, 2019


हम घृणित-कुत्सित विडंबनाओं के एक ऐसे युग में जी रहे हैं जब सरकार का सालाना खाता-बही का हिसाब बांचते हुए फासिस्टों का एक टेम्पररी मुनीम मुक्तिबोध की कविता की पंक्तियाँ सुनाता है और "प्रगतिशील" कवि-लेखक पटना लिट् फेस्ट में फासिस्टों के एक चतुर और उदार चेहरे वाले तथा अंग्रेजों के लिए मुखबिरी करने वाले नेता -- अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हैं !

(3फरवरी, 2019)

Sunday, February 03, 2019


छि: -त्थू - धिक् ... लानत है! इन चेहरों को पहचानिये! ये फ़ासिस्ट बर्बरों और हत्यारों के दरबार में राग दरबारी सुनाने वालों के चेहरे हैं। जुगुप्सा और घृणा पैदा करने वाली इनकी हँसी हत्यारों की हँसी से कम नहीं है। इनमें जो पुराने क्रांतिकारी जनकवि हैं, वे तो लम्बे समय से बिहार में फ़ासिस्टों और उनके सहयोगी पतित समाजवादियों की सरकार की गोद में बैठकर सोने की कटोरिया में दूध-भात खा रहे हैं। और उधर उन नारी-विमर्शकार, नारीवादी कवि महोदया को तो देखिये! उनसे पूछिये कि बिहार में फ़ासिस्टों की सरकार और आर.एस.एस. के अघोषित मुखपत्र 'दैनिक जागरण' द्वारा आयोजित लिट् फे़स्ट में भाग लेते हुए क्या मुजफ्फरपुर की बच्चियों की या गुजरात 2002 में सामूहिक बलात्कार और हत्या की शिकार हुई सैकड़ों औरतों की याद आयी, स्त्रियों की आज़ादी के बारे में संघियों के विचार याद आये, 'लव जे़हाद' की याद आयी ? इन सत्ताश्रयी-सेठाश्रयी छद्मवेषी वामपंथियों को 'पटना लिट् फे़स्ट' में हिस्सा लेते हुए क्या रथयात्रा से लेकर अबतक के खून ख़राबे की, मॉब लिंचिंग की, गाय के नाम पर हुई हत्याओं की, दाभोलकर-पानसारे-कलबुर्गी-गौरी लंकेश की हत्याओं की, तमाम बुद्धिजीवियों पर हुए हमलों की, उन्हें दी जाने वाली धमकियों की याद आयी? जब 'पटना लिट् फे़स्ट' के मंच पर यह क्रीड़ा-कल्लोल हो रहा था, तब पुणे पुलिस सु‍प्रीम कोर्ट के आदेश को धता बताते हुए प्रो. आनंद तेलतुम्बड़े को गिरफ़्तार कर रही थी। बेशर्मो ! मंच और मोटे लिफाफे और रसरंजन की ऐय्याशियों के लिए कितना नीचे गिरोगे ? सोने की कटोरी में परोसा गया फ़ासिस्ट सत्ताधारियों का गू खाकर गिलौरियाँ दबाकर महफिलें सजाने में तुम्हें शर्म नहीं आती ? कबतक चुप्पी साधे रहोगे जसम, जलेस, प्रलेस वालो, तुम्हारी अप्रासंगिकता भी संसदीय वामपंथी जड़वामनों की तरह स्वत:सिद्ध होती जा रही है। जलेस के जो लोग PLF की गंद का विरोध कर रहे थे, उन्हें जलेस के पदाधिकारियों को 'पटना लिट् फे़स्ट' के मंच पर देखकर कैसा लग रहा होगा? अब भी बोलो भाई, चुप मत रहो। और दिल्ली के सम्भ्रान्त-शालीन-कुलीन-वरिष्ठ-गरिष्ठ वाम जनवादी कवि-लेखक गण ! कबतक मुँह में दही जमाये रहेंगे? साम्प्रदायिक फासीवादी बर्बरता के अगर सच्चे विरोधी हैं तो हिटलर के वंशज फ़ासिस्ट बर्बरों के दस्ताने चढ़े खूनी हाथों को थाम्हकर सिर से लगाने वालों के खिलाफ़ खुलकर बोलते क्यों नहीं ? पहले भी एक आलोचक महोदय दी.द.उ. के एकात्म मानववाद की प्रशंसा पर लेख लिखकर जसम में बने रहे।
मैंने PLF जयपुर के आयोजक प्रलेस द्वारा धुर-प्रतिक्रियावादी सांस्कृतिक सं‍स्‍ था काव्या और उसके अनिवासी भारतीय मालिक परीक्षित के साथ पर्दे के पीछे साझेदारी करके बीज वक्तव्य और सत्र बेचने तथा फासिस्टों के चम्मच मकरंद परांजपे को आमंत्रित करने पर सवाल उठाया तो पुरातन पापी परम पतित पाण्डे को इतना चुभ गया कि वह कई दिन से मेरे ऊपर और मेरे राजनीतिक-सामाजिक समूह के ऊपर गालियों और कुत्सा प्रचार की बारिश करता रहा। दिल्ली के साहित्यिक शरीफ़ज़ादे चुप्पी साधे रहते हैं ऐसे मसलों पर। लेकिन पंड़वा तो ऐसा कई बार कर चुका है। सुन पंड़वा ! मैं 'पटना लिट् फेस्ट' और PLF - प्रसंग जैसी गन्दगियों पर, सत्ताश्रित-सेठाश्रित छद्म वामपंथी महानुभावों की कारनामों पर और वाम-जनवादी साहि‍त्य के तमाम कायर-कुटिल-लम्पट-कैरियरवादी-दारूकुट्टे घुसपैठियों की सरगर्मियों के खिलाफ़ लगातार लिखती रहूँगी। कोई प्रतिबद्ध व्यक्ति कुत्सा-प्रचारी कुत्तों के भौंकने और रंगे सियारों के 'हुँआ-हुँआ' करने से डरकर अगर चुप्पी साध ले, तो उसकी प्रतिबद्धता सवालों के घेरे में आ जायेगी।
अंत में, ईमानदार और शिष्ट प्रतिबद्ध साथी मुझे क्षमा करें! फ़ासि‍स्ट बर्बरों और भ्रष्ट जालिम सत्ताधारियों के महलों के दरवाज़े पर नौबत-शहनाई-नक्कारा बजाने वाले और पर्दे के पीछे फर्शी सलाम ठोंककर इनाम-इक़राम बटोरने वालों के लिए इस कायरता और दुनियादारी भरे माहौल मे ऐसी ही भाषा की ज़रूरत है।

(2फरवरी, 2019)

Friday, February 01, 2019


भाजपा को शिकस्त देने के लिए कांग्रेस फिर एक बेहद ख़तरनाक और गंदा खेल खेल रही है ! तुरत उसे इसका कुछ लाभ मिल भी जाए तो अंततोगत्वा इसका लाभ धार्मिक कट्टरपंथी फासिस्टों को ही होगा !

सभी जानते हैं कि शंकराचार्य स्वरूपानंद कांग्रेसी संत हैं ! कल उनकी धर्म संसद ने 21 फरवरी को राम मंदिर निर्माण के लिए प्रयाग से अयोध्या कूच का एलान इसलिए किया कि केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारों को बाध्य होकर संतों और उनके अनुयाइयों को गिरफ्तार कराना पड़े, हंगामा हो और फिर कांग्रेस देश को यह बताने में सफल हो जाए कि भाजपा मंदिर के मसले का सिर्फ़ चुनावी इस्तेमाल कर रही है, मंदिर बनवाने में उसकी कोई रुचि नहीं है I उनकी इस चाल की काट करने के लिए आज वी.एच.पी. समर्थक संतों की धर्म संसद शुरू हुई, जिसमें मंदिर-निर्माण के मसले पर मोदी सरकार को समय देने की बात हो रही है, ताकि फिर चुनावों में इसका इस्तेमाल किया जा सके !

कांग्रेस ने अकाली दल की धर्म की राजनीति का जवाब धर्म की राजनीति से देने के लिए ही संत भिंडरावाले को खड़ा किया था जो आगे चलकर उसके लिए भस्मासुर साबित हुआ I शाहबानो मामला, राम मंदिर का ताला खुलवाना और बाबरी मस्जिद गिराने में तत्कालीन नरसिंह राव सरकार की भूमिका -- कांग्रेस द्वारा भाजपा की केसरिया लाइन का जवाब नरम केसरिया लाइन से देने का एक लंबा इतिहास है ! इस समय भी चुनावों के पहले राहुल गाँधी का मंदिर-मंदिर घूमना, उनको जनेऊधारी उच्च कुलीन ब्राह्मण सिद्ध करने के लिए कांग्रेसियों का बयान पर बयान जारी करना और अब स्वरूपानंद की धर्म-संसद --- यह बताता है कि कांग्रेस अब नेहरूकालीन मरियल-विकलांग धर्म-निरपेक्षता के दौर में भी वापस नहीं लौट सकती (रेडिकल बुर्जुआ अर्थों में धर्म-निरपेक्ष तो खैर वह कभी नहीं थी!) । जो सोशल डेमोक्रेट्स और लिबरल भद्र जन कांग्रेस के सहारे भारत में सेक्युलर बुर्जुआ जनवाद की बहाली और "नेहरूवियन समाजवाद के स्वर्ग" के धरती पर उतर जाने का सपना देख रहे हैं, वे घामड़ और उल्लू नहीं तो भला और क्या हैं !

कांग्रेस धर्म की राजनीति के बरक्स धर्म-निरपेक्षता की राजनीति की वाहक हो ही नहीं सकती ! जाति की राजनीति पर भरोसा करने वाली क्षेत्रीय बुर्जुआ पार्टियाँ भी ऐसा नहीं कर सकतीं क्योंकि अंतिम निष्कर्ष के तौर पर जाति की राजनीति धर्म की राजनीति के पूरक का ही काम करती है ! कांग्रेस और उसके सहयोगी थोड़ी-बहुत लोकरंजक बातें भले कर लें, नव-उदारवाद से अलग उनकी कोई आर्थिक नीति हो ही नहीं सकती ! जो संसदीय वामपंथी हैं, वे तो अब कीन्सियाई "कल्याणकारी राज्य" के नुस्खों से भो पीछे हटकर ( अमर्त्य सेन टाइप भाषा में बात करते हुए ) "मानवीय चेहरे" वाले नव-उदारवाद के गले में वरमाल डाल चुके हैं और यू.पी.ए.-1 के दौर जैसी मधुयामिनी का इंतज़ार कर रहे हैं ! नव-उदारवाद पर आम सहमति के इस दौर में जिस कट्टरपंथी बुर्जुआ राजनीति का बोलबाला होगा वह भारतीय परिस्थितियों में सर्वोपरि तौर पर धर्म की राजनीति और फिर जाति की राजनीति ही होगी ! कांग्रेस जो गेम खेल रही है, वह भी इस बात में सहायक होगा कि जनता की ज़िंदगी के बुनियादी सवालों की जगह धार्मिक उन्माद की राजनीति ही होती रहेगी और हिन्दुत्ववादी फासिस्टों के उत्पात तब भी सडकों पर जारी रहेंगे जब वे सत्ता में नहीं रहेंगे ।

(31जनवरी, 2019)

Thursday, January 31, 2019


परम पतित पापी पंड़वा पोस्ट लिखता है पी.एल.एफ़. से लौटकर कि बड़ा मज़ा आया , 'बाकी विवाद शुरू हो गया है, दो-चार दिन रौनक रहेगी, मजे लीजिये I' यह कहकर यह पुराना पुरबिहा पापी पी.एल.एफ़. के आयोजकों की पतनशीलता के विरुद्ध आवाज़ उठाने वालों की खिल्ली उड़ा रहा है, लिहाड़ी ले रहा है I उसकी इस हिमाक़त के वाजिब कारण भी हैं ! वह जानता है कि आज विरोध में बोलने वाले भी कल उससे 'हें-हें-हें-हें' करते हुए मिलने लगेंगे I पंड़वा जानता है कि ऐसे विरोधों का भभका कुछ दिनों में शांत हो जाता है और फिर वही,'तू मेरा हाजी बगोयम मैं तेरा हाजी बगो !' उसे पता है कि दिल्लीवासी जो उसके हमप्याला-हमनिवाला हुआ करते हैं और दिन के उजाले में बहुत उसूलपरस्त बनाते हैं, वे उसके सारे कुकर्मों को जानते हैं और फिर भी उसके साथ मिल-बैठकर सोहर गाते ही हैं ! वह यह भी जानता है कि दिल्लीवासी प्रगतिशील मठाधीश और मठवासी लोग इन "तुच्छ मामलों" में नहीं पड़ते, वे फोन पर उधर भी सहमति जताते हैं और इधर भी ! मज़े की बात है कि पी.एल.एफ. के आयोजकों के अवसरवाद के ख़िलाफ़ लिखी गयी पोस्ट्स पर सहमति जाहिर करने वाले कई महानुभावों को आज ही पंड़वा की वाल पर उसकी पोस्ट्स लाइक करते और लहालोट होते भी देखा जा सकता है!

(29जनवरी, 2019)





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कहीं भी क्रांतिकारी लहर जब उतार पर होती है और ठहराव और विघटन का दौर आता है तो कैरियरवाद का भूत प्रगतिशीलता का झंडा उठाये हुए लेखकों-बुद्धिजीवियों के सर पर न सिर्फ़ चढ़ जाता है, बल्कि चढ़कर उन्मादियों की तरह नाचने लगता है ! ऐसे लोगों को लगने लगता है कि क्रान्ति तो अभी दूर है, तबतक क्यों न अपनी मेहनत से कुछ अपना ही भला कर लिया जाए और प्रगतिशीलता का सिक्का भुनाकर कुछ नाम और प्रतिष्ठा कमा लिया जाए, देश-देशांतर में थोड़ा चमक लिया जाए ! भारत हो या नेपाल, बांग्लादेश हो या श्रीलंका, ऐसी प्रवृत्तियों का नाच हमें बौद्धिक-सांस्कृतिक जगत में खूब देखने को मिल रहा है !

(29जनवरी, 2019)





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क्या करूँ, मैं अपनी उद्दंडता और बदतमीज़ी से खुद ही परेशान हूँ ! अब कोई पतित समाजवादी या कोई सोशल डेमोक्रेट जो मज़दूरों की लडाइयाँ लड़ते-लड़ते फासिस्टों की गोद में जाकर बैठ गया हो, तो उसके मरने पर मैं न उसे 'नमन' लिख पाती हूँ, न आदरांजलि दे पाती हूँ ! मुझे नहीं लगता कि किसी के मर जाने मात्र से उसकी कारगुजारियों और उनके नतीजों को भुलाया जा सकता है ! एक इंसान दूसरों के लिए और पूरे समाज के लिए अपनी सामाजिक गतिविधियों और उनके नतीजों के अतिरिक्त और होता ही क्या है I भारतीय भद्रजनों के सुकोमल मन को बुरा लगेगा, लेकिन मेरा बाप भी अगर सामाजिक-राजनीतिक जीवन में होता और उसके प्रतिक्रियावादी सिद्धांत और व्यवहार जनता के हितों के ख़िलाफ़ होते तो उसके मरने पर मैं उसे कोई श्रद्धांजलि नहीं दे पाती ! हाँ, यह ज़रूर है कि ऐसे किसी आदमी के मरने पर मैं बस चुप रहती हूँ, खामखा किसी के अनुयाइयों को क्या चिढ़ाना या दुखी करना ! वह तो ये सारी बातें इसलिए कर रही हूँ कि एक साहब पीछे पड़ गए कि मरने पर दुश्मन के लिए भी तो एक श्रद्धांजलि बनती है ! बनती है तो आप दीजिये, मेरे पीछे मत पड़िये, जो भी बोलूँगी, बहुत बुरा लग जाएगा ! मैं बोलूँगी तो बोलेगा कि बोलती है !

(29जनवरी, 2019)












Wednesday, January 30, 2019


मार्क ट्वेन ने कहा है कि मूर्खों से बहस में मत उलझो, वे तुम्हें अपने स्तर पर घसीट ले जायेंगे और फिर अपने अनुभव के डंडे से तुम्हारी पिटाई कर देंगे ! हमारे समाज में अनुभव के डंडे के साथ ही ओहदे और सामाजिक रुतबे और डिग्रियों का डंडा भी खूब चलता है I किसी अफसर लेखक से बहस कीजिए और उसका प्रतिवाद या आलोचना कर दीजिये ! फिर उसका लाल-भभूका चेहरा और तमतमाहट देखिये ! दरअसल वह अन्य साहित्यकारों को भी अपने मातहत मुलाज़िम जैसा ही समझता है ! प्रतिवाद सुनना उसकी आदत नहीं होती और दांत चियारकर उसकी हाँ में हाँ मिलाने वाले भी कम नहीं होते I इसी तरह किसी यूनिवर्सिटी में हिन्दी साहित्य पढ़ाने वाले किसी मास्टर से "प्राध्यापकीय" आलोचनाओं और पी-एच.डी., एम.फिल. आदि के लिए कराये जाने वाले शोधों आदि की स्तरहीनता को लेकर बात कीजिये !
फिर उनके मुखारविंद से झरने वाले तर्क-पुष्पों को इकट्ठा कर लीजिये ! बीच-बीच में उनका अवलोकन करने से मनोरंजन होता रहेगा !

(28जनवरी, 2019)

Tuesday, January 29, 2019


मेरी दोस्त के पड़ोस में जो आंटीजी रहती हैं, वह अपनी हमउम्र औरतों के साथ बैठकर भजन-कीर्तन या मोहल्ले की बहुओं और युवा लड़कियों की शिकायत बतियाने पर ज़रा भी समय नहीं खर्च करतीं I सुबह एक घंटा अख़बार पढ़ती हैं, सभी पार्टियों की आलोचना करती हैं और मोहल्ले की गतिविधियों और लोगों का बारीक ऑब्जरवेशन करके कुछ नीति-वाक्य और आप्तवचन बोला करती हैं I

एक दिन बोलीं," बेटा, ज़िंदगी को मस्त होकर जीना है तो तीन बातों का ध्यान रखना ! पहला, किसी की नक़ल मत करो ! दूसरा, किसी से जलन-कुढ़न मत पालो ! तीसरा, किसी से होड़ मत किया करो, अपना काम यथाशक्ति करके खुश रहा करो !" फिर अपनी ही छोटी बेटी का उदाहरण देती हुई बोलीं,"अब श... को ही ले लो ! हरदम उसका पेट खराब रहता है... कभी कब्ज़, कभी दस्त, कभी एसिडिटी, कभी माइग्रेन ! डॉक्टर भी सारे थक गए ! मैं जानती हूँ, वह कभी ठीक नहीं होगी I वजह यह है कि वह हरदम कभी इसकी तो कभी उसकी नक़ल करती रहती है, कभी किसी से तो कभी किसी से जलती-कुढ़ती रहती है और किसी न किसी से होड़ करती रहती है ! उसमें न कोई ओरिजिनैलिटी है, न उसके मन में अच्छे-सुन्दर ख़यालों के लिए कोई जगह है I बेटा, यूँ समझ लो कि अगर तुम टुच्चे हो तो सबसे अधिक इसकी क़ीमत तुम्हीको चुकानी है !"

मैं सोच रही थी कि आंटीजी अपनी पीढ़ी की स्त्रियों से कितनी आगे हैं ! हमलोगों को तो अपने अनुभव के पिटारे से कुछ न कुछ निकालकर अक्सर देती रहती हैं ! आम लोगों की बातों पर यदि गौर किया जाये तो ज़िंदगी के लिए बहुत ज़रूरी नसीहतें राह चलते मिल जाया करती हैं ! जनता इसीतरह हमें सिखाती है !

(26जनवरी, 2019)