Friday, January 16, 2026

चाहतों का क्या!

 

चाहतों का क्या है! 

चाहतें तो पागल होती हैं। 

जैसे अक्सर मैं चाहती हूँ कि

नंगे धूसर पहाड़ों को

बसंत के हरेपन से ढँक दूँ, 

नदियों को प्रदूषणमुक्त पानी से

लबालब भर दूँ, 

घाटी के सूख चुके सोतों को

फिर से जीवित कर दूँ। 

चाहती हूँ कि उत्पादन, राजकाज और समाज के

पूरे तंत्र पर उत्पादन करने वाले क़ाबिज़ हों

और फ़ैसले की पूरी ताक़त

उनके हाथों में हो। 

चाहती हूँ बराबरी और आपसी सम्मान से

भरा ऐसा प्यार जो मुक्ति का पर्याय हो

और जिसकी मौन उपस्थिति में

आत्माएँ संवाद करें कविता की भाषा में। 

जो नहीं है और जिसे होना ही चाहिए

उसकी कामना में खरचती हूँ जीवन

और सोचती हूँ कि दुनिया में अगर

नहीं हुआ करतीं कुछ पागलपन भरी चाहतें

तो मनुष्यता का भविष्य क्या होता! 

लेकिन सिर्फ़ चाहने से क्या होता है! 

इसलिए दीवारों पर नारे लिखती हूँ, 

पोस्टर चिपकाती हूँ, 

नये-नये पर्चे तैयार करती हूँ, 

अध्ययन-चक्रों और रात्रि-पाठशालाओं में

सपने और विचार बाँटती हूँ

और आदतन कविताएँ भी लिखती हूँ। 

अब तुमसे क्या बात करूँ मेरे भाई! 

तुम तो जो है उसे ही स्वीकार करके

जीने को जीना समझते हो, 

बदलाव की हर कोशिश की निरर्थकता पर

वैचारिक ग्रंथ और महान कविताएँ लिखते हो, 

हत्यारों की सत्ता से मिले तमगों को 

छाती पर सजाये इतराते हुए घूमते हो

और जब अकेलेपन से त्रस्त हो जाते हो

तो अध्यात्म की गुफा को शरण्य बनाते हो। 

बेहतर है कि तुमसे संवाद करने की जगह

तुम्हारी सच्चाई बताई जाये उन लोगों को

जो विचारों की दुनिया में जब आँखें खोलते हैं

तो तुम्हारे शब्दों के ऐन्द्रजालिक आकर्षण में

उलझ जाते हैं। 

**

(16 जनवरी 2026)


Thursday, January 15, 2026

  

-- नाज़िम हिकमत . 

इस तरह से 

मैं खड़ा हूँ बढ़ती रोशनी में 

मेरे हाथ भूखे, दुनिया सुंदर 

मेरी आँखें समेट नहीं पातीं पर्याप्त पेड़ों को -

वे इतने उम्मीद भरे हैं, इतने हरे। 

एक धूप भरी राह गुज़रती है शहतूतों से होकर ,

मैं जेल चिकित्सालय की खिड़की पर हूँ। 

सुंघाई नहीं दे रही मुझे दवाओं की गंध -

कहीं पास में ही खिल रहे होंगे कार्नेशन्स। 

यह इस तरह है :

गिरफ़्तार हो जाना अलग बात है,

ख़ास बात है आत्म-समर्पण न करना !

(अंग्रेजी से अनुवाद-वीरेन डंगवाल)

Wednesday, January 14, 2026

 

बेशक फासिस्ट जब इस देश के संविधान को भी व्यवहारतः ताक पर रखकर हमारे अतिसीमित, रहे-सहे जनवादी अधिकारों पर भी डाका डाल रहे हैं तो हम उन अधिकारों के लिए लड़ेंगे और फासिस्टों को बेनक़ाब करने के लिए संविधान का हवाला भी देंगे, लेकिन इस प्रक्रिया में संविधान को जनवाद की "पवित्र पुस्तक" या "होली बाइबिल" कत्तई नहीं बनाया जाना चाहिए, इसका आदर्शीकरण या महिमामंडन करना एक भयंकर अनैतिहासिक और आत्मघाती ग़लती होगी !

किसी भी बुर्जुआ जनवादी देश की आम जनता को अपने जनवादी अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए प्रबोधनकालीन दार्शनिकों के आदर्शों को सन्दर्भ-बिंदु बनाना चाहिए जो तर्कणा-आधारित  इहलौकिकता (सेकुलरिज्म) और जनवाद की अवधारणा पेश करते हैं न कि किसी देश-विशेष के संविधान को ! दुनिया का ज्यादा से ज्यादा जनवादी अधिकार देने वाला बुर्जुआ जनवादी देश भी अपनी जनता को उतने जनवादी अधिकार नहीं देता जितना अपने संविधान में दावे और वायदे करता है !

"हम भारत के लोग..." -- भारतीय संविधान की प्रस्तावना के ये शब्द हूबहू वही हैं जिससे 1787 के फिलाडेल्फिया कन्वेंशन ने अमेरिकी संविधान की शुरुआत की थी ! गौरतलब है कि इस कन्वेंशन में न तो अश्वेत आबादी का प्रतिनिधित्व था न ही इस संविधान को लागू करते हुए अमेरिकी गणराज्य ने दासता का उन्मूलन किया ! दासता का उन्मूलन अश्वेत दासों के अनथक संघर्षों के फलस्वरूप एक शताब्दी बाद हुआ ! अमेरिकी संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित "हम संयुक्त राज्य के लोग" में स्त्रियों की आधी आबादी भी शामिल नहीं थी, क्योंकि उससमय उन्हें मताधिकार भी प्राप्त नहीं था ! 

संविधान में आदर्शों की चाहे जितनी लम्बी-चौड़ी लफ्फाजी की जाए, संविधान में लिख देने मात्र से जनता को अधिकार प्राप्त नहीं हो जाते ! हाँ, जिन अधिकारों को जनता लड़कर हासिल करती है, उनमें से कई को शासक वर्ग संविधान में संहिताबद्ध करने के लिए बाध्य हो जाता है ! यानी जिन देशों में जनता क्रांतिकारी संघर्षों की लम्बी प्रक्रिया में जनवादी अधिकार हासिल करती है उन देशों के सामाजिक ताना-बाना में जनवाद के तत्व रच-बस जाते हैं और बुर्जुआ संविधान भी किसी हद तक इस स्थिति को प्रतिबिंबित करने लगते हैं ! पश्चिम के जिन देशों में बुर्जुआ जनवाद 'पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति' की ऐतिहासिक प्रक्रिया से गुज़रकर स्थापित हुआ, वहाँ के सामाजिक ताना-बाना और जनता की चेतना में जनवाद के मूल्य रचे-बसे हैं और इसलिए वहाँ के संविधान किसी हद तक इस वस्तुगत स्थिति को प्रतिबिंबित करते हैं ! हालाँकि उन देशों में भी जब संकट के बादल गहराते हैं तो बुर्जुआ वर्ग जनवाद के संवैधानिक वायदों से मुकर जाता है और अपने वर्गीय अधिनायकत्व को नंगे रूप में लागू करने लगता है!

भारत जैसे उत्तर-औपनिवेशिक समाजों की स्थिति कुछ भिन्न है ! यहाँ का बुर्जुआ वर्ग 'पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति' की प्रक्रिया से गुजरकर सत्ता में नहीं आया ! वह औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना के गर्भ से पैदा हुआ एक रुग्ण-विकलांग-बौना बुर्जुआ वर्ग था जिसने क्रांति की जगह 'दबाव-समझौता-दबाव' की रणनीति अपनाकर तथा विश्व-परिस्थितियों एवं जनता की क्रांतिकारी शक्तियों की कमजोरी का लाभ उठाकर सत्ता में आया ! यह बुर्जुआ वर्ग अपनी जनता को उतना जनवादी अधिकार भी कत्तई नहीं दे सकता जितना पश्चिम के किसी बुर्जुआ वर्ग ने दिया ! यही कारण है कि हमारे देश का संविधान आद्यंत कोरी लफ्फाजियों से भरा हुआ है ! इन कथित लफ्फाजियों को अगर हम जनवाद के आदर्शों के रूप में पेश करते हैं तो जनता को एक ऐसा संवैधानिक विभ्रम देते हैं कि वह लोक-लुभावन लफ्फाजी के साथ रचे गए संवैधानिक प्रपंच में और अधिक उलझ जाए ! दूरगामी तौर पर, आमूलगामी बदलाव के किसी भी संघर्ष के लिए यह आत्मघाती सिद्ध होगा ! बेशक, हमें बुर्जुआ संवैधानिक और विधिक दायरे के भीतर अपने जनवादी अधिकारों की ढेरों लड़ाइयाँ लड़नी होती हैं, पर ऐसा करते हुए बुर्जुआ संविधान और बुर्जुआ कानूनों के प्रति जनता में कोई विभ्रम कत्तई नहीं पैदा किया जाना चाहिए I आमूलगामी सामाजिक बदलाव का सीमान्त या क्षितिज जन-समुदाय की निगाहों में बुर्जुआ संविधान या कानून-व्यवस्था बन जाए, ऐसी कोई ऐतिहासिक, आत्मघाती अदूरदर्शिता कदापि नहीं की जानी चाहिए ! 

उन्नत से उन्नत बुर्जुआ जनवादी संविधान भी बुर्जुआ वर्ग के शासन करने का आधार-ग्रन्थ होता है, वह किसी आमूलगामी सामाजिक-राजनीतिक बदलाव या क्रांति की दिशा-निर्देशक संहिता नहीं हो सकता ! क्रांतियाँ संवैधानिक-वैधानिक चौहद्दियों में क़ैद रहकर या किसी संविधान से निर्देशित होकर नहीं चलतीं ! वे हमेशा ही इन सीमांतों का अतिक्रमण करती हैं ! अतः, अपने जनवादी और नागरिक अधिकारों के लिए लड़ते हुए हमें बुर्जुआ वर्ग की कमीनगी, कुटिल पाखण्ड और दुरंगेपन और विश्वासघात का भंडाफोड़ करने के लिए उनके संविधान में उल्लिखित वायदों की बार-बार याद अवश्य दिलानी चाहिए और उन अधिकारों की लड़ाई में संवैधानिक और क़ानूनी रास्तों और निदानों का भी इस्तेमाल करना चाहिए, लेकिन संविधान और कानून-व्यवस्था का महिमा-मंडन करके जनता में संवैधानिक-विधिक विभ्रम नहीं पैदा करना चाहिए, उसकी क्रांतिकारी चेतना को कुशाग्र बनाने की जगह कुंद करने का काम नहीं करना चाहिए ! बुर्जुआ लिबरल और सोशल डेमोक्रेट यही काम करते हैं ! 

दूसरी बात जो महत्वपूर्ण है, वह यह कि आज हमारी लड़ाई मात्र जनवादी और नागरिक अधिकारों की लड़ाई नहीं है ! और यह लड़ाई किसी 'बोनापार्टिस्ट' टाइप निरंकुश स्वेच्छाचारी तानाशाह बुर्जुआ सत्ता से है, यह भी बात नहीं है ! हमारी लड़ाई सीधे-सीधे फासिज्म से है ! हिन्दुत्ववादी फासिस्ट अपनी ऐतिहासिक प्रकृति के अनुरूप आचरण करते हुए बुर्जुआ संविधान में उल्लिखित बेहद सीमित और आधे-अधूरे जनवादी और नागरिक अधिकारों को भी निरस्त कर रहे हैं ! ऐसी स्थिति में हमारी तात्कालिक लड़ाई इन साजिशों के ख़िलाफ़ होगी और अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए होगी, पर यह केवल एक तात्कालिक लड़ाई है, फासिज्म के ख़िलाफ़ जनता की लड़ाई इन्हीं संवैधानिक चौहद्दियों में सीमित कदापि नहीं हो सकती ! इसलिए भारतीय संविधान को वस्तुगत तौर पर भी आदर्शीकृत करने की यदि कोई कोशिश की जाती है तो यह एक प्रतिगामी कदम होगा, संवैधानिक सुधारवाद होगा ! इस तात्कालिक लड़ाई के आसन्न मुद्दों पर हम बुर्जुआ डेमोक्रेट्स और सोशल डेमोक्रेट्स के साथ भी बेहिचक खड़े होंगे, पर उनका अंतिम लक्ष्य हमारा अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता ! ईमानदार से ईमानदार बुर्जुआ डेमोक्रेट्स और सोशल डेमोक्रेट्स इस विभ्रम और यूटोपिया के शिकार होते हैं कि फासिज्म की जगह आदर्श रूप में बुर्जुआ जनवाद की स्थापना की जानी चाहिए ! बुर्जुआ जनवाद की सीमांतों से आगे वे सोचते ही नहीं ! सच यह है कि आज उस हद तक भी बुर्जुआ जनवाद की वापसी संभव नहीं जैसी आज से 70-80 साल पहले संभव थी ! पूँजीवाद के ढाँचागत संकट के चलते फासिज्म की जगह यदि कोई बुर्जुआ जनवादी सत्ता बीच-बीच में  आयेगी भी तो वह बोनापर्टिस्ट टाइप कोई निरंकुश सत्ता होगी जो जनता को नाम मात्र का ही जनवादी अधिकार देगी, और उस समय भी, फासिज्म एक घोर जन-विरोधी बर्बर शक्ति के रूप में समाज में मौजूद रहेगा और कहर बरपा करता रहेगा ! याद कीजिए, कांग्रेस के शासन-काल में भी हिन्दुत्ववादियों का उत्पात जारी रहा है पिछले तीन दशकों के दौरान ! और यह भी याद रखिये कि मज़दूरों, मेहनतक़शों, दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों और क्रांतिकारी आन्दोलनों को कुचलने में कांग्रेस ने भी कभी कोई कोताही नहीं बरती ! बेर्टोल्ट ब्रेष्ट ने कहा था कि जो फासिज्म से लड़ने की बात करते हुए पूँजीवाद से लड़ने की बात नहीं करता, वह फासिज्म से नहीं लड़ सकता ! फिर एक जगह वह यह भी कहते हैं कि जो पूँजीवाद से लड़ने की बात करता है लेकिन फासिज्म से नहीं लड़ता, वह भी वस्तुतः पूँजीवाद से लड़ नहीं सकता ! 

इनदिनों जनांदोलनों के दौरान संविधान की प्रस्तावना के पाठ का एक चलन चला हुआ है ! ऐसा करके हम कहीं न कहीं जनता के बीच संविधान को "जनवाद के आधार-ग्रन्थ" के रूप में आदर्शीकृत करते हैं और एक विभ्रम पैदा करते हैं ! प्रस्तावना कोरी लफ्फाजी है ! भारतीय गणराज्य शब्दों के वास्तविक अर्थों में संप्रभुता-संपन्न है ही नहीं ! नव-उदारवाद और फासिज्म के दौर के पहले भी भारत साम्राज्यवादी लूट और दबाव का शिकार था और भारतीय बुर्जुआ वर्ग साम्राज्यवादियों का तब भी जूनियर पार्टनर ही था ! यह समाजवादी भी नहीं है ! नेहरूकालीन राजकीय पूँजीवाद को समाजवाद कहना एक मूर्खता होगी ! वह  "कल्याणकारी राज्य" के बुर्जुआ कीन्सियाई नुस्खों तक को एक सीमित रूप में ही लागू कर पाया ! भारतीय संविधान में उल्लिखित धर्मनिरपेक्षता ऐतिहासिक अर्थों में धर्मनिरपेक्षता है ही नहीं ! वह धर्मनिरपेक्षता को 'सर्व-धर्म-सद्भाव' के रूप में परिभाषित करती है ! धर्म-निरपेक्षता का मतलब है कि  राजनीति और सार्वजनिक जीवन में धर्म की कोई दखल न हो और धर्म के निजी विश्वास के रूप में अनुपालन की नागरिकों को पूरी आज़ादी हो ! भारत में ऐसा कभी नहीं रहा ! राजनीति, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में धर्म की दखलंदाजी फासिस्टों के सत्तारूढ़ होने के पहले भी थी, धार्मिक अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न में राजकीय एजेंसियों की भी सक्रिय भूमिका हुआ करती थी, शिक्षा और "जन-कल्याण" की तमाम संस्थाएँ धार्मिक सम्प्रदाय चलाया करते थे, राजनीति में धर्म का खुलेआम इस्तेमाल होता था और धार्मिक ध्रुवीकरण की आंच पर कांग्रेस सहित अन्य बुर्जुआ पार्टियाँ भी अपनी रोटियाँ सेंका करती थीं ! इसी संविधान के लागू होने के दौरान दलितों और अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न आज़ाद भारत में निर्बाध जारी रहा है ! इसी संविधान के प्रावधानों के तहत आपातकाल लागू हुआ था ! इसी संविधान के काल में नेहरू ने शेख अब्दुल्ला और नम्बूदिरिपाद की चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त किया था ! नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह और क्रांतिकारी आन्दोलन का दमन, नेल्ली नरसंहार, नंदीग्राम, सिंगुर, सलवा जुडूम ... -- यह सबकुछ इसी संविधान के तहत हुआ !

 हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हमारे देश में 'constitutional remedy' तक सिर्फ़ मुट्ठी भर पढी-लिखी प्रबुद्ध आबादी की ही पहुँच हो पाती है ! बहुसंख्यक आम आबादी जैसे-तैसे  'legal remedy' तक ही पहुँच पाती है ! और औपनिवेशिक कानून-व्यवस्था और पुलिस-प्रशासन के ढाँचे के कारण वहाँ भी उसे न्याय बहुत कम मामलों में ही मिल पाता है ! अंत में, यह भी भूलने की ज़रूरत नहीं है कि संविधान की प्रस्तावना में जिन महत उद्देश्यों की बड़बोली घोषणा की गयी है, वह देश के 15 प्रतिशत अभिजातों द्वारा चुनी गयी संविधान सभा के सदस्यों ने पूरी भारतीय जनता की ओर से कर दी थी ! वह संविधान सभा सार्विक मताधिकार के आधार पर चुनी ही नहीं गयी थी ! जिस संविधान  को कुछ लोग जनवाद की "पवित्र पुस्तक" बताने में लगे हैं, उसमें आदर्शों की तमाम लफ्फाजियाँ दुनिया के विभिन्न संविधानों से कट-पेस्ट करके ले ली गयी हैं,लेकिन जहाँतक मूल अंतर्वस्तु का सवाल है, इसकी 395 में से 250 धाराएँ 1935 के उसी 'गवर्नमेंट ऑफ़ इण्डिया एक्ट' से से ज्यों की त्यों ले ली गयी हैं, जिसे नेहरू तक ने उससमय 'गुलामी का काला चार्टर' कहा था ! यह संविधान राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के तहत ऊँचे आदर्शों और लुभावने वायदों का पूरा झुनझुना बजाता  है पर उनके क्रियान्वयन का कोई प्रावधान नहीं करता ! संपत्ति के 'पवित्र अधिकार' को तो हमारे देश में कानूनी अधिकार का दर्ज़ा हासिल है लेकिन  काम करने या रोज़गार के अधिकार  को हमारा संविधान मूलभूत अधिकार का दर्जा नहीं देता, न ही हमारे क़ानून इसकी कोई गारण्टी देते हैं ।  इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं होता कि अपनी गोट लाल करने के लिए तमाम  दलितवादी बुर्जुआ नेता अम्बेडकर की नायक-पूजा और देव-पूजा करते हुए संविधान को अप्रश्नेय "पवित्र पुस्तक" घोषित कर देते हैं और इस बात को सिरे से गोल कर जाते हैं कि 5-6 वर्ष बीतते ही अम्बेडकर का संविधान से पूरीतरह मोहभंग हो गया था और उसे जला देने तक की बात वह करने लगे थे !

लुब्बेलुब्बाब यह कि हमें अपने जनवादी और नागरिक अधिकारों की तथा धर्म-निरपेक्षता की लड़ाई लड़ते हुए संवैधानिक निदानों और प्रावधानों का बेशक भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए, संवैधानिक वायदों-करारों से फासिस्टों के विश्वासघात को भी उजागर करना चाहिए, संविधान-प्रदत्त अतिसीमित जनवादी अधिकारों के भी अपहरण के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करनी चाहिए, लेकिन ऐसा कोई भी काम नहीं  करना चाहिए जिससे इस संविधान का आदर्शीकरण हो और जनता में वृथा विभ्रम फैलें ! जहाँतक और जबतक गुंजाइश होती है, हम संवैधानिक रास्तों से और संवैधानिक-विधिक दायरे में ही संघर्ष चलाते हैं, पर इन्हें अनुल्लंघनीय लक्षमणरेखा मान लेने का विभ्रम जनता में कत्तई नहीं फैलाया जाना चाहिए ! संघर्ष करते हुए जनता इन सीमाओं को खुद पहचानने लगती है और फिर इनके अतिक्रमण की अनिवार्यता को समझने लगती है ! तात्कालिक मुद्दों की लडाइयाँ लड़ते हुए हम अपने क्रांतिकारी शिक्षा और प्रचार के कार्य को इसी दिशा में निर्देशित करते हैं ! क्रांतिकारी बदलाव संविधान और कानून की चौहद्दी में क़ैद रहकर नहीं, बल्कि उनको तोड़कर होते हैं ! इतिहास में इसका कोई अपवाद नहीं है ! हिन्दुत्ववादी फासिज्म के विरुद्ध संघर्ष भी क्रांतिकारी संघर्ष की ही एक अविभाज्य कड़ी है, इसे बुर्जुआ जनवाद की फिर से बहाली के यूटोपियाई और असंभव सुधारवादी लक्ष्य तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए !

(14 Jan 2026)


Friday, January 09, 2026

फ़ासिस्ट अंधेरगर्दी और आतंक राज के ख़िलाफ़ साहस के साथ आवाज़ उठाना आज हमारा बुनियादी कर्तव्य और दायित्व है।


 मेरा तो जनता के पक्ष में खड़ा होने वाले सभी कवियों, लेखकों, कलाकारों से साफ़-साफ़, दो टूक शब्दों में कहना है कि सभी सरकारी अकादमियों, जयपुर लिटफेस्ट, साहित्य आजतक जैसे आयोजनों, विविध साहित्य महोत्सवों और भारंगम आदि-आदि का, और विश्वविद्यालयों के उन सभी आयोजनों का पूर्ण बहिष्कार किया जाना चाहिए जिनमें संघी कुलपति और भाड़े के टट्टू नौकरशाह मंच पर बिराजे हों। इस फ़ासिस्ट समय में सत्ता और पूँजी के सभी प्रतिष्ठानों और आयोजनों से पूरी तरह दूरी बरतना भी प्रतिरोध का एक कारगर तरीक़ा है। 

अगर आप एक सच्चे लेखक हैं तो आपकी हैसियत आपके लेखन से तय होगी, न कि सरकार और सेठों की संस्थाओं के दिये गये ओहदों, ईनामों, पदवियों से और उनके रंगारंग जलसों में सजधजकर मंचों को सुशोभित करने से। हमें अपनी बात जनसमुदाय तक अपने वैकल्पिक माध्यमों से पहुँचानी होगी और एक फ़ासिस्ट समय में, लाजिमी तौर पर सड़क पर भी उतरना होगा। अपने दिलों से जेल और मुकदमों वगैरह का डर निकाल देना भी ज़रूरी है। राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में तो ऐसा बहुत सारे उन लेखकों और पत्रकारों ने भी किया था जो वामपंथी नहीं थे। फ़ासिस्ट, और सभी सत्ताधारी, इसी बात से तो डरते हैं कि लोग कहीं उनसे डरना बन्द न कर दें। 

फ़ासिस्ट अंधेरगर्दी और आतंक राज के ख़िलाफ़ साहस के साथ आवाज़ उठाना आज हमारा बुनियादी कर्तव्य और दायित्व है। हमारे यशस्वी और साहसी पूर्वज लेखकों और कलाकारों ने हमें यही राह दिखलाई है। जिन लोगों ने बीसवीं सदी के फ़ासिज़्म विरोधी प्रतिरोध संघर्षों और राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलनों के इतिहास को पढ़ा है वे इस सच्चाई से भलीभाँति परिचित हैं। 

(9 Jan 2026)


Friday, December 19, 2025

दुःख के बारे में एक और खोज

 

दुःख अंत की भाषा था ।

और भाषा का अंत था ।

अँधेरे का व्याकरण था दुःख 

और व्याकरण का अन्धेरा ।

दुःख था अकेलेपन की चीख 

और एक चीख का अकेलापन ।

दुःख अन्दर की खोहों की 

निरुद्देश्य खोजपूर्ण यात्रा था ।

दुःख अकेले भोग लेने की 

एक स्वार्थपूर्ण कामना था ।

दुःख जूते में घुसा हुआ एक कंकड़, 

बहा दिया गया आँसू का एक कतरा था ।

दुःख था बहुत कुछ जानना 

और लगातार जानना 

और सिर्फ़ जानना ।

दुःख आत्मा पर एक धब्बा था अपरिहार्य, 

दुनिया की तमाम अपूर्ण कामनाओं की 

हिलती हुई छाया था ।

यह पाया कि सबसे बड़ा दुःख था फिर भी 

यह जानना कि दुःख है 

और यह न जानना कि

इसके कारण क्या हैं ?

--- शशि प्रकाश 

    (नवम्बर, 1998)

Thursday, December 18, 2025

कूपमंडूकता के बारे में कुछ नोट्स


कूपमंडूकों द्वारा अमरत्व का प्रमाण-पत्र प्राप्त करने की अपेक्षा क्षणभंगुर जीवन लाखगुना बेहतर होता है I

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तो चलिए कूपमंडूकता के बारे में कुछ और गप्प-गलचौर किया जाये, इस बात की परवाह किये बिना कि ये बातें कूपमंडूकों को कितनी बुरी लगेंगी। ग़नीमत यह है कि इस बात पर कोई हमें बुरा-भला कहने नहीं आयेगा क्योंकि कोई भी कूपमंडूक ख़ुद को कूपमंडूक नहीं मानता। 

 कूपमंडूकता एक सार्वभौमिक परिघटना है, पर अलग-अलग देशों में इसकी अलग विशिष्टताएँ होती हैं I उन्नीसवीं शताब्दी में जर्मन महाकवि हाइने ने और युवा मार्क्स-एंगेल्स ने जर्मन कूपमंडूकता की खूब खिल्ली उड़ाई थी और हर्ज़ेन, चेर्नीशेव्स्की, दोब्रोल्युबोव जैसे क्रांतिकारी जनवादी दार्शनिकों ने रूसी कूपमंडूकता से जमकर लोहा लिया था I पर इन महापुरुषों ने अगर भारतीय कूपमंडूकता, विशेषकर "हिन्दू" कूपमंडूकता के दर्शन किये होते तो उसके आगे उन्हें दुनिया की हर कूपमंडूकता पानी भरती नज़र आती I

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कूपमंडूक के मानस का निर्माण निम्न-बुर्जुआ आत्मतुष्टि, पाखंडपूर्ण पारम्परिक नैतिकता, और चाटुकारिता की दासतापूर्ण वृत्ति से होता है I

 कूपमंडूक महानगरीय जीवन की अच्छाई-बुराई के विराट फलक से डरता और चिढ़ता है और अपने भीतर कस्बाई सुस्ती और आत्मतुष्ट गँवारपन को लिए हुए मुम्बई-बंगलुरु ही नहीं बल्कि पश्चिम के शहरों तक में जी आता है I 

कूपमंडूक हरदम अपने निजी अनुभवों की दुहाई देता है और तर्क और विज्ञान की बातों से नफ़रत करता है I कूपमंडूक हर जगह अपने हित ताड़ता रहता है, लेकिन कोई भी कदम उठाने से पहले नेवले की तरह सर उठाकर हवा को सूँघते हुए चौकन्नी निगाहों से चारो ओर देखता है कि कहीं कोई जोखिम तो नहीं !

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 कूपमंडूक हमेशा सोचता है कि नयी पीढ़ी बर्बाद हो गयी है और उससे कोई उम्मीद नहीं की जा सकती I वह अपने बाल-बच्चों से हरदम असंतुष्ट रहता है और चाहता है कि जीवन में वह जो कुछ भी नहीं कर पाया वह सब कुछ उसके बच्चे कर डालें I वह हमेशा वर्तमान से खिन्न रहता है, भविष्य उसे अंधकारमय दीखता है और सारी अच्छाइयाँ अतीत में नज़र आती हैं !

 वह हमेशा नैतिकता के बारे में बातें करता है पर खुद हमेशा अनैतिक ख़यालों में डूबा रहता है, पर डर के मारे अनैतिक काम करने से बचता है और कल्पना करता है कि काश, उसे ऐसी जगह जाने का अवसर मिले जहाँ वह जमकर लम्पटपना करे और उसे पहचानने वाला कोई न हो I कूपमंडूक धर्म को मनुष्यता के लिए अनिवार्य और विज्ञान को विनाशकारी मानता है I

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कूपमंडूक अपने को आदर्शवादी बताता है और भौतिकवाद से घोर घृणा का प्रदर्शन करता है I उसके लिए भौतिकवाद का मतलब है, पेटूपन, पियक्कड़पन, दुर्वासनाएँ, दंभ, धनलिप्सा, लोलुपता, तृष्णा, मुनाफाखोरी आदि ! और आदर्शवाद शब्द का अर्थ वह सदाचार, लोकोपकार, संयम आदि समझता है जिसकी औरों के सामने वह खूब डींगें हाँकता है, पर उनमें विश्वास तभी करता है जब ज्यादा पीने से उसके सर में दर्द हो जाता है, या वह दिवालिया हो जाता है, यानी हर उस स्थिति में जिसे वह अपनी "भौतिकवादी" ज्यादतियों का नतीज़ा समझता है I

*

कूपमंडूक नाना प्रकार के अनुभवों से गुजरने वाली उन मोटी तोंदों के प्रति काफ़ी श्रद्धाभाव रखता है, जो कांट के अनुसार, पिचकती हैं तो अश्लीलता बन जाती हैं, और यदि फूलती हैं तो धार्मिक प्रेरणा बन जाती हैं I

 कूपमंडूक हमेशा झुककर मजबूत के शासन को स्वीकार करता है और फिर उतनी ही निर्मम निरंकुशता के साथ अपने से कमजोर और बेबस को, जैसे कि अपनी पत्नी और बच्चों को दबाता है I कूपमंडूक अपने घर में एक छोटी सी रियासत के राजा जैसा होता है I

 कूपमंडूक सत्ता को देवत्व-मंडित जैसा कुछ मानता है, सत्ता से पुरस्कृत-सम्मानित होने को मोक्ष-प्राप्ति सरीखा समझता है I कूपमंडूक यदि वामपंथी भी हो तो सरकारी अफसरों के आगे झुक कर कोर्निश बजाता है I सरकारी अफसर अगर लेखक हों तो उनके दरबार में पहुँचकर वह स्वयं को इन्द्रसभा में बैठा हुआ महसूस करता है और उस अफसर लेखक को प्रेमचंद और निराला का वारिस बताता रहता है I

*

 कूपमंडूक ज्ञान से हमेशा आतंकित रहता है, पर उसकी कुंठा यह होती है कि वह लोगों के बीच ज्ञानी के रूप में प्रतिष्ठा भी चाहता है I वह इस स्थायी भय में जीता रहता है कि लोग उसकी मूर्खता पकड़ लेंगे, इसलिए वह विद्वानों की बातों पर जोर-जोर से सर हिलाता है I

कूपमंडूक को चुटकुले सुनने-सुनाने में बहुत मज़ा आता है I वह बेहद गैर-ज़रूरी बातें भी बेहद गंभीर मुद्रा में करता है I

कूपमंडूक हरतरह के आन्दोलन और सामाजिक अशांति से नफ़रत करता है I वह डंडे के अनुशासन से श्वानवत प्यार करता है और यह कहता रहता है कि लोगों के पिछवाड़े डंडे लगाकर सबकुछ ठीक कर देना चाहिए, पर अपना पिछवाड़ा वह हर सूरत में बचा लेना चाहता है I

*

कूपमंडूक अपने परिष्कृत और प्रांजल रूप में भी विवेकशील नागरिक का प्रहसन होता है I वह हमेशा मूल की जगह नक़ल को या कार्टून को तरजीह देता है I तूफ़ान से वह भय खाता है, लेकिन तूफ़ान अपने पीछे जो कीचड़-कचरा छोड़ जाता है, उसमें उसे स्वर्गिक सुख की अनुभूति होती है I 

कूपमंडूक विचारों की जटिलता और अमूर्तता से घबराता है, हर चीज़ को सरल-संक्षिप्त रूप में जानना चाहता है और अपनी बात करने की जगह हरदम ऐसे जुमले बोलता रहता है कि यह बात आम लोगों की समझ में नहीं आयेगी I

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मार्क्स ने कहीं लिखा था कि जर्मन कूपमंडूकता का दलदल इतना विराट है कि गोएठे और हेगेल जैसी महान हस्तियों के पैर भी कभी-कभी उस दलदल में फँस गये I भारतीय कूपमंडूकता का दलदल उससे भी कई गुना अधिक विराट है I यहाँ तो प्रसिद्ध लेकिन बौने क़द के ज्यादातर वाम बुद्धिजीवी और साहित्यकार भी इसी दलदल में लोटपोट होते रहते हैं और सत्ता उनके सामने चारा फेंकती रहती है I

मार्क्स ने  1863 में लिखा था :"यह सही है कि पुरानी दुनिया कूपमंडूक की है I लेकिन हमें कूपमंडूक को ऐसा भूत नहीं मानना चाहिए, जिससे भय खाकर पीछे हट जाएँ I इसके विपरीत, हमें उसपर नज़र रखनी चाहिए I दुनिया के इस मालिक का अध्ययन करना उपयोगी है I"

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पुरानी दुनिया को नष्ट करने का प्रोजेक्ट सिर्फ़ अभाव, अत्याचार, शोषण, युद्ध, भुखमरी, व्यभिचार, विलासिता और अमानवीयता की दुनिया को नष्ट करने का ही प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह कूपमंडूक के साम्राज्य को तहस-नहस करने का भी प्रोजेक्ट है !

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(18 Dec 2025)


 मैं सोच रही हूँ कि तीन दिन तक दिन-रात पन्द्रह सौ कविताएँ लिखूँ, फिर उसकी पन्द्रह प्रतियाँ ख़ुद ही छाप लूँ, इस घोषणा के साथ कि यह पन्द्रह सौ वर्षों की श्रेष्ठतम काव्यकृति है। उसकी क़ीमत पन्द्रह करोड़ नहीं, पन्द्रह लाख भी नहीं बल्कि विनम्रतापूर्वक एक लाख पन्द्रह हज़ार रखूँ और फिर पन्द्रह बुद्धिजीवी पाठक खोज निकालूँ। 

अपनी यह इच्छा जाहिर करने पर एक मित्र ने कहा कि इसमें एक ख़तरा यह है कि पन्द्रह लोग पकड़ कर मुझे पागलखाने पहुँचा दें और वहाँ मुझे पन्द्रह महीने गुज़ारने पड़ें। 

लेकिन मेरा ख़याल है कि ऐसा कुछ नहीं होगा। क्या किसी बुद्धिजीवी ने कभी यह प्रस्ताव रखा कि नॉन बायोलॉजिकल महामानव का, कंगना रनौत का या उन जैसे तमाम दूसरों का निवास किसी पागलखाने में होना चाहिए? और बुद्धिजीवियों और कवियों के बीच भी पागल और नीमपागल क्या कम हैं? और जो पागल नहीं हैं उनमें से एक बड़ी संख्या शातिरदिमाग़, काइयाँ, कायर, मौकापरस्त और दरबारी मिज़ाज के लोगों की है। ऐसे लोग किसी फ़ासिस्ट सिस्टम की अहम ताक़त होते हैं। 

#पगलैट_ख़यालात

(18 Dec 2025)

Sunday, December 07, 2025


 आज तथाकथित साहित्यिक अवांगार्द की चर्चा बहुत होती है, और इस शब्‍द का अभिप्राय मुख्‍यत: रूप के क्षेत्र में होने वाले फैशनेबुल प्रयोगों से ही होता है। मेरे विचार में सच्‍चे अवांगार्द, सच्‍चे हरावल वे रचनाकार हैं, जो अपनी कृतियों में हमारे युग के जीवन के लक्षण निर्धारित करनेवाली नयी अंतर्वस्‍तु को उजागर करते हैं। सामान्‍यत: यथार्थवाद और यथार्थवादी उपन्‍यास -- दोनों ही अतीत के महान रचनाकारों के कलात्‍मक अनुभव पर आधारित हैं। परंतु अपने विकास में उन्‍होंने महत्‍वपूर्ण नये, आधुनिक लक्षण प्राप्‍त किये हैं। 

मैं इस यथार्थवाद की चर्चा कर रहा हूँ, जो जीवन के नवीकरण का, मानव के हित में उसके पुनर्गठन का विचार लिए होता है। बेशक, मैं उस यथार्थवाद की बात कर रहा हूँ, जिसे हम समाजवादी यथार्थवाद कहते हैं। उसकी मौलिकता इस बात में है कि वह उस विश्‍वदृष्टिकोण को व्‍यक्‍त करता है, जो न मात्र अवलोकन को स्‍वीकार करता है और न ही वास्‍तविकता से पलायन को, जो मानवजाति की प्रगति के लिए संघर्ष का आह्वान करता है तथा कोटि-कोटि जनता के प्रिय लक्ष्‍यों को समझना तथा इन लोगों के लिए संघर्ष का पथ आलोकित करना संभव बनाता है।

मानवजाति एकाकी व्‍यक्तियों की भीड़ मात्र नहीं है, जो पृथ्‍वी के गुरुत्‍वाकर्षण क्षेत्र से बाहर निकले अंतरिक्षनाविक की भांति भारहीनता की अवस्‍था में तिरते रहते हैं। हम पृथ्‍वी पर रहते हैं, उसके नियमों से शासित हैं, और हमारे जीवन पर हावी हैं दैनिक चिंताएँ और अपेक्षाएँ, उज्‍ज्‍वल भविष्‍य की आशाएँ। पृथ्‍वी के आबादी के विराट संस्‍तर एकसमान आकांक्षाओं से प्रेरित हैं, उनके समान हित हैं, जो उन्‍हें एक-दूसरे से अलग करने की अपेक्षा कहीं अधिक हद तक उन्‍हें एक सूत्र में पिरोते हैं।

ये श्रमिक जन हैं, वे लोग हैं, जो अपने हाथों और मस्तिष्‍क से सभी वस्‍तुओं का सृजन करते हैं। मैं उन लेखकों में से हूँ, जो अपना सर्वोच्‍च मान और सर्वोपरि स्‍वतंत्रता अपनी कलम से श्रमिक जनता की सेवा करने की निर्बाध संभावना में ही देखते हैं।

-- मिख़ाईल शोलोख़ोव

Tuesday, December 02, 2025

 

उट्ठो मेरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो

ख़ाक-ए-उमरा के दर-ओ-दीवार हिला दो

गरमाओ ग़ुलामों का लहू सोज़-ए-यक़ीं से

कुन्जिश्क-ए-फिरोमाया को शाहीं से लड़ा दो

सुल्तानी-ए-जमहूर का आता है ज़माना

जो नक़्श-ए-कुहन तुम को नज़र आये मिटा दो

जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी

उस ख़ेत के हर ख़ोशा-ए-गुन्दम को जला दो

क्यों ख़ालिक़-ओ-मख़लूक़ में हायल रहें पर्दे

पीरान-ए-कलीसा को कलीसा से हटा दो

मैं नाख़ुश-ओ-बेज़ार हूँ मरमर के सिलों से

मेरे लिये मिट्टी का हरम और बना दो

तहज़ीब-ए-नवीं कारगह-ए-शीशागराँ है

आदाब-ए-जुनूँ शायर-ए-मश्रिक़ को सिखा दो

-- अल्लामा इक़बाल


 मेरी कविता 'एक मध्यवर्गीय विद्रूप काव्यात्मक विडम्बना' का नेपाली भाषा में अनुवाद किया है नेपाली कवि कामरेड  Bala Ram Timalsina  ने। पाठकों की सुविधा के लिए नीचे मूल कविता भी दे दी गयी है। 

एउटा मध्यवर्गीय विद्रूप काव्यात्मक विडम्बना 

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©Kavita Krishnapallavi 

जस्तो कि -

कायरता त हाम्रो रगतमै थियो 

अनि पर्खेर बस्नु हाम्रो जीवन थियो ।

प्रार्थना पत्रहरू र निवेदनहरूको भाषा

हामीलाई ओखतीको रुपमा पियाइएको थियो

अनि सामान्य मानिसहरू प्रति अलिकति दया

र कृपालुता नै

हाम्रो प्रगतिशीलता थियो ।

हाम्रो दुनियादारीलाई

मानिसहरूले सेवाभाव सम्झने गल्ति गर्थे

हाम्रो क्रुरता हाम्रो साँघुरो सोच जति नै थियो ।

हामी अत्याचार र मूर्खता भन्दा 

जति टाढा  देखिने गर्दथ्यौं या देखाइन्थ्यो

त्यति टाढा पनि थिएनौं 

जब अत्याचारको वर्षा हुने गर्दथ्यो

र केही कुरा बोल्नु भनेको

ज्यान खतरामा होम्नु हुन जान्थ्यो

हामी चलाखी पूर्वक अराजनीतिक भैदिन्थ्यौं

या त कला र सौन्दर्यका अतिशय आग्रही,

या प्रेम,करुणा,अहिंसा,मानवीय पीडा,

या आफैलाई बदल्ने आदि कुरा गर्न थाल्दथ्यौं।

अनि मानिसहरू यो कुरालाई 

हाम्रो सादगी , भोलाभालापन 

या अति संवेदनशीलता बुझ्ने गर्दथे ।

थाहा छैन , 

हामी दुर्दान्त वनवासी तपस्वी थियौं 

या कलाका असाध्य वीणाका

 अप्रतिम साधक थियौं

या आफ्नो हृदयलाई 

कुनै अग्लो शमीको रुखको टोड्कामा राखेर

भेष बदलेर बस्ती बस्ती डुल्ने

कोइ मायावी अमानुष थियौं 

या त केवल एउटा दीर्घजीवी कछुवा नै थियौं ।

तर यति कुरा चै प्रष्ट थियो कि 

हामी भित्र मनुष्योचित कुरा

केही पनि बाँकि थिएन ।

हाम्रा आत्माका आँखाहरू थिएनन्

न त कानहरू नै थिए ।

अँ ,

कविता भने हामी निकै राम्रा लेख्ने गर्दथ्यौं ।

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मूल हिन्दी कविता

एक मध्यवर्गीय विद्रूप काव्यात्मक  विडम्बना  

कायरता तो जैसे हमारे ख़ून में थी

और इन्तज़ार करना हमारा जीवन था।

प्रार्थना पत्रों और निवेदनों की भाषा 

हमें घुट्टी में पिलायी गयी थी 

और मामूली लोगों के प्रति थोड़ी दया और कृपालुता ही

हमारी प्रगतिशीलता थी।

हमारी  दुनियादारी को लोग

भलमनसाहत समझते थे।

संगदिली हमारी उतनी ही थी 

जितनी कि तंगदिली।

अत्याचार और मूर्खता से उतने भी दूर नहीं थे हम

जितना कि दिखाई देते थे और दिखलाते थे।

जब ज़ुल्म की बारिश हो रही हो

और कुछ भी बोलना जान जोखिम में डालना हो

तो हम चालाकी से अराजनीतिक हो जाते थे

या कला और सौन्दर्य के अतिशय आग्रही,

या प्रेम, करुणा, अहिंसा, मानवीय पीड़ा,

ख़ुद को बदलने आदि की बातें करने लगते थे।

और लोग इसे हमारी सादगी और भोलापन 

समझते थे या अतिसंवेदनशीलता।

न जाने हम दुर्दान्त तपस्वी थे वनवासी 

या कला की असाध्य वीणा के अप्रतिम साधक

या अपना हृदय किसी ऊँचे शमी वृक्ष के कोटर में 

रखकर भेस बदलकर बस्तियों में घूमने वाला

कोई मायावी अमानुष

या महज एक दीर्घजीवी कछुआ, 

लेकिन इतना तय था कि कुछ भी 

मनुष्योचित नहीं रह गया था 

हमारे भीतर।

हमारी आत्मा की आँखें नहीं थीं

और न ही कान।

हाँ लेकिन कविताएँ हम

बहुत सुन्दर लिख लेते थे।

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Saturday, November 29, 2025


ज़्यादातर लोगों द्वारा सुनाये गये किस्से सजे-धजे बागों की तरह लगते हैं -- करीने से छाँटी गयी बाड़, सुव्यवस्थित फूलों की क्यारियाँ, सलीके से कटी घास का मैदान और कुछ सुन्दर सजावटी झाड़ियाँ और पेड़। 

कुछ ही लोग मिलते हैं जिनके किस्से जंगलों जैसे होते हैं -- तमाम किस्म के जंगलों जैसे। 

और कई ऐसे लोग भी मिलते हैं जिनके दिलों में किस्सों के क़ब्रिस्तान होते हैं। 

... 

मेरे पास किस्सों के जंगल हैं और कुछ क़ब्रिस्तान भी। 

... 

इधर सुनने में आया है कि कुछ लोग रात के अँधेरे में क़ब्रों को खोदकर कंकाल निकाल ले जाते हैं और उनकी हड्डियों के ढाँचे को व्यवस्थित करके और पालिश करके ऊँची क़ीमत पर बेच देते हैं। आजकल कुछ लोग अपने अध्ययन कक्ष में और कुछ अपने शयनकक्ष में नरकंकाल सजाकर रखने लगे हैं। 

(उनींदे में डायरी के कुछ इन्दराज)

(29 Nov 2025)

Thursday, November 27, 2025


 ''किसी कमरे में जहांँ सभी लोग सर्वसम्मति से  चुप रहने का षड्यंत्र किये बैठे हों ,सत्य एक पिस्तौल दगने जैसी आवाज़  करता है ''

-- पोलिश कवि चेस्वाव मिवोश

Friday, November 21, 2025

 


... बौद्धिक समाज में, या आम मध्यवर्गीय नागरिकों के बीच रहते हुए अगर आप उसूलपरस्त हैं तो दोस्त गिने-चुने मिलेंगे और दुश्मन बहुतायत में। 

... अगर आप संवेदनशील और सोचने वाले इंसान हैं तो दुख हमेशा आपका पीछा करते रहेंगे और ख़ुशियाँ दूर भागती रहेंगी। 

... फिर भी हर मुमकिन जतन करके अपनी दोस्तमिज़ाजी बचाये रखनी चाहिए और ज़िन्दादिली भी। नौटंकीबाज़ और दुनियादार लोगों से घिरे होकर भी अपनी सादामिज़ाजी और पारदर्शिता बचाये रखनी चाहिए, हालाँकि यह उतना आसान नहीं होता।

... जीवनानुभव अर्जित करने के लिए बहुत सारे लोगों का संग-साथ चाहिए होता है और चिन्तन और सृजन के लिए बहुत सघन अकेलापन। 

... भावनाओं का अपना तर्क होता है और हर तर्क (या विचार) के पीछे (सकारात्मक या नकारात्मक) भावनाएँ होती हैं। अगर विचारों के पीछे सिर्फ़ नकारात्मक भावनाएँ हैं, या सकारात्मक भावनाओं का प्रवाह बेहद क्षीण है तो आप दुर्दांत विद्वान भले हो सकते हों, आपके हृदय के रेगिस्तान में कविता की सदानीरा सरिता कभी प्रवाहित नहीं हो सकती। हाँ, बरसों के दौरान, कभी-कभार होने वाली बारिश के दौरान तो बीहड़ मरुस्थलों में भी क्षीण जलधाराएँ बह निकलती हैं जिन्हें जल्दी ही रेतीला विस्तार अपने भीतर सोख लेता है। 

... कुछ लोगों के व्यक्तित्व का विस्तार बहुत अधिक होता है लेकिन रेगिस्तान जैसा। 

... रेगिस्तान को कई विधियों से हरा-भरा बनाया जा सकता है लेकिन रेगिस्तान जैसे व्यक्तित्वों को मानवीय हरियाली और कविता की आभा से भर पाना लगभग नामुमकिन होता है। 

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(डायरी के कुछ इन्दराज, अगस्त-नवम्बर 2025 के दौरान)

(21 Nov 2025)

Tuesday, November 18, 2025

पराजय के दिनों में सर्वहारा राजनीति का क़सीदा

 

तुम नहीं गाती हो

खोयी हुई चीज़ों का शोकगीत।

बस उन्हें स्मृतियों में सुरक्षित रखती हो। 

जो निर्माण किया जाना है भविष्य में

तुम उसकी कविता सुनाती हो

कभी एक सहज बयान

तो कभी एक फंतासी की शैली में। 

तुम पूर्वजों के आख्यानों में

जीवितों की साँसें पिरोती हो

और यूटोपिया को विज्ञान में

बदल देती हो। 

तुम जीने के लिए मरना सिखाती हो, 

धरती के अभागों को 

सपने देखना सिखाती हो, 

और दबे-कुचले लोगों को

बग़ावत में उठ खड़े होने में

मनुष्य होने का अहसास कराती हो। 

तुम्हारी संगत में हमने जाना कि 

बुराइयों से नफ़रत किये बिना

अच्छाइयों से प्यार नहीं किया जा सकता

और तुमसे ही हमने जाना कि

बार-बार के विपर्ययों 

और अंधकार युगों की वापसी के बावजूद इतिहास का अंत कभी नहीं होता

और रोटी, इंसाफ़ और बराबरी के लिए

जारी लड़ाई से जो कभी पीछे नहीं हटते

उनके जीवन में अकथ दुख आते हैं

लेकिन रंगों की कभी मृत्यु नहीं होती। 

आततायी बागों को उजाड़ते रहते हैं

लेकिन फूल अपने लिए खिलने की जगह

ढूँढ़ ही लेते हैं। 

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(18 Nov 2025)

Thursday, November 13, 2025

 

आज से लगभग 50 साल पहले 'भंगिमा' में छपी शशि प्रकाश की एक लम्बी कविता – 


‘यात्रा में : सुदर्शन भाई से कविता सम्वाद’ का एक अंश

आत्मपीड़ा का दाह, दृष्टि का सुकून और कविता का उपसंहार 

फिर भी सुदर्शन भाई,

यह कैसे कहूँ कि दुःख नहीं है।

न जाने दर्द की कितनी तहे हैं–

लेकिन आग भी तो है। खुली आँखें भी तो हैं/ बहती ज़िन्दगी भी तो है।

न जाने वर्जना और भय की कितनी ग्रन्थियाँ हैं–

लेकिन आग भी तो है/खुली आँखें भी तो हैं/बहती ज़िन्दगी भी तो है।

मैं रोज़ चाहता हूँ बेदर्दी से

इस गन्दी दिमागी पूँजी की 

एक–एक तह को उधेड़कर जला देना।

रोज चाहता हूँ जल्दी से होना 

वह आख़िरी लड़ाई, जल प्रलय 

उसका उत्तरवर्ती वह मनु 

भविश्ववत हिम गिरि के किसी 

उत्तुंग शिखर पर बैठा हुआ।

मैं अच्छी ज़िन्दगी की भूमिका 

सही ज़िन्दगी के रूप में चाहता हूँ।

यानी आग चाहता हूँ 

आवाज़ चाहता हूँ 

प्यार चाहता हूँ 

हथियार चाहता हूँ 

यानी वह सब,

जो चाहता है रणतत्पर कामगार।

..... आइये, हम अपनी रफ़्तार तेज़ करें,

कहीं हम बिचौलिये होकर ही न रह जायें।

उधर देखिये,

जिनको नज़र देने की हमारी 

जिम्मेदारी है 

वे मज़बूत बाजुओं वाले लोग

काफ़ी क़रीब आ गये हैं 

झुग्गियों खेतों से चलकर 

साफ़ सुथरी आग के साथ 

(सही दिशा में ले जाने वाली 

हवा के झोंके की प्रतीक्षारत आग)

क्या आप 

उनकी आवाज़ सुन रहे हैं?

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