Sunday, September 19, 2021

जीवन और राजनीति में उसूलों पर अनम्य दृढ़ता और साफ़गोई होनी चाहिए और दैनन्दिन बात-व्यवहार में सहजता और विनम्रता होनी चाहिए।

यह सच्चे कम्युनिस्ट का बुनियादी गुण होता है।

जो लोग उसूली संघर्षों में दोटूकपन और साफ़गोई का बुरा मानते हैं वे उदारतावादी और अवसरवादी लोग होते हैं। अक्सर आप पायेंगे कि ऐसे लोगों के पास जब तर्कों का कोई उत्तर नहीं होता तो वे कठदलीली करते हैं, अपने स्टैण्ड से पलटी मारने लगते हैं, धीरे-धीरे बात बदलने लगते हैं, गोलमाल और लीपापोती करने लगते हैं और कुछ मिथ्यारोप लगाते हुए बहस से ही भाग खड़े होते हैं।

ऐसे लोगों के क्रान्तिकारी चरित्र का क्षरण और पतन अवश्यम्भावी होता है। उनका राजनीतिक अवसरवाद जल्दी ही सचेतन व्यक्तिगत अवसरवाद में रूपान्तरित हो जाता है।

19 Sept 2021

Saturday, September 18, 2021

क्रान्ति, पार्टी और मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी: मार्क्‍सवादी काउत्‍स्‍की के विचारों की समीक्षा


 क्रान्ति, पार्टी और मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी: मार्क्‍सवादी काउत्‍स्‍की के विचारों की समीक्षा

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जब काउत्‍स्‍की अभी मार्क्सवादी थे, तो वे यूरोपीय मज़दूर आन्दोलन व कम्युनिस्ट आन्दोलन के प्रमुख नेता थे। लेनिन भी काउत्‍स्‍की के विचारधारात्मक योगदान को तमाम प्रश्नों पर मानते थे और क़रीबी से उनके कई सही मार्क्सवादी विचारों पर अनुसरण भी करते थे, मसलन, कृषि प्रश्न, पार्टी अनुशासन का प्रश्न और कम्युनिस्ट विचारधारा और मज़दूर आन्दोलन के सम्बन्धों के प्रश्न पर। 

काउत्‍स्‍की ने मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों और पार्टी के रिश्तों पर भी अपने मार्क्सवादी दौर में सटीक नज़रिये से लिखा, जिसकी अनुशंसा लेनिन समेत सभी समकालीन क्रान्तिकारी कम्युुनिस्टों ने की थी। इस सन्दर्भ में उनके दो लेख विशेष तौर पर पढ़ने योग्य हैं: 

1. बुद्धिजीवी और मज़दूर (https://www.marxists.org/arc.../kautsky/1903/xx/int-work.htm) 

2. “बुद्धिजीवी” और पार्टी के उसूल (https://www.marxists.org/archive/kautsky/1912/xx/intell.htm) 

ये दोनों बेहद छोटे लेकिन बेहद महत्वंपूर्ण लेख हैं। इन दोनों ही लेखों को हम अनुवाद होने पर तत्‍काल ही प्रकाशित करेंगे। 

इन दो लेखों से कुछ महत्वपूर्ण अंश मैं अनुवाद करके पेश कर रहा हूँ। हालाँकि अभी दूसरे कामों में बहुत व्यस्‍तता थी, लेकिन आज सुबह इन लेखों पर कई वर्षों बाद दोबारा निगाह पड़ी, तो इन अंशों को आपके साथ साझा करने से ख़ुद को रोक नहीं पाया। ग़ौर करें, काउत्‍स्‍की लिखते हैं: 

“लेकिन यह अन्तरविरोध (मज़दूर और बुद्धिजीवी के बीच का अन्तरविरोध – अनु.) श्रम और पूँजी के बीच के अन्तरविरोध से भिन्न है। एक बुद्धिजीवी कोई पूँजीपति नहीं होता। सच है कि उसका जीवन-स्तर बुर्जुआ होता है और अगर उसे दरिद्र हो जाने से बचना है तो उसे यह जीवन-स्तर क़ायम रखना पड़ता है; लेकिन साथ ही वह अपने श्रम का उत्पाद और अक्सर अपनी श्रमशक्ति बेचता है; और अक्सर वह स्वयं पूँजीपतियों द्वारा शोषित और अपमानित होता है। इसलिए बुद्धिजीवी का सर्वहारा वर्ग से कोई आर्थिक अन्तरविरोध नहीं है। लेकिन उसके जीवन का स्तर और उसके श्रम की स्थितियाँ सर्वहारा नहीं होती हैं, और यह भावनाओं और विचारों में एक निश्चित अन्तरविरोध को जन्म  देता है। 

“एक अलग-थलग व्‍यक्ति के तौर पर सर्वहारा का कोई वजूद नहीं होता। उसकी शक्ति, उसकी प्रगति, उसकी उम्मीदें और अपेक्षाएँ पूरी तरह संगठन से, अपने साथियों के साथ की जाने वाली व्यवस्थित कार्रवाई से निकलतीं हैं। जब वह किसी बड़े और शक्तिशाली संगठित तंत्र का हिस्सा होता है, तो वह अपने आपको बड़ा और शक्तिशाली महसूस करता है। यह संगठन ही उसके लिए मुख्य वस्तु है; उसकी तुलना में एक व्‍यक्ति का महत्व बेहद मामूली होता है। सर्वहारा एक ऐसे समूह के अंग के तौर पर भी, जिसे कि वह नहीं जानता, अधिकतम समर्पण के साथ और किसी व्यक्तिगत लाभ या व्यक्तिगत यश की सम्भावना या उम्मीद के बिना किसी भी पद पर अपने कर्तव्यों का निर्वाह स्वैच्छिक अनुशासन के साथ करता है जो कि उसकी सभी भावनाओं और विचारों में समाया होता है।

“बुद्धिजीवी का मामला बिल्कुल अलग होता है। वह इस शक्ति के माध्यम से नहीं बल्कि अपनी दलीलों के माध्यम से लड़ता है। उसका हथियार उसका व्यक्तिगत ज्ञान, उसकी व्यक्तिगत क्षमता और उसके व्यक्तिगत विश्वास हैं। वह कोई पद केवल अपनी व्यक्तिगत क्षमताओं के आधार पर ही हासिल कर सकता है। इसलिए इनकी सबसे मुक्त क्रियाशीलता उसे अपनी सफलता की प्रमुख पूर्वशर्त लगती है। बड़ी मुश्किल से ही वह एक ऐसे अंश या अंग (part) के रूप में कार्य करने को स्वीकार करता है, जो कि सम्पूर्ण (whole) के अधीन हो, और तब भी वह ऐसा अनिवार्यता के कारण करता है, इसलिए नहीं कि उसका झुकाव इसके प्रति हो। वह अनुशासन की आवश्यकता महसूस करता है, लेकिन जनसमुदायों के लिए, उस चुनिन्दा अल्पसंख्या के लिए नहीं, जिसका कि वह खुद को, ज़ाहिरा तौर पर, हिस्सा मानता है।” 

(कार्ल काउत्‍स्‍की , ‘मज़दूर और बुद्धिजीवी’, 1903) 

इसी लेख में काउत्‍स्‍की अन्त में लिखते हैं: 

“इसीलिए हर बुद्धिजीवी को पार्टी में शामिल होने से पहले ईमानदारी से अपनी जाँच कर लेनी चाहिए। और इसीलिए पार्टी को भी उसकी जाँच कर लेनी चाहिए कि वह सर्वहारा वर्ग के वर्ग संघर्ष के साथ अपने आपको एकरूप कर सकता है या नहीं, और एक सामान्य सैनिक के समान उसमें डूब सकता है या नहीं, वह भी बिना किसी ज़ोर-ज़बर्दस्ती का अनुभव किये या बिना दमित महसूस किये। जो बुद्धिजीवी ऐसा करने में सक्षम हैं वे अपनी प्रतिभाओं के अनुसार सर्वहारा वर्ग को बहुमूल्य- सेवा प्रदान कर सकते हैं, अपनी पार्टी गतिविधि से विशाल आत्‍मसन्तोष का अनुभव प्राप्त कर सकते हैं। जो बुद्धिजीवी ऐसा करने में अक्षम होंगे वे भारी घर्षण, निराशा, टकरावों की अपेक्षा कर सकते हैं, जो न तो उनके लिए अच्छी होगी और न ही पार्टी के लिए। 

“एक ऐसे बुद्धिजीवी का आदर्श उदाहरण जिसने अपने आपको सर्वहारा वर्ग की भावनाओं के साथ साथ पूर्णत: एकरूप कर दिया, और जिसने एक शानदार लेखक होने के बावजूद बुद्धिजीवियों के विशिष्ट तौर-तरीकों का परित्याग कर दिया, जिसने आम मज़दूरों के साथ उल्लास के साथ मार्च किया, जिसने हर उस पद पर काम किया जो कि उसे सौंपा गया, जिसने अपने आपको पूरे दिल के साथ हमारे महान लक्ष्य के लिए समर्पित कर दिया, और जो वैयक्तिकता के दमन के बारे में उन मंद मिनमिनाहटों से घृणा करता था, जो कि नियत्शे और इब्सेेन के दर्शन में प्रशिक्षित वे सारे व्यक्ति आम तौर पर तब किया करते हैं, जब भी वे अल्पसंख्या में होते हैं – बुद्धिजीवी का वह आदर्श उदाहरण जिसकी आज समाजवादी आन्दोलन को ज़रूरत है, और कोई नहीं बल्कि विल्हेल्म  लीब्क़नेख़्त थे। हम मार्क्स का जिक्र भी कर सकते हैं, जिन्होंने अपने आपको कभी आगे करने का प्रयत्न नहीं किया, और इण्टरनेशनल में दिल से लागू किया गया उनका अनुशासन एक मिसाल था, वह भी एक ऐसे संगठन में जिसमें वे अक्सर अल्पसंख्या में रहा करते थे।”

(कार्ल काउत्‍स्‍की, उपरोक्त सन्दर्भ)

आइये अब कार्ल काउत्‍स्‍की की दूसरी रचना ‘“बुद्धिजीवी” और पार्टी के उसूल’ के कुछ महत्वपूर्ण अंशों को देखें जो कि मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों और पार्टी के रिश्ते के सवाल पर रोशनी डालता है। यह लेख 1912 का है। इस लेख में काउत्‍स्‍की   एक विशिष्ट घटना के बारे में लिखते हैं। पार्टी से अनुशासनहीनता करने वाले एक टुटपुँजिया बुद्धिजीवी का निष्कासन किया गया, जिस पर बर्नस्टाइन, सूडेकुम व फ्रैंक जैसे संशोधनवादियों ने एक विरोध-पत्र जारी किया। इस लेख में काउत्‍स्‍की उसी विरोध-पत्र का जवाब देते हैं। 

काउत्‍स्‍की बताते हैं कि यह टुटपुँजिया बुद्धिजीवियों की प्रवृत्ति होती है कि वे पार्टी और मज़दूर वर्ग से समस्त अनुशासन और कर्तव्यों के निर्वाह की उम्मीद करते हैं, लेकिन अपने लिए वे केवल अधिकारों और स्वतन्त्रता के सिद्धान्‍त को लागू करते हैं, कर्तव्‍यों और अनुशासन के नहीं। ‘राय की स्वतंत्रता’ और ‘विज्ञान के अधिकार’ के नाम पर पार्टी की कार्रवाइयों में अनुशासन का उल्लंघन किया जाता है जो कि एक मध्य्वर्गीय अराजकतावादी प्रवृत्ति ही है। देखिये काउत्‍स्‍की क्या लिखते हैं: 

“उल्टे उनके इस विरोध पर एक ऊर्जावान विरोध का जन्म होगा, क्योंकि विज्ञान की सभी आज़ादियों की हिफ़ाज़त के नाम पर, यह किसी और ही चीज़ का दावा कर रहा है। यह दावा कर रहा है कि वे लोग जो कि विज्ञान के लोग हैं या विज्ञान के लोग होने का दावा करते हैं, उन्हें उन साधारण कॉमरेडों पर लागू होने वाले अनुशासन से मुक्त कर दिया जाय, जिनके पास “हीनतर या सीमित तर्क शक्ति है”।

“और यही तो बात है। यह हालिया घोषणापत्र पार्टी में “बुद्धिजीवियों” के लिए विशिष्ट विशेषाधिकार सुरक्षित करने का एक और प्रयास है।

“पहले यह मांग की गयी कि संसद के सदस्योंं को, विशेषकर जो प्रान्तीय डायटों में हैं, पार्टी निर्णयों से बँधे होने की बाध्यता को ख़त्म कर दिया जाय। फिर समाजवादी मेयरों के लिए कहा गया कि उन्हेंं ऐसे निर्णयों से इतर बना दिया जाय। अब पार्टी कांग्रेस को इस अधिकार से वंचित करने की बात की जा रही है कि वह यह बताए कि कौन-सी धारणाएँ समाजवादी हैं और कौन-सी नहीं, विशेषकर जब वे धारणाएँ किसी “बुद्धिजीवी” की हों, जो किताबें लिखना जानता है।”

(काउत्‍स्‍की, ‘“बुद्धिजीवी” और पार्टी के उसूल', 1912) 

इसके ठीक आगे काउत्‍स्‍की एकदम सटीक बात पकड़ते हुए लिखते हैं: 

“बुद्धिजीवी के पास पार्टी कॉमरेड के सारे अधिकार होंगे, लेकिन उसके कोई कर्तव्य नहीं होंगे। 

“वैज्ञानिक शोध वाले हमारे ये लोग शान्तचित्तता के साथ ये कर्तव्य-निर्वाह करने वाला काम सर्वहारा वर्ग पर छोड़ देते हैं।

“हमें इस बात पर खुद को मुबारकबाद देने के लिए “गट्ठे पड़े हाथों” की राजनीति का प्रशंसक होने की कोई ज़रूरत नहीं है कि मज़दूरों ने पार्टी के भीतर विशेषाधिकार-प्राप्त स्थिति के “बुद्धिजीवियों” के अभिमान को हमेशा ठुकराया है, और यह उम्मीद की जा सकती है कि भविष्य में भी वे ऐसे अभिमानों को ठुकराएँगे।

“जाहिरा तौर पर, ऐसी माँगें भविष्य में और भी ज्‍़यादा उठायी जाएँगी। इन माँगों में हम पार्टी की वृद्धि में अन्तर्निहित एक परिघटना को ही देख रहे हैं। 

“इस बात में कुछ भी अजूबा नहीं है कि वे “बुद्धिजीवी” जो हमारे पास आएँगे वे जल्द ही या कुछ समय बाद इस या उस कारण के चलते अपने आपको पार्टी से असहमत पाएँगे। ऐसी चीज़ें सर्वहाराओं के साथ बिरले ही होती है क्योंकि वर्ग संघर्ष की अनिवार्यताएँ उन्हें पार्टी के साथ ज़्यादा नैसर्गिकता के साथ बाँधती हैं। 

“जब तक पार्टी छोटी थी, और काम गौण रूप से होता था, और संसदीय मैण्डेट्स की संख्या छोटी थी, तब तक पार्टी से व्यक्ति का अलगाव आसान और कष्टरहित था। लेकिन आज की कहानी अलग है, जब पार्टी इतने मैण्डेट्स व सम्पादन-कार्यों (जर्मनी में आज 71 समाजवादी दैनिक अख़बार हैं) का संचालन कर रही है और इतने अस्तित्व‍ उससे जुड़े हुए हैं। ऐसे में पार्टी से व्यक्ति का अलगाव एक कष्टदायक ऑपरेशन के समान ही हो सकता है, और यह नैसर्गिक है कि कई ऐसे बुद्धिजीवी लोग जो पार्टी से कोई अन्तरविरोध महसूस कर रहे हों, वे पार्टी से उम्मीद करें कि पार्टी ही अपने उसूलों में लचक पैदा कर दे। अगर ऐसे व्यक्ति पार्टी से ऐसा करवाने में कामयाब नहीं होते तो यह उन्हें अपनी राय की स्वतन्त्रता में असह्य बाधा प्रतीत होती है।” 

(काउत्‍स्‍की, उपरोक्त सन्दर्भ) 

अन्त में काउत्‍स्‍की निष्‍कर्ष के तौर पर लिखते हैं: 

“भौतिक और बौद्धिक उत्पादन के परिणामों में इस विरोध का हमारी पार्टी की गतिविधि पर भी असर पड़ता है। भौतिक उत्पादन में लगे लोग ज्‍़यादा आसानी से संगठित और अनुशासित होते हैं, बनिस्बत उनके जो कि बौद्धिक उत्पादन में लगे होते हैं। बौद्धिक उत्पादन में लगे लोगों में हमेशा अनुशासन की कमी और अराजकतावाद की ओर झुकाव होता है।

“इसे समझा ज़रूर जाना चाहिए, लेकिन वर्ग संघर्ष के लिए संगठित एक पार्टी में इसे नज़रन्दाज़ कतई नहीं किया जाना चाहिए। 

“हमें सिवाय ऐसे बुद्धिजीवियों के और किसी बुद्धिजीवी की आवश्यकता नहीं है, जो कि वर्ग संघर्ष द्वारा अनिवार्य बनाये गये अनुशासन के अधीन रहने के लिए सक्षम और इच्छुक हों। जो ऐसा नहीं कर सकता वह एक शानदार आदमी हो सकता है, या यहाँ तक कि एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक भी हो सकता है; लेकिन एक समाजवादी के तौर पर उसका कोई मूल्य नहीं है। ऐसे व्यक्ति को संगठन के बाहर अपने आदर्श की तलाश करनी चाहिए।” 

(काउत्‍स्‍की, उपरोक्त सन्दर्भ) 

काउत्‍स्‍की के उपरोक्त विचार उस दौर के हैं, जबकि अभी वे एक मार्क्सवादी थे। इस दौर में अभिव्यक्त ये विचार आज भी बेहद-बेहद प्रासंगिक हैं। 

सभी जनपक्षधर मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों को काउत्‍स्‍की के उपरोक्त दोनों लेख अवश्य पढ़ने चाहिए, क्योंकि ये लेख ठीक उस दुखती नब्ज़ पर हाथ रखते हैं, जो कि सभी मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों की समस्या होती है। 

पोस्ट ख़त्म करने से पहले मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों की ही एक अन्य प्रवृत्ति पर टिप्पणी यहाँ वांछित होगी।

फ़र्ज़ करिये कि उपरोक्त शब्द स्तालिन के होते, या माओ के होते, तो मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के मस्तिष्क में ये अलग प्रकार की रासायनिक प्रतिक्रिया को जन्म‍ देते! लेकिन यदि ये शब्द काउत्‍स्‍की के या (उससे कम हद तक!) लेनिन के हों, तो यह अलग प्रकार की रासायनिक प्रतिक्रिया को जन्म देंगे! क्या बात की जा रही है की बजाय इस पर (भी) ध्यान देना कि बात कर कौन रहा है, यह भी मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों की एक ख़ासियत होती है। ठीक उसी प्रकार उद्धरणों के पूरे सन्दर्भ को समझे बग़ैर अपनी सहूलियत के अनुसार महान शिक्षकों के उद्धरणों को पेश करना, अनुमोदन करते हुए या नकारते हुए, यह भी मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों की एक आम आदत होती है। 

निश्चित तौर पर, क्रान्ति को आज जनपक्षधर मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों की भी आवश्यकता है। उपरोक्त बातों का यह अर्थ नहीं है कि क्रान्ति बिना उनकी भूमिका के सम्भ्व होगी। लेकिन साथ ही पार्टी मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों को साथ लेने में अपने उसूलों को तिलां‍जलि नहीं देती है। वह हरेक ऐसे मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी को पार्टी के उसूलों और अनुशासन पर कसती है और जो बुद्धिजीवी इस अनुशासन को पूरे दिल से स्वीकारते हैं और पार्टी के भीतर और बाहर आम जनसमुदायों से, ऊँचाई से नहीं बल्कि बराबरी के साथ, एकरूप होने को तैयार होते हैं, वे ही आने वाली समाजवादी क्रान्तियों में अपनी शानदार भूमिका निभा सकते हैं, जो कि उनके जीवन को भी सफल बनाएगी, उन्हें  बौनेपन, निराशा, हताशा, डिप्रेशन और लक्ष्यहीनता से बाहर निकालेगी।

-- Abhinav Sinha


Friday, September 17, 2021


जिस समाज में तुम रहते हो

यदि तुम उसकी एक शक्ति हो

जैसे सरिता की अगणित लहरों में

कोई एक लहर हो

तो अच्छा है.

जिस समाज में तुम रहते हो

यदि तुम उसकी सदा सुनिश्चित

अनुपेक्षित आवश्यकता हो

जैसे किसी मशीन में लगे बहु कल-पुर्जों में

कोई भी कल-पुर्जा हो

तो अच्छा है.

जिस समाज में तुम रहते हो

यदि उसकी करुणा ही करुणा

तुम को यह जीवन देती है

जैसे दुर्निवार निर्धनता

बिल्कुल टूटा-फूटा बर्तन घर किसान के रक्खे रहती

तो यह जीवन की भाषा में

तिरस्कार से पूर्ण मरण है.

जिस समाज में तुम रहते हो

यदि तुम उसकी एक शक्ति हो

उसकी ललकारों में से ललकार एक हो

उसकी अमित भुजाओं में दो भुजा तुम्हारी

चरणों में दो चरण तुम्हारे

आँखों में दो आँख तुम्हारी

तो निश्चय समाज-जीवन के तुम प्रतीक हो

निश्चय ही जीवन, चिर जीवन !

 -- त्रिलोचन

Thursday, September 16, 2021


हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है

तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल

जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन

हमारी जेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा

कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी

तो किस उम्मीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है

बना है शाह का मुसाहिब फिरे है इतराता

वगर्ना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है

-- मिर्ज़ा ग़ालिब

Saturday, September 11, 2021

व्यवहार में विनम्रता सहृदय और जनवादी होने की बुनियादी निशानी है। लेकिन विचारों और आलोचना में विनम्रता छल है, मक्कारी है, धूर्त किस्म की समझौतापरस्ती है। 

सभी सच्चे और ईमानदार लोग खरी बातों और आलोचनाओं का तहेदिल से स्वागत करते हैं।

गुटबाज़, व्यक्तिवादी, घमण्डी और कैरियरवादी छद्म-विद्वान वस्तुपरक वैज्ञानिक आलोचना को भी अपने ऊपर हमले के रूप में लेते हैं। आप अगर कोई ऐसी तर्कसंगत, विज्ञानसम्मत बात कहें जो उनके हितों या पूर्वाग्रहों के विपरीत हो तो वे आपको गाली देने लगते हैं, आपके ख़िलाफ़ गुटबाज़ी, कुत्साप्रचार और घटिया लोगों के साथ मिलकर षड्यंत्र करने लग जाते हैं, या फिर पूआ जैसा गाल फुलाकर कोने में मुँह करके बैठ जाते हैं।

ठकुरसुहाती बतियाने और पसंद करने वाले लोग परले दर्जे के कूपमंडूक और तर्कणा-विरोधी लोग होते हैं।

 बौद्धिक, तार्किक और प्रबुद्ध माहौल बनाने की कोई कोशिश जब भी कभी शुरू होती है, उसके ख़िलाफ़ तमाम कुण्ठित कूपमण्डूकों, अकर्मण्य परजीवियों और टुच्चे प्राणियों का गुप्त या अघोषित संयुक्त मोर्चा तुरंत बन जाता है। ऐसे लोग कृतघ्न तो होते ही हैं, कुत्ते की पूँछ की तरह होते हैं जो दस बरस नली में रखने पर भी सीधी नहीं होती।

11 Sept 2021

Friday, September 03, 2021

एक वृक्ष की त्रासद जीवन-गाथा

 



 एक वृक्ष की त्रासद जीवन-गाथा 

(दिवंगत कामरेड रामनाथ की स्‍मृति में ) 

....

सदानीरा उस नदी के किनारे 

फलदार वृक्षों से भरे हुए 

जंगल जैसे घने उस बागीचे ने 

कभी जीवन के कलरव से 

गुलज़ार दिन देखे थे – 

घने साये तले सुस्‍ताते मज़दूर , 

फूस की झोपड़‍ियों की छान्‍ही छाते लोग , 

कुछ घुमन्‍तू दस्‍तकारों के तम्‍बुओं से 

तरह-तरह के औज़ार बनाने की प्रक्रि‍या से 

जन्‍मी आवाज़ें और बच्‍चों और स्त्रियों की आवाज़ें 

और हुक्‍कों और चूल्‍हों से उठता धुऑं 

और ऊपर पत्‍तों के बीच 

रंग-बिरंगे पक्षियों का शोर... …

वहॉं ध्‍वनियों और रंगों और ऋतुओं और 

रोशनी और अँधेरे और आकृतियों और परछाइयों 

और गर्मी और ठण्‍डक और नमी और शुष्‍कता की 

एक भरी-पूरी दुनिया 

आबाद हुआ करती थी। 

मार्च-अप्रैल के महीनों में पूरे माहौल में 

आम्र मंजरियों और महुआ के फूलों की 

मादक गमक भरी रहती थी 

और गर्मियों में नदी पर झुके हुए 

आम और जामुन के पेड़ नदी में 

अपने कुछ फल गिराते रहते थे 

और पेड़ों की ऊँची डालियों से 

बच्‍चे शोर मचाते हुए 

उफनती लहरों में छलॉंग लगाते रहते थे। 

फिर गुज़रे क़रीब तीस-पैंतीस वर्षों के दौरान 

पर्यावरण कुछ ऐसा बदला कि 

नदी अपना पाट बदलकर 

बाग से दूर होकर बहने लगी। 

ज्‍़यादातर बूढ़े वृक्ष निर्जीव काठ हो गये 

शुष्‍क, पत्रहीन। 

कुछ के तनों को दीमकों ने खोखला कर दिया 

और कुछ को मिट्टी के ढूहों में बदल दिया। 

लोग अब यहॉं अड्डे नहीं जमाते थे, 

ख़ानाबदोशों की टोलियॉं 

इधर का रुख नहीं करती थीं 

और बच्‍चे तो जैसे इस ओर आने का 

रास्‍ता ही भूल चुके थे। 

उस निचाट उजाड़ में खड़ा रह गया था 

बरगद जैसा विशाल 

देसी आम का एक बूढ़ा पेड़, 

हर ऑंधी जिसकी कुछ डालियों को 

बेरहमी से तोड़ जाती थी 

और कुछ डालियॉं खुद ही सूखती चली जाती थीं। 

आसपास के गॉंवों के सयाने 

इस पेड़ को भुतहा बताने लगे थे। 

उम्रदराज़ पेड़ की जिजीविषा बसन्‍त ऋतु में 

कुछ बौर तो पैदा करती थी 

लेकिन टिकोरों के जन्‍म से पहले ही 

वे मधुआ कर झड़ जाया करते थे। 

उदास, एकाकी उस पेड़ के आसपास 

अब नहीं थे पुराने साथी-संघाती पेड़। 

बस आसपास कुछ बौनी, कँटीली, फूल-फलहीन, 

मनहूस और ज़हरीली झाड़‍ियॉं थीं। 

कुछ कोटरों में काहिल, बौद्धि‍कों से दीखते 

उल्‍लुओं के बसेरे थे। 

अक्‍सर पास की फ़ैक्‍ट्री के पीछे के नाले से निकलने वाला 

अपशिष्‍ट पीकर, नशे में सुस्‍त पड़े, 

झड़े हुए रोंओं वाले कुछ मरियल बन्‍दर भी 

उस बेरंग सन्‍नाटे में यहॉं-वहॉं 

लेटे मिल जाते थे। 

बस एक कठफोड़वा था 

जो बीच-बीच में आकर 

गतयौवन महाकाय वृक्ष की सूखती काया पर 

अपनी कठोर तीखी चोंच से 

ठक्-ठक् की चोट करता रहता था। 

चीज़ों की आन्‍तरिक गति ही 

अन्‍तत: होती है निर्णायक। 

सोचना तो उस एकाकी वृक्ष को भी था 

कि नदी उस बाग से दूर क्‍यों होती गयी 

जिसका वह सबसे पुराना निवासी था! 

क्‍यों छूटते गये उसके पुराने मित्र वृक्ष 

और तमाम जीवनोपयोगी वनस्‍पतियों की जगह 

कहॉं से उग आये ज़हरीले-कँटीले झाड़-झंखाड़ 

सॉंपों-बिच्‍छुओं से भरे हुए! 

लेकिन अपनी निजी क्षमता और अनुभव पर 

अतिआत्‍मविश्‍वास भी कई बार 

एक ऐसा मायाजाल रचता है 

कि आलोचनात्‍मक विवेक की क्षमता 

छीजती चली जाती है 

और चीज़ों को रास्‍ते पर लाने की सम्‍भावना 

रीतती चली जाती है। 

ऐसी ही कुछ त्रासदी घटित हुई 

उस अनुभवसम्‍पन्‍न वृक्ष के साथ भी। 

मरने से पहले उस वृक्ष ने 

पुराने दिनों को और गर्म दिलों की संगत को 

चिलचिलाती धूप में 

कॉंपते-थरथराते-झिलमिलाते भूदृश्‍य की तरह 

याद करते हुए 

नदी की लहरों को,  हरीतिमा को, 

पुरवा हवाओं की नमी को 

भरे गले से, कमज़ोर पड़ती आवाज़ में 

पुकारने की कोशिश की 

जो बेरहम कठफोड़वे की ठक्-ठक् और 

तेज़ हवा में झरझराती-खड़खड़ाती 

झाडि़यों के शोर में खो गयी। 

बूढ़ा वृक्ष यह देख नहीं पाया कि उसकी 

बची-खुची उम्‍मीदें ऐन उसके नीचे की 

मिट्टी में फैलती चली गयी थीं 

उससे जीवन-द्रव्‍य का रस और 

पुरखों की विरासत के खनिज लेकर 

और उसकी युयुत्‍सा जगह-जगह 

धरती की छाती फोड़कर पौधों की शक़्ल में 

उगने की कोशिश कर रही थी। 

उसकी कुछ जड़ें 

भूमिगत सुरंगों से होकर गुज़रते 

छापामारों की तरह लगातार 

नदी की ओर बढ़ती जा रही थीं। 

वे युवा वृक्षों के एक जंगल को 

जन्‍म देना चाहती थीं 

और नदी को खींचकर 

फिर से वापस लाना चाहती थीं। 

मृत्‍यु से जूझता वह वृद्ध वृक्ष 

नहीं देख सका सतह के नीचे का सच ,

नहीं भॉंप सका आगत की आहटें। 

उसे लगा कि उसकी पुकारें अब निरर्थक हैं, 

व्‍यर्थ है प्रतीक्षा अब  

नदी और हरीतिमा और पुरवा हवाओं की 

वापसी की। 

फि‍र उसने सॉंसों की टूटती डोर को 

थामने की कोशिश छोड़ दी, 

बिना यह जाने कि 

धरती के नीचे फैलती उसकी जड़ों में 

संचित जीवन की तरलता और हरीतिमा 

आने वाले दिनों में 

अनगिन युवा, जिजीविषु और युयुत्‍सु पेड़ों के 

एक भरे-पूरे जंगल को 

जन्‍म दे सकती हैं।

-- शशि प्रकाश (1 स‍ितम्‍बर 2021)

Tuesday, August 24, 2021

 


परिभाषित करने का मतलब होता है सीमाओं में बाँध देना! 

-- ऑस्कर वाइल्ड

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एक लेखक का दिल, एक कवि का दिल, एक कलाकार का दिल, एक संगीतकार का दिल हमेशा टूटा हुआ दिल होता है। उसी टूटी हुई खिड़की से हम दुनिया को देखते हैं।

-- एलिस वॉकर

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मनुष्य   का ज्ञान व्यवहार की कसौटी के जरिये छलांग भर कर एक नयी मंजिल पर पहुँच जाता है | यह छलांग पहले की छलांग से और ज्यादा महत्वपूर्ण होती है | क्योंकि सिर्फ यही  छलांग ज्ञानप्राप्ति की पहली छलांग  अर्थात वस्तुगत  बाहय जगत को प्रतिबिम्बित करने के दौरान बनने वाले विचारों , सिद्धान्तों , नीतियों , योजनाओं अथवा उपायों के सही होने अथवा गलत होने को साबित करती है | सच्चाई को परखने का दूसरा कोई तरीका नहीं है | यही नहीं , दुनिया का ज्ञान प्राप्त करने का सर्वहारा वर्ग का एकमात्र उद्देश्य है उसे बदल डालना | अक्सर सही ज्ञान की प्राप्ति केवल पदार्थ से चेतना की तरफ जाने और फिर चेतना से पदार्थ की तरफ लौटने की प्रक्रिया को , अर्थात व्यवहार से ज्ञान की तरफ जाने और फिर ज्ञान से व्यवहार की तरफ लौट आने की प्रक्रिया को बार-बार दुहराने से ही होती है | यही मार्क्सवाद का ज्ञान-सिद्धान्त है , द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का ज्ञान-सिद्धान्त है |

---माओ त्से-तुंग  ( सही विचार कहाँ से आते हैं ? )

Monday, August 23, 2021

शोपेन का नग़मा बजता है


शोपेन का नग़मा बजता है

छलनी है अँधेरे का सीना, बरखा के भाले बरसे हैं

दीवारों के आँसू हैं रवां, घर ख़ामोशी में डूबे हैं

पानी में नहाये हैं बूटे,

गलियों में हू का फेरा है

शोपेन का नग़मा बजता है

इक ग़मगीं लड़की के चेहरे पर चाँद की ज़र्दी छाई है

जो बर्फ़ गिरी थी इस पे लहू के छींटों की रुशनाई है

ख़ूं का हर दाग़ दमकता है

शोपेन का नग़मा बजता है

कुछ आज़ादी के मतवाले, जां कफ़ पे लिये मैदां में गये

हर सू दुश्मन का नरग़ा था, कुछ बच निकले, कुछ खेत रहे

आलम में उनका शोहरा है

शोपेन का नग़मा बजता है

इक कूंज को सखियाँ छोड़ गईं आकाश की नीली राहों में

वो याद में तनहा रोती थी, लिपटाये अपनी बाँहों में

इक शाहीं उस पर झपटा है

शोपेन का नग़मा बजता है

ग़म ने साँचे में ढाला है

इक बाप के पत्थर चेहरे को

मुर्दा बेटे के माथे को

इक मां ने रोकर चूमा है

शोपेन का नग़मा बजता है

फिर फूलों की रुत लौट आई

और चाहने वालों की गर्दन में झूले डाले बाँहों ने

फिर झरने नाचे छन छन छन

अब बादल है न बरखा है

शोपेन का नग़मा बजता है

 --- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

यह पागल समुद्रों की आवाज़ थी,

एक प्रचण्ड दहाड़,

जिसने तुम्हारे बच्चे का हृदय

चकनाचूर कर दिया, जो बहुत 

मानवीय था

और बहुत नरम।

-- आर्थर रिम्बो

 (From 'Ophelia', in  "Selected Poems and Letters".Translated by Jeremy Harding and John Sturrock.)

Sunday, August 22, 2021

 

जो भी व्यक्ति शोर की जगह संगीत चाहता है, दिलबहलाव की जगह उल्लास चाहता है, सोना की जगह अंतरात्मा चाहता है, कारोबार की जगह सृजनात्मक काम चाहता है,  मूर्खता की जगह जोशो-जुनून चाहता है, उसके लिए हमारी इस क्षुद्रता भरी, घिसी-पिटी दुनिया में कोई जगह नहीं होती।

-- हरमन हेस्से (1877-1962)

( जर्मन-स्विस कवि, उपन्यासकार, चित्रकार)


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इंद्रधनुष का अंत कहाँ होता है,

तुम्हारी आत्मा में या क्षितिज पर?

--पाब्लो नेरूदा, 'सवालों की किताब'

Friday, August 20, 2021

त्रिलोचन की कविताएँ...

 


पथ पर चलते रहो निरंतर 

पथ पर

चलते रहो निरन्तर

सूनापन हो

या निर्जन हो

पथ पुकारता है

गत-स्वन हो

पथिक,

चरण-ध्वनि से

दो उत्तर

पथ पर

चलते रहो निरन्तर 

*

चोट जभी लगती है

तभी हँस देता हूँ

देखने वालों की आँखें

उस हालत में

देखा ही करती हैं

आँसू नहीं लाती हैं

और

जब पीड़ा बढ़ जाती है

बेहिसाब

तब

जाने-अनजाने लोगों में

जाता हूँकी

उनका हो जाता हूँ

हँसता हँसाता हूँ 

--- त्रिलोचन

Wednesday, August 18, 2021


हम साम्राज्यवाद के जितने विरोधी हैं, उतने ही उत्कट विरोधी हर प्रकार के धार्मिक कट्टरपंथ के भी हैं। हर धार्मिक कट्टरपंथ आम मेहनतकश अवाम का और स्त्रियों का घनघोर शत्रु होता है। 

एक सच्चे सेक्युलर के रूप में हम दृढ़ता से मानते हैं कि धर्म निजी विश्वास की चीज़ है और राजनीतिक-सार्वजनिक जीवन में उसकी कोई दख़लंदाज़ी नहीं होनी चाहिए। हम भारत में कथित "हिन्दू राज" का शंख और घंटा-घड़ियाल बजाने वाले बहुसंख्यावादी कट्टरपंथी फ़ासिज़्म के विरोधी हैं, तो 'इस्लामी अमीरात' और शेखों-शाहों-मुल्लों की सभी तरह की धुर-प्रतिक्रियावादी हुकूमतों के भी विरोधी हैं।

जो भारत में संघी फ़ासिस्टों का विरोध करते हैं और अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानी 'इस्लामी अमीरात' की स्थापना का स्वागत करते हैं, वे दोमुंँहे लोग हैं। उनसे हमारा कोई साथ मुमकिन नहीं। 

किसी भी धार्मिक कट्टरपंथ का मुकाबला दूसरे धार्मिक कट्टरपंथ से नहीं किया जा सकता। हर धार्मिक कट्टरपंथ दूसरे धार्मिक कट्टरपंथ को मज़बूत बनाने का ही काम करता है। किसी भी देश के उत्पीड़ित धार्मिक अल्पसंख्यक एक सच्ची सेक्युलर लोकसत्ता के लिए लड़कर ही अपनी मुक्ति हासिल कर सकते हैं। धर्म के झंडे तले संगठित होकर वे बहुसंख्यावादी धार्मिक कट्टरपंथी लहर के कहर से मुक्त नहीं होंगे बल्कि उसे और मज़बूत बनायेंगे।

यह धर्मयुद्धों का युग नहीं है। और जो धर्मयुद्धों का युग था, वह भी मध्ययुगीन शासकों की आपसी लड़ाई का ही युग था। दो पाटों के बीच अंततः पिसती आम मेहनतक़श जनता ही थी। 

आज की दुनिया में सभी प्रकार के धार्मिक कट्टरपंथ आम अवाम को मध्ययुगीन प्रतिगामी धार्मिक यूटोपिया में फँसाकर उसे साम्राज्यवाद और पूँजीवाद का चारा बनाते हैं  तथा,  वास्तविक मुक्ति के क्रान्तिकारी संघर्ष से दूर करके उसकी गुलामी की बेड़ियों को मज़बूत बनाने का काम करते हैं।

अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना की विदाई के साथ ही, न केवल वहाँ, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में अंतर-साम्राज्यवादी होड़ (मुख्यतयाअमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिम खेमे और चीन-रूस की उभरती नयी सामराजी धुरी के बीच), तथा, साम्राज्यवादी धड़ों और इस क्षेत्र के सभी छोटे-बड़े देशों के बुर्जुआ शासकों के बीच नये समीकरणों (टकरावों और सहकारों) का नया दौर शुरू होगा। इस क्षेत्र के सभी देशों में व्यवस्था के गहराते संकट के साथ और बुर्जुआ सत्ताओं की बढ़ती निरंकुशता तथा फासिस्ट उभारों के साथ, आंतरिक वर्ग-संघर्ष की स्थितियाँ भी तेज़ी से विकसित होंगी। खाड़ी क्षेत्र और समूचे अरब इलाके के साथ ही अब दक्षिण एशिया और फिर मध्य एशिया में भी अन्तर-साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा और इस इलाके के देशों के आंतरिक वर्ग-संघर्ष तीखे हो जायेंगे तथा एक-दूसरे से गुँथ-बुन जायेंगे। पूंँजीवादी विश्व के आर्थिक संकट के राजनीतिक संकट में ढलने और तीखे होते बहुस्तरीय टकरावों का एक बड़ा रंगमंच अब पश्चिम एशिया, दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के देशों को जोड़ते हुए तैयार हो रहा है।

 ऐसे ही रंगमंच पर, राख से फ़ीनिक्स पक्षी की तरह उठकर क्रान्तिकारी शक्तियाँ भी अपनी प्रभावी भूमिका निभायें, व्यवस्थागत संकट एक क्रान्तिकारी संकट में बदल जाये और फिर कई देशों में क्रान्तिकारी विस्फोट की स्थिति उत्पन्न हो जाये, इस बात की भी प्रचुर संभावना है।

आखिरकार, दुनिया को यहीं रुके तो रहना नहीं है! यह 'इतिहास का अंत' नहीं है, यह तो फ्रांसिस फूकोयामा भी मान चुके हैं। इक्कीसवीं सदी में विकल्पहीनता, प्रतिगामी उभारों और भ्रमोत्पादक तरल परिस्थितियों के इस अँधेरे के उस पार, बहुत मुमकिन है, एशिया का नया जागरण प्रतीक्षा कर रहा हो!

 इतिहास कई बार कुछ दशकों, या शताब्दी तक के समय के लिए, ठहर सा जाता है, थोड़ा पीछे भी लौट जाता है, लेकिन अंततः उसे आगे ही जाना होता है!

18 Aug 2021


Tuesday, August 17, 2021

हम पिछड़े समाजों के अँधेरों से आये हुए लोग ज़्यादातर मामलों में किफ़ायतशारी बरतते हैं, लेकिन ज़िन्दगी के मामले में काफ़ी फ़िज़ूलख़र्च होते हैं। जबतक होश आता है, तबतक ढेर सारी ज़िन्दगी यूँ ही ख़र्च हो चुकी होती है!

17 Aug 2021


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कुछ लोग सोचते हैं कि समय भी घड़ी की सुइयों की तरह गोल-गोल घूमता रहता है!

22 Aug 2021



समन्दर की लहरें ज्वार बनने के लिए

पूरनमासी के चाँद का इन्तज़ार करती हैं

और चाँद कभी भी वायदाख़िलाफ़ी नहीं करता।

ज़िन्दगी में ऐसा नहीं होता।

कई बार यहाँ चाँद आने में देर कर देता है

और जब आता है तो इन्तज़ार करती लहरें 

 थककर सो चुकी होती हैं। 

कई बार ऊबकर लहरें चाँद की राह तकना

छोड़ देती हैं और आवारा हवाओं के सहारे

समुद्री तूफ़ान बनने की कोशिश करती हुई

दिशाहीन बिखर जाती हैं।

ज़िन्दगी के तूफ़ानों को ध्वंस और निर्माण की 

सटीक योजना के साथ आना होता है।

उन्हें कई-कई नाकामयाबियों के बीच से

कामयाबी की राह बनानी होती है।

उनका कोई पंचांग नहीं होता

न ही कोई समय-सारणी!

फिर भी उन्हें आना ही होता है

ज़िन्दगी में सुन्दर-सार्थक बदलाव की खातिर।

ज़िन्दगी के तूफ़ानों का निर्माण चाँद को ख़ुद

ज़िन्दगी की उमड़ती-घुमड़ती लहरों के

 भीतर से करना होता है

जीवन की गतिकी की सटीक समझदारी के आधार पर!

17 Aug 2021


मातृभूमि की सत्य कल्पित महिमा के गीत सभी जातियों मे गाये जाते है। ध्रुव प्रदेश का निवासी जो दस फिट बर्फ़ खोदकर एक मछली निकालकर खाता है , वह भी गाता है कि धन्य है मेरा देश ! यह पृथ्वी पर स्वर्ग है ! और रेगिस्तान का आदमी , जो ऊँट का पेट चीरकर पानी निकालकर पीता है , वह भी गाता है कि बलिहारी है इस देश की ! जब आदमी ऐसे गीत गाकर मगन हो जाता है तब नेताओं का काम आसान हो जाता है। वे उसे सिखाते हैं -- 'अब कहो कि मैं इस स्वर्गोपम मातृभूमि के लिए शीश कटा दूँगा ।' बस इसके बाद लोग गीत गाते हुए भूखों भी मर लेंगे और युद्ध छेड़ दो तो सिर कटाने भी पहुँच जायेंगे ।

-- हरिशंकर परसाई

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धरती के पास संगीत उनके लिए है जो सुनते हैं।

-- विलियम शेक्सपियर