Monday, February 17, 2025

भगदड़

 (कविता के रूप में न स्वीकारना चाहें तो इस एक कवितानुमा बयान, या एक गद्यगीत या एक राजनीतिक विचार-कविता के रूप में पढ़ सकते हैं) 


भगदड़ हमारे समय का राष्ट्रीय रूपक है। 

कुम्भ मेले में भगदड़

स्टेशनों पर भगदड़

सड़कों पर भगदड़

सपनों में भगदड़

विचारों में भगदड़

कला और साहित्य में भगदड़

बाज़ार में भगदड़

शेयर मार्केट में भगदड़... 

भगदड़ एक राष्ट्रीय और वैश्विक परिघटना है। 

भगदड़ एक भेड़िया है जो कभी

मनुष्य का शिकार करती है तो कभी मनुष्यता का। 

*

अराजकता अन्तर्निहित अभिलाक्षणिकता है

माल-उत्पादन की प्रणाली की। 

संकट जब बढ़ता है 

मुनाफ़े की दर के गिरने की आम प्रवृत्ति के कारण

और मन्दी गहराती है तो भगदड़ मच जाती है

भूमण्डलीय बाज़ार में। 

भगदड़ मच जाती है तब समाज में, सड़कों पर 

जब सबसे ऊपर बैठे हुए लोग पूँजीवादी

संकट का विकट बोझ डाल देते हैं

नीचे के लोगों पर। 

लोग भागते हैं सड़कों पर 

पाँच किलो अनाज, या बेहद छोटी-छोटी चीज़ों, 

या कुछ बुनियादी ज़रूरतों, 

या अपने दुखों से मुक्ति, 

या मोक्ष-प्राप्ति के लिए

अपने जैसे ही लोगों को कुचलते हुए

और जो सबसे कमज़ोर होते हैं

वही सबसे पहले मौत का निवाला बनते हैं। 

जब संकट के दीर्घायु दौर जारी रहते हैं

तो सत्ता के शीर्ष पर जा बिराजते हैं

आधुनिक बर्बर

चाहे वे फ़ासिस्ट हों या निरंकुश स्वेच्छाचारी,

चाहे वे जनवाद का मुखौटा भर लगाये रहें

या चाहे उसे भी उतार फेंकें। 

ये आधुनिक बर्बर सुव्यवस्थित ढंग से पैदा करते हैं

सड़कों पर अव्यवस्था

और इनकी सुचिन्तित नीतियांँ 

सड़कों पर, जीवन में, नानाविध रूपों में

भगदड़ को जन्म देती हैं। 

*

जैसे शान्त, सुसज्जित, भव्य मंत्रणा कक्षों में

होने वाले कारोबारी सौदों से

सड़कों पर आतंक और मौत का खेल 

खेलने वाली बर्बरता का जन्म होता है, 

उसीतरह योजनाबद्ध ढंग से निर्मित नीतियाँ

सड़कों पर जानलेवा भगदड़ को जन्म देती हैं। 

निराशा और दिशाहीनता के नये-नये आधुनिक

और उत्तर-आधुनिक विचारों के साथ ही

पुरानी मूर्खताएँ भी उन्नततम संचार-माध्यमों पर सवार

दिग-दिगंत की यात्रा करती रहती हैं। 

नये नशों के साथ पुराने नशे भी

बिकते रहते हैं नये चलन के खाद्य पदार्थों में मिलाकर

आकर्षक पैकिंग में लपेटकर। 

कथित धर्मनिरपेक्षता के साम्राज्य में

आला अदालत का जज ईश्वर के परामर्श से

कथित विवादित पूजास्थल के बारे में

फ़ैसला सुनाता है

बहुसंख्यक धार्मिक आबादी के पक्ष में

और एक धार्मिक मेले के प्रचार में

कथित धर्मनिरपेक्ष राज्य मशीनरी अरबों-खरबों रुपये झोंक देती है। 

ऊपर जो नीतियांँ बनती हैं व्यवस्थित ढंग से

वही कई बार सड़कों पर जनसंहारकारी

भगदड़ों को जन्म देती हैं

और हत्यारे कहीं नज़र नहीं आते

और बहुत सारे चतुर सुजान अपने सुरक्षित घरों में बैठे

जनता को ही दोषी ठहरा देते हैं कि

वही अपनी रूढ़िवादी मूर्खता के चलते

आत्मघात के रास्ते पर चल पड़ती है। 

अपने हरावल के नेतृत्व में ही जनता

करती है इतिहास का निर्माण

और क्रान्तिकारी वैज्ञानिक चेतना

उसके भीतर से स्वत: नहीं पैदा होती

बल्कि बाहर से डाली जाती है। 

बेशक़ जनता की पिछड़ी चेतना की भी

की जानी चाहिए मित्रतापूर्ण आलोचना

लेकिन जनता इस आलोचना पर तभी कान देगी

जब आलोचना करने वाला उसका भरोसेमंद साथी हो, 

उसकी लड़ाइयों का सहभागी हो। 

उसी शिक्षक से सीखता है विद्यार्थी

जो ख़ुद सीखता है उनसे जिन्हें सिखाता है, 

जो बोलने से पहले सुनता है

और सिखायी हुई चीज़ों को अमल में

लाने के दौरान भी साथ खड़ा रहता है। 

*

तो भगदड़ में मरने वाली जनता को

उसकी पिछड़ी चेतना और धार्मिक कूपमण्डूकता के लिए

कोसने वाले वैज्ञानिक चेतना वाले बुद्धिजीवियों से

यह सवाल तो बनता ही है

कि तुम जिन चीज़ों को जानने का दावा करते हो

उसे जनता को बताने के लिए

अबतक तुमने क्या किया, 

कितना रहे और लड़े आम लोगों के साथ, 

जीवन क्या जिया? 

लेकिन उससे भी पहले सवाल यह भी किया जा सकता है कि

क्या वास्तव में चीज़ों को जानते हो तुम भी

या मुग़ालते में जीते हो? 

क्या आभासी सतह को भेदकर

सारभूत सत्य तक पहुँच है तुम्हारी

या बस यूँ ही चुबलाते और उगलते रहते हो

जुमले और मुहावरे भारी-भारी? 

**

(17 Feb 2025)

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