ऐतिहासिक ऋतुओं से होकर यात्रा करते हुए
सितम्बर के महीने में
दिल शमशेर बहादुर सिंह हो जाता था
और स्मृति निराला I
अक्टूबर के साथ होना गद्यात्मक होना होता था
विष्णु खरे सरीखा I
नवम्बर में कोलाहल दिशाहीन
इक्कीसवीं सदी के नये कवियों सा और
दिसम्बर जैसे कोलकाता की सड़कों पर
कोहरे से भरी किसी सुबह
भीड़ में खोये हुए जीवनानंद दास I
जनवरी तो फिर भी
एक दुर्गम द्वंद्वात्मक संभावना हुआ करती थी
गजानन माधव मुक्तिबोध की तरह I
*
अगर आप लगातार ऋतुओं के बीच से
गुज़रते हुए यात्रा करते रहते हैं
तो बीतकर भी बीतते नहीं
उद्दाम रूमानियत भरे प्यार के दिन I
कभी उदासी,
कभी उम्मीद,
कभी सपने
और कभी कविता बन आते रहते हैं
फ़ासिस्ट अँधेरे के दौर में भी I
अगर आप हथियार नहीं डालते हैं
तो अप्रत्याशित कुछ सुखद भी
घटित होता ही रहता है
अपार कठिनाइयों के बीच I
जैसे एक लंबी यात्रा के बाद
देर रात गये
आप उतरते हैं
पहाड़ों की तलहटी के किसी
रेलवे स्टेशन के सुनसान प्लेटफॉर्म पर
और वहाँ एक बेंच पर
अपनी डायरियों और प्रिय कवियों की
किताबों से भरा वह बैग
रखा हुआ पाते हैं
जो जून की गर्मियों में
ट्रेन के किसी भीड़ भरे डिब्बे में
छूट गया था
जब पानी पीने के लिए आप
किसी छोटे से स्टेशन पर उतर गये थे I
*
याद करने पर
शायद याद आ जाये कि आपके साथ भी
कभी ऐसा हुआ था लेकिन
तमाम कर्तव्यनिष्ठ नागरिकों की तरह
घर-गिरस्ती के चक्कर में
आप इसे भूल गये
जैसे कि अपने तमाम दायित्वों,
विचारों और सपनों को भूल गये
और यह भी भूल गये कि कभी
आप भी यायावरी, विद्रोह और
प्यार के बारे में सोचा करते थे I
दुविधाओं से उबरकर शायद आप
कुछ साहसिक और निर्णायक हो भी सकते थे,
लेकिन तभी इतिहास के अंत का
तुमुल कोलाहल उठा
और आप दुनिया के आम लोगों की दुर्दशा
और दु:खों पर विमर्श करते हुए
सुरक्षित, पुरस्कृत और प्रतिष्ठित
होने के रास्ते पर
आगे बढ़ गये I
**
(19 Sept 2022)

No comments:
Post a Comment