Thursday, August 05, 2021

हमारी नींद -- वीरेन डंगवाल


आज वीरेन डंगवाल का 74वाँ जन्मदिन है I 1970 के दशक में उभरी वाम-जनवादी कविता-धारा की नयी पीढ़ी में मंगलेश डबराल, पंकज सिंह और नीलाभ की ही तरह वीरेन डंगवाल ने भी अपनी अलग काव्य-भाषा विकसित की और सादगी का एक नया सौन्दर्यशास्त्र रचा ! आज अपनी-अपनी ढब के ये चारों कवि हमारे बीच नहीं हैं !

 वीरेन डंगवाल के व्यक्तित्व में जो निश्छलता, सहृदयता, फक्कड़मिज़ाजी, आकर्षक सादगी, ज़िंदगी से उद्दाम प्यार और भविष्य के प्रति अगाध विश्वास जैसे विरल मानवीय गुण थे, वही उनकी कविता के भी मूल संघटक अवयव थे ! वीरेन दा ने मद्धम गति से लिखा और कम लिखा और धीरे-धीरे अपनी कविता की ओर लोगों का ध्यान खींचा, क्योंकि उनकी कविता में कोई आलंकारिक चमक और चौंकाऊ बिम्ब नहीं होते थे I रोज़मर्रा की ज़िंदगी, जीवन की संरचना को उद्घाटित करती परिघटनाओं और भावनाओं से वह ऐसी कविताओं का वर्णक्रम तैयार करते थे, जो रोज़ बरती जाने वाली ज़रूरी चीज़ों की तरह आत्मीयता की आभा से भरी होती थीं ! 

बरसों जानलेवा कैंसर से जंग लड़ते हुए उन्होंने उद्दाम जिजीविषा और युयुत्सा का परिचय दिया लेकिन 28 सितम्बर,2015 को वह यह युद्ध हार गए और मात्र 68 वर्ष की आयु में इस दुनिया को विदा कह गए ! 

उनको याद करते हुए हम यहाँ उनकी एक कविता प्रस्तुत कर रहे हैं : 


हमारी नींद

-- वीरेन डंगवाल

मेरी नींद के दौरान 

कुछ इंच बढ़ गए पेड़ 

कुछ सूत पौधे 

अंकुर ने अपने नाम मात्र कोमल सींगों से 

धकेलना शुरू किया

बीज की फूली हुई 

छत, भीतर से। 

एक मक्खी का जीवन-क्रम पूरा हुआ 

कई शिशु पैदा हुए, और उनमें से 

कई तो मारे भी गए 

दंगे, आगज़नी और बमबारी में। 

ग़रीब बस्तियों में भी 

धमाके से हुआ देवी जागरण 

लाउडस्पीकर पर। 

याने साधन तो सभी जुटा लिए हैं अत्याचारियों ने 

मगर जीवन हठीला फिर भी 

बढ़ता ही जाता आगे 

हमारी नींद के बावजूद 

और लोग भी हैं, कई लोग हैं 

अब भी 

जो भूले नहीं करना 

साफ़ और मज़बूत 

इनकार।

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