सकूत-ए-शाम मिटाओ बहुत अँधेरा है
सकूत-ए-शाम मिटाओ बहुत अँधेरा है
सुख़न की शमा जलाओ बहुत अँधेरा है
दयार-ए-ग़म में दिल-ए-बेक़रार छूट गया
सम्भल के ढूँढ़ने जाओ बहुत अँधेरा है
ये रात वो के सूझे जहाँ न हाथ को हाथ
ख़यालो दूर न जाओ बहुत अँधेरा है
लटों को चेहरे पे डाले वो सो रहा है कहीं
ज़या-ए-रुख़ को चुराओ बहुत अँधेरा है
हवाए नीम शबी हों कि चादर-ए-अंजुम
नक़आब रुख़ से उठाओ बहुत अँधेरा है
शब-ए-सियाह में गुम हो गई है राह-ए-हयात
क़दम सम्भल के उठाओ बहुत अँधेरा है
गुज़श्ता अह्द की यादों को फिर करो ताज़ा
बुझे चिराग़ जलाओ बहुत अँधेरा है
थी एक उचकती हुई नींद ज़िंदगी उसकी
'फ़िराक़' को न जगाओ बहुत अँधेरा है
********
ग़ज़ल का साज़ उठाओ बड़ी उदास है रात
ग़ज़ल का साज़ उठाओ बड़ी उदास है रात
नवा-ए-मीर सुनाओ बड़ी उदास है रात
नवा-ए-दर्द में इक ज़िंदगी तो होती है
नवा-ए-दर्द सुनाओ बड़ी उदास है रात
उदासियों के जो हमराज़-ओ-हमनफ़स थे कभी
उन्हें ना दिल से भुलाओ बड़ी उदास है रात
जो हो सके तो इधर की राह भूल पड़ो
सनमक़दे की हवाओं बड़ी उदास है रात
कहें न तुमसे तो फ़िर और किससे जाके कहें
सियाह ज़ुल्फ़ के सायों बड़ी उदास है रात
अभी तो ज़िक्र-ए-सहर दोस्तों है दूर की बात
अभी तो देखते जाओ बड़ी उदास है रात
दिये रहो यूं ही कुछ देर और हाथ में हाथ
अभी ना पास से जाओ बड़ी उदास है रात
सुना है पहले भी ऐसे में बुझ गये हैं चिराग़
दिलों की ख़ैर मनाओ बड़ी उदास है रात
समेट लो कि बड़े काम की है दौलत-ए-ग़म
इसे यूं ही न गंवाओ बड़ी उदास है रात
इसी खंडहर में कहीं कुछ दिये हैं टूटे हुए
इन्ही से काम चलाओ बड़ी उदास है रात
दोआतिशां न बना दे उसे नवा-ए-‘फ़िराक़’
ये साज़-ए-ग़म न सुनाओ बड़ी उदास है रात
********

No comments:
Post a Comment