राजभक्ति का एक वास्तविक खतरा यह होता है कि यह झुण्ड-सोच. अंध-राष्ट्रवाद (शॉविनिज्म), देशाहंकार (ज़िन्गोइज्म) की खास किस्मों से जुड़ जाती है और सामाजिक तौर पर इतने तरीकों से विध्वंसक हो जाती है, जितना कि कोई भी गुण भ्रष्ट होने के बाद नहीं हो पाता I राष्ट्रवाद और देशभक्ति के अन्दर पथभ्रष्ट अतिरेक का शिकार हो जाने की प्रवृत्ति विशेष तौर पर मौजूद रहती है !
-- जॉन क्लीनिग
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निराश होने के लिए समय नहीं है, चुप रहने की ज़रूरत नहीं है, भय की कोई गुंजाइश नहीं है I हम बोलते हैं, हम लिखते हैं, हम भाषा को बरतते हैं I इसतरह सभ्यताओं के जख्म भरते हैं !
-- टोनी मॉरिसन
(अफ्रो-अमेरिकन स्त्री-लेखक)
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अगर तुम सिर्फ़ तभी ऊँचे क़द के लगते हो क्योंकि कोई अपने घुटनों के बल खड़ा है, तो तुम्हारी समस्या गंभीर है I
-- टोनी मॉरिसन
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यदि कोई भौतिक शक्ति तुम्हारे पक्ष में नहीं खड़ी हो और कहीं भी कुछ बदलता न दीख रहा हो, न ही कुछ करना सम्भव दीख रहा हो, तो पूरी ताकत से, आवाज लगाओ। ... कभी-कभी पहाड़ों में महज़ एक ज़ोरदार आवाज़ से ही हिमस्खलन की शुरुआत हो जाती है।
-अज्ञात
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हालाँकि दुनिया उठ खड़ी हुई और उसने उस हरामज़ादे की नकेल कस दी, लेकिन उसे जनम देने वाली कुतिया अब फिर से गरमाई हुई है I
-- बेर्टोल्ट ब्रेष्ट
(ब्रेष्ट ने यह कहा था उन्नीस सौ पचास के दशक में कभी ! द्वितीय विश्वयुद्ध में फासिज्म को कुचल दिए जाने के बाद, तब अमेरिका में मैकार्थीवाद का समय चल रहा था, शीतयुद्ध शुरू हो चुका था और पश्चिमी दुनिया में यहाँ-वहाँ फासिस्ट प्रवृत्तियाँ फिर से सर उठाने लगी थीं I आज हम देख रहे हैं कि विश्व-पूँजीवाद की बूढ़ी कुतिया ने कई फासिस्ट पिल्ले जने हैं जो मरियल हैं पर बेहद खूँख्वार हैं ! इन हालात में ब्रेष्ट के इस उद्धरण का याद आ जाना स्वाभाविक है !)

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