Wednesday, August 14, 2019

एक था रंगा ! एक था बिल्ला !



मैं जर्मनी और इटली वाले रंगा-बिल्ला की बात कर रही हूँ जो 80-90 साल पहले धूमकेतु की तरह उभरे थे और लाशों की ढेरियों पर चढ़कर, गलियों में बहते लहू में अपने बूट छपछपाते हुए सत्ता के शिखर तक पहुँचे थे I

उन्होंने ढेरों अभेद्य जेलें बनवाईं, तहखाने-दर तहखाने वाले कत्लगाह, फाँसीघर और टार्चर चैम्बर I फिर उन्होंने पूरे मुल्क को ही जेलखाना बना दिया I

जो उनके बनाए साम्राज्य के नक्शे में रिहाइश के क़ाबिल नहीं था उसे गैस चैम्बर्स में गीली-सूखी लकड़ियों की तरह जला दिया गया I उनके आसपास सिर्फ़ जैकारा लगाते लोग थे, उनकी हर स्कीम को हर कीमत पर अंजाम देते लोग थे I मुल्क की सड़कों पर गश्त लगाती सेना-पुलिस थी, या उन्मादी बर्बरों की टोलियाँ थीं I

उनसे जो भी मिलता था, उन्हें महानों में महान बताता था I वे सोचते थे कि उनके सभी देशवासी उन्हें महानों में महान मानते हैं ! फिर वे चाहने लगे कि दुनिया के सभी देशों के सभी लोग उन्हें महानों में महान मानें ! इसके लिए उन्होंने चारों दिशाओं में अपनी फौजों के लश्कर दौड़ा दिए और इसतरह अपने ताक़त का इजहार किया !

रंगा हज़ार साल उम्र वाला साम्राज्य बनाना चाहता था और खुद को चिन्तक, कला-पारखी, लेखक -- सबकुछ मानता था, इतिहास का महानतम सेनापति और साम्राज्य-निर्माता तो मानता ही था I बिल्ला जब कला-संस्कृति की बात सुनता था तो उसका हाथ अपनी पिस्तौल के हत्थे पर खुद-ब-खुद चला जाता था और हर सोचने वाले दिमाग को वह खतरनाक मानता था और उसे हमेशा के लिए चुप कर देना चाहता था या जेल की अँधेरी कोठरी में उसे सड़ने के लिए छोड़ देना चाहता था !

क्या-क्या उन्होंने नहीं सोच रखा था, सिकंदर, चंगेज़ खान, कुबलाई खान, नेपोलियन वगैरह को पीछे छोड़ दुनिया का महानतम साम्राज्य-निर्माता बनने के लिए ! पर दो दहाइयों का समय भी नहीं बीता था कि रंगा को चारो ओर से घिरा हुआ बंकर में खुद को गोली मार लेनी पड़ी और बिल्ला को लोगों ने उसके दरबारियों सहित मारकर सड़कों पर घसीटा, उनकी लाशों पर पेशाब किया और फिर चौराहों पर उल्टा टांग दिया I

पिछले 70-80 वर्षों के दौरान, कई बार दुनिया के अलग-अलग देशों में पैदा हुए अलग-अलग साइज़ और औकात के रंगा और बिल्ला I उन्होंने भी अपनी औकात के हिसाब से अपना ताक़तवर साम्राज्य बनाने के बाबत सोचा, इसके लिए दंगे करवाए, खून की नदियाँ बहाईं, उन्माद की आँधी चलाई, खूँख्वार काले क़ानून बनाए, घपलों-घोटालों से भरे चुनाव करवाए, फर्जी मुठभेड़ें करवाईं, धार्मिक-नस्ली नफ़रत का सैलाब पैदा किया, लाशों की ढेरियाँ लगाईं और उनपर चढ़कर आसमान में रखे सिंहासनों तक पहुँचे I भक्तों के जुनूनी नारों, खरीदे गए कवियों की विरुदावलियों, टुकड़ों पर पालने वाले बौद्धिकों के लेखन और सड़कों पर छाये सन्नाटे को सभी बौने और मंझोले साइज़ के रंगा-बिल्ला अपनी अजेय ताक़त का प्रमाण मानते थे और होता यह था कि सिर्फ़ वे बोलते थे और लोग सुनते थे ! पर इनमें से किसी भी रंगा-बिल्ला का साम्राज्य मुश्किल से ही एक दशक का समय पार कर पाया ! इनमें से कुछ घसीटकर अपने ही बनवाये किसी जेल में ठूँस दिए गए, कुछ सड़कों पर कुत्तों की तरह मरे और कुछ भागकर सात समंदर पार अपने सरपरस्तों की दर पर जा पहुँचे, एक दयनीय किस्म की गुमनामी में ज़िल्लत और घुटन भरा अपना बुढ़ापा काटने के लिए I

इतिहास तो बार-बार आगाह करता है दुनिया के तमाम रंगाओं-बिल्लाओं को कि लाशों की ढेरियों, खून के चहबच्चों, जेलों, क़त्लगाहों, आतंक और सन्नाटे से भरे साम्राज्य कभी भी टिकाऊ नहीं होते और और एकछत्र हुकूमत करने से लाख गुना बेहतर होता है मनुष्य की तरह जीना और समस्त मानवीय चीज़ों को प्यार करना, पूँजी की सेवा करने से लाख गुना बेहतर होता है आम लोगों की सेवा करना, लेकिन हर रंगा-बिल्ला की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि वे इतिहास की आवाज़ पर कभी कान नहीं देते I

अगर कभी रंगा-बिल्ला की जोड़ी किसी देश में एक साथ पैदा हो जाये और आतंक, दमन और तबाही की अपनी सारी ताक़त का मुजाहिरा करे, तो भी उसका साम्राज्य हज़ार साल तो क्या, सौ साल तो क्या, पचास साल तो क्या, बीस साल भी बमुश्किल-तमाम नहीं चल सकता I इतिहास की यह अकाट्य, निरपवाद शिक्षा है I

लेकिन इतिहास की एक अकाट्य शिक्षा यह भी है कि कोई भी रंगा-बिल्ला इतिहास से कभी कोई सबक नहीं सीखता और इतिहास के हाथों कठोरतम दंड पाना उसकी नियति होती है I

(9अगस्‍त, 2019)

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