Tuesday, August 13, 2019


पिछले दिनों कई ऐसे पुराने मित्र मिले जो कभी सोशल डेमोक्रेट्स और लिबरल जमातों की खिल्ली उड़ाते थे, लेकिन प्रतिक्रिया के मौजूदा घटाटोप में वे कुछ पस्तहिम्मत और मायूस से नज़र आये ! वे कुछ इस मूड में दीखे कि "चीज़ें ससुरी जैसी चल रही हैं, चलने दो ! एक फासिस्ट जहन्नुम में बेड़ा गर्क होने दो पगलाई हुई जनता का ! होश ठिकाने आ जाएगा !"

मार्कंडेय काटजू मार्का "प्रबुद्ध निरंकुश" सेक्युलर तरक्कीपसंद बुद्धिजीवियों की तो यह फितरत ही होती है कि वे अंततः जनता को ही उसकी मूढ़ता के लिए कोसने लगते हैं ! ऐसे लोग कुछ बुनियादी चीज़ों को नहीं समझ पाते ! पहली बात, वे इस बात को नहीं समझते कि अपने सांस्कृतिक-वैचारिक उपकरणों के जरिये शासक वर्ग जनता से शासन करने की सहमति हासिल कर लेता है ! यही बुर्जुआ वर्ग की हेजेमनी या वर्चस्व है ! दूसरी बात, क्रांतिकारी प्रचार, काम और शिक्षा के द्वारा क्रांतिकारी शक्तियाँ इस वर्चस्व को तोड़ती हैं I तीसरी बात, जबतक क्रांतिकारी नेतृत्व तैयार न हो, तबतक सत्ता से असंतोष के बावजूद जन-समुदाय इस व्यवस्था के दायरे के भीतर ही विकल्प की तलाश करता रहता है I क्रांतिकारी नेतृत्व के बिना खुद वह क्रान्ति नहीं कर सकता I कुछ स्वतःस्फूर्त विद्रोह और उभार अगर होंगे भी तो वे कालान्तर में बिखर जायेंगे या कुचल दिए जायेंगे I चौथी बात, प्रतिक्रिया और सघन सामाजिक संकट के दौरों में जनता का पिछड़ा और निराश हिस्सा तेजी से फासिस्टों द्वारा सुझाए गए लोकरंजक समाधानों और उन्मादी नारों के जाल में फँस जाता है I जो इस जाल में नहीं फँसते वे भी निराश तटस्थता का रुख अपना लेते हैं I पाँचवी बात, बुर्जुआ जनवाद का सिस्टम ऐसा होता है कि छोटे से संगठित समर्थन को भी शासक वर्ग व्यापक जन-समर्थन के रूप में पेश कर लेता है I छठी बात, कुर्सीतोड़ प्रगतिशील वाम बुद्धिजीवी जब जनता को उसके पिछड़ेपन के लिए कोसते हैं तो अपनी जमात को एकदम किनारे कर लेते हैं और ओलंपियन ऊँचाइयों पर बैठकर बौद्धिक देववाणी सुनाते हैं ! जनता का पिछड़ापन वर्ग समाज के सामाजिक श्रम-विभाजन और विशिष्ट सामाजिक-राजनीतिक इतिहास की देन होता है I पिछड़ी चेतना जनता की चाहत, चुनाव या शौक नहीं है I अगर समाज का क्रांतिकारी उन्नत-चेतस हिस्सा आगे बढ़कर हिरावल की भूमिका नहीं निभा पाता है तो इसके लिए हम जनता को नहीं कोस सकते I यह भारत के कुर्सीतोड़ बौद्धिकों का कुलीनतावादी श्रेष्ठता-बोध है ! जनता को उसकी जहालत के लिए, अपने भारतीय समाज को उसके पिछड़ेपन के लिए और कम्युनिस्ट मूवमेंट को उसकी विफलताओं के लिए कोसने से इन लोगों के अपने अपराध-बोध और कुंठाओं का कुछ देर के लिए शमन हो जाता है और दोपहर की मीठी, सुकूनतलब नींद के लिए मूड बन जाता है I

तो ऐसे बौद्धिकों से कहने को भला बचा ही क्या रह जाता है ! और फिर बात यह भी है कि जो दुनिया को लेक्चर पिलाते हैं, वे मेरे जैसे तुच्छ, अल्पज्ञानी की बातें भला सुनेंगे भी क्यों ?

लेकिन जो दिल के नेक और जनता और देश से जेनुइन सरोकार रखने वाले साथी हैं, और आज की कठिन अंधकारमय परिस्थितियों में निराशा की तलैया में गोते लगा रहे हैं; उन्हें मैं अमेरिकी और फ़्रांसीसी क्रान्ति के एक नेता और दार्शनिक टॉम पेन के एक प्रसिद्ध कथन की याद दिलाना चाहूँगी I टॉम पेन ने कहा था,"संघर्ष जितना कठिन होता है, जीत उतनी ही शानदार होती है I"

(8अगस्‍त, 2019)

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