हाय, मैं क्या करूँ ? मेरा हृदय कितना संकुचित और संकीर्ण है ! मैं किसी फासिस्ट को, हत्या, उन्माद और बर्बरता की राजनीति करने वाले किसी भी व्यक्ति को, या उनके गिरोह में शामिल किसी पढ़े-लिखे शरीफ़ चेहरे वाले या वाली को मरने पर श्रद्धांजलि दे ही नहीं पाती ! खुशी भी नहीं मनाती, क्योंकि व्यक्ति के मरने से कोई फर्क नहीं पड़ता ! असम्पृक्त रहती हूँ !
एक बात बताइये ! कोई पुरुष या महिला खूब सुशिक्षित और सुसंस्कृत हो, लोगों की मदद करने वाला/वाली हो, शरीफ़ और मृदुभाषी हो; लेकिन बर्बरों का साथ देता/देती हो, रथ-यात्रा, बाबरी मस्जिद ध्वंस, गुजरात-2002 जैसी घटनाओं का/की पुरजोर समर्थक हो, बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं जैसे आपराधिक भ्रष्टाचारियों का/की पितृवत/मातृवत संरक्षक हो, तो क्या उसे ज्यादा "मानवीय" फासिस्ट मानकर कुछ श्रद्धा-सुमन अर्पित किये जा सकते हैं ? भई, मेरा तो दिल-जिगर कोशिश करने पर भी इतना बड़ा नहीं हो पाता ! लेकिन हमारी पवित्र भारत-भूमि पर ऐसे बड़े दिल वाले पुण्यात्मा प्रगतिशीलों-वामियों की कमी नहीं है ! इन विशाल-हृदय लोगों में दया-भाव का सोता इसकदर अविरल बहता रहता है कि जब बर्बरों और हत्यारों की नयी पीढ़ी बूढ़े हो चुके बर्बरों और हत्यारों को रिटायरमेंट देकर मार्गदर्शक-मंडल में बैठा देती है, या उनमें से किसी का लोटा घुमा देती है, तो उन पुराने, बूढ़े पापियों की दयनीय स्थिति को देखकर वे लोग दया-करुणा और सहानुभूति से भर जाते हैं ! जबकि इस मामले में मुझे महान चीनी लेखक लू शुन का यह सुझाव ज्यादा मुफ़ीद लगता है कि कुत्ता जब पानी में गिरा हो तो उसपर दया दिखाने की जगह दो डंडे और रसीद कर देने चाहिए !
बहरहाल, अभी तो मैं ग्लानि में डूबी बैठी हूँ कि मेरे भीतर से शोक की कोई लहर उठ ही नहीं रही है !
(7अगस्त, 2019)

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