Monday, August 12, 2019


'सरकती जाये है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता...'

बुर्जुआ जनवाद की "पवित्र पुस्तक" के प्रति आदर-भाव दिखाना फासिस्टों का पाखण्ड होता है, यह तो बार-बार साबित हो चुकी बात है ! लेकिन ताज्जुब की बात है कि जो तमाम सोशल डेमोक्रेट्स इस पवित्र पुस्तक को वास्तव में जनवाद की संहिता समझते हैं और इसके प्रति अगाध श्रद्धा-भाव रखते हैं, उनमें से भी कइयों के सर पर भी अंधराष्ट्रवाद का भूत कल से इसतरह चढ़कर नाच रहा है कि निहायत असंवैधानिक ढंग से धारा 370 की समाप्ति में भी उन्हें "राष्ट्रीय गौरव" और कश्मीर में शान्ति-बहाली की संभावनाओं के दर्शन हो रहे हैं ! बहुतों को यह कदम "कश्मीर पर भारत की फतह" के रूप में दिखाई दे रहा है ! अब उनसे यह पूछना बेकार है कि यह किसपर किसकी फतह है !

कई "प्रगतिशीलों' के नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता सरकते देखने के तो हम पहले से ही आदी हैं ! मगर कल से तो अजब बेसब्री का आलम है ! फ़टाफ़ट अपने नक़ाब नोचकर लोग कतारों में लग रहे हैं ! उनका मन 'भामाकीजै' बोलने के लिए उचक रहा है, पर अभी थोड़ा सकुचा रहे हैं ! लेकिन इंतज़ार कीजिए जल्दी ही इनमें से कई 'नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे'... भी गाते हुए नज़र आयेंगे ! यह कोई नई बात थोड़े ही है ! बुर्जुआ डेमोक्रेट्स और सोशल डेमोक्रेट्स का इतिहास तो एकबार खंगालकर देखिये I पहले विश्वयुद्ध के समय और दूसरे विश्वयुद्ध की पूर्वबेला में तीसरे-चौथे दशक के फासिस्ट उभार के समय यह पूरी जमात खुद ही पूरीतरह अंधराष्ट्रवादी रंग में रंग गयी थी I जल्द ही भारत में भी इस प्रजाति के प्राणियों को आप गाते हुए सुनेंगे :'रंग दे तू मोहे गेरुआ'...

(6अगस्‍त, 2019)

No comments:

Post a Comment