(जर्मन कवि)
झींगुर
झींगुर इत्ते थोड़े? इत्ते सारे झींगुर?
कौन गिनेगा इनकी आवाज़ें
आग्नेय चट्टानों के नीचे
गोल शिलाखण्डों के बीच
घास के जंगलों-दलदलों में;
आवाज़ें किधर
गीत उमड़ते और लहकते हुए
जुगलबन्दी करते, उत्तर देते हुए
किसके लिए?
पोषित किन हाथों से
लोभ-लदे पंखों के बीच
सूदख़ोरी की बर्फ़ के नीचे
गाते हैं देवताओं और दादुरों को मात देने के लिए
झींगुर इत्ते थोड़े
इत्ते सारे झींगुर।
****
मध्यवर्ग का शोकगीत
हम फ़रियाद नहीं कर सकते
हम बेकार नहीं हैं
हम भूखे नहीं रहते
हम खाते हैं
घास बाढ़ पर है
सामाजिक उत्पाद
नाख़ून
अतीत
सड़कें खाली हैं
सौदे हो चुके हैं
साइरन चुप हैं
यह सब गुज़र जायेगा।
मृतक अपनी वसीयतें कर चुके हैं
बारिश ने झींसी की शक्ल ले ली है
युद्ध की घोषणा अभी तक नहीं हुई है
उसके लिए कोई हड़बड़ी नहीं है
हम घास खाते हैं
हम सामाजिक उत्पाद खाते हैं
हम नाख़ून खाते हैं
हम अतीत खाते हैं
हमारे पास छिपाने को कुछ नहीं है
हमारे पास चूकने को कुछ नहीं है
हमारे पास कहने को कुछ नहीं है
हमारे पास है
घड़ी में चाबी दी जा चुकी है
बिलों का भुगतान किया जा चुका है
धुलाई की जा चुकी है
आख़िरी बस गुज़र चुकी है
वह ख़ाली है
हम शिकायत नहीं कर सकते
हम आख़िरकार किस बात का इन्तज़ार कर रहे हैं?
(अनुवाद: सुरेश सलिल)
झींगुर
झींगुर इत्ते थोड़े? इत्ते सारे झींगुर?
कौन गिनेगा इनकी आवाज़ें
आग्नेय चट्टानों के नीचे
गोल शिलाखण्डों के बीच
घास के जंगलों-दलदलों में;
आवाज़ें किधर
गीत उमड़ते और लहकते हुए
जुगलबन्दी करते, उत्तर देते हुए
किसके लिए?
पोषित किन हाथों से
लोभ-लदे पंखों के बीच
सूदख़ोरी की बर्फ़ के नीचे
गाते हैं देवताओं और दादुरों को मात देने के लिए
झींगुर इत्ते थोड़े
इत्ते सारे झींगुर।
****
मध्यवर्ग का शोकगीत
हम फ़रियाद नहीं कर सकते
हम बेकार नहीं हैं
हम भूखे नहीं रहते
हम खाते हैं
घास बाढ़ पर है
सामाजिक उत्पाद
नाख़ून
अतीत
सड़कें खाली हैं
सौदे हो चुके हैं
साइरन चुप हैं
यह सब गुज़र जायेगा।
मृतक अपनी वसीयतें कर चुके हैं
बारिश ने झींसी की शक्ल ले ली है
युद्ध की घोषणा अभी तक नहीं हुई है
उसके लिए कोई हड़बड़ी नहीं है
हम घास खाते हैं
हम सामाजिक उत्पाद खाते हैं
हम नाख़ून खाते हैं
हम अतीत खाते हैं
हमारे पास छिपाने को कुछ नहीं है
हमारे पास चूकने को कुछ नहीं है
हमारे पास कहने को कुछ नहीं है
हमारे पास है
घड़ी में चाबी दी जा चुकी है
बिलों का भुगतान किया जा चुका है
धुलाई की जा चुकी है
आख़िरी बस गुज़र चुकी है
वह ख़ाली है
हम शिकायत नहीं कर सकते
हम आख़िरकार किस बात का इन्तज़ार कर रहे हैं?
(अनुवाद: सुरेश सलिल)

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