हमारी ग़लतियों के भी कुछ 'साइड इफेक्ट्स' होते हैं I उनमें से कुछ महत्वपूर्ण होते हैं और कुछ दिलचस्प !
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हमारा दृष्टिकोण कितना वैज्ञानिक है और हमारे भीतर कितना क्रान्तिकारी साहस है , इन दोनों चीज़ों का पता सबसे अधिक तब चलता है जब हमें खुद अपनी कमजोरियों या गलतियों के बारे में सोचना और बोलना होता है।
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भइयाजी, ई जो फेसबुक देवता हैं इनकी महिमा तो अपरम्पार है ! ई एक खुल्ला मैदान है जहँवा एक से एक बिद्वानन का रेवड़ चरता आउर पगुराता रहता है I जो चार गो गंभीर किताब नहीं पढ़ा, ऊ एक से एक आप्तवचन आ सुभासित बोलता रहता है, सूत्रीकरन देता रहता है, भबिस्यबानी करता रहता है I मारकसबादी त एतना सब भर गया है कि आँखि मून के ढेलवांस फेंको त कवनो मारकसबादिये को जा के लागता है I ई सब जेतना बाम बिद्वान है, मारकस-लेलिन के किताब का तो मुँहे नाहीं देखता है, सगरो काम अन्दाजीफिकेसने से चला लेता है I गज्जब भइया ! चिन्तक चतुर चपाट चोन्हरावें, मरकट सब मधुमंगल गावें I
(11 जनवरी, 2019)
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अगर आप सच्चे मायनों में एक इन्क़लाबी हैं तो आपके पास एक तार्किक दिमाग के साथ ही एक भावप्रवण हृदय भी ज़रूर होना चाहिए I और हाँ, जैसी कि मार्क्स की प्रिय सूक्ति कहती है, मनुष्य अपनी सभी कमजोरियों सहित आपको प्यारा लगना चाहिए I इंक़लाबी मूल प्रकृति से भोले-भाले लोग होते हैं, अपनी तमाम पूरी-अधूरी ख्वाहिशों, कमियों-कमजोरियों, स्वप्नों-स्मृतियों-फंतासियों तथा खुशियों और उदासियों के साथ जीने वाले !
(12जनवरी,2019)
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बच्चों को देखकर यह लगता है कि हम इस दुनिया के बारे में कितना कम जानते हैं !
विद्वानों को नहीं, बच्चों को सुनकर यह अहसास होता है कि दुनिया के बारे में हमारी जानकारियाँ, कितनी अधूरी, ग़लत और पूर्वाग्रह-ग्रस्त हैं !
बच्चो को खुश देखकर, और उदास देखकर -- दोनों ही सूरतों में शिद्दत के साथ यह महसूस होता है कि इस दुनिया को बेहतर और सुन्दर बनाने के लिए सचमुच अभी कितना कुछ किया जाना बाक़ी है !
(15जनवरी, 2019)

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