रूसी उदारतावादी साहित्यकार आन्नेंकोव मार्च,1846 में कार्ल मार्क्स से मिले थे I 28 वर्षीय मार्क्स ने उनपर एक ऐसे व्यक्ति की ज़बरदस्त छाप छोड़ी जो अपने लक्ष्य के बारे में स्पष्ट था और जिसे सभी "मिथ्या पैगम्बरों" और "मानव जाति के उद्धारकों" के आडम्बरपूर्ण अज्ञान से बहुत नफ़रत थी I
आन्नेंकोव ने अपने संस्मरणों में कम्युनिस्ट पत्र व्यवहार समिति की एक बैठक का हवाला दिया है जिसमें मार्क्स और भोंड़े समतावादी यूटोपियन कम्युनिज्म के एक सिद्धांतकार विल्हेल्म वाइटलिंग के बीच एक झड़प हो गयी थी I वाइटलिंग की भ्रामक लोकरंजक शिक्षायें उससमय जर्मन मज़दूरों के एक हिस्से को अपनी ओर खूब आकर्षित कर रही थीं I मार्क्स ने वाइटलिंग से पूछा कि उनके क्रिया-कलापों के पीछे के सैद्धांतिक आधार क्या हैं ! इसपर वाइटलिंग गोलमाल भाषा में बताने लगे कि उनका मक़सद किसी नए आर्थिक सिद्धांत का विकास करना नहीं, बल्कि अपनी भयावह स्थिति का मज़दूरों को अहसास कराना है तथा उन्हें जनवादी और कम्युनिस्ट कम्यूनों में संगठित होने की शिक्षा देना है I इसपर गुस्से में त्योरी चढ़ाए मार्क्स ने वाइटलिंग को बीच में ही रोकते हुए कहा कि कार्रवाई के लिए कोई दृढ, सुविचारित सैद्धांतिक आधार तैयार किये बिना आम आबादी को उद्वेलित और आंदोलित करना उसे धोखा देना है I उन्होंने कहा कि सही वैज्ञानिक विचारों और रचनात्मक सिद्धांत के बिना कार्रवाई के लिए मज़दूरों का आह्वान करना उस उपदेशक के बेईमान, खोखले खेल के समान होगा, जो एक ओर, अनुप्राणित पैगम्बर और दूसरी ओर, केवल मुँह फाड़कर ताकने वाले मूर्खों की कल्पना करता है !
इस कटूक्ति को सुनकर वाइटलिंग के पीले गाल लाल हो गए, वे आडम्बरी भाषा में मज़दूर वर्ग के लिए किये गए अपने सेवा कार्यों का बखान करने लगे और फिर यह कहा कि आम ध्येय के लिए उनके साधारण प्रारंभिक कार्यों का महत्व उन सिद्धांतों और कोरे विश्लेषणों से कहीं ज्यादा है, जो पीड़ित और विपत्तिग्रस्त लोगों की दुनिया से बहुत दूर होते हैं I इन शब्दों पर क्रुद्ध होकर मार्क्स ने मेज पर अपनी मुट्ठी इतनी जोर से पटकी कि उसपर रखा लैम्प झनझनाने और डगमगाने लगा ! वह यह कहते हुए कूद पड़े कि ' अज्ञान ने अभीतक किसी की सहायता नहीं की है !'
कूपमंडूक संस्मरण-लेखकों ने अक्सर मार्क्स की व्यग्र कठोरता की, उनके "तानाशाही" तरीकों की और उन लोगों के प्रति उनकी "मेफिस्टोफिलीस सी" घृणा की शिकायत की है जो उनके सिद्धांतों से मूर्खतापूर्ण और कूपमंडूकतापूर्ण ढंग से असहमति जाहिर करते थे I
अपने विरोधियों के साथ राजनीतिक वाद-विवाद में मार्क्स की शैली में प्रबल भावनात्मक पुट होता था I मार्क्स के लिए समाज विज्ञान एक ऐसा क्षेत्र था जहाँ विचारों का संघर्ष विभिन्न सामाजिक-वर्गीय दृष्टिकोणों के टकराव के रूप में प्रकट होता था I उनके लिए यह संघर्ष उन "महाविद्वानों" का पंडिताऊ, आवेशरहित और पाखंडी शास्त्रार्थ नहीं था, जो बाजी हारते हुए भी अपनी झेंप छिपाने की कला में पारंगत होने की कोशिश करते हैं!
(सन्दर्भ : P. Annenkov, From the Essay "A Wonderful Ten Years", 'Reminiscences of Marx and Engels' Rahul Foundation, Lucknow, 2010)

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