Friday, January 16, 2026

चाहतों का क्या!

 

चाहतों का क्या है! 

चाहतें तो पागल होती हैं। 

जैसे अक्सर मैं चाहती हूँ कि

नंगे धूसर पहाड़ों को

बसंत के हरेपन से ढँक दूँ, 

नदियों को प्रदूषणमुक्त पानी से

लबालब भर दूँ, 

घाटी के सूख चुके सोतों को

फिर से जीवित कर दूँ। 

चाहती हूँ कि उत्पादन, राजकाज और समाज के

पूरे तंत्र पर उत्पादन करने वाले क़ाबिज़ हों

और फ़ैसले की पूरी ताक़त

उनके हाथों में हो। 

चाहती हूँ बराबरी और आपसी सम्मान से

भरा ऐसा प्यार जो मुक्ति का पर्याय हो

और जिसकी मौन उपस्थिति में

आत्माएँ संवाद करें कविता की भाषा में। 

जो नहीं है और जिसे होना ही चाहिए

उसकी कामना में खरचती हूँ जीवन

और सोचती हूँ कि दुनिया में अगर

नहीं हुआ करतीं कुछ पागलपन भरी चाहतें

तो मनुष्यता का भविष्य क्या होता! 

लेकिन सिर्फ़ चाहने से क्या होता है! 

इसलिए दीवारों पर नारे लिखती हूँ, 

पोस्टर चिपकाती हूँ, 

नये-नये पर्चे तैयार करती हूँ, 

अध्ययन-चक्रों और रात्रि-पाठशालाओं में

सपने और विचार बाँटती हूँ

और आदतन कविताएँ भी लिखती हूँ। 

अब तुमसे क्या बात करूँ मेरे भाई! 

तुम तो जो है उसे ही स्वीकार करके

जीने को जीना समझते हो, 

बदलाव की हर कोशिश की निरर्थकता पर

वैचारिक ग्रंथ और महान कविताएँ लिखते हो, 

हत्यारों की सत्ता से मिले तमगों को 

छाती पर सजाये इतराते हुए घूमते हो

और जब अकेलेपन से त्रस्त हो जाते हो

तो अध्यात्म की गुफा को शरण्य बनाते हो। 

बेहतर है कि तुमसे संवाद करने की जगह

तुम्हारी सच्चाई बताई जाये उन लोगों को

जो विचारों की दुनिया में जब आँखें खोलते हैं

तो तुम्हारे शब्दों के ऐन्द्रजालिक आकर्षण में

उलझ जाते हैं। 

**

(16 जनवरी 2026)


No comments:

Post a Comment