Thursday, January 15, 2026

  

-- नाज़िम हिकमत . 

इस तरह से 

मैं खड़ा हूँ बढ़ती रोशनी में 

मेरे हाथ भूखे, दुनिया सुंदर 

मेरी आँखें समेट नहीं पातीं पर्याप्त पेड़ों को -

वे इतने उम्मीद भरे हैं, इतने हरे। 

एक धूप भरी राह गुज़रती है शहतूतों से होकर ,

मैं जेल चिकित्सालय की खिड़की पर हूँ। 

सुंघाई नहीं दे रही मुझे दवाओं की गंध -

कहीं पास में ही खिल रहे होंगे कार्नेशन्स। 

यह इस तरह है :

गिरफ़्तार हो जाना अलग बात है,

ख़ास बात है आत्म-समर्पण न करना !

(अंग्रेजी से अनुवाद-वीरेन डंगवाल)

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