महाकाव्य है नयी सदी का
प्रहसन क्यों कहते हो इसको
पूर्वकथन:
कथाभूमि हो कोई भी
चाहे दिल्ली या पटना
आये दिन होती रहती है
कुछ ऐसी ही घटना I
*
कथावस्तु:
प्रगतिशीलता के बंकर से गरज उठा कवि
तान मुट्ठियाँ,
"कविता वो है जो श्रमिकों के साथ बैठकर
भरी दुपहरी सड़क किनारे पत्थर कूटे!"
लोकतंत्र के राजाजी के
भव्य महल की खिड़की से
जो झाँक रही थी छैल-छबीली
जिसपर कवि का मन लट्टू था,
मादक नेत्र नचाकर बोली,
होंठ काट मुस्काकर बोली,
"चल हट झूठे! "
*
उत्तरकथन:
कविता की कला पर जब
अभिजन हों लट्टू
तो झोला टाँगे इधर-उधर
क्यों भटकें बजरबट्टू!
पटना से दिल्ली से वर्धा-भोपाल तक
हर दिन हर महीने सालों साल तक
सृजन के साथ होगा विलास,
परिहास और मटरगश्ती
जीवन में हो चाहे जितना अँधेरा
रोशनी में तैरेगी कविता की कश्ती !
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(26 Sept 2022)

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