जी, आप मेरा पेशा जानना चाहते हो ! सुबह मैं सफ़ाई कर्मचारी का काम करती हूँ । ज़िन्दगी के गली-कूचों की सफ़ाई करती हूँ । बहुत मेहनत और लगन का काम है बाबू ! तुम नहीं समझोगे ।
दोपहर को खा-पीकर थोड़ा आराम करती हूँ, फिर बोरा उठाकर कूड़ा बीनने निकल जाती हूँ, कूड़ाघरों, रेल की पटरियों, बसअड्डों, ढाबों-होटलों के पिछवाड़ों और कूड़े से अँटे पड़े नालों की ख़ाक़ छानती हूँ और तमाम किस्म की चीज़ें इकट्ठा करती हूँ -- बच्चों के खिलौने, पुरानी गुड़िया, रंग-बिरंगे कपड़े, घर के पुराने सामान, किचन के डिब्बे, डायरियाँ, सपने, यादें, पागलपन भरी चाहतें ... ! यह एक बहुत दिलचस्प और क्रिएटिव काम होता है । यह बात भी तुम नहीं समझोगे बाबू ! मैं तो देखती हूँ बाबू, बहुत सारी किताबें पढ़ने वाले अक़्लमंद समझे जाने वाले अधिकतर लोग ज़िन्दगी की ये छोटी-मोटी बातें शायद ही कभी समझ पाते हैं । ख़ैर, यह तो छोटा मुँह बड़ी बात हो गई, तुम बुरा न मानना !
वैसे सच पूछो तो चीज़ कोई भी बेकार कहाँ होती है । लोग उनका इस्तेमाल नहीं समझ पाते और वे उन्हें बेकार लगने लगती हैं । जो लोग पुरानी चीज़ों, रिश्तों, लोगों का मोल नहीं समझते वे ज़िन्दगी के लिए सुन्दर और उपयोगी नयी चीज़ों को पहचानने और बरतने की तमीज़ भी नहीं पैदा कर पाते और नयी के नाम पर निरर्थक, असुन्दर चीज़ों से घर, मन, दिमाग़ और जीवन को भरते रहते हैं । इसतरह लोग अपनी ज़िन्दगी, दिलो-दिमाग़ और सपनों और रिश्तों को कूड़ा-कबाड़ से भर लेते हैं और एक बेहद मँहगी और आरामदेह कुर्सी पर बैठकर मानवीय ज़रूरतों और उपयोगिता को ज़िन्दगी से निर्वासन की सज़ा देकर कूड़ाघरों के दण्डद्वीप पर भेज देते हैं । निरर्थक, कुरूप, अनुपयोगी चीज़ों, लोगों, विचारों, चाहतों से घिरे हुए वे स्वयं कूड़ा-कबाड़ बन जाते हैं और एक 'मिथ्या चेतना' के वशीभूत जीवनपर्यंत इस बात को नहीं समझ पाते । नये के बिना जीवन संभव नहीं । पर नये की पहचान के लिए पुराने को भी जानना होगा, छाँटना-बीनना होगा ।
शाम को अपने बटोरे गये कूड़े में से तमाम ऐसी चीज़ें मैं अलग करती हूँ जिनका ज्यों का त्यों इस्तेमाल किया जा सकता है । फिर कुछ चीज़ें होती हैं जिन्हें कुछ मरम्मत, कुछ रंग-रोगन, कुछ जुगाड़ की दरकार होती है । यह काम हर इतवार को बस्ती के बच्चों और कुछ बूढ़ी तज़ुर्बेकार औरतों की मदद से निपटाया जाता है । कुछ ऐसा कूड़ा-कबाड़ होता है जो रीसाइक्लिंग प्लाण्ट पहुँचाना होता है । यह काम निपटा कर मैं फिर कूड़ा के डम्पिंग साइट पर जाती हूँ और वहाँ से सड़-गल कर खाद बन चुके कूड़े को खोदकर हाथठेला में भरकर पास के जंगल में जाती हूँ और पौधों और बूढ़े-जवान पेड़ों की जड़ों में खाद भरती हूँ । और अब यह राज की बात भी तुम्हें बता ही दूँ कि कुछ मेरे दोस्त बादल हैं जो मेरे पाले-पोसे गये सदाबहार वनों पर हर दो-तीन दिन बाद, देर रात झमड़कर बरस जाते हैं ।
तो यह है मेरी रामकहानी बाबू ! अब इससे अगर तुम कोई कहानी या कविता बनाओगे तो उसपर कोई भरोसा नहीं करेगा, दुनिया वाले और घरवाले तुम्हें पागल समझने लगेंगे । क्या करोगे ! लोगों के दिल और दिमाग़ में ही इतना कूड़ा भर गया है कि दरअसल जो हो रहा है उसे वे समझना नहीं चाहते और जो आगे होने वाला है, उसपर उन्हें भरोसा ही नहीं है ।
इसीलिए तो कहती हूँ, ज़िन्दगी की सफ़ाई और कूड़े की बिनाई-छँटाई लगातार करनी होगी और बहुत बड़े पैमाने पर करनी होगी । नये के लिए जगह भी तभी बन पायेगी । अच्छा, चलती हूँ । बहुत टाइम नहीं है मेरे पास तुम्हारी तरह खोटा करने के लिए !
(17 Oct 2020)

No comments:
Post a Comment