Saturday, October 17, 2020


एक स्त्री के साथ बलात्कार होता है तो वह सिर्फ एक पुरुष द्वारा ही नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था द्वारा और सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था द्वारा भी बलात्कार होता है । बलात्कार मर्दों के उस मानसिक अनुकूलन का तो परिणाम होता ही है जो स्त्री को मनुष्य की जगह अपनी यौन-तृप्ति की वस्तु मानते हैं, पर उससे भी अधिक यह पुरुष-वर्चस्ववाद का बर्बरतम हथियार भी है । जिन गैर-जनतांत्रिक समाजों के ताने-बाने में जनवाद नहीं होता और स्त्री-पुरुष के बीच पार्थक्य बहुत अधिक है, वहाँ पुरुष-वर्चस्व की यह बर्बर और रुग्ण अभिव्यक्ति ज्यादा देखने को मिलती है । स्त्री के सेक्स को मर्दों और पूरी क़ौम की सामाजिक-निजी और नैतिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बना दिया गया है, जिसके कारण सभी युद्धों में विजेता सेनाएँ पराजित देशों की स्त्रियों के साथ बलात्कार करती हैं, आंदोलनरत जनता का मनोबल तोड़ने के लिए सेना और पुलिस बलात्कार और यौन-उत्पीड़न को हथियार बनाती हैं, सामाजिक रूप से ताक़तवर जातियों और समुदायों के लोग दबे-कुचले लोगों की स्त्रियों का आखेट करते हैं, फासिस्ट धार्मिक, नस्ली या क़ौमी अल्पसंख्यकों की स्त्रियों के साथ सामूहिक बलात्कार करते हैं और दंगों में भी मुख्य निशाना औरतें ही होती हैं । निश्चय ही, बलात्कृत स्त्रियों की मदद करने वाले लोग एक ज़रूरी और सराहनीय कार्य कर रहे हैं, पर बलात्कार का स्त्री उत्पीड़न के सभी रूपों के साथ उन्मूलन का रास्ता एक ही है और वह यह कि  पितृसत्ता और स्त्री-पराधीनता को जन्म देने वाली सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष संगठित हो, उसमें स्त्रियों की भी उनके एजेंडे सहित अधिकतम भागीदारी हो, और अन्ततः एक दीर्घकालिक संघर्ष के बाद इस सामाजिक ढांचे को ध्वस्त कर दिया जाए ।

(17 Oct 2020)

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