Saturday, October 17, 2020


पुराना क्लासफेलो था, फेसबुक से ढूँढ़कर संपर्क किया और मिलने आ गया । पूरा मेटामार्फोसिस हो चुका था । किसी ज़माने में अच्छा-भला आदमी हुआ करता था, अब  सॉलिड भक्त में बदल चुका था । बचने की मेरी सारी कोशिशों को नाकाम करते हुए उसने राजनीतिक बहस छेड़ ही दी । मेरी कई फेसबुक पोस्ट्स पढ़कर आया था ।

बहस तो क्या होनी थी, जल्दी ही वह उत्तेजित लाल भभूका चेहरा लिए चीखने लगा,"हाँ, अगर ये फासिस्ट विचार हैं तो मैं इन्हीं में साँस लेता हूँ, इन्हीं को खाता-पीता हूँ । तुम क्या खाती हो ? पश्चिम से आयातित विचार और गाय ?"

"नहीं, मैं फासिस्ट खाती हूँ । मैं फासिस्ट-भक्षी डायन हूँ, पर आज मेरा व्रत है ।"

वह अकबका कर देखने लगा और फिर कभी न मिलने की घोषणा करके कुछ बड़बड़ाता हुआ तेज़ क़दमों से बाहर निकल गया ।

(17 Oct 2020)

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