Sunday, October 18, 2020


जो माले पार्टी आज चुनाव में हराकर फ़ासिस्टों को धूल चटा देने के लिए चन्द्र शेखर के हत्यारों की पार्टी के साथ महागठबंधन में शामिल है, वह उन नीतीश कुमार की पुरानी समता पार्टी के साथ मोर्चा बनाकर भी चुनाव लड़ चुकी है जो आज फ़ासिस्टों की गोद में बैठे हैं ।  वैसे माकपा-भाकपा कांग्रेस विरोध के नाम पर अतीत में भाजपा के साथ भी मोर्चा बना चुके हैं और भाकपा कांग्रेस के आपातकाल का भी समर्थन कर चुकी है । ये अब बुर्जुआ संसदीय राजनीति की रेज़गारी ही बने रहेंगे, सर्वहारा क्रान्ति के हरावल के रूप में इनका पुनरुत्थान असंभव है । इस बात को समझने के लिए संशोधनवाद के बारे में लेनिन को पढ़िए, ख्रुश्चोवी संशोधनवाद के विरुद्ध चीनी पार्टी की बहस के दस्तावेजों को पढ़िए । संशोधनवाद कम्युनिस्ट मुखौटे वाली बुर्जुआ राजनीति होती है और सभी संशोधनवादी पूँजीवादी व्यवस्था की दूसरी सुरक्षा-पंक्ति होते हैं -- लेनिन ने यही बताया था । 

अक्सर लोग प्लास्टिक की बोतल में पानी लेकर निपटने खेतों में, जंगल-झाड़ में या रेल पटरी किनारे जाते हैं और काम हो जाने के बाद बोतल वहीं फेंक देते हैं । सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय बुर्जुआ पार्टियों के लिए सभी संसदीय वामपंथी जड़वामन वही प्लास्टिक की  बोतल होते हैं ।

(18 Oct 2020)

इस पोस्‍ट पर आये हुए कुछ चुनिन्‍दा कमेंट्स और उनको दिये हुए जवाब:

(सारे कमेंट्स पढ़ने के लिये 18अक्‍टूबर का फेसबुक पोस्‍ट देखें)


Malti Haldar

हमने तो ये भी देखा है कि अति वामपंथी विचारधारा के लोग अपने कार्यकर्ताओं की जमानत के लिए उत्तराखंड के सबसे बड़े माफिया की मदद लेते है, ये कौन सा वाद है स्पष्ट करेंगे जरा

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Kavita Krishnapallavi

Malti Haldar यह एक निकृष्ट किस्म का कुत्सा-प्रचार है जो हथकंडा किसी भी प्रकार की राजनीतिक नैतिकता से रिक्त लोग तब इस्तेमाल करते हैं जब उनके पास देने के लिए कोई तर्कसंगत उत्तर नहीं रह जाता ! उक्त घटना के समय और उस आन्दोलन के दौरान तो आप न जाने कहाँ थीं, पर यह "ज़रूरी जानकारी" आप तक ज़रूर पहुँच गयी ! आपके सूचनार्थ निवेदन है कि उक्त मामले में साथियों की ज़मानत साथी गीता गैरोला के बेटे ने और आन्दोलन के दौरान ही संपर्क में आये तीन लोगों ने ली थी ! हमलोगों के साथियों का केस आन्दोलन में सक्रिय वकील रजिया बेग देख रही थीं ! नैनीताल में पैरवी वकील स्निग्धा तिवारी कर रही थीं जो साथी पी.सी. तिवारी की सुपुत्री हैं ! अदालत में बहुतेरे भाजपा-विरोधी बुर्जुआ नेता और दंदफंदी पत्रकार भी उपस्थित थे जो मदद की पेशकश कर रहे थे और इस-उस अधिकारी से बात करने के दावे भी कर रहे थे I हमलोगों का किसी से परिचय नहीं था, और मदद मांगना तो दूर, हमलोगों ने किसी को घास तक नहीं डाली ! गीताजी, कमला पन्त, निर्मला बिष्ट आदि दर्ज़नों साथी लगातार साथ मौजूद थे ! बल्कि, उलटे कुछ साथी तो यह कहते थे कि इन कानूनी मामलों में भी हम ज़रूरत से अधिक शुद्धतावादी हैं ! और आपको उन बातबहादुर कामरेडों की याद क्यों नहीं आयी, जो इस जनवादी अधिकार के मामले में भी ज़मानत लेने से बहाना बनाकर निकल लिए और मांदों में दुबककर जुबानी जमा-खर्च करते रहे ! वैचारिक-राजनीतिक मतभेद लाख हों पर जनवादी अधिकार के प्रश्न पर तो साथ खडा होना चाहिए था, सिद्धांत तो यही बताता है ! हम यह तो नहीं कर सकते कि किसी से हमारे गंभीर राजनीतिक मतभेद हों तो राज्यसत्ता के दमन और जनवादी अधिकार के सवाल पर भी साथ देने की जगह पतली गली से निकल लें ! और सबसे मूल बात यह है कि यह बात इससमय यहाँ कैसे आई ? अगर आपको यह तथ्य पता था तो ईमानदारी का तक़ाज़ा था कि आप पहले ही पूछतीं और सवाल उठातीं ! अब यहाँ जब हम बुर्जुआ संसदीय चुनावों में टैक्टिकल भागीदारी की लेनिनवादी नीति के परिप्रेक्ष्य में बिहार चुनावों में मा-ले की नीति पर सवाल उठा रहे हैं और आलोचना रख रहे हैं, तो उस मुद्दे पर बात करने की जगह आप एक साल से पेट में दाबकर रखे एक ऐसे "रहस्य" का "उदघाटन" कर रही हैं जिसका कोई सिर-पैर ही नहीं है ! यह संजीदा मार्क्सवादी-लेनिनवादी विमर्श-पद्धति नहीं है ! यह बेहद हल्का और गैर-जिम्मेदाराना राजनीतिक आचरण है ! मगर हमें कोई आश्चर्य नहीं है ! हर गंभीर राजनीतिक आलोचना के उत्तर में ऐसी बौखलाहट और पिनपिनाहट भरी प्रतिक्रियाएं हम संसदीय वाममार्गियों और कुपढ़-अपढ़ बुद्धिजीवियों से अक्सर सुनते रहे हैं !

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Malti Haldar

बिल्कुल जब दुश्मन फासिस्ट हो तो सभी जनवादियों को एक मंच पे आना चाहिए ये बात सभी के साथ लागू होना चाहिए या नहीं या फिर उसकी सार्वजनिक मंचो पर आलोचना करनी चाहिए

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Kavita Krishnapallavi

हाँ, अब आप मुद्दे की बात कर रही हैं ! असहमत होने पर बौखलाकर, सुनी-सुनाई घटिया अफवाहबाज़ी की बातों के आधार पर चिकोटी काटने की जगह पहले ही स्वस्थ ढंग से मतभेद के मुद्दे पर बात करतीं तो बेहतर होता ! मुद्दे की बात यह है कि जिन चुनावबाज़ संसदीय वामपंथियों के लिए चुनाव और बुर्जुआ विधायिकाएं टैक्टिकल इस्तेमाल की चीज़ न होकर "वर्ग-संघर्ष का मुख्य रणक्षेत्र" बन गयी हैं, वे चुनावी संयुक्त मोर्चे को ही फासिज्म-विरोधी संयुक्त मोर्चे का पर्याय समझ बैठे हैं ! यह एक मार्क्सवाद-लेनिनवाद विरोधी दीवालिया समझ है ! 1920-30 के दशक में कोमिन्टर्न के नेताओं ने बार-बार स्पष्ट किया था कि फासिज्म-विरोधी संयुक्त मोर्चा चुनावी संयुक्त मोर्चा नहीं बल्कि ज़मीनी संघर्ष का संयुक्त मोर्चा है ! फासिज्म तृणमूल स्तर से संगठित पेटी-बुर्जुआ क्लास का एक धुर-प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन है जिसे मज़दूरों-मेहनतकशों और मध्य वर्ग के रेडिकल हिस्सों का एक रेडिकल प्रगतिशील सामाजिक आन्दोलन खडा करके ही कुचला जा सकता है ! चुनावी हारों से फासिस्टों का निर्मूलन न कभी हुआ है, न आगे कभी होगा ! 1920 के दशक में कोमिन्टर्न का सूत्रीकरण यह था कि फासिज्म के विरुद्ध सभी मज़दूर-वर्गीय संगठनों, पार्टियों, मंचों व आन्दोलनों का संयुक्त मोर्चा होना चाहिए ! 1930 के दशक में जब जर्मनी, इटली में फासिस्ट सत्ता में आ चुके थे और यूरोप के सभी देशों में फासिस्ट उभार चरम पर था तो कोमिन्टर्न ने 'पोपुलर फ्रंट' की लाइन दी, जिसका मतलब था कि फासिज्म-विरोधी मोर्चे में ऐसी बुर्जुआ जनवादी शक्तियों को भी साथ लिया जाना चाहिए, जो फासिज्म के विरुद्ध संघर्ष के लिए तैयार हों ! उससमय ऐसी बुर्जुआ जनवादी शक्तियां भी थीं जो फासिस्टों के ख़िलाफ़ ज़मीन पर संघर्ष कर रही थीं ! हालाँकि व्यवहार में आगे भी देखा गया कि बहुत कम बुर्जुआ जनवादी शक्तियां संघर्ष में डटी रहीं ! मुख्य संघर्ष कम्युनिस्ट शक्तियों के अतिरिक्त अराजकतावादियों ने और स्वतंत्र पहलकदमी वाले मज़दूरों ने ही किया था ! आज की पूंजीवादी दुनिया में ऐसी बुर्जुआ जनवादी शक्तियां हैं ही नहीं जो ज़मीनी संघर्ष में फासिज्म के विरुद्ध मोर्चा ले सकती हों ! ये फासिस्ट 'ब्लिट्जक्रीग' के समय मांदों में दुबक जायेंगी ! इनके पास फासिज्म के विरुद्ध सडकों पर संघर्ष करने वाले जुझारू कैडर हैं ही नहीं ! इनके कैडर तो खुद ही जातिवादी गुंडे हैं और ये पार्टियां ऐसी हैं जो समय-समय पर मौक़ा मिलते ही भाजपा की गोद में बैठकर सरकार बना लेती हैं ! चंदू और अजित सरकार के हत्यारों-गुंडों की जिन पार्टियों को आप जनवादी कह रही हैं, वे कल को फासिस्टों की पूँछ में कंघी करते हुए सत्ता की मलाई चाटने लगती हैं ! और नव-उदारवाद की नीतियों की वाहक, 'नरम केसरिया लाइन' का झंडा ढोने वाली, नक्सलबाड़ी से लेकर आजतक सभी जनवादी संघर्षों का दमन करने वाली कांग्रेस भी आज मा-ले की निगाह में "जनवादी शक्ति" हो गयी तो नज़रों के इस सामाजिक जनवादी मोतियाबिंद के बारे में क्या कहा जाए ! कोई भी फासिज्म-विरोधी मोर्चा चुनाव लड़ने मात्र के लिए नहीं होता और ज़मीनी संघर्ष में संघी फासीवाद के ख़िलाफ़ इनमें से कोई बुर्जुआ पार्टी उतरेगी ही नहीं, तो ज़मीनी संघर्ष का संयुक्त मोर्चा क्या हवा में बनेगा ? दूसरी बात, सच यह है कि आज के समय में 'पॉपुलर फ्रंट' की कोई रणनीति कारगर हो ही नहीं सकती ! इससमय वह रणनीति कारगर होगी जो कोमिन्टर्न ने 1920 के दशक में प्रतिपादित की थी, यानी सभी मज़दूर-वर्गीय पार्टियों, संगठनों, मंचों, जन-संगठनों का जुझारू संयुक्त मोर्चा जो चुनावी नहीं, बल्कि ज़मीनी संघर्षों का संयुक्त मोर्चा हो ! (अगले कमेंट में जारी)

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Kavita Krishnapallavi

(पिछले कमेंट से जारी) लेकिन सच तो यह है कि फासिज्म के विरुद्ध ऐसे किसी ज़मीनी संघर्ष के लिए ये संसदीय वामपंथी खुद ही तैयार नहीं हैं और मज़दूर वर्ग को इसके लिए शिक्षित-प्रशिक्षित करके तैयार करने की जगह उसको इन्होने सिर्फ़ चुनावी और अर्थवादी-सुधारवादी विभ्रम दिए हैं तथा उसे बुर्जुआ राजनीति और विचारधारा का शिकार बनने के लिए छोड़ दिया है ! इनकी यूनियनें "वर्ग-संघर्ष की प्राथमिक पाठशाला" नहीं, बल्कि "अर्थवाद और संसदीय विभ्रमों की प्राथमिक पाठशाला" हैं ! ये पार्टियां सर्वहारा के जुझारू हरावल के लेनिनवादी ढाँचे और रीति-नीति का परित्याग करके, यानी एक उन्नत कैडर-पार्टी के ढाँचे का परित्याग करके, चवन्निया मेम्बरी वाली जन-पार्टी बन चुकी हैं, जिनके सदस्य फासिज्म की सैद्धांतिकी तो दूर, मार्क्सवाद का भी अ-ब-स नहीं जानते ! इनके कई नेता भी नहीं जानते ! इसलिए, अगर कोई बहस छेड़ो भी तो ये सस्ती जुमलेबाजी पर उतर आते हैं ! इतिहास के सबसे बड़े गुनाहगार तो ये लोग हैं जो जन-समुदाय को फासिज्म के विरुद्ध संघर्षों की लम्बी तैयारी के बेहद कठिन दौर में चुनावी और सुधारवादी विभ्रम का शिकार बना रहे हैं और उसे यह विभ्रम दे रहे हैं कि चुनावी शिकस्त देकर फासिज्म को पीछे धकेल दिया जाएगा ! इन्होने न इतिहास पढ़ा है, न फासिज्म की मार्क्सवादी सिद्धांत और विमर्शों को पढ़ा है, न ही वर्ग-संघर्ष की सैद्धांतिकी पढी है ! ऐसे लोगों को मध्यवर्गीय पराजितमना, कुलीन, निराशावादी बौद्धिक भी समर्थन देने के लिए मिल जाते हैं जो सोचते हैं कि क्रांति तो अब एक यूटोपिया है और फासिज्म की दैत्याकार शक्ति को सडकों पर टक्कर देना तो नामुमकिन है, इसलिए फिलहाल चुनाव में भाजपा को हराकर ही कुछ राहत की सांस ले लो ! यह एक शुतुरमुर्गी और कायराना सोच है ! ऐसे कबूतरदिल लोग सोच ही नहीं पाते कि मज़दूर वर्ग की क्रांतिकारी चेतना, लम्बी और कठिन ज़मीनी कामों के बाद जब जागृत और संगठित हो जाती है तो वह फासिस्टों और उनकी खूनी राज्यसत्ता के लिए भी अजेय होती है ! इन लोगों में इतनी कूव्वत ही नहीं है कि ये चुनावी और यूनियनी कवायद और कुछ अनुष्ठानिक कार्रवाइयों के दुश्चक्र से निकलकर मज़दूर वर्ग को क्रांतिकारी लाइन पर संगठित करने की नयी शुरुआत कर सकें ! और ऐसी जो छोटी-छोटी क्रांतिकारी पहलकदमियां इन्हें दीखती हैं तो चुनावी वाम दलों के बूढ़े हाथियों की विशाल काया से तुलना करते हुए ये सोचते हैं कि इतनी छोटी ताक़तें भला क्या कर पाएंगी ! अगर सही क्रांतिकारी जनदिशा पर काम हो तो कुछ समय ऐसा होता है जब इतिहास चंद दिनों का काम दशकों में करता है और फिर वह दौर आटा है कि दशकों का काम चंद दिनों में निपट जाता है ! (अगले कमेंट में जारी)

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Kavita Krishnapallavi

(पिछले कमेंट से जारी) इस बात को भूलने की ज़रूरत नहीं है कि बीसवीं सदी का फासीवाद विश्व-पूंजीवाद के आवर्ती चक्रीय क्रम में कुछ अंतराल पर पैदा होने वाले महामंदी के संकट के दौर में पैदा हुआ था, जबकि आजका फासीवादी उभार एक ऐसी वैश्विक परिघटना है जो पूंजीवादी संकट के चढ़ावों-उतारों भरे एक सुदीर्घ चक्र की पैदावार है और यह संकट ऐसा ढांचागत संकट है कि ऐसे सुदीर्घ चक्रों के बीच 'बूम' वाले किसी अल्पकालिक दौर की भी संभावना नहीं दीख रहा है ! हर अल्पकालिक आंशिक राहत संकट का नया भयंकर चक्र लेकर आता रहेगा ! यानी यह पूंजीवाद का 'टर्मिनल डिजीज' है जो बना रहेगा ! इसके साथ ही राजनीतिक पटल पर फासीवाद भी बना रहेगा ! सत्ता में न रहने पर भी इसकी उत्पाती कार्रवाइयां जारी रहेंगी ! और जब फासिज्म सत्ता में नहीं रहेगा, तब भी जो बुर्जुआ राज्यसत्ता होगी वह बस नाममात्र की जनवादी होगी और निरंकुश दमनकारी होगी ! उसकी नव-उदारवादी आर्थिक नीतियाँ फासिस्टों से भिन्न नहीं होंगी ! फासिजम पूंजीपतियों के हाथों में ज़ंजीर से बंधे कुत्ते की तरह होगा, जिसकी ज़ंजीर संकट बढ़ने पर ढीली कर दी जायेगी और कुत्ते को जनता पर छोड़ दिया जाएगा ! तात्पर्य यह कि फासिज्म के विरुद्ध क्रांतिकारी संघर्ष एक सुदीर्घ "पोजीशनल वारफेयर' के समान होगा और चढ़ावों-उतारों से गुजरते हुए यह सर्वहारा क्रान्ति संपन्न होने तक जारी रहेगा, यानी फासिज्म-विरोधी संघर्ष सर्वहारा क्रान्ति की एक कड़ी के रूप में ही आज देखा जा सकता है ! तृणमूल स्तर से मज़दूरों-मेहनतकशों का एक जुझारू प्रगतिशील सामाजिक आन्दोलन खड़े किये बिना, मज़दूर इलाकों को जन-दुर्ग में तबदील किये बिना और मज़दूरों के लड़ाकू दस्ते (जर्मनी के 'फैक्ट्री हंड्रेड' जैसे) संगठित किये बिना फासिज्म से नहीं लड़ा जा सकता ! चुनावी संयुक्त मोर्चे फासिज्म के विरोध के नाम पर जो बन रहे हैं, यह राजनीतिक जोकरपना है और यह खतरनाक है क्योंकि जनता में विभ्रम और मुगालते पैदा करता है ! माकपा के प्रकाशन 'लेफ्टवर्ड' ने फासिज्म-विरोधी मार्क्सवादी लेखन का एक बढ़िया संकलन छापा है (मज़े की बात है कि खुद माकपा का आचरण ही उन लेखों के विपरीत है) और 'कॉर्नरस्टोन पब्लिकेशन्स' खड़गपुर से एक और ऐसा महत्वपूर्ण संकलन छापा है जिसमें वे मार्क्सवादी विमर्श भी शामिल है जो दुनिया में दूसरे विश्वयुद्ध के बाद हुए हैं ! संकीर्ण अनुभववादी बोदे तर्कों से बचने के लिए उन्हें पढ़ना ज़रूरी है ! और भी बहुत सारी पुस्तकें हैं इस विषय पर ! उन्हें पढ़ने की ज़रूरत है ! तब पता चलेगा कि ये संसदीय वामपंथी आज कितना भयंकर काम कर रहे हैं ! आपके कोई भी साथी यह सारा साहित्य पढ़कर आयें, फिर थोथी जुमलेबाजी-लेक्चरबाज़ी नहीं, इस विषय पर दो-तीन दिनों की एक खुली बहस रखी जा सकती है !

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Malti Haldar

कविता जी मेरे पास ना तो शब्द है ना भाषा शैली ना ही मैंने इतनी अधिक पढ़ाई की है कि आपकी इस बहस का हिस्सा बन सकूं लेकिन मुझे सिर्फ इतना समझ में आता है कि जब दुश्मन फासिस्ट बन जाता है तो हमें भी अपनी रणनीति उसी हिसाब से तय करनी चाहिए अभी तो देश बचाने की लड़ाई है लाइन और वाद तो देश बचेगा तो उसे भी बचा लेंगे। बाकी बिहार में माले ने कभी कोई समझौता नहीं किया है सबसे ज्यादा शहादत माले द्वारा ही दी गई है माले उनकी आवाज बना है जो महादलितों गिना जाता है। आपने सार्वजनिक रूप से इस मंच का इस्तेमाल माले के खिलाफ किया है तो अपनी आलोचना स्वीकार करने का प्रयास भी करना चाहिए। देश बचेगा संविधान बचेगा तो इतिहास में कब किसने क्या स्टैंड लिया इसकी आलोचना भी की जा सकेगी

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Kavita Krishnapallavi

Malti Haldar राजनीतिक स्टैंड का सवाल इसी बात से तय होता है कि वैज्ञानिक दृष्टि से जनता के हित में क्या है । मैं इस प्रश्न का उत्तर दे चुकी हूँ । आप उसी बात को दुहराये जा रही हैं । मैं एक कम्युनिस्ट हूँ और मार्क्सवाद के अनुसार ही यह तय करूँगी कि सही और जनहित में क्या है । कामन सेंस, अनुभववाद , भक्तिभाव और क़ुर्बानियों की दुहाई देने से नहीं वैज्ञानिक तर्क से चीज़ें तय होती हैं ।अगर आप मेरे तर्कों पर नुक्तेवार बात नहीं कर सकतीं तो नाहक ही बहस छेड़ रही हैं । अगर आपने मार्क्सवाद नहीं पढ़ा है तो मेरी गलती तो नहीं है । बिना जाने-पढ़े ही भक्ति भावना से आपको अपनी पार्टी सही और मेरे द्वारा उसकी आलोचना ग़लत लग गई तो इस "दिव्य दृष्टि" का तो मैं कुछ नहीं कर सकती । बेहतर होगा कि इस मुद्दे पर आपकी पार्टी के कोई ऐसे साथी बहस करें जिन्होंने कुछ मार्क्सवाद पढ़ रखा हो, फ़ासिज़्म पर मार्क्सवादी लेखन से परिचित हों। सही-गलत पर बहस तो उसी से हो सकती है जो मार्क्सवादी लेखन से परिचित हो । राजनीतिक बहसें और सही ग़लत के फैसले किसी की भावनाओं और भक्ति से नहीं हुआ करते । इत्यलम !

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 Veeru Singh

भारत की कम्यूनिस्ट पार्टियां संसदीय लोकतंत्र के भंवरजाल में फंस गई हैं।

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Dayal Nimodia

कोई भी हो जिसे राजनीति जिसमें वर्तमान में नीति ढूंढे से भी कहीं नजर नहीं आती का प्रसाद चख लिया और पचा लिया वह उसी डाल को काट रहा है जिस पर वह बैठा हुआ है अर्थात वह सिद्धांतों की लाश पर नृत्य कर रहा है !

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Chandan Verma अच्छी लगी? पूरा आर्टिकल इनबॉक्स कर दिया है। 🙏🏼

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Ram Krishna

बेशक सहमत.

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 Pradeep Bhattacharya

सवाल लालू या नितीश के साथ जाने का नहीं, मुद्दा BJP/RSS के हाथों से एक और महत्वपूर्ण राज्य को छीनने का है... स्थिति को अगर 'किताबों' की आईने में न देखकर सन्दर्भ में, द्वंदात्मक रूप से देखें तो...

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Kavita Krishnapallavi

Pradeep Bhattacharya द्वंद्वात्मकता यही है कि स्थिति को किताबों के आईने में और किताबों को स्थिति के आईने में देखना होता है । आपलोग चुनाव का टैक्टिकल नहीं, स्ट्रैटेजिक इस्तेमाल कर रहे हैं और बुर्जुआ विधायिका में मज़दूर वर्ग का स्वतंत्र पक्ष उपस्थित करने की जगह बुर्जुआ पार्टियों की पूँछ में कंघी कर रहे हैं । चुनाव में भागीदारी पर लेनिन और बोल्शेविक नेताओं का विपुल लेखन है, नेट से भी निकाल कर पढ़ सकते हैं । और फ़ासिस्टों से राज्य छीनकर राजद-कांग्रेस को दे देने और एकाध मंत्रिपद माले को परसादी में मिल जाने से सर्वहारा-अर्ध्दसर्वहारा और आम मध्यमवर्ग को क्या मिल जाएगा, फ़ासिस्टों को क्या धक्का लग जायेगा या मज़दूर क्रांति की लामबंदी कैसे मजबूत हो जायेगी । संसदीय वामपंथी दलों ने चुनावी संयुक्त मोर्चे को फ़ासिज़्म विरोधी मोर्चा का पर्याय समझ लिया है । संशोधनवादियों का एक जाना-पहचाना जुमला है --'ये सब किताबी बातें हैं, ज़मीनी हालात के हिसाब से चलना होता है !' इस जुमले की आड़ में वे मार्क्सवाद की बुनियादी प्रस्थापनाओं को भी बेठन में बाँधकर दुछत्ती पर धर देते हैं । आप अपनी किसी भी करनी को जस्टिफाई करने के लिए यह नहीं कह सकते कि मार्क्सवाद की फलां बात पुरानी पड़ गई है । आपको विस्तार से साबित करना होगा कि किस तरह, किन बदली परिस्थितियों में मार्क्सवाद की कोई प्रस्थापना पुरानी पड़ गई है !

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Kavita Krishnapallavi

Pradeep Bhattacharya अब आप हलकी जुमलेबाजी पर उतर आये ! लेनिन या मार्क्स हमारे ईश्वर नहीन, पर किसी देश की बदली परिस्थितियों या विशेष स्थितियों के नाम पर आप सबकुछ मनचाहे ढंग से उलट-पलट नहीं कर सकते ! जैसे देश-काल विशेष की रणनीति और आम रणकौशल में तो बदलाव होते रहते हैं, पर मार्क्सवाद की बुनियादी विचारधारात्मक प्रस्थापनाएं अपने विकासमान स्वरूप के बावजूद एकदम उलट नहीं जातीं ! जैसे अगर कोई पार्टी यह मानती है कि आज की परिस्थितियों में शांतिपूर्ण संक्रमण या संसदीय मार्ग से समाजवाद आ सकता है, तो उसे तर्कों सहित यह साबित करना पडेगा कि क्रांतिकारी बदलाव यानी वर्ग-संघर्ष और सर्वहारा अधिनायकत्व के बारे में लेनिन की प्रस्थापनाएं किसप्रकार, क्यों और किन वस्तुगत बदलावों के चलते पुरानी पड़ गयी हैं ! उसे बताना पडेगा कि किन परिस्थितियों में लेनिनवादी पार्टी ढांचा और कार्यप्रणाली के सिद्धांत पुराने पड़ गए हैं और मेंशेविकों तथा काउत्स्कीपंथियों के जन-पार्टी के ढाँचे और कार्य-प्रणाली का अनुसरण आज के लिए सही है ! बस इतना कहकर आप नहीं निकल सकते कि परिस्थितियाँ बदल गयी हैं, इसलिए क्रान्ति और पार्टी के सिद्धांत बदल गए हैं ! लेनिन ईश्वर नहीं हैं, लेकिन साम्राज्यवाद के युग में पहली सफल सर्वहारा क्रान्ति का सिद्धांत और व्यवहार में नेतृत्व देने के कारण मार्क्सवाद की एक अथॉरिटी ज़रूर हैं ! अगर बुनियादी लेनिनवादी विचारधारात्मक-रणनीतिक प्रस्थापनाओं को बदलने वाली कोई नई अथॉरिटी उभर रही है तो उसे अपने पूरे तर्कों सहित बदलाव के कारण बताने होंगे ! यह नहीं कि लेनिनवादी भी कहते रहें खुद को और उनकी सारी बुनियादी प्रस्थापनाओं को छोड़ दें ! यह तो और हास्यास्पद है कि मा-ले के प्रचंड अवसरवादी एक ही साथ माओ को भी सही मानते हैं और ख्रुश्चोव-ब्रेझनेव और देंग-सियाओ पिंग को भी ! उनके लिए माओकालीन चीनी पार्टी भी सही थी और ख्रुश्चेव के बाद सोवियत पार्टी भी एक सर्वहारा पार्टी थी और सोवियत संघ में 1954-56 के दौरान पूंजीवाद की पुनर्स्थापना भी नहीं हुई ! वे माओ की सांस्कृतिक क्रान्ति को भी समाजवाद का प्रयोग मानते हैं और उसे 'महाविनाश' बताने वाले देंग के 'बाज़ार-समाजवाद' को भी समाजवाद का ही प्रयोग मानते हैं ! जाहिर है कि इन पतित संसदमार्गियों के लिए विचारधारात्मक प्रश्नों का कोई मतलब ही नहीं रह गया है और कार्यकर्ताओं को कोई मार्क्सवादी शिक्षा न देकर, भक्त और पिछलग्गू बनाकर इन्होने ऐसा बना दिया है कि उन्हें मार्क्सवादी विज्ञान के बुनियादी सवालों की न कोई जानकारी है, न ही कोई लेना-देना है !

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Pradeep Bhattacharya not agreed

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Pradeep Bhattacharya

साथी Kavita Krishnapallavi, लेनिन आपके 'ईश्वर' हैं क्या, जो अपने 100 साल बाद किसी और देश और समाज में अलग-अलग परिस्थितियों में रणनीति और कार्यनीति क्या होगी, उसपर आख़िरी वाक्य कह गए हैं... ये तो ब्राम्हणों के 'वेद प्रामाण्य' जैसी बात हो गई... वैसे लेनिन भी मार्क्स की हर कही गयी बात और अपनाई गई रणनीति को कभी भी अकाट्य नहीं समझा था...

किताबें मैंने भी थोड़ी-बहुत पढ़ी है, और उनके महत्त्व को मैं कम करके आंकना नहीं चाहता हूँ, पर 'मार्क्सवाद' का बुनियादी दर्शन और सिद्धांत हमें यही सीखाता है कि हर किताब, हर सिद्धांत और हर विचार और 'चेतना' से ज़माना और परिवर्तनशील ठोस हालात हमेशा चार कदम आगे-आगे चलता है... ऐसे में जो किताबों का भारी बोझ सर पर लादे उसी दुनिया में ठहर जाय और ये समझे कि हम बहुत बड़ा तीर मार रहे हैं, वो कभी भी बदलते ज़माने की हक़ीक़तों को समझ नहीं पाता और न ही बदलाव की राजनीती का हिस्सा बन पाता है...

वैसे मैं आपको स्पष्ट कर दूँ कि मैं किसी भी पार्टी (चाहे आप उसके साथ 'संशोधनवादी' या 'क्रांतिकारी', कोई भी जुमला जोड़ दें) की रणनीति या सिद्धांत का न बचाव कर रहा हूँ, न तरफ़दारी...

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Pradeep Bhattacharya

Kavita Krishnapallavi मैंने कतई हलके-फुल्के ढंग से बात नहीं की है... I meant it, whatever I've said...

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Kavita Krishnapallavi

Pradeep Bhattacharya तब आपकी फतवेबाज़ी पर भला क्या बात की जा सकती है ! महागठबंधन के द्वारा फ़ासिज़्म को धूल चटाने का इंतज़ार कीजिए । मैं अपनी बात कह चुकी हूँ ।

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Pradeep Bhattacharya

Kavita Krishnapallavi Sorry, मैंने कभी नहीं कहा कि 'महागठबंधन' फासिज़्म को धूल चटा देगा, न ही कोई फ़तवा जारी किया, सिर्फ़ अपनी राय ज़ाहिर किया था...

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