Sunday, October 18, 2020


किसी भी तरह से जनता के साथ आ जाने और आंदोलित हो जाने से इंक़लाब के रास्ते पर आगे नहीं बढ़ा जा सकता । क्रान्तिकारी सिद्धान्तों पर जन-समुदाय जब उठ खड़ा होता है तब क्रान्ति की लहर आगे गतिमान होती है। लोकलुभावन नारों, जुमलों, वायदों से आकृष्ट हो कर जनता कई बार बुर्जुआ और संशोधनवादी पार्टियों के पीछे खड़ी हो जाती है और ठगी जाने पर मायूसी में डूब जाती है ।  क्रान्ति के 'शार्टकट' से आकृष्ट हो कर जनता और बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा कई बार "वाम" दुस्साहसवादी अतिरेकपंथ का भी समर्थक हो जाता है और फिर निराशा में डूब जाता है । 

क्रान्ति केवल एक विद्रोह, जनाक्रोश का विस्फोट मात्र नहीं हुआ करती । वह एक सुचिन्तित वैज्ञानिक क्रिया होती है जो एक सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था को ध्वस्त करके नयी व्यवस्था का निर्माण करती है । क्रान्तिकारी सिद्धान्तों से लैस एक हिरावल के बिना मेहनतक़श जन समुदाय क्रान्ति कर ही नहीं सकता । 

अगर आक्रोशित जनता के विद्रोह मात्र से ही क्रान्ति हो जाता करती तो रूसी क्रान्ति गेपोन पादरी के नेतृत्व में 1905 में ही हो गई होती । अगर लचर सिद्धान्तों वाली ढीली पोली पार्टियों के नेतृत्व में क्रान्ति संभव होती तो रूसी क्रान्ति के नेता अर्थवादी या मेंशेविक होते, लेनिन की कठोर सिद्धान्तवादी और फौलादी ढाँचे वाली बोल्शेविक पार्टी नहीं । अगर चुनावी रास्ते से मज़दूर सत्ता की स्थापना संभव होती तो अबतक दुनिया में काउत्स्कीपंथी दूसरे इण्टरनेशनल की पार्टियों ने या भाकपा-माकपा टाइप ख्रुश्चोवपंथी पार्टियों ने भी कहीं सत्ता में आकर समाजवाद का कोई माडल खड़ा कर दिया होता । 

बुर्जुआ चुनाव का टैक्टिकल इस्तेमाल तो लेनिन की पार्टी ने भी किया, और ज़रूर करना चाहिए, पर उसने जनता को कभी इस भ्रम में नहीं डाला कि चुनावी रास्ते से ही समाजवाद आ जायेगा (उल्टे चुनावी मंच से भी जनता को संसदीय विभ्रमों से मुक्त करने का काम किया) और कभी भी अपने को पूरी तरह से खुली, ढीली-पोली, चवन्निया सदस्यता वाली चुनावी जन पार्टी में नहीं बदला । पार्टी का एक संसदीय धड़ा था, पूरी पार्टी ही भाकपा-माकपा और माले की तरह संसदीय पार्टी कभी नहीं बनी । भारत की इन छद्म- वाम पार्टियों का नेतृत्व अपनी कतारों को सर्वहारा क्रान्ति के विज्ञान और इतिहास से कभी परिचित नहीं कराता ताकि वे आँखों पर पट्टी बाँधे चुनावी फसल की दँवाई-मँड़ाई करते रहें, लाल झंडा लिए मुख्यतौर पर सफ़ेदपोश मज़दूरों की, राहत-रियायतों की कुछ आर्थिक लड़ाइयाँ लड़ते रहें और खुद भ्रम में जीते हुए जनता को सुधारवादी विभ्रमों में फँसाये रखें । 

(अगली पोस्ट में यह विषय जारी रहेगा)

(18 Oct 2020)


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