हमारे समय में ईमान की शर्म, ज़मीर का डर
रोने में मुझे कोई शर्म नहीं ।
रोना हृदय की विकलता हो सकती है,
आपको अवश करता, भीतर टूट गए बाँध से
बाहर निकल पड़ा दुःख का कोई ज्वार,
हृत्शूल की कोई गहरी पीड़ा,
कोई ऐसी याद जिसके निकट आप
जाना न चाहते हों, पर सहसा पहुँच गए हों
या मन को मथ देने वाला कोई पश्चाताप भी !
कोई गमन या कोई आगमन भी
कुछ आँसू ला सकता है
और कोई देखा-सुना-पढ़ा गया दूसरों का दुःख भी !
रोने से मैं नहीं डरती,
मैं किसी आततायी के सामने
कातर हो जाने की कल्पना से डरती हूँ,
किसी बर्बर की सत्ता के सामने सिर झुकाने
और शिष्ट-सुसंस्कृत-संभ्रांत केंचुओं, तिलचट्टों, झींगुरों
और कनखजूरों की किसी साहित्यिक-सांस्कृतिक बैठकी
या सभा में प्रशंसित-पुरस्कृत होने की कल्पना मात्र से काँप जाती हूँ,
शर्म से पसीने-पसीने हो जाती हूँ ।
रोने से मैं नहीं डरती,
मैं डरती हूँ कि अगर कहीं सांस्कृतिक मंडी के शेयर-दलालों,
कमीशनखोरों, दुराचारियों को प्रगतिशीलता का
मुखौटा लगाए देखूँ और उन्हें नोचने की इच्छा दबा लूँ
तो कितनी शर्मनाक बात होगी !
मैं डरती हूँ कि अगर कहीं मैं इतनी सुसंस्कृत बन जाऊँ
कि गू को गू, सूअर को सूअर, बर्बर को बर्बर,
फासिस्ट को फासिस्ट, व्यभिचारी को व्यभिचारी,
अवसरवादी को अवसरवादी, कैरियरवादी को कैरियरवादी,
सोशल डेमोक्रेट को सोशल डेमोक्रेट, बुर्जुआ लिबरल को बुर्जुआ लिबरल
और छद्म-वामी को छद्म-वामी कहने से हिचकने लगूँ,
यानी शिष्ट-कुलीन "प्रगतिशीलों" की तरह
चीज़ों को उनके सही नाम से पुकारने की जगह
कोई उज्जवल-रहस्यमय बिम्ब या रूपक तलाशने लगूँ ;
तो फिर वह दिन मेरे लिए कितना शर्मनाक होगा !
अक्सर सोचती हूँ कि मैं भी कहीं शिष्टाचारवश
हत्यारों से तमगे और वजीफ़े पाने वालों का स्वागत
ठेठ देसी गालियों से करने से परहेज़ न करने लगूँ !
ऐसा दिन देखने के पहले सिर्फ़ मैं ही नहीं,
हर स्वाभिमानी, सहृदय, न्यायप्रिय, बहादुर इंसान,
हर सच्चा कवि,
सौ-सौ मौतें मरना चाहेगा !
रोने में मुझे कोई शर्म नहीं आती,
मुझे शर्म आती है कल के योद्धाओं को आज,
अपनी ढलती उम्र और इतिहास के बेहद कठिन और अँधेरे समय में
रुदालियों की वेशभूषा में देखकर, या
बहुरूपिए का भेस बनाकर दरबार में तमाशा दिखाते हुए
और कोर्निश बजाकर फेंकी गयी अशर्फियाँ उठाते हुए देखकर !
अगर मुझे कोई डर लगता है तो बस यही कि मैं
कहीं ऐसे ही दृश्यों के घटाटोप में
इन्हें बर्दाश्त करने की आदी न बन जाऊँ !
(9 Oct 2020)
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