बेशर्मी और मूर्खता भरी आज की साहित्यिक दुनिया में मुक्तिबोध की भाषा में यह पूछने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती कि 'आपकी पालिटिक्स क्या है पार्टनर ?'
ज्यादातर महानुभाव मिलते ही बेशर्मी और मूर्खता के साथ सण्डास के दरवाज़े की तरह अपना दिमाग़ खोलकर रख देते हैं और उसमें बजबजाती सारी कूपमंडूकता और राजनीतिक अपढ़पन भरी अपनी सोशल डेमोक्रेटिक और बुर्जुआ लिबरल सोच की संचित गंद को आपके सामने पेश कर देते हैं ।
पर इससे भी भयंकर बात यह है कि ऐसे गोबर गणेशों और खुशामदी टट्टुओं की भी भरमार है जो ऐसे "विद्वानों" के विचार पढ़-सुनकर 'अहो-अहो' करते हुए बोल उठते हैं,"आपके गूढ विचारों के आस्वाद से मन तृप्त हो गया ! आप राजनीति, इतिहास, साहित्य सैद्धांतिकी, मार्क्सवाद आदि के अद्भुत, अनन्य, अपूर्व, अगाध विद्वान हैं! आप ज्ञानसागर हैं !"
इस मिथ्या प्रशंसा से फूलकर कुप्पा वह कैरियरवादी मूर्ख फिर और मुग़ालते में आ जाता है और किताबें लिखने और सोशल मीडिया पर लेक्चर देने बैठ जाता है ! मूर्खता का अँधेरा तब और अधिक गहरा होने लगता है और उस अँधेरे में सोशल डेमोक्रेटिक और बुर्जुआ लिबरल विचारों की बदबू से नाक फटने लगती है !
आपने पढ़ा होगा शायद कि मार्क्स सबसे अधिक घृणा कूपमंडूकों से करते थे और कहते थे कि अज्ञान एक राक्षसी शक्ति है जो भविष्य में भी कई विपत्तियों को जन्म दे सकती है । कूपमंडूकता और अज्ञान के साथ अगर अहम्मन्य कैरियरवाद का भी 'मधुर मिलन' हो जाये तो उसके विनाशकारी नतीजे का अनुमान कोई विवेकवान आदमी आसानी से लगा सकता है !
(7 Oct 2020)

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