Tuesday, October 06, 2020

मुक्तिबोध जीवन और विचारों के द्वंद्वात्मक तनावों के साक्षात् मूर्त रूप मात्र ही नहीं हैं !


मुक्तिबोध जीवन और विचारों के द्वंद्वात्मक तनावों के साक्षात् मूर्त रूप मात्र ही नहीं हैं ! वह हिन्दी कविता का ईमान हैं, ज़मीर हैं, अंतरात्मा की कचोट हैं, न निभाये गए कर्तव्यों के लिए सजीव पश्चाताप हैं, पराजयों से उबरकर लिया गया नया संकल्प हैं, एक नयी यात्रा की आतुर पुकार हैं, क्षुद्र-विचारहीन-निरर्थक  जीवन जीते चले जाने की आदत के प्रति एक बेचैन कर देने वाली धिक्कार हैं,  इतिहास के वरदानों और अभिशापों को बाँचने वाले ज्योतिषी हैं !

उनके समकालीन कई अच्छे कवि हुए, पर इन अर्थ-सन्दर्भों में वे मुक्तिबोध के पासंग भी नहीं थे I 

और आज की तो बात ही छोड़ दीजिये I एक से एक 'महान', 'युगद्रष्टा', 'कालजयी', 'नयी ज़मीन तोड़ने वाले', 'ट्रेंडसेटर', 'अंतरराष्ट्रीय पटल पर प्रतिष्ठित', 

'विलक्षण कला और अलौकिक शिल्प वाले' कवि गण हैं ! पर कुछ अपवादों को छोड़कर  ये सभी 'सेल्फ-ऑब्सेस्ड', नार्सिसस-ग्रंथि से पीड़ित, क्षुद्रात्माएँ हैं ! ये लिलिपुटियंस हैं, जीवन की सुरक्षा और सुविधा की गारंटी के साथ प्रसिद्धि के क्षितिज पर चमकने और इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अपना नाम दर्ज कराने को व्यग्र-आतुर तुच्छ जंतु हैं ! ये रात के अँधेरे में रसोई में खाने के टुकड़े ढूँढ़ने वाले तिलचट्टे और अपने बिल के दरवाज़े पर बैठकर शोर मचाने वाले झींगुर हैं ! ये दिन-रात जोड़-तोड़, हदबंदी-चकबंदी-गिरोहबंदी आदि में डूबे रहने वाले, इतिहास, दर्शन और सिद्धांत के ज्ञान से दुश्मनी पालने वाले, अहर्निश चमत्कारी बिम्बों-रूपकों की तलाश करते रहने वाले, जन-संघर्षों में भागीदारी के जोखिम से मीलों दूर रहने वाले, सत्ता की बर्बरता और दमन की किसी भी घटना पर प्रबल काव्यात्मक आह और चीत्कार भरी कविता लिखकर चर्चित होने के लिए चौकन्ना होकर इंतज़ार करते हुए जीवन बिता देने वाले "सद्गृहस्थ" हैं ! ये हम्माम में बैठे लड़ते हुए नंगे हैं, अँधेरे में भुकभुकाते हुए भकजोगनी हैं ! 

आज के फासिस्ट समय में कविता लिखकर अमर हो जाने की जगह अगर अपने सुखी परिवार, सुविधा-संपन्न सुरक्षित जीवन को छोड़कर ये आत्मग्रस्त क्षुद्रात्माएँ कहीं पर मेहनतकशों के बीच कुछ समय देतीं, उनके जीवन से सीखतीं, उन्हें शिक्षित और जागृत करतीं, स्वाधीनता आन्दोलन की तरह लाठियाँ और मुक़दमे झेलतीं, जान का जोखिम मोल लेतीं तो इनका जीवन सार्थक हो जाता, कलुष धुल जाते और शायद सच्ची कविता के उत्स तक पहुँचाने का मार्ग भी मिल जाता I पर यह इनसे न हो सकेगा I

अपवादों को छोड़कर, ये सभी पराजित-मना सोशल डेमोक्रैट और बुर्जुआ लिबरल हैं जो वाम का मुखौटा पहने रहते हैं ! साहित्य की चंद जेनुइन आवाज़ों के विरुद्ध ये चुप्पी का षड्यंत्र रचते हैं, आपसी तमाम नोचा-चोंथौव्वल के बावजूद   ईमानदार युयुत्सु स्वरों के विरुद्ध ये फ़ौरन 'न्यूनतम आम सहमति का संयुक्त मोर्चा' बना लेते हैं ! इनमें जो थोड़े शरीफ हैं, उन्हें भी चूँकि स्थापित होना है, अमर होना है, इसलिए वे भी तमाम व्यभिचारियों-दुराचारियों के साथ मधुर सम्बन्ध चलाते रहते हैं ! 

 आलम यह है कि किसी संघी विचारक का गुणगान करने वाला आलोचक, किसी एन डी ए सरकार की कला-साहित्य अकादमी का दायित्व अपने कंधे पर ढोने वाला पुराना "दुर्दांत क्रांतिकारी" और साथ ही  "अद्भुत कलावादी" कवि, एक भाजपाई मुख्य मंत्री को अपना पिता बताने वाला एक जनवादी कवि, फासिस्टों से पद-पुरस्कार-सम्मान लेने वाले बहुतेरे प्रगतिशील साहित्यकार  -- ये सभी कुछ दिखावटी विरोधों के बावजूद हमप्याला-हमनिवाला बने रहते हैं ! राजधानी को ही ले लीजिए । दरियागंज का दल्ला भी कविता में वामपंथ का झोला ढोता है ! एक दारूकुट्टा, लम्पट-व्यभिचारी ब्यूरोक्रेट मूर्ख कांख-कांख की गयी कविताई के बाद अब मार्क्सवाद पढ़ाने के नाम पर वैचारिक मूर्खता के सारे कीर्तिमान तोड़ता रहता है, राजनीति में  गाँधी-अम्बेडकर-मार्क्स-लोहिया-मायावती-लालू-अखिलेश-येचुरी-करात सबको फेंट-फाटकर अद्भुत सोशल-डेमोक्रेटिक गंदी-बदबूदार खिंचड़ी तैयार करता है और उसपर चाँदी का वरक लगाकर सोशल मीडिया पर परोसता रहता है I यानी, 'सब गंदा है, पर धंधा है !' 

कुछ कथित "क्रांतिकारी" भी हैं जो 'टैक्टिस' के नाम पर सब जानते हुए सबसे मधुर-मधुर चलाते हैं, रात-अँधेरे वैचारिक अवसरवादियों के साथ कुछ चुम्बन- आलिंगन भी कर लेते हैं और कभी-कभार थोड़ा गू का हलवा भी दो-चार चम्मच खा लेते हैं !

जो ऐतिहासिक पराजय, विपर्यय और गतिरोध के दौर होते हैं , उससमय सुविधाभोगी मध्यवर्गीय बौद्धिक किस सीमा तक बेशर्म और पतित हो सकते हैं, इसका नमूना आज के भारत की साहित्यिक परिदृश्य पर देखा जा सकता है I और यह जो भारत की मध्यवर्गीय जमात की सुविधाजीवी ऊपरी परत है, यह तो वैसे भी आज के पूँजीवादी समाज में व्यवस्थित हो चुकी है और जन-मुक्ति के प्रोजेक्ट के साथ विश्वासघात कर चुकी है I इनके व्यवस्था-विरोध की चौहद्दी भी व्यवस्था ने ही तय कर दी है !

एक बात और है ! अपनी निष्क्रियता, कायरता और अवसरवाद की कुंठा का शमन करने के लिए ये कवि-लेखक गण अक्सर फेंस के किनारे एक ऊँची कुर्सी लगाकर बैठ जाते हैं और "समाजवाद फेल हो जाने के लिए, जनता का कोई क्रांतिकारी आन्दोलन न खड़ा कर पाने के लिए या आपस में बिखरे होने के लिए" वाम क्रांतिकारियों को कोसने और नसीहत देने लगते हैं जबकि उन्हें समस्या के वैचारिक या ऐतिहासिक पक्ष की कोई जानकारी नहीं होती ! बहरहाल, इन महारथियों से तो कुछ न हो सकेगा !

अब साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर भी नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के 'पैदल सिपाहियों' और 'पार्टीजन दस्तों' की नयी पीढ़ी तैयार करनी होगी, ट्रेंच खोदने होंगे, बैरिकेड्स खड़े करने होंगे और मोर्चे बाँधने होंगे ! फासिज्म के धुर-प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन के बरक्स मज़दूरों, मेहनतकशों और निम्न-मध्यवर्ग के प्रगतिशील तत्वों का रेडिकल सामाजिक आन्दोलन खड़ा करने में अगर कवि-लेखक भी खड़े नहीं होते तो उनका सारा "कालजयी" लेखन दरअसल घोड़े की लीद है ! लीद करने की जगह लोगों को संगठित करने के लिए जो काम किये जाते हैं वे कविता से कम काव्यात्मक नहीं होते !

(6 Oct 2020)

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