2008 से जारी पूँजीवादी संकट के बाद से दुनिया भर में पूँजीवाद के प्रति जनता में बढ़ते मोहभंग से निपटने के लिए विश्व पूँजीवाद का रहनुमा बिल गेट्स दुनिया भर में घूम-घूम कर पूँजीपतियों से ग़रीबों को खैरात बांटने के लिए तैयार कर रहा है। हाल ही में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में आदिवासियों को उनके जल-जंगल-जमीन से विस्थापित कर प्राकृतिक संसाधनों की अकूत लूट से अथाह संपत्ति अर्जित करने वाले वेदान्ता ग्रुप के अनिल अग्रवाल ने भी इस खैरात बांटो मुहिम के तहत अपनी संपत्ति का 75 फ़ीसदी हिस्सा मानवतावादी कामों में लगाने का फैसला किया है। कुछ समय पहले अजीम प्रेमजी ने भी ऐसी ही खैरात बांटने के लिए हामी भरी थी। मध्यवर्ग का एक हिस्सा ऐसे लुटेरे पूँजीपतियों की दरियादिली पर लहालोट हुआ जा रहा है। ऐसे काठ के उल्लुओं को यह भी नहीं दिखता कि आज के दौर में पूँजीपति अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा बैंक खातों में नहीं रखते बल्कि दुनिया भर के बहुराष्ट्रीय निगमों और वित्तीय संस्थाओं के शेयर में निवेश करते हैं और उनसे लाभांश प्राप्त करते हैं। ऐसे में जिस संपत्ति का 75 फ़ीसदी अनिल अग्रवाल जैसे लुटेरे परमार्थ में लगाने का दावा कर रहे हैं वह उनकी वास्तविक संपत्ति का एक बेहद छोटा हिस्सा है, यानी उनकी कुल लूट-खसोट का एक जूठन भर है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वजह है कि ये लुटेरे पूँजीपति यह जूठन जनता की ओर फेंक रहे हैं?
कार्ल मार्क्स ने 'कम्युनिस्ट घोषणापत्र' में लिखा है कि पूँजीवादी समाज में बुर्जुआ वर्ग का एक हिस्सा हमेशा धर्मार्थ और सुधार के कामों में संलग्न होता है। इससे जनता का पूँजीवाद के प्रति भ्रम बरकरार रहता है और पूँजीवाद की उम्र बढ़ती है। इससे पूँजीवादी समाज में ग़रीबी और बदहाली का उन्मूलन नहीं होता, समानता और न्याय की स्थापना नहीं होती। बल्कि शोषक और अन्यायी व्यवस्था के कायम रहने की ज़मीन तैयार होती है। इस चैरिटी से दुनिया के ग़रीबों का कोई भला नहीं होने वाला है! हाँ, एक काम ज़रूर होने वाला है - दुनियाभर के मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग की भारी आबादी और साथ ही सचेत मज़दूर आबादी में भी, पूँजीवादी व्यवस्था के मानवतावादी होने और उसके उत्तरजीवी होने को लेकर ज़बरदस्त भ्रम पैदा होगा। ख़ासतौर पर, पढ़े-लिखे युवाओं के बीच बिल गेट्स, वॉरेन बुफे, अजीम प्रेमजी, अनिल अग्रवाल जैसे लुटेरे सन्त और आदर्श बनकर उभरेंगे। छात्रों-नौजवानों के दिमाग़ में व्यवस्था द्वारा पैठाया गया यह तर्क और मज़बूत होगा कि 'पहले ख़ुद कुछ बन जायें, तभी तो समाज के लिए कुछ करेंगे!' और वे इस समझदारी से और दूर होते जायेंगे कि ये 'कुछ' वास्तव में कुछ भी नहीं है और इससे दुनिया में कुछ भी नहीं बदलने वाला। यह जनता के मन में पूँजीपतियों और धनपतियों के प्रति पलने वाले रोष के लिए एक 'सेफ्टी वॉल्व' का काम करेगा, जो जनता के ग़ुस्से को थोड़ा-थोड़ा करके निकाल देगा। लोग व्यवस्था के विकल्प के बारे में सोचने की बजाय व्यवस्था के भीतर ऐसे तथाकथित मसीहाओं के अवतरित होने के बारे में सोचते और उम्मीद करते रहेंगे। कुल मिलाकर, इस चैरिटी से होना-जाना कुछ भी नहीं है। बस, समाज में पूँजीवाद के प्रति भ्रम की उम्र कुछ और बढ़ जायेगी।
ऐसे किसी भ्रम को पालने की बजाय आम मेहनतकश जनता को यह नारा बुलन्द करना चाहिए कि हमें तुम्हारी ख़ैरात नहीं चाहिए, अपना हक चाहिए - यानी, पूरी दुनिया!
-- Anand Singh (2014)

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