Friday, October 09, 2020

अज़ीम शख्सियतें

अज़ीम शख्सियतें

 जो  अज़ीम शख्सियतें आती थीं पुचकारने मेरी वाल पर 

अब तो कभी किसी बात पर दुत्कारने भी नहीं आतीं ! 

फटर-फटर सच बोलने से यूँ बिदक जाते हैं ग्रेट लोग 

"इतने सच से कला मर जाती है," वो कहते हैं !

"सच को तमीज़ से कहो शीरीं जुबां में थोड़ा-थोड़ा 

और ये भी रखो ख़याल कि महफ़िल में बैठा कौन है !

हर महफ़िल में बयां करते हैं सच को अलहदा ढंग से 

और कभी ऐसा भी कि सच बोलते ही नहीं !

कभी-कभी कला होती है सिर्फ़ अंदाज़े-बयां 

बात यह होती है कि कोई बात ही नहीं होती !

बात में बात भी ग़र हो तो कुछ ऐसी हो 

कि बात फिर सबको जमे तालियाँ हर ओर बजें !

ये हुनर सीख लो फिर देखना क्या होता है 

अदब के आसमां पे चमकोगी सितारा बनकर !

हुक्मरां कर देंगे इनामो-इकराम की बारिश 

और बाँये बाजू में भी इज्ज़त बख्शी जायेगी !

हर्रे लगे न फिटकरी मगर रंग होगा  चोखा बेशक़

ये नुस्खा है आजमूदा, तुम भी आजमाओ जी !"

मैंने कहा,"इतनी बाजीगरी करना बस में नहीं 

अदब को आदाब-अर्ज़ करके निकल जाऊँगी

औलिया की दरगाह पर जाकर पढ़ूँगी सूफ़ियाना क़लाम

या फिर राजघाट जाकर रामधुन गाऊँगी !

बाजीगरी करनी ही है तो सरकस में जाऊँगी 

करतब दिखाऊँगी या जोकर बन जाऊँगी !

अदब की दुनिया में अगर रहूँगी तो सच कहूँगी

ज़ालिमों की आँखों में किरच-सी चुभती रहूँगी !

आर्ट अगर सच को छुपाये तो भला किस क़ाबिल 

 आर्ट फिर क्या, जो लोगों को कुछ न हो हासिल ! 

आर्ट ग़र जीने और लड़ने की नज़र ना दे

ऐसे में होगा महज कचरे की ढेरी वह !"

बस इन्हीं बातों से उखड़ पड़े सब ग्रेट अदीब 

अब वो इस राह से भूले से नहीं गुज़रे हैं !

9oct.2020

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