Saturday, October 10, 2020

मैंने इस्लामी धार्मिक कट्टरपंथ पर एक पोस्ट डाली थी !

 

(https://www.facebook.com/kavita.../posts/3284909281564590...) 

मेरी मूल प्रस्थापनाएँ बिलकुल स्पष्ट थीं ! फिर भी कुछ अपढ़-कुपढ़ मुसंघियों और उनके शागिर्दों  के भेजे में बात घुसी नहीं ! वे कमेंट बॉक्स में आकर बस यूँ ही आंय-बांय करने लगे कि 'मैं संघियों के गुनाह का दोष मुस्लिमों पर डाल रही हूँ', 'इस्लामोफोबिक हूँ' और 'संघ की छुपी समर्थक हूँ !' कुछ गधे हर तार्किक कमेंट पर आकर हँसने की इमोजी चिपकाने लगे ! चूँकि धर्मान्धों के भेजे में तर्क के घुसने का कोई सुराख़ तक नहीं होता, इसलिए ऐसे लोगों से तो कोई डायलॉग मुमकिन नहीं ! लेकिन जिनके पास थोड़ा-बहुत लॉजिक है, उनके लिए एक बार फिर यह पोस्ट लिखकर कुछ बातें एकदम दो-टूक साफ़ कर देना चाहती हूँ !

मेरा कहना है कि चाहे किसी भी धर्म का धार्मिक कट्टरपंथ हो, वह मेहनतक़श अवाम और उत्पीड़ित समूहों, मिसाल के तौर पर स्त्रियों का, दुश्मन होता है ! मैं यह बात धर्म-विरोध या नास्तिकता की ज़मीन से नहीं कर रही हूँ, बल्कि सेकुलरिज्म की ज़मीन से कर रही हूँ ! बेशक़, आप को अपने निजी धार्मिक विश्वासों को मानने की पूरी आज़ादी होनी चाहिए, पर  निजी विश्वास के दायरे के बाहर धर्म की  राजनीति और सार्वजनिक जीवन में कोई दखल नहीं होनी चाहिए और यहाँ तक कि किसी नागरिक को अपने धार्मिक विश्वास को अपने परिवार या अपनी बीवी पर भी थोपने की आज़ादी नहीं होनी चाहिए ! हर व्यक्ति को अपना धार्मिक-अधार्मिक निजी विश्वास चुनने की आज़ादी होनी चाहिए I जैसे, समाजवादी राज्य किसी पर नास्तिकता थोपता नहीं है, वह सबको धार्मिक  या नास्तिक निजी विश्वास को मानने की आज़ादी देता है ! अब यह वैज्ञानिक शिक्षा और समाजवाद के जीवन पर पड़े प्रभावों का नतीज़ा होता है कि आबादी में  भौतिकवादी विचार वाले लोग बढ़ते चले जाते हैं ! 

भारत में चूँकि हिन्दू आबादी बहुसंख्यक है, इसलिए जाहिर है कि यहाँ हिन्दुत्ववादी फासिस्टों का बहुसंख्यावादी धार्मिक कट्टरपंथ ही बुर्जुआजी का राजनीतिक हथियार है और सभी मेहनतकशों, धार्मिक अल्पसंख्यकों और दलितों-स्त्रियों के उत्पीड़ित समूहों पर कहर बरपा करता है I इसीलिये हम ज़्यादातर उसीपर चोट करते हुए लिखते हैं, या उसीके विरुद्ध हमारे संघर्ष केन्द्रित होते हैं ! जब हम संघी फासिस्टों के ख़िलाफ़ लिखते हैं तो मुसंघी कठमुल्लों को काफी सुकूनतलब लगता है I इसलिए यह साफ़ कर देना ज़रूरी है कि हम इस्लामी धार्मिक कट्टरपंथ को भी उतना ही जन-विरोधी और फासिस्ट मानते हैं I धार्मिक रिवाजों, किताबों और मुल्लों के फतवों के सहारे स्त्रियों की आज़ादी को कुचलने और मर्दों के साथ उनकी बराबरी का विरोध करने में वे किसी भी अन्य धर्म के मतिमंद कट्टरपंथियों से पीछे नहीं हैं ! भारत में मुसलमानों के धार्मिक अल्पसंख्यक होने के चलते यहाँ इस्लामी गणराज्य का सपना तो ये कठमुल्ले देख नहीं सकते !  आज की क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियों में, भारत से काटकर अलग कोई छोटा मुस्लिम देश बनाने का सपना भी कोई पागल ही देख सकता है I लेकिन, ज़ाकिर नाइक जैसे तमाम धर्मोपदेशक और ओवैसी जैसे नेता लगातार जो कट्टरपंथी ज़हर उगलते रहते हैं, उसके हवाले दे-देकर हिन्दुत्ववादी फासिस्ट लगातार मुसलमान आबादी को कट्टर, हिन्दू-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी प्रचारित करते हैं, उन्हें "देश के भीतर के शत्रु" के रूप में प्रचारित करते हैं ! इसतरह मुसंघी हर हाल में संघी फासिज्म के सहायक सिद्ध होते हैं ! संघी फासिज्म के खूनी आतंक से डरी निराश-निरुपाय आम मुस्लिम आबादी का एक हिस्सा जब मुसंघियों के बहकावे में आकर धर्म के झंडे तले इकट्ठी होता है तो  वह सेकुलरिज्म के झंडे तले इकट्ठी होने वाली व्यापक अवाम की एकजुटता को तोड़कर हिंदुत्ववाद-विरोधी लड़ाई को कमजोर करता है ! कोई इडियट भी इस बात को समझ सकता है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों की निजी धार्मिक आज़ादी और सुरक्षा सिर्फ़ और सिर्फ़ एक सच्चे सेक्युलर समाज में ही संभव है ! सच्चे सेकुलरिज्म के लिए लड़ते हुए, आगे लोग खुद ही इस बात को समझ जायेंगे कि सच्चे अर्थों में सेक्युलर समाज केवल एक समाजवादी समाज ही हो सकता है ! संघियों के जवाब में मुसंघी जो धार्मिक कट्टरपंथी जूनून की आग उगलते हैं, उसके नतीजे के तौर पर आम  मुसलमान ही दंगों, पुलिसिया हमलों और नरसंहारों का चारा बनते हैं ! स्पष्ट कर दूँ कि मैं संघी गुंडों के आगे दुबक बैठने की राय नहीं दे रही हूँ, बल्कि आम मेहनतकश जमातों और सभी सेक्युलर मध्यवर्गीय लोगों को संगठित करके मुकाबले की तैयारी की बात कर रही हूँ ! काश, ये मुसंघी कुरान, हदीस, सुन्नाह और सीरत के अलावा कुछ विश्व-इतिहास और फासिज्म के इतिहास और राजनीतिक सिद्धांत बारे में भी पढ़ते I खैर, अव्वलन तो ये पढ़ेंगे ही नहीं, और पढ़ेंगे भी तो पते की बात भेजे में घुसेगी नहीं, क्योंकि किसी भी धार्मिक कट्टरपंथी के दिमाग के वे दरवाज़े पत्थर की चट्टानों से बंद होते हैं जहाँ से तर्क या विवेक की कोई बात भीतर जा सके !

हमारी दूसरी बात का परिप्रेक्ष्य और व्यापक है ! हम पूरी दुनिया में धार्मिक कट्टरपंथ की हर धारा से नफ़रत करते हैं और उनका उतनी ही शिद्दत के साथ विरोध करते हैं ! अगर हम भारत में जान देने की कीमत चुकाने के लिए तैयार होकर तथा लाठियाँ, गुंडों के हमले, फर्जी मुक़दमे और जेल आदि भुगतते हुए हिन्दुत्ववादी बहुसंख्यावादी फासिस्टों की खूनी सत्ता के सामने सीना तानकर खड़े हैं तो इसलिए कि यह हमारे उसूल का सवाल है ! और उसी उसूल की खातिर हम  बर्मा में रोहिंग्या मुसलमानों पर बौद्ध कट्टरपंथी फासिस्टों के, बांग्लादेश के हिन्दू अल्पसंख्यकों पर वहाँ के इस्लामी कट्टरपंथियों के, पाकिस्तान में हिन्दू, शिया, अहमदिया आदि अल्पसंख्यक जमातों पर वहाँ के सुन्नी कट्टरपंथियों के, ईरान, तुर्की, ईराक में कुर्दों पर शिया और सुन्नी कट्टरपंथियों के, तथा, फिलिस्तीन के लोगों पर इज़रायली जायनवादी फासिस्टों के अत्याचारों और खूनी हमलों का विरोध करते हैं ! हम अरब देशों के उन भ्रष्ट-विलासी तेल-धनी शेखों-शाहों की ज़ालिम सत्ताओं का भी विरोध करते हैं जो अपने शत्रु अरब देशों के अपने ही धर्म के लोगों पर युद्ध का कहर बरपा करते हैं, अमेरिकी साम्राज्यवाद की गोद में बैठते हैं और चोरी-छुपे जायनवादियोंके साथ भी हमबिस्तर हो लेते हैं ! हम तुर्की के उस फासिस्ट एर्दोगान का भी विरोध करते हैं जो अपनी क्षेत्रीय विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं के चलते सीरिया के गृहयुद्ध के खूनी खेल में पश्चिमी ताक़तों के साथ हिस्सा बंटा रहा है, अपने देश की सेक्युलर परम्पराओं को मिट्टी में मिला चुका है और एक खूनी-ज़ालिम शासन चला रहा है ! अगर आप दुनिया के इन तमाम धार्मिक कट्टरपंथियों और बहुसंख्यावादी धार्मिक सत्ताओं और तमाम कठमुल्लों-मुसंघियों के ख़िलाफ़ चुप रहते हैं और धर्म के झंडे तले संगठित होकर मोदी शासन और हिंदुत्व फासिज्म से लड़ाई में कामयाबी हासिल करना चाहते हैं, तो मुआफ़ करें, आप 'मूर्खों के स्वर्गलोक' के एक अच्छे नागरिक हैं ! अगर आप संघी फासिज्म के ख़िलाफ़ हमारी बातों पर तड़-तड़-तड़-तड़ ताली पीटते हैं और हमारी ऐसी पोस्ट्स पर दे-दनादन लाइक ठोंकते हैं और मुसंघी बन्दों और इस्लामिक कट्टरपंथ पर चुप रहते हैं, तो मुआफ़ करें, आप एक बेईमान इंसान हैं ! हिन्दुत्ववादी कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ हम जिस मोर्चे की बात करते हैं उसमें कोई इस्लामिक या अन्य कट्टरपंथी कत्तई नहीं हो सकता ! हमारा मज़बूती से मानना है कि भारत में मुसंघी अपनी हरक़तों से संघियों के ही हाथ मज़बूत करते हैं ! दूसरी बात, सभी धार्मिक कट्टरपंथी निरंकुश स्वेच्छाचारी और गैर-जनतांत्रिक होते हैं, और घोर स्त्री-विरोधी होते हैं ! ज़ाकिर नाइक जैसे लोग मोहन भागवत जैसे लोगों से से किसी भी मायने में कम स्त्री-विरोधी नहीं है ! 

हिन्दुत्ववादी कट्टरपंथ अगर आपके ऊपर कहर बरपा कर रहा है तो उसका तो आप विरोध करेंगे, लेकिन इस्लामी कट्टरपंथ कहीं और अगर धार्मिक अल्पसंख्यकों को कुचल रहा है तो उसपर चालाक चुप्पी साध लेंगे, या इसलामिक कट्टरपंथ के अस्तित्व से ही इनकार कर देंगे और भारत के मुसंघियों और दुनिया के इस्लामिक कट्टरपंथियों पर सवाल उठाने पर उलटे हमें ही 'इस्लामोफोबिक' और 'छुपा हुआ संघ-समर्थक' घोषित कर देंगे ! वाआआआआह ! इतनी बेशर्मी और कठहुज्जती कहाँ से सीख कर आये हैं मेरे भाई ? किस मदरसे से यह नायाब तालीम हासिल की है ? ऐसे सवालों से कैसे आप बच निकलते हैं कि सऊदी अरब का जो शाही खानदान पवित्र इस्लामी स्थानों का संरक्षक है, वह अमेरिकी लुटेरों की गोद में बैठा रहता है और ज़ालिम इज़रायली जायनवादियों के साथ भी अँखियाँ लड़ाता है !

ये  सारी बातें इसलिए कर रही हूँ कि कल मैंने अपनी पोस्ट पर आने वाली प्रतिक्रियाओं में एक बार फिर देखा कि पढ़े-लिखे धर्मांध कितने बज्र्मूर्ख, कुतर्की और विवेक-शून्य हो जाते हैं ! मेरे किसी भी सवाल का तर्कसंगत उत्तर दिए बिना कुछ मुसंघियों के कूपमंडूक चेले आकर मुझे 'इस्लामोफोबिक' और 'संघियों का छुपा हुआ मददगार' कहने लगे ! कुछ अपढ़ कूपमंडूक अवांतर प्रसंग करते हुए यह दावा करने लगे कि इस्लाम को अगर सही से लागू किया जाए तो वही समाजवाद है !  खैर जो धरम की मूसली से कूटी गयी बुद्धि वाले मुझे इस्लामोफोबिक और संघियों का गुप्त मददगार कह रहे हैं, उनसे तो इतना ही कहेंगे कि 'मुन्ना, जब तुम शायद उंगली चूस रहे होगे, तबसे हम इन धर्मोन्मादियों का सड़कों पर मुकाबला कर रहे हैं, लाठियाँ खाकर, कई-कई हमले झेलकर, जेल जाकर और तमाम धमकियों का सामना करके ! और इनके वहशी जुलूसों के सामने धरनों-प्रदर्शनों में डटे रहे हैं ! तब पता नहीं, तुम्हारे जैसे कितने मूर्ख शब्दवीर खिड़की-दरवाज़े बंद करके चादर ओढ़े पसीने-पसीने हो रहे होंगे !

आख़िरी बात यह कि जितने भी ऐसे लोग हैं जो भाजपा के फासिस्ट शासन का तो विरोध करते हैं, लेकिन सभी तरह के धार्मिक कट्टरपंथ के विरोधी नहीं हैं, या जिन्हें तब बहुत तेज़ मिर्ची लग जाती है जब उनके धर्म की कट्टरपंथी धाराओं की आलोचना की जाए; ऐसे सभी लोग मेरी मित्र-सूची से फ़ौरन दफ़ा हो जाएँ ! जो मेरी मित्र-सूची में नहीं हैं, लेकिन किसी ऐसी पोस्ट पर आ धमकते हैं और कमेंट करते हैं, उनसे मेरी इल्तिजा है कि तर्क खूब कीजिए, पर सन्निपातिक दिमाग़ी हालत में आकर आंय-बांय मत कीजिए, कुतर्क मत कीजिए, फ़तवे मत दीजिये, लेबल मत चस्पां कीजिए ! नहीं तो मुझे फिर आपकी शान में गुस्ताख़ी करते हुए आपको ब्लॉक कर देना पड़ेगा !

(10 Oct 2020)

No comments:

Post a Comment