Saturday, September 05, 2020

 

लीजिये, अब आज का ताज़ा किस्सा सुनिए !

आप अगर उस बात के लिए ही लतिया और कूट दिए जाएँ, जिसपर आपका ही कमिटमेंट डिग गया हो, तो कस्सम से, शरीर से भी ज्यादा दिल को चोट लगती है ! 

एकदम लुटा-पिटा चेहरा और कूँचा-थूरा गया शरीर लेकर सामने के चबूतरे पर बैठा मोहल्ले का भक्त आज इसी बात का जीता-जागता सबूत बना नज़र आ रहा था I

आज सुबह-सुबह सड़क पर कुछ शोर सुनकर जब बाहर निकली तो देखा भक्त अपनी पटके वाली जांघिया पहने सड़क पर सरपट भाग रहा है I बनियान उसकी फट चुकी थी I उसके पीछे भागते हुए फिर उसके पिताश्री दृष्टिगोचर हुए, एक हाथ में जूता और दूसरे में डंडा धारण किये हुए I मेरे देखते ही देखते पिताश्री का उपानह भक्त के पृष्ठभाग पर 'धपाक' से जा टकराया I भक्त गिरने-गिरने को हुआ, फिर सम्हलकर पिताश्री के प्रक्षेपास्त्रों की सीमा से बाहर निकल गया I फिर जब हंगामा शांत हुआ तो भक्त मुँह लटकाए वापस लौटा और सामने के चबूतरे पर जा बैठा I तबसे वहीं बैठा कुछ चिंतन-मनन कर रहा है I बच्चों से पता चला कि भक्त के सड़क पर निकल भागने के पहले उसके पिताजी उसे घर के बैठके और बरामदे में पटक-पटककर कूट चुके थे I मुष्टिका-प्रहार, पाद-प्रहार और दंडिका-प्रहार से बेहाल होने के बाद भक्त सड़क पर छूट भागा था I

फिर मोहल्ले के विविध संचार-साधनों से समस्त सूचनाएँ संकलित हो गयीं I किस्सा-कोताह यह कि भक्त के पिताश्री वह पुण्यात्मा थे जो बाबरी-मस्जिद ध्वंस के बाद अयोध्या की तीर्थयात्रा कर चुके थे I पहलीबार उन्हें थोड़ी निराशा तब हुई थी जब अटल बिहारी की सरकार ने सरकारी कर्मचारियों की पेंशन स्कीम को ख़त्म कर दिया था I फिर भी 2014 में उन्होंने भाजपा को ही वोट दिया था I न सिर्फ़ वोट दिया था, बल्कि हर व्यक्ति के खाते में 15 लाख आने जैसे वायदों का मोहल्ले में खूब प्रचार भी किया था I 2019 तक उनकी संघ-भक्ति में धीरे-धीरे काफ़ी गिरावट आ गयी थी, हालांकि इस बार भी वोट उन्होंने मोदी को ही दिया था I इधर उनका बेटा शाखा में तैयार नया पट्ठा बन चुका था, एकदम अगिया बैताल I पर कुछ "बुरी सोहबत" के कारण चन्द महीनों में ही उसकी अटूट आस्था कुछ डगमगाने-चरमराने लगी थी I मोहल्ले की बहसों में वह भाजपा का ही पक्ष लेता था, पर ढेरों ऐसे सवाल होते थे जिनका उसके पास कोई जवाब नहीं होता था I उसकी दुविधाओं को बढाने में मैंने भी अपना आवश्यक योगदान दिया था, हालांकि मोदीजी की दैवी शक्तियों में भक्त की आस्था अभी भी बनी हुई थी एक हद तक I उधर घर की परिस्थितियों ने पिताश्री के साथ भक्त के ऊपर भी प्रभाव डाला था I मँहगाई ने जीना मुहाल कर रखा था I शादी के इंतज़ार में बैठी बहन 30 की होने जा रही थी I शाखा के अन्य साथियों की ही तरह पढाई छूटने के तीन वर्षों बाद भी भक्त बेरोजगार था I संघ और भाजपा के नेताओं की सिफारिशें भी काम न आ सकीं I

इसी बीच कोरोना का प्रकोप-काल आ गया I एकबार फिर संघी संस्कार कुनमुनाकर जाग गए I भक्त और उसके पिताजी ने मोदीजी के आह्वान पर जमकर थाली-ताली बजाई, पटाखे फोड़े और दीया-बाती भी की I लेकिन दीया-बाती के तीसरे दिन ही भक्त के पिताश्री कोरोना पॉजिटिव होकर अस्पताल पहुँच गए I वहाँ कोरोना से ज्यादा अस्पताल की भीषण दुर्व्यवस्था से मरते-मरते बचे I बीस दिन बाद घर लौटे, बेहद मायूस और मोहभंग की मानसिकता में I इधर रोजाना दफ्तर आने का भी फ़रमान आ गया I इसीबीच एक और महत्वपूर्ण घटना घट गयी I लॉकडाउन के दौरान एक शाम पिताश्री दूध और सब्ज़ी लेने निकले I अभी नुक्कड़ की दूकान तक पहुँचे ही थे कि पुलिस के सिपाही ने गरेबान पकड़कर 'माँ-बहन' करते हुए तीन-चार डंडे रसीद कर दिए I उसदिन पिताश्री अपने बरामदे में खड़े होकर भाजपा और मोदी को चिल्ला-चिल्ला कर देर तक गाली देते रहे I

सब्र की आख़िरी हद उस दिन टूट गयी जिस दिन खबर आयी कि जो लोग 30 वर्ष नौकरी कर चुके हैं या जिनकी उम्र 55 साल की हो चुकी है, सरकार उनलोगों को रिटायर करने का फैसला लेने जा रही है I पिताश्री का माथा घूम गया ! क्या होगा रिटायरमेंट के बाद ? पेंशन का क्रिया-कर्म करके उसका लोटा तो अपना लोटा घूमने के पहले अटलजी ही घुमा चुके थे I 2014 से अबतक अगर सात करोड़ नौकरियाँ छिन चुकी हैं, तो साहबज़ादे के नौकरी पाने की कोई उम्मीद तो दूर-दूर तक नहीं है I कारखानों में दिहाड़ी मिलाने तक के लाले पड़े हैं I उसदिन किसी ने खाना नहीं खाया I रात को भी पूरा घर गहन चिंता और अँधेरे में डूबा रहा I

सुबह-सुबह चाय पीते हुए पिता को दिलासा देने की गरज से भक्त ने बात शुरू की,"चिंता की कोई बात नहीं है पिताजी ! अभी कई राज्यों में चुनाव हैं, फिर मोदीजी को 2024 की भी चिंता है I कुछ न कुछ होगा I नौकरियाँ ज़रूर निकलेंगी I कोरोना की आफत बीत जाए तो अर्थ-व्यवस्था भी सुधरेगी I वैसे संघ-भाजपा की कोशिश है ही कि कटुओं को कोई नौकरी या रोज़गार न मिले I आरक्षण को धीरे-धीरे ख़तम किया ही जाना है ! फिर हमारे जैसों के लिए कुछ और स्कोप हो जाएगा I" भक्त अभी कुछ और आशावादी बातें करने वाला था, पर पिताश्री ने इसका मौक़ा ही नहीं दिया I हाथ में लिया कप भक्त के मुँह पर उछाल दिया, सामने की टेबल को ठोकर मारकर किनारे किया और उछलकर भक्त पर चढ़ बैठे I कुर्सी उलट गयी I पिताश्री ने लातों-मुक्कों से मरम्मत करने के बाद भक्त को बरामदे से नीचे गिराकर पास पड़े जूते और लाठी से पीटना शुरू कर दिया I वह जोर-जोर से चीख रहे थे,,"स्साले, @$#%&*@#!, अभी भी तेरे सिर से  'जय श्रीराम' और मोदड़े का भूत नहीं उतरा ? अबे ससुरे, मुसलमानों को बर्बाद करने के चक्कर में तो हमारा ही दिवाला पिट गया भूतनी के ! गदहा है तू ! तुम्हारी अकल मैं ठिकाने लाता हूँ अभी ! ... ..." पिताश्री लगातार चीखते हुए भक्त की सेवा किये जा रहे थे I भक्त को जब लगा कि पिताजी उसकी जान ही ले लेंगे तो वह निकलकर सड़क पर भगा था I

चबूतरे पर बैठा  भक्त सोच रहा था कि नाहक ही उसने पिताजी को दिलासा देने की कोशिश की जिसके चलते इतनी कुटम्मस हो गयी I

(5सितम्‍बर, 2020)

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