नव-उदारवाद के दौर में, विशेषकर नयी शताब्दी के दौरान, वाम धारा के माने जाने वाले कवियों की जो युवा पीढी उभरकर सामने आयी है, उसके बड़े हिस्से की विचारधारात्मक और राजनीतिक चेतना प्रायः भोथरी है, और कभी-कभी भ्रष्ट भी ! इनमें से अधिकांश कलादेवियों के साथ अभिसार करते रहने की दुर्निवार प्रवृत्ति के शिकार हैं I सृजन और चिंतन की जगह ज्यादा समय वे पूँजी की मंडी में छज्जे से झाँकती प्रसिद्धि और स्थापना नामकी वारांगनाओं के साथ नैन-मटक्का करने में और साहित्य की राजनीति का चौपड़ खेलने में खर्च करते हैं !
ऐसे नौबढ़ों की कविताएँ कुछ शुरुआती चौंक-चमत्कार के बाद अपनी ही फार्मूलेबाज़ी की भूल-भुलैया में भटकती रह जाती हैं I आम लोगों की पीड़ा-व्यथाओं-संघर्षों से ऐसे लोगों का कोई जेनुइन सरोकार नहीं होता I न तो ये सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों की और आज के समाज में जीते सजीव मनुष्यों के मानस की, उसके द्वंद्वों और सपनों की, कोई समझ बनाने की कोशिश करते हैं, न इतिहास और मानविकी की कोई समझ बनाने पर ध्यान देते हैं, न ही साहित्य के वैचारिकी की इनकी कोई सुसंगत समझ होती है I
चौंक-चमत्कार पैदा करने के लिए कभी वे गाँव के ओझा-गुनियों की तरह, या किसी सूफ़ी संत की मज़ार पर हाथ में मोरपंखी की झाडू लिए बैठे फ़कीर की तरह, कुछ रहस्यपूर्ण आप्तवचन या सूक्ति बोलते हैं, तो कभी वात्स्यायन के काम-शास्त्र के सम्भोगासनों का "साहसिक" विवरण देने लगते हैं I उनकी इन "साहसिक" अराजक "विद्रोही" अदाओं पर फ़िदा होकर उन्हें पुदीने की झाड़ पर चढ़ाकर बर्बादी का मार्ग दिखाने वाले कुछ शरारती घाघ मठाधीशों की भी हिन्दी जगत में कमी नहीं है I
जिससमय हमारा समाज इतिहास के एक गहनतम संकट से गुज़र रहा है, जो समय देश की 90 प्रतिशत सर्वहारा, अर्द्ध-सर्वहारा और आम मध्यवर्गीय आबादी के लिए दुस्सह पीड़ा-व्यथा का दौर है, जो हत्यारी फासिस्ट सत्ता के बर्बर दमन और सड़कों पर खूनी फासिस्ट गिरोहों के नग्न-वीभत्स नृत्य का दौर है; ऐसे समय में यमुना तट पर नटखट क्रीडा-कल्लोल-केलि में निमग्न इन कंदर्प-कोटि-कमनीय कवि-श्रेष्ठों को इतिहास बजबजाती नाली में खदबदाते पिस्सुओं की ही तरह देखेगा !
(28मई, 2020)

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