Saturday, May 30, 2020


हाल के दिनों में कई लेखक-कलाकार साथियों ने कोरोना-कहर के दौर में हज़ारों कि.मी. की यात्रा पैदल करके अपने गाँवों की ओर चल पड़ने वाले प्रवासी मज़दूरों की भावनाओं को इन शब्दों में अभिव्यक्ति दी कि अब ये मज़दूर थोड़े में गुज़ारा करके इंसान की तरह अपने गाँवों में ही रहेंगे, इसतरह सड़कों पर आवारा पशुओं की तरह भटकने और अनाथ-असहाय मरने के लिए शहर नहीं आयेंगे ! हमलोगों को भी राहत-कार्यों के दौरान ऐसे मज़दूर मिले जो कहते थे कि एक बार बस गाँव पहुँच जाएँ तो कुछ मेहनत-मजूरी करके वहीं रूखी-सूखी खाकर जी लेंगे, पर अब शहर नहीं आयेंगे I

दूसरी ओर ऐसे मज़दूर भी मिले जो कहते थे कि एक बार कोरोना की आफत टले तो फिर शहर तो आना ही पड़ेगा, गाँव में धरा ही क्या है, लम्बे समय तक वहाँ रुककर परिवार को जिला-खिला पाना उनके लिए संभव ही नहीं है जिनके पास कोई खेती नहीं है, या नाम मात्र की खेती है I खेत और भट्ठों की मज़दूरी जैसे अनियमित-अनिश्चित मज़दूरी के कामों से गरीबों के परिवार अब ज़िंदा नहीं रह सकते I

हम समझते हैं कि इस दूसरी कोटि के मज़दूर ज्यादा व्यावहारिक और यथार्थवादी बातें कर रहे थे ! जो पहली कोटि के मज़दूर थे वे वर्तमान समय की भीषण विपत्ति के असह्य दबाव में अति-भावुक होकर यह प्रतिक्रिया दे रहे थे कि अब फिर कभी शहर नहीं आयेंगे ! सच यह है कि आज ज़िंदा रहने के लिए वे गाँवों की ओर भाग रहे हैं, कल फिर ज़िंदा रहने के लिए ही उन्हें शहरों की और भागना पड़ेगा ! जब गाँवों से माइग्रेट करके यह 14-15 करोड़ आबादी शहर आयी थी तो इसीलिये आयी थी कि गाँव में ज़िंदा रहना दूभर हो गया था I ज़िंदगी तात्कालिक भावनाओं के ज्वारों या दबावों से नहीं संचालित होती ! किसी भी उत्पादन-प्रणाली और सामाजिक-आर्थिक संरचना के कुछ सुनिश्चित नियम होते हैं, ज़िंदगी उनसे बंधी होती है I इंसान तात्कालिक भावनाओं के दबाव से क्रान्ति भी नहीं कर सकता I किसी सामाजिक ढाँचे में जब जीवन असह्य हो जाता है तो समाज के उन्नत-चेतस तत्व सामाजिक-आर्थिक गतिकी के नियमों को समझकर ही उस व्यवस्था को बदलने के लिए जनता को जागृत-संगठित कर पाते हैं ! किसी भी सामाजिक संकट की प्रतिक्रिया लेखों में या साहित्य में महज भावोच्छवासों के रूप में नहीं होनी चाहिए ! समाज के विचारशील तत्वों का काम होता है कि वे उस संकट के कारणों को समझें और लोगों को उनके बारे में बताकर सामाजिक परिवर्तन के लिए उनकी चेतना तैयार करने की दिशा में काम करें !

दुःख, गुस्से और निरुपायता में बहुत सारे प्रवासी मज़दूर आज ज़रूर ऐसा सोच रहे हैं कि अब फिर कभी वे शहर नहीं आयेंगे, पर कुछ महीने या साल बीतते-बीतते गाँव में उनकी ज़िंदगी इतनी असह्य हो जायेगी कि फिर वे शहर की ओर रुख करने को मज़बूर होंगे ! जो 14 करोड़ प्रवासी मज़दूर गाँवों से शहर गए थे, या पंजाब-हरियाणा-तराई के फार्मों में काम करने गए थे, उनका एक बहुत छोटा हिस्सा अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने की सोच कर गया था ! 90 प्रतिशत प्रवासी गाँवों में चरम विकल्पहीनता की स्थिति का सामना करने के चलते गए थे ! वे अस्तित्व के संकट के चलते शहर गए थे ! कृषि के पूँजीवादीकरण के साथ ही अनिवार्य तौर पर बड़ा मालिकाना छोटे मालिकाने को धीरे-धीरे लील जाता है ! कृषि के राष्ट्रीय बाज़ार का हिस्सा होने के साथ ही गाँवों में भी पूँजी का जोर चलने लगता है ! सभी छोटे मालिक धीरे-धीरे उजड़कर भूमिहीन सर्वहारा की जमातों में शामिल होते चले जाते हैं ! कृषि-अर्थ-व्यवस्था इतनी बड़ी श्रम-शक्ति को रोज़गार नहीं दे सकती, अतः मज़दूरों के उद्योगों और सेवा-क्षेत्र और शहरी छोटे-मोटे रोज़गारों की ओर विस्थापन की शुरुआत होती है ! क्लासिकी तौर पर, या ऐतिहासिक तौर पर भी औद्योगिक श्रम-शक्ति का निर्माण कृषि-क्षेत्र की सरप्लस मज़दूर आबादी से ही हुआ था ! खेती में पूँजी के प्रवेश के साथ ही किसान आबादी का विभेदीकरण, सर्वहाराकरण और आप्रवासन होना ही होना है I मनरेगा जैसे छोटे-छोटे पंगु-विकलांग "कल्याणकारी" कदम मज़दूरों की करोड़ों की आबादी को गाँवों में जीने के साधन नहीं मुहैय्या करा पायेंगे ! पुराने कृषि-आधारित और सम्बद्ध क्षेत्रो तथा परम्परागत कुटीर उद्योगों में विस्तार की आर्थिक गुंजाइश अब है ही नहीं, और इस मंदी और बाज़ार के संकट के दौर में तो कदापि नहीं है जब मुनाफे की गिरती दर का संकट प्रेत की तरह सभी देशों की पूँजीवादी अर्थ-व्यवस्थाओं के सर पर सवार है I कोरोना के संकट के दौर में गाँव पहुँची मज़दूर आबादी ज्यादा से ज्यादा एक या दो साल तक नमक-रोटी खाकर और आधे पेट खाकर गाँव में गुजारा करेगी ! फिर अस्तित्व के जिस संकट ने उन्हें इतनी यंत्रणाएं झेलकर गाँवों की और जाने को मज़बूर किया है, वही संकट फिर उन्हें खदेड़कर शहरों और औद्योगिक केन्द्रों की ओर धकेलेगा जहाँ वे उजरती गुलामों की तरह खटने के लिए अभिशप्त होंगे ! गाँव और खेती अब मेहनतकशों को जीने के दीर्घकालिक विकल्प दे ही नहीं सकते ! शहर और उद्योग उन्हें उजरती गुलाम (wage slave) बनाकर उनकी हड्डियां निचोड़ लेते हैं, पर किसी न किसी रूप में नरक की ही ज़िंदगी सही, लेकिन ज़िंदा रहने का विकल्प तो दे ही देते हैं ! मंदी या महामारी का कोई अल्पकालिक संकट इतिहास की गति को नहीं मोड़ सकता और राजनीतिक अर्थशास्त्र के बुनियादी नियमों को नहीं झुठला सकता !

मंदी के दौरों में रोज़गार के संकट के चलते मज़दूर एक औद्योगिक इलाके से दूसरे इलाके, और एक सेक्टर से दूसरे सेक्टर स्थानांतरित होते रहते हैं, पर शहरों से गाँवों की ओर ' रिवर्स माइग्रेशन' अब एक आम प्रवृत्ति हो ही नहीं सकती I इसे हम 'क्लास एंगल' से यूँ भी देख सकते हैं कि शहरी मध्य वर्ग की मंझोली और ऊपरी परतों में बहुत ऐसे लोग (प्रायः सवर्ण) हैं जिनकी गाँव में भी खेत और बाग़ , कम या ज्यादा बचे हुए हैं, जिसे उन्होंने भाड़े पर उठा रखा है I जिनकी एकदम ज़मीन नहीं है, या नाम मात्र की ज़मीन है, और रहने को दो कोठरियां हैं, वे जब गाँव में भी थे तो मुख्यतः मज़दूरी करके ही परिवार को जिलाते-खिलाते थे I ऐसी सारी आबादी को ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था लम्बे समय तक कोई रोज़गार दे ही नहीं सकती I जिस शहरी मध्य वर्ग के पास गाँव में भी कुछ जर-ज़मीन है, उसके पास शहर में भी बेहतर रोज़गार, घर, बच्चों की शिक्षा आदि की सुविधा है I वह स्थायी निवास के लिए गाँव कत्तई नहीं जाएगा ! उसके बच्चे भी आधुनिक परिवेश की जनवादी आज़ादी छोड़कर स्थायी तौर पर गाँवों के संकीर्ण रूढ़िवादी माहौल में जाना नहीं चाहेंगे I और जो भूमिहीन मज़दूर है, वह गाँव भला क्योंकर जाना चाहेगा ? उसके लिए वहाँ है ही क्या ? इस आबादी का बहुलांश दलित है, जो गाँव में जितना सामाजिक अपमान झेलता है, उतना उसे शहरी जीवन में नहीं झेलना पड़ता ! इसलिए, महामारी जैसे किसी संकट को छोड़कर वह शहर को ही चुनता है ताकि वहाँ के सीमित आधुनिक और जनवादी स्पेस में थोड़ी सांस ले सके ! गाँव में जो ब्राह्मण, ठाकुर, भूमिहार, कायस्थ, या यहाँ तक कि कुर्मी, कुशवाहा, यादव, जाट, लोध रेड्डी, कम्मा, मराठा आदि मध्य जातियों (किसान जातियों) के छोटे मालिक किसान भी पूँजी की मार से तबाह होते जा रहे हैं, वे नकली जातीय ऐंठ के चलते अपने गाँव में मज़दूरी करना पसंद नहीं करते और शहर में आकर कठोर मेहनत वाली दिहाड़ी को बेहतर विकल्प के रूप में चुनते हैं ! वे शहर इसलिए भी आते हैं कि खुद कठिन मेहनत करके अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर कोई ऐसी नौकरी करने लायक बना सकें जिससे वह शहरी मध्य वर्ग की कतारों में शामिल हो जाए और जातीय श्रेष्ठता के पुराने दंभ को वे जैसे-तैसे बनाए रह सकें ! तात्पर्य यह कि पूँजीवादी समाज में गाँव और शहर के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जाएगा, गाँवों से शहरों की ओर माइग्रेशन की आम प्रवृत्ति बनी रहेगी तथा पूरे राष्ट्रीय उत्पादन तंत्र में, बुनियादी रूप से ज़रूरी होते हुए भी कृषि-अर्थ-व्यवस्था और उनपर आधारित ग्रामीण जीवन सदा हाशिये पर ही बना रहेगा !

(29मई, 2020)

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