सुबह-सुबह साहित्य-प्रतिष्ठानों और प्रतिष्ठान-बद्ध साहित्यकारों के बारे में कुछ अशुभ-अपवित्र और अवांछित विचार
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मेरे ख़याल से कला-साहित्य के प्रतिष्ठान=बूढ़ा-बीमार हाथी I महावत=सत्ता I प्रतिष्ठान के कवि-लेखक=हाथी की अगवानी करते और पिछवाड़े के पीछे भागते कुत्ते I
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साहित्य-प्रतिष्ठान वह बैलगाड़ी होता है जिसे हाँकने वाला गाड़ीवान राजनीतिक सत्ता-तंत्र होता है I साहित्य-प्रतिष्ठानों के पदाधिकारी और उसकी छत्रछाया में जीने वाले साहित्यकार बैलगाड़ी के नीचे चलने वाले उस कुत्ते के समान होते हैं जो समझते हैं कि गाड़ी को वही चला रहे हैं !
(30 अगस्त, 2019)
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मैं ज़िन्दगी के एक-एक लम्हे को संपृक्ति और सरोकार के साथ जीती हूँ। बच्चों से, प्रकृति से, साहित्य-कला, संगीत और अच्छी फिल्मों से बहुत लगाव रखती हूँ। घुमक्कड़ी और साथियों-दोस्तों के साथ गप्पें मारना खूब पसंद है। लेकिन मुझे मेरा गुस्सा और क्षोभ कम करने की और "प्रैक्टिकल" बनाने की "नेक" सलाह मेरे शुभचिन्तक मित्र प्लीज़ न दिया करें। मैं अपने आसपास की दुनिया को प्यार करती हूँ और उसे सुंदर देखना चाहती हूँ। मैं ज़िन्दगी की तमाम कुरूपताओं, बुराइयों और मानवद्रोही प्रवृत्तियों से, तमाम पाखण्ड, छल-छद्म और दुरंगेपन से गहरी घृणा करती हूँ । इसलिए आज के समय और समाज में जीते हुए क्षुब्ध और क्रुद्ध रहती हूँ ! मैं खुश होना जानती हूँ और होती भी हूँ पर हरदम ठिठोलीबाज़ी करते रहना और दांत चियारते रहना मुझे बिल्कुल पसंद नहीं। हल्की, स्तरहीन बातें भी मुझे फूटी आँखों नहीं सुहातीं। कुरूपताओं और बर्बरताओं के ऐतिहासिक साम्राज्य में सदा खुश और संतुष्ट जीवन बिताने वाले लोग निहायत असंवेदनशील और बेरहम लोग ही हो सकते हैं। मैं ऐसे लोगों से बहुत दूर रहना चाहती हूँ और उनसे फ़ेसबुक पर आभासी मित्रता का रिश्ता भी नहीं रखना चाहती।
(1सितम्बर, 2019)
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हिन्दी समाज अभी भी वस्तुपरक तार्किक विमर्श के क़ाबिल नहीं बन सका है I लिजलिजी किस्म की रूमानियत और अतिभावुक विद्रोहों की ओर यूँ भागता है जैसे गुड़ की ढेली की ओर चींटा !
हिन्दी-पट्टी का औसत नागरिक दरअसल प्रेम के मामले में कैशोर्य और शुरुआती युवापन से आगे की आयु में कभी पहुँच ही नहीं पाता I समझदार लोग भी बौद्धिक धरातल पर निराला,शमशेर, फैज़, फिराक़ आदि की रचनाओं में प्रेम के निरूपणों-आख्यानों को भले सराह लें, दिल उनका सच में गुलजार, बशीर बद्र, शहरयार, निदा फाज़ली वगैरह पर ही टूटकर फ़िदा होता है ! अमृता प्रीतम की जब भी बात होती है, उनके साहित्य से अधिक अमृता-साहिर-इमरोज़ के प्रसंगों में खो जाते हैं और भाव-विगलित होकर कुछ कहने-सुनने लगते हैं !
मुझे तो अमृता प्रीतम का लेखन रूमानियत और भावुकता के अतिरेक से एकदम लिसलिस-चिटचिट करता महसूस होता है, बात चाहे मुहब्बत की हो या बगावत की ! जो सच्चा यथार्थवादी साहित्य होता है वह मुहब्बत और बगावत के तमाम रोमैंटिक आवेग के साथ वस्तुपरकता के गुरुत्व को कभी नहीं खोता !
मुझे अमृता प्रीतम गद्य में वहीं खड़ी दीखती हैं जहाँ कविता में गुलजार या बशीर बद्र ! वह एक ओवररेटेड लेखिका हैं ! मुझे इस्मत चुगताई और कृष्णा सोबती, और एक अलग ज़मीन पर कुर्रतुल एन हैदर, उनसे मीलों आगे दीखती हैं !
(2सितम्बर, 2019)
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पाँच सालों में तत्काल सेवा से रेलवे ने 25000 करोड़ की अतिरिक्त कमाई की । रिज़र्व बैंक के आरक्षित कोष से 1लाख76 हज़ार करोड़ निकाल लिया । बैंकों ने विभिन्न सेवाओं पर तरह-तरह के शुल्क और दंड लगाकर अरबों-खरबों के वारे-न्यारे कर लिए । अब नए मोटर चालान अधिनियम से धुआंधार जनता की जेब ढीली की जाएगी । यह तो वैध लूट हुई । अवैध लूट और घोटालों का तो कोई हिसाब ही नहीं । हम तो समझते थे कि यह हत्यारों और दंगाइयों की सरकार है, लेकिन यह तो ठगों-बटमारों-गिरहकटो-सेंधमारों-डकैतों की भी सरकार है ! नमो-नमो!
(3सितम्बर, 2019)
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वोले शोयिंका ने कहा है कि किताबें और हर तरह का लेखन उनके लिए आतंक की चीज़ें हैं जो सच्चाई को दबाना चाहते हैं I मेरे ख़याल से यह अधूरी बात है I ऐसे भी लेखक हैं जो सच्चाई को दबाने या छुपाने के लिए ही लिखते हैं I सच्चाई से डरने वाले शासक ऐसे लेखकों को पुरस्कृत करते हैं I जिन लेखकों को कोई आतताई सत्ता पुरस्कृत-सम्मानित करती है, वे घृणित लोग हैं, लेखक के नाम पर कलंक हैं ! वे भाड़े के टट्टू हैं !
(3सितम्बर, 2019)
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हिन्दी कविता में कुछ लोगों ने हमेशा से कुछ खित्तों को नंदन कानन सरीखा रमणीय और अलौकिक सौन्दर्य से परिपूर्ण बनाए रखा है ! यहाँ निरंतर कभी मदनोत्सव तो कभी वसन्तोत्सव के मधुर-मनोरम-रम्य दृश्य सजे रहते हैं!
समाज में चाहे विपत्तियों-अनिष्टों-अत्याचारों-बर्बरताओं का जितना भी गगनभेदी कोलाहल हो, साहित्य के इस उपक्षेत्र के मार्गों-उपमार्गों-वीथिकाओं-कुंजों औरअलिन्दों में जारी कला के उल्लास-पर्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता I वहाँ अलंकृत रेशमी वस्त्राभरण धारण किये भोगवादी, उपभोगवादी, सम्भोगवादी, अधिशेषभोगवादी, रूपवादी, कलावादी, समाधिवादी, उत्तर-विचारवादी -- सभी कवि गण आमोद-प्रमोद करते हुए रमण और विचरण करते रहते हैं !
बीच-बीच में रथों पर आरूढ़ राजपुरुष रत्न और स्वर्ण-मुद्राएँ बिखेरते हुए आते हैं और कुलीन कलावंत कवियों को अलंकृत-पुरस्कृत करके चले जाते हैं !
कविता के वाम-जनवादी खित्तों के खुले मैदानों में खड़े शिविरों में जो रात्रि-विमर्श-सभाएं होती थीं, उनमें कई विभूतियों ने बार-बार ये विचार रखे कि वाम-जनवादी कविता की एकांगिता, यांत्रिकता और इकहरेपन को दूर करने के लिए आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है कि हम भी नंदन-काननों में जारी वसंतोत्सवों-मदनोत्सवों की ओर यदा-कदा झाँक लिया करें और वहाँ आने वाले राजपुरुषों से भी टैक्टिकली कुछ निकटता बनाएं ! चूंकि जन-हित के साथ स्व-हित भी आवश्यक है, अतः पद-पीठ-पुरस्कारों-सम्मानों से भी दूरी नहीं रखनी चाहिए ! सत्ता को बदलने के लिए आवश्यक है कि सत्ता में घुसकर उसे समझा जाए I यह करते हुए हमें जनवादी कविता में पतंगें और कबूतर उड़ाने होंगे, रेशम के धागे कातने होंगे और उस इकहरेपन, सपाटपन और यांत्रिकता से मुक्ति पानी होगी जो हमारे प्रयोजन को स्पष्ट कह देता है I कविता का मतलब यह है कि हम इसतरह अपनी बात कहें कि लोग समझ ही न पायें, या, उनके कई-कई अर्थ निकाले जा सकते हों !'
इसतरह वाम-जनवादी कविता को कुछ दूरद्रष्टा कवियों ने अलौकिक कलाओं के झालर-फुन्दनों से सजाया और आने वाली पीढ़ियों को रास्ता दिखाया I
कुछ वाचाल और उद्दंड काव्यद्रोही- कलाद्वेषी लोग इन महापुरुषों को 'सत्ताकामी वामी', 'पद-पीठ-पुरस्कारवादी', 'वसंतकुंजवासी, 'सुखचैनवादी', 'डकारवादी' और 'दोपहरकीनींदवादी' कहा करते हैं !
(5सितम्बर, 2019)

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