
मोदी-शाह ने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है ! कर्फ्यू के दौरान घाटी के आम लोगों को सैन्य बलों और पुलिस के हाथों किन परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, इसकी कई रपटें कई न्यूज़ पोर्टल्स पर आ चुकी हैं I अब बी.बी.सी. की यह रिपोर्ट देखिये I कर्फ्यू के सन्नाटे को तोड़ते हुए, सेना की परवा किये बगैर लोग सड़कों पर उतरने लगे हैं ! और यह तो अभी महज शुरुआत है I मोदी-शाह को बहुत महँगी कीमत चुकाकर यही सबक मिलने वाला है कि संवैधानिक अंधेरगर्दी और सेना की बंदूकों के बूते कश्मीर में शान्ति-बहाली न अबतक हो सकी है, न ही आगे कभी हो पायेगी I घाटी में इन हालात में एक भी बाहरी आदमी का जाकर बसना तो दूर, एक भी कश्मीरी पंडित परिवार की वापसी मुमकिन नहीं हो पायेगी ! वहाँ का माहौल फिलिस्तीनी इन्तेफादा जैसा होता जा रहा है और ऐसे माहौल को सेना के बूते नहीं बदला जा सकता I
जिस कश्मीरी अवाम ने जिन्ना की सांप्रदायिक राजनीति को ख़ारिज करके सेक्युलर राजनीति और भारत का साथ चुना था, उसे अलगाव में डालने का सिलसिला तो तभी शुरू हो गया था जब नेहरू ने शेख अब्दुल्ला की सरकार को बर्खास्त करके उन्हें जेल में डाल दिया था I इसे और अधिक गति मिली 1980 के दशक में, जब तमाम वायदा-खिलाफियों के बाद घाटी में अफ्स्पा लागू हुआ और राज्यपाल जगमोहन की साजिशों के चलते घाटी से पंडितों के पलायन के हालात पैदा हुए I पाकिस्तान ने भी इसी दौर में कुछ धार्मिक कट्टरपंथी आतंकी गुटों को शह देने की राजनीति को तेज़ कर दिया ! अब संविधान के अनुच्छेद 370 और 35-A को रद्द करके, जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्ज़ा छीनकर, और उसे पूर्ण राज्य भी नहीं बल्कि दो केंद्र-शासित प्रदेशों में बाँटकर मोदी ने जो गेम खेला है, उससे घाटी में जन-विद्रोह का एक नया इतिहास शुरू होने जा रहा है I
दरअसल मोदी-शाह का असली मक़सद ही कुछ और है ! अनुच्छेद-370 और 35-A ख़तम करके वे पूरे देश में यह सन्देश देना चाहते हैं कि भाजपा अपने वायदों को पूरा करने के लिए कटिबद्ध है और देश की एकता-अखण्डता के प्रति प्रतिबद्ध है I कश्मीर घाटी में लगभग शत-प्रतिशत मुस्लिम आबादी होने की वस्तुगत स्थिति के साथ एक धार्मिक कोण जोड़ते हुए वे संघ के सांप्रदायिक एजेंडा को भी इसी बहाने पूरे देश में आगे बढ़ायेंगे I आने वाले दिनों में घाटी में प्रतिरोध की आग लगातार सुलगती रहेगी और पूरे देश में अर्थ-व्यवस्था के ध्वंसकारी संकट के साथ जनाक्रोश की जो भीषण आग लगेगी, उसे साम्प्रदायिकता और अंध-राष्ट्रवाद की लहर फैलाकर काबू करने के लिए घाटी के हालात का लाभ उठाया जाएगा !
कश्मीर-समस्या का एक और भी आयाम है I अमेरिका अब किसी भी कीमत पर अफगानिस्तान से पिंड छुड़ाकर पीछे हटना चाहता है I सत्ता में भागीदारी के लिए, या सत्ता-हस्तांतरण के लिए पाकिस्तान-समर्थित तालिबान से उसकी वार्ताएँ जारी हैं जिनमें पाकिस्तान अहम भूमिका निभा रहा है I एक बार अफगानिस्तान में जब तालिबान राजनीति की मुख्य धारा में आ जाएगा और सत्ता का भागीदार बन जाएगा, तो पाकिस्तानी सत्ता उधर से खाली होकर कश्मीर में आतंकी गुटों के सहारे अपने निहित स्वार्थों की राजनीति पर अधिक ध्यान दे सकेगी I पाकिस्तान-समर्थित आतंकवाद की राजनीति बेशक़ कश्मीरी जन-समुदाय के संघर्ष को भी नुक्सान ही पहुँचायेगी, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि भारतीय सेना के अंगूठे तले दबे रहने की परिस्थितियों में निराशा और 'ओवर-रिएक्शन' के चलते घाटी की जनता में भी पाकिस्तान का और आतंक की राजनीति का समर्थन-आधार किसी हद तक बढ़ जाएगा और मज़बूत हो जाएगा ! बहरहाल, मोदी-शाह गिरोह को इसकी चिंता नहीं है क्योंकि इन हालात में उनको पूरे देश में अंध-राष्ट्रवाद और धार्मिक कट्टरपंथ की राजनीति को हवा देने में और संघ के एजेंडा को आगे बढ़ाने में विशेष मदद मिलेगी ! देश महाविनाश के गर्त्त में जाए, इससे उन्हें क्या फ़र्क पड़ता है ! बल्कि फासिस्टों का तो काम यही है !
(11अगस्त, 2019)
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