Friday, August 16, 2019


"जा-जा, मुसल्लों का बिस्तर गर्म कर", "जा-जा, पाकिस्तान चली जा, इमरान खान तेरा इंतज़ार कर रहा है", "सेक्स की भूखी", "जे.एन.यू. के कंडोम", "फ्री सेक्स वाली", "रंडी", "हराम की जनी" ... ... जब भी फासिज्म की राजनीति के किसी पहलू पर कोई पोस्ट डालो, भगवा भेड़िये इसी किस्म की सैकड़ों वीभत्स स्त्री-विरोधी गालियों के साथ टूट पड़ते हैं और इनबॉक्स अश्लील मेसेज, गालियाँ और गंदे चित्र भेजना शुरू कर देते हैं ! यह फेसबुक पर उपस्थित मेरे जैसी किसी आम स्त्री के ही अनुभव नहीं हैं ! गालियों का निशाना तसलीमा नसरीन, अरुंधती रॉय, स्वरा भास्कर आदि-आदि भी उसीतरह बनाई जाती हैं ! यही नहीं, इतिहास में पीछे जाकर विजय लक्ष्मी पंडित, इंदिरा गाँधी आदि पर भी अश्लील और यौनिकता-केन्द्रित वीभत्स आरोप लगाना सभी फासिस्टों और धार्मिक कट्टरपंथियों का एक मुख्य हथकंडा होता है !

'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते' की सच्चाई तो उससमय सामने आती है, जब आप तर्क, विज्ञान, सेकुलरिज्म, आधुनिकता या स्त्री-पुरुष समानता की बात करते हैं और जुनूनी भक्त फासिस्टों के नायक और उनकी विचारधारा और राजनीति पर कोई सवाल उठाते हैं ! थोड़ी देर तक शाखाओं, शिशु-मंदिरों, गोदी मीडिया और व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी से प्राप्त थोथी जानकारियों के बूते कठदलीली करने की निष्फल कोशिशों के बाद देशद्रोही होने के आरोप और फिर गालियों की ऐसी बौछार ज्यों गंदा नाला नदियों में गन्दगी उड़ेलता है !

जब तर्क न हो तो कोई भी उन्मादी किस्म का भक्त गाली ही देगा ! लेकिन सोचने की बात है कि फासिस्ट चेतन और अवचेतन मस्तिष्क में स्त्रियों के विरुद्ध कितनी नफ़रत, कितनी रुग्ण कल्पनाएँ और फंतासियाँ, कितने वहशी किस्म के हिंसक विचार क्यों बजबजाते रहते हैं ! इसके कुछ बुनियादी कारणों की ओर मैंने पिछली पोस्ट में इंगित किया है ! अगर उसमें कुछ और पक्षों को जोड़ दें तो बात और संतुलित हो जायेगी !

विलियम राइख ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द मास साइकोलोजी ऑफ़ फासिज्म' में फासिस्ट मानस का प्रभावशाली मनोविश्लेषण किया है I राइख के अनुसार, किसी फ्यूहरर या पितातुल्य-गुरुतुल्य व्यक्तित्व या प्रक्षेपित महानायक के सामने झुकने की पूर्व शर्त 'यौनिकता का दमन' (सेक्सुअल रिप्रेशन) होता है I दमित यौनिकता का व्यापक प्रसार अंधी आस्था का एक आधार होता है और मॉब-लिंचिंग, सामूहिक बलात्कार, नर-संहार जैसी अतिरेकी हिंसा की घटनाओं में अभिव्यक्ति पाता है ! जब ऐसी घटनाओं के विस्फोट का वक़्त नहीं होता है तो रोजमर्रा के जीवन में बर्बर और वीभत्स शाब्दिक हिंसा के जरिये फासिस्ट मानस की दमित यौनिकता अभिव्यक्त होती रहती है ! सोशल मीडिया पर और अन्यत्र जो भाड़े के और स्वयंसेवी ट्रोल सक्रिय रहते हैं और दिन-रात गालियाँ देने और कुत्सा-प्रचार का ही काम करते रहते हैं, उनका एक हिस्सा उन पीले-बीमार चेहरे वाले बेरोजगार या छोटी-मोटी अनियमित नौकरियों मे लगे मध्यवर्गीय नौजवानों का होता है, जो वैसे भी स्वस्थ मित्रताओं और सामाजिक संपर्कों से वंचित होते हैं ! उनके दिमाग में या तो शाखा, शिशु मंदिर की शिक्षा, या गोदी मीडिया और व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी का प्रचार भरा हुआ होता है I एक दूसरा हिस्सा है जो आई.टी. सेक्टर में या कहीं अच्छी-भली नौकरी करता है या व्यापार करता है या एन.आर.आई. है, पर उसके दिमाग में भी वही शिक्षा और प्रचार-सामग्री भरी हुई है I जीवन की तमाम सुविधाओं के बावजूद वह भी अलगाव का शिकार है, आर्थिक-सामाजिक मसलों पर फासिस्टों का लोक-रंजक प्रचार और अंध-राष्ट्रवाद उसे भाता है ! तमाम आधुनिक जीवन के बावजूद आबादी का यह हिस्सा भी स्त्री-विरोधी पूर्वाग्रह और दमित यौनिकता का बुरी तरह शिकार होता है !

फासिस्टों और धार्मिक कट्टरपंथियों के स्त्री-विरोधी मानस और यौनिक रुग्णताओं के शेष जिन कारणों की मैने अपनी पिछली पोस्ट में चर्चा की है, उनसे जोड़कर ही इस पोस्ट में वर्णित विश्लेषण को पढ़ा जाना चाहिए !

(11अगस्‍त, 2019)

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