ये नागपुरिया तबेले के खच्चर-टट्टू जब भी रेंकते हैं तो आपलोगों को ताज्जुब क्यों होता है महराज ! ये तो हरदम ही ऐसी 'देववाणी' बोलते रहते हैं और इनके पुनीत गुह्य कर्मों के ई.डी.-सी.डी. भी तो घूमते ही रहते हैं !
दुनिया में फासिस्टों के अन्तरंग जीवन और चिंतन पर भी काफ़ी अध्ययन हुए हैं ! यह जगजाहिर सी बात है कि जितने भी फासिस्ट या किसी भी किस्म के धार्मिक कट्टरपंथी (चाहे संघी हों या मुसंघी) होते हैं, वे घनघोर काम-कुंठित और चरम यौन-बुभुक्षित होते हैं ! शाखाओं में ब्रह्मचर्य की महिमा बताते हुए औरतों को जिसतरह हीन योनि का प्राणी, नरक का द्वार आदि बताया जाता है, उससे इनके दिमागों में स्त्रियों को लेकर प्रचंड रुग्ण और हीन ग्रंथि बन जाती है I इनके धार्मिक रूढिगत विचार इन्हें स्त्रियों को घरों और परम्पराओं में क़ैद करके रखने की शिक्षा देते हैं (नागपुरिया संतरों का मुच्छड़ सरदार तो बार-बार यह कहता रहता है ) I दूसरी ओर आज के आधुनिक सामाजिक जीवन में इनकी राजनीतिक विवशता होती है कि ये आधुनिक स्त्रियों को राजनीति में, यहाँ तक कि अपनी पार्टी में भी बर्दाश्त करें ! इस तनाव में इनका व्यक्तित्व विभाजित हो जाता है ! एकतरफ ये "पराई" स्त्रियों को माता-बहन आदि कहते रहते हैं, दूसरी और "आज़ाद" स्त्रियों को औकात दिखा देने के लिए, उन्हें "जीत लेने" के लिए इनकी आत्मा ऐंठती रहती है I
मानवीय प्यार केवल बराबरी और समता के आधार पर ही संभव होता है ! चूँकि एक फासिस्ट को स्त्री की खंडित और आभासी स्वतन्त्रता भी स्वीकार्य नहीं होती, इसलिए दरअसल वह स्त्री-पुरुष के बीच स्वस्थ प्यार के रिश्तों से एकदम अपरिचित होता है ! उसकी आत्मा की जगह एक खोखल होता है और वह श्मशान में खड़े एक ठूँठ की तरह होता है, क्योंकि उसके भीतर मानववाद और जनवाद के मूल्य आंशिक और खंडित रूप में भी नहीं होते ! प्यार के बारे में वह जानता ही नहीं ! वह केवल काबू करने, कण्ट्रोल करने, जीतने के टर्म्स में ही सोचता है ! उसका यौन-जीवन दरअसल प्यार-रिक्त यौन-भोग मात्र होता है, घोड़े और कुत्ते के माफिक ! ऊपर से वह धर्म-ध्वजाधारी, सदाचारी, देशव्रती प्राणी बना रहता है, पर उसका आत्मिक जीवन नरक का बजबजाता हुआ रसातल होता है !
अक्सर होता यह है कि किन्हीं असावधान क्षणों में उसकी आत्मा की गंद शब्दों में ढलकर बाहर बहने लगती है ! जब कोई फासिस्ट भक्त कश्मीर जाकर लड़की लाने की, या वहाँ की गोरी लड़कियों के साथ घर बसाने की बात करता है, या बिहार से हरियाणा लड़की लाने की बात करता है, तो दरअसल वह अपनी अंदरूनी गंद की सरेआम सड़क पर उल्टी कर रहा होता है I इसमें उसकी एक और कुंठा शांत होती है I चूँकि फासिस्ट औरत को जायदाद या जागीर समझते हैं, इसलिए ऐसी बात करते समय उनके भीतर "शत्रु-दलन" का भाव भी होता है I दंगों के दौरान सामूहिक बलात्कार का इस्तेमाल भी ये पशु अक्सर एक राजनीतिक हथियार के रूप में भी करते हैं !
(10अगस्त, 2019)

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