सबसे बुरा
तब होता है जब लोग -- जाने-अनजाने --
अपने भीतर एक क़ैदख़ाना
लिये चलने लगते हैं I
-- नाज़िम हिकमत
(नौ-दस बजे रात की कविताएँ)
******
मैं वायदा नहीं कर सकता
शान्त, गरिमामय,
और असम्पृक्त बने रहने का,
समंदर किनारे पड़े चट्टान सरीखा ...
अगर मेरा हृदय फट पड़ने को है,
तो इसे फट जाने दो क्रोध से,
व्यथा से,
या ख़ुशी से I
-- नाज़िम हिकमत
("To Lydia Ivanna”)
*******
जुदाई नहीं होती है वक़्त या फ़ासला
यह हमारे बीच एक पुल है
रेशम के धागे से भी बारीक
तलवार से भी तेज़
-- नाज़िम हिकमत
********
[एक बेहद कठिन समय में जब अँधेरा गहराता जा रहा हो और आपको भविष्य और आने वाली पीढ़ियों की खातिर बर्बरता की शक्तियों के विरुद्ध एक निर्मम-निर्णायक संघर्ष में उतरने की तैयारी करनी हो तो अपने हृदय की तरलता को, सपनों को, कविता को बचाए रखना ज़रूरी होता है ! इस तरलता से आपको धारा के विरुद्ध तैरने की शक्ति मिलती है, साहस मिलता है I कविता हमारा यह प्रयोजन सिद्ध करती है ! नाज़िम हिकमत ने आततायी सत्ता से लड़ते हुए जेलों में नारकीय जीवन भी बिताया, पर उनके हृदय में बच्चों, भविष्य और मनुष्यता के प्रति वह तरलता बनी रही जहाँ से कविता की अन्तर्धाराएँ फूटती हैं ! उन्होंने मनुष्यता के भविष्य के प्रति उम्मीद कभी नहीं छोड़ी I यही उनकी कविताओं की शक्ति है और इसीलिये कठिन समयों में वे हमें और अधिक आत्मीय लगती हैं ! कवियों को नाज़िम हिकमत से जानना चाहिए कि सुन्दर और शक्तिशाली कविता के वास्तविक स्रोत क्या हैं ! बाक़ी, शब्दों से सुन्दर पच्चीकारी करने वाले, बारीक रेशमी कतान और महीन तराश वाले तो बहुत घूम रहे हैं कविताओं का खोमचा सजाये, इस उम्मीद में कि महामहिमों की निगाह पड़ेगी तो कुछ इनामो-इकराम हासिल हो जायेंगे ! बहरहाल, आप नाज़िम हिकमत की यह ख़ूबसूरत कविता पढ़िए !]
.
चलो यह दुनिया सिर्फ़ एक दिन के लिए बच्चों को सौंप दें
खेलने के लिए चमकदार और चित्ताकर्षक रंगों वाले एक बैलून की तरह
और उन्हें खेलने दें सितारों के बीच गाते हुए
चलो बच्चों को दे दें यह दुनिया एक बहुत बड़े सेब की तरह, एक गरमागरम पावरोटी की तरह
कम से कम एक दिन उन्हें किसी चीज़ की कमी न हो
बच्चों को दे दें यह दुनिया
कम से कम एक दिन के लिए दुनिया को सीखने दें दोस्ती करना
बच्चे हमारे हाथों से हासिल करेंगे यह दुनिया
और वे रोपेंगे अनश्वर पौधे !
-- नाज़िम हिकमत
('बच्चों को दे दें यह दुनिया')
**********
बीजों में, धरती में, सागर में भरोसा करना,
मगर सबसे अधिक लोगों में भरोसा करना I
बादलों को, मशीनों को, और किताबों को प्यार करना,
मगर सबसे ज्यादा लोगों को प्यार करना I
ग़मज़दा होना
एक सूखी हुई टहनी के लिए,
एक मरते हुए तारे के लिए,
और एक चोट खाए जानवर के लिए,
लेकिन सबसे गहरे अहसास रखना लोगों के लिए I
खुशी महसूस करना धरती की हर रहमत में --
अँधेरे और रोशनी में,
चारों मौसमों में,
लेकिन सबसे बढ़कर लोगों में I
-- नाज़िम हिकमत
('मेरे बेटे के नाम आख़िरी चिट्ठी')
********
अज़ीम इन्सानियत
.
अज़ीम इन्सानियत जहाज़ के डेक पर सफ़र करती है
रेलगाड़ी में तीसरे दर्ज़े के डब्बे में
पक्की सड़क पर पैदल
अज़ीम इन्सानियत I
.
अज़ीम इन्सानियत आठ बजे काम पर जाती है
बीस की उम्र में शादी कर लेती है
चालीस तक पहुँचते मर जाती है
अज़ीम इन्सानियत I
.
रोटी काफ़ी होती है सबके लिए अज़ीम इन्सानियत को छोड़कर
चावल के साथ भी यही बात
चीनी के साथ भी यही बात
कपड़ों के साथ भी यही बात
किताबों के साथ भी यही बात
काफ़ी होती हैं चीज़ें सबके लिए अज़ीम इन्सानियत को छोड़कर I
.
अज़ीम इन्सानियत की ज़मीन पर छाँह नहीं होती
उसकी सड़क पर बत्ती नहीं होती
उसकी खिड़की पर शीशे नहीं होते
पर अज़ीम इन्सानियत के पास उम्मीद होती है
उम्मीद के बिना तुम ज़िन्दा नहीं रह सकते I
.
-- नाज़िम हिकमत
********
म्यूज़ियम घूमना अच्छी बात है
लेकिन म्यूज़ियम में रखी हुई चीज़ बन जाना खौफ़नाक है !
-- नाज़िम हिकमत
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तब होता है जब लोग -- जाने-अनजाने --
अपने भीतर एक क़ैदख़ाना
लिये चलने लगते हैं I
-- नाज़िम हिकमत
(नौ-दस बजे रात की कविताएँ)
******
मैं वायदा नहीं कर सकता
शान्त, गरिमामय,
और असम्पृक्त बने रहने का,
समंदर किनारे पड़े चट्टान सरीखा ...
अगर मेरा हृदय फट पड़ने को है,
तो इसे फट जाने दो क्रोध से,
व्यथा से,
या ख़ुशी से I
-- नाज़िम हिकमत
("To Lydia Ivanna”)
*******
जुदाई नहीं होती है वक़्त या फ़ासला
यह हमारे बीच एक पुल है
रेशम के धागे से भी बारीक
तलवार से भी तेज़
-- नाज़िम हिकमत
********
[एक बेहद कठिन समय में जब अँधेरा गहराता जा रहा हो और आपको भविष्य और आने वाली पीढ़ियों की खातिर बर्बरता की शक्तियों के विरुद्ध एक निर्मम-निर्णायक संघर्ष में उतरने की तैयारी करनी हो तो अपने हृदय की तरलता को, सपनों को, कविता को बचाए रखना ज़रूरी होता है ! इस तरलता से आपको धारा के विरुद्ध तैरने की शक्ति मिलती है, साहस मिलता है I कविता हमारा यह प्रयोजन सिद्ध करती है ! नाज़िम हिकमत ने आततायी सत्ता से लड़ते हुए जेलों में नारकीय जीवन भी बिताया, पर उनके हृदय में बच्चों, भविष्य और मनुष्यता के प्रति वह तरलता बनी रही जहाँ से कविता की अन्तर्धाराएँ फूटती हैं ! उन्होंने मनुष्यता के भविष्य के प्रति उम्मीद कभी नहीं छोड़ी I यही उनकी कविताओं की शक्ति है और इसीलिये कठिन समयों में वे हमें और अधिक आत्मीय लगती हैं ! कवियों को नाज़िम हिकमत से जानना चाहिए कि सुन्दर और शक्तिशाली कविता के वास्तविक स्रोत क्या हैं ! बाक़ी, शब्दों से सुन्दर पच्चीकारी करने वाले, बारीक रेशमी कतान और महीन तराश वाले तो बहुत घूम रहे हैं कविताओं का खोमचा सजाये, इस उम्मीद में कि महामहिमों की निगाह पड़ेगी तो कुछ इनामो-इकराम हासिल हो जायेंगे ! बहरहाल, आप नाज़िम हिकमत की यह ख़ूबसूरत कविता पढ़िए !]
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चलो यह दुनिया सिर्फ़ एक दिन के लिए बच्चों को सौंप दें
खेलने के लिए चमकदार और चित्ताकर्षक रंगों वाले एक बैलून की तरह
और उन्हें खेलने दें सितारों के बीच गाते हुए
चलो बच्चों को दे दें यह दुनिया एक बहुत बड़े सेब की तरह, एक गरमागरम पावरोटी की तरह
कम से कम एक दिन उन्हें किसी चीज़ की कमी न हो
बच्चों को दे दें यह दुनिया
कम से कम एक दिन के लिए दुनिया को सीखने दें दोस्ती करना
बच्चे हमारे हाथों से हासिल करेंगे यह दुनिया
और वे रोपेंगे अनश्वर पौधे !
-- नाज़िम हिकमत
('बच्चों को दे दें यह दुनिया')
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बीजों में, धरती में, सागर में भरोसा करना,
मगर सबसे अधिक लोगों में भरोसा करना I
बादलों को, मशीनों को, और किताबों को प्यार करना,
मगर सबसे ज्यादा लोगों को प्यार करना I
ग़मज़दा होना
एक सूखी हुई टहनी के लिए,
एक मरते हुए तारे के लिए,
और एक चोट खाए जानवर के लिए,
लेकिन सबसे गहरे अहसास रखना लोगों के लिए I
खुशी महसूस करना धरती की हर रहमत में --
अँधेरे और रोशनी में,
चारों मौसमों में,
लेकिन सबसे बढ़कर लोगों में I
-- नाज़िम हिकमत
('मेरे बेटे के नाम आख़िरी चिट्ठी')
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अज़ीम इन्सानियत
.
अज़ीम इन्सानियत जहाज़ के डेक पर सफ़र करती है
रेलगाड़ी में तीसरे दर्ज़े के डब्बे में
पक्की सड़क पर पैदल
अज़ीम इन्सानियत I
.
अज़ीम इन्सानियत आठ बजे काम पर जाती है
बीस की उम्र में शादी कर लेती है
चालीस तक पहुँचते मर जाती है
अज़ीम इन्सानियत I
.
रोटी काफ़ी होती है सबके लिए अज़ीम इन्सानियत को छोड़कर
चावल के साथ भी यही बात
चीनी के साथ भी यही बात
कपड़ों के साथ भी यही बात
किताबों के साथ भी यही बात
काफ़ी होती हैं चीज़ें सबके लिए अज़ीम इन्सानियत को छोड़कर I
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अज़ीम इन्सानियत की ज़मीन पर छाँह नहीं होती
उसकी सड़क पर बत्ती नहीं होती
उसकी खिड़की पर शीशे नहीं होते
पर अज़ीम इन्सानियत के पास उम्मीद होती है
उम्मीद के बिना तुम ज़िन्दा नहीं रह सकते I
.
-- नाज़िम हिकमत
********
म्यूज़ियम घूमना अच्छी बात है
लेकिन म्यूज़ियम में रखी हुई चीज़ बन जाना खौफ़नाक है !
-- नाज़िम हिकमत
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