(देश में फासिज्म का खूनी अँधेरा गहराता जा रहा है I राज्य कारपोरेशनों की सेवा ही नहीं कर रहा है, बल्कि राज्य और कारपोरेशनों का लगभग परस्पर विलय हो चुका है I बुर्जुआ जनवाद की जर्जर लंगोटी भी चिंदी-चिंदी हो गयी है I एक के बाद एक काले कानूनों की आमद होती जा रही है I सड़कों पर बर्बर भीड़ हिंसा का नंग नाच कर रही है और बेगुनाहों को निशाना बना रही है ! क़ब्र से निकलकर गेस्टापो के दस्ते ज़ोम्बियों के गिरोहों की तरह गलियों-पार्कों में मार्च कर रहे हैं ! लोग संगीनों की नोक पर "विकास" के लिए दर-ब-दर किये जा रहे हैं ! जंगल-जल-ज़मीन के दावेदारों की लाशें बिछाई जा रही हैं ! कुछ कबूतर-दिल बौद्धिक झुकने को कहने पर रेंगने लगे हैं और कुछ हत्यारों की अगवानी के लिए शास्त्रीय रागों में स्वागत-गान रच रहे हैं I फिलहाल चारो ओर मरघट का सन्नाटा पसरा है I पर जैसा कि इतिहास बताता है, यह 'इतिहास का अंत' नहीं है I आतंक, मौतों और दमन का यह दौर चिरंतन नहीं है I सतह के नीचे आँधियों के बीज जीवित पड़े हैं ! समय आने पर उनसे तूफानों की फसल तैयार होगी ही I तबतक, आज के माहौल को सटीक ढंग से बयान करने वाली फ़ैज़ की इस नज़्म की रूह तक पहुँचने की कोशिश की जा सकती है ! इस नज़्म में सिर्फ़ आज की तस्वीर ही नहीं है, बल्कि आने वाले कल के इशारे भी हैं !)
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निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले जिस्म ओ जाँ बचा के चले
है अहल-ए-दिल के लिए अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद
कि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद
बहुत है ज़ुल्म के दस्त-ए-बहाना-जू के लिए
जो चंद अहल-ए-जुनूँ तेरे नाम-लेवा हैं
बने हैं अहल-ए-हवस मुद्दई भी मुंसिफ़ भी
किसे वकील करें किस से मुंसिफ़ी चाहें
मगर गुज़ारने वालों के दिन गुज़रते हैं
तिरे फ़िराक़ में यूँ सुब्ह ओ शाम करते हैं
बुझा जो रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो दिल ये समझा है
कि तेरी माँग सितारों से भर गई होगी
चमक उठे हैं सलासिल तो हम ने जाना है
कि अब सहर तिरे रुख़ पर बिखर गई होगी
ग़रज़ तसव्वुर-ए-शाम-ओ-सहर में जीते हैं
गिरफ़्त-ए-साया-ए-दीवार-ओ-दर में जीते हैं
यूँही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़
न उन की रस्म नई है न अपनी रीत नई
यूँही हमेशा खिलाए हैं हम ने आग में फूल
न उन की हार नई है न अपनी जीत नई
इसी सबब से फ़लक का गिला नहीं करते
तिरे फ़िराक़ में हम दिल बुरा नहीं करते
गर आज तुझ से जुदा हैं तो कल बहम होंगे
ये रात भर की जुदाई तो कोई बात नहीं
गर आज औज पे है ताला-ए-रक़ीब तो क्या
ये चार दिन की ख़ुदाई तो कोई बात नहीं
जो तुझ से अहद-ए-वफ़ा उस्तुवार रखते हैं
इलाज-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार रखते हैं
-- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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