तुर्की में एर्दोगान की फासिस्ट सत्ता के राजकीय आतंकवाद के ख़िलाफ़ कुर्दिश चित्रकार ज़हरा दोगान की पेन्टिंग I ज़हरा को इस पेंटिंग के कारण 2016 में तीन वर्ष कारावास की सज़ा मिली I लाख दमन के बावजूद एर्दोगान तुर्की के कलाकारों के प्रतिरोध को कुचल नहीं पा रहा है I एर्दोगान अक्सर शिकायत करता है कि कला-साहित्य एक ऐसा क्षेत्र बना हुआ है जहाँ इस्लामी राज्य' अपनी छाप नहीं छोड़ पाया है I
इस चित्र को हम भारत में गहराते फासिस्ट संकट और राजकीय दमन के सन्दर्भ में भी देख सकते हैं I यूँ तो सत्ता पहले से ही नागरिकों के कम्प्यूटरों और फोन-कॉल्स पर नज़र रखती थी, पर अब उसने इसका खुलेआम एलान कर दिया है I मोदी सरकार की आलोचना करने के कारण मणिपुर के एक पत्रकार को रासुका लगाकर जेल में ठूँस दिया गया है Iअनपरा (उ.प्र.) में ठेका मज़दूरों के बारे में रिपोर्ट लिखने वाले एक पत्रकार को संगीन धाराओं में गिरफ्तार कर लिया गया है I छत्तीसगढ़ में राजकीय दमन की खबरों को उजागर करने वाले कई पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, वकीलों पर फर्जी मुक़दमे लाद देने और उन्हें राज्य से बाहर निकलने को मज़बूर करने की खबरें पुरानी हो चुकी हैं I सी.बी.आई., ई.डी., आई.बी.आदि सभी एजेंसियाँ सीधे फासिस्टों के मुख्यालय से निर्देशित हो रही हैं ! शीर्ष स्तर की न्यायपालिका सरकार के सामने साष्टांग दंडवत है I आज सोहराबुद्दीन मामले के भी सभी आरोपी हाई कोर्ट से बरी हो गए I जो जज भ्रष्ट और बिके हुए नहीं हैं, वे भी लोया-गति को प्राप्त नहीं होना चाहते I जाहिर है कि बुर्जुआ जनवाद का रामनामी फासिस्टों के लिए इतना सुविधाजनक हो चुका है कि वे उसे ओढ़े हुए ही अपनी सारी खूनी कारगुजारियों को अंजाम दे रहे हैं ! उधर सडकों पर मॉब लिंचिंग का खूनी खेल बदस्तूर जारी है I अयोध्या में काठ की हाँडी दुबारा न चढ़ पाने और बुलंदशहर में इच्छित नतीज़ा न आ पाने के बावजूद सड़कों पर धार्मिक उन्माद का खूनी खेल फिर से शुरू करने की हर-चन्द कोशिशें अभी भी जारी हैं I
जो बुर्जुआ जनवादी मिजाज़ के "भलेमानस" और लिबरल लोग पाँच राज्यों के चुनावी नतीजों से आश्वस्त दीख रहे हैं, उन्होंने इतिहास से कुछ भी नहीं सीखा है I पहली बात, इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि अंतिम समय तक धर्मोन्माद की लहर उभाड़कर और ई.वी.एम. माता की कृपा से हिन्दुत्ववादी फासिस्ट बाज़ी अपने पक्ष में करने की कोशिश करेंगे I दूसरी बात, फासिस्ट यदि सत्ता में नहीं रहेंगे, तब भी वे सड़कों पर अपना खूनी खेल जारी रखेंगे I पूँजीपति वर्ग जंजीर में बंधे कुत्ते की तरह संकटकाल के लिए फासिस्ट विकल्प को हमेशा तैयार रखेगा I कांग्रेस की नरम केसरिया लाइन भी अंततः धार्मिक कट्टरपंथ की राजनीति के ही काम आयेगी Iक्षेत्रीय पार्टियों द्वारा खेली जाने वाली जातिगत समीकरणों की राजनीति भी अगले चक्र में धर्म की राजनीति को ही बल पहुँचायेगी I यह भी याद रखना चाहिए कि कांग्रेस भी नव-उदारवादी नीतियों को ही लागू करेगी और उसके शासनकाल में भी लाजिमी तौर पर सत्ता के ज्यादा से ज्यादा निरंकुश होते जाने की गति जारी रहेगी I और तब फिर से लोकरंजक नारे देते हुए फासिस्ट भाजपा अपने को विकल्प के रूप में पेश करेगी I
यह ज़रूरी है कि मज़दूर वर्ग अपना स्वतंत्र राजनीतिक पक्ष बुर्जुआ संसदीय राजनीति के दायरे में भी रणकौशलात्मक तौर पर प्रस्तुत करे, पर यह बात भली-भाँति समझ लिया जाना चाहिए कि फासिस्ट पार्टी को चुनावों में हराकर फासिज्म को परास्त नहीं किया जा सकता I फासिज्म पेटी-बुर्जुआ क्लास का एक धुर-प्रतिक्रियावादी रोमानी उभार है, तृणमूल स्तर से संगठित एक सामाजिक आन्दोलन है I उसे, तृणमूल स्तर से मज़दूर वर्ग, अन्य मेहनतक़श वर्गों और मध्य वर्ग के रेडिकल हिस्से का प्रगतिशील सामाजिक आन्दोलन संगठित करके सड़कों पर ही शिकस्त दिया जा सकता है !
(21दिसम्बर, 2018)

No comments:
Post a Comment