Monday, December 31, 2018


परीकथाओं में राजकुमारी अपने पालतू खरगोश से और रसोइया अपने बिल्ले से बातें करता है और वे भी इंसानों की तरह बोलते-समझते हैं I खरगोश और बिल्ला अगर इंसानी जुबान में बात नहीं करते तो कथा आगे ही नहीं बढ़ पाती और बच्चों की कहानी में दिलचस्पी भी नहीं पैदा हो पाती I परीकथाओं में भी जीवन का यथार्थ होता है, पर वह सरल होता है I वह उपयोगी और मूल्यवान होता है, पर बाल-हृदय के लिए होता है I

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो उम्र से बड़े तो हो जाते हैं लेकिन ज़िंदगी की सच्चाइयों की कहानी परीकथाओं की भाषा में सुनना चाहते हैं I ज़िंदगी से उनकी अपेक्षाएँ भी परीकथाओं जैसी ही होती हैं I साहित्य में भी यथार्थ का वे परीकथाओं जैसा चित्रण चाहते हैं I ऐसे लोग आधुनिक जीवन के व्याकरण को समझ नहीं पाते और इसके लिए ताउम्र सज़ाएँ भुगतते रहते हैं I ऐसे लोग गंभीर, तलस्पर्शी साहित्य के मर्म तक भी नहीं पहुँच पाते और एक किस्म की आत्मिक-कलात्मक रिक्तता के साथ पूरा जीवन काट देते हैं I

जीवन में सार्थकता-बोध के लिए सबसे पहले ज़रूरी यह है कि हम परीकथाओं में जीने की आदत छोड़ दें, अनावश्यक यूटोपियाओं का परित्याग करें और यथार्थ की कठोर, ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर चलना सीखें ! उम्र के साथ अगर आदमी का दिलो-दिमाग भी बड़ा न हो जाये तो ज़िंदगी में बेहिसाब तक़लीफें झेलनी पड़ती हैं !

(20दिसम्‍बर, 2018)

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