Wednesday, January 02, 2019


यह है दन्त-नखहीन, सात्विक-शाकाहारी "वामपंथ" ! भद्र-कुलीन जनों का निर्वीर्य "वामपंथ" !!

नसीरुद्दीन शाह की बात तो समझ आती है, पर अब उनका समर्थन करते हुए अधिकांश वाम बुद्धिजीवी भी कह रहे हैं कि हाँ, आज के भारत में डर तो लगता है ! डर, डर और डर ! और गब्बर सिंह ने यूँ ही थोड़े न कहा था कि जो डर गया, समझो मर गया !

अरे भाई ! खाली 'डर-डर' ही चिल्लाते रहोगे, या कुछ लड़ने की तजबीज़ भी सोचोगे ! जितना डरोगे, बर्बर उतना ही डरायेंगे ! गुंडे तुम्हारे घरों में घुसकर बेइज्ज़त करेंगे ! तुमको सड़कों पर रगेदेंगे ! तुम्हारी मानवता की अपीलों पर ठहाके लगायेंगे I तुम्हारे उपवासों और मोमबत्ती जुलूसों से भी कोई फर्क नहीं पडेगा I अरे, कैसे वामपंथी हो जो इतिहास से कुछ भी नहीं सीखा ?

चुनावों में अगर हार भी गए तो भी ये फासिस्ट सड़कों पर अपना उत्पात जारी रखेंगे ! इन्हें चुनावों में हराकर नहीं, सड़कों पर आमने -सामने की लड़ाई में शिकस्त देकर ही पीछे धकेला जा सकता है ! मध्यवर्गीय पीले-बीमार चेहरे वाले उन्माद रोग के शिकार इन लोगों का जो धुर-प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन है, उसका मेहनतकशों और लड़ाकू प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का एक जुझारू प्रगतिशील सामाजिक आन्दोलन खड़ा करके ही मुकाबला किया जा सकता है !

रोने-कलपने, मुर्दा बुर्जुआ संविधान की दुहाई देने, अन्य बुर्जुआ पार्टियों से आस लगाने और इंसानियत की दुहाइयाँ देने की जगह लड़ने के बारे में सोचो I तुम्हारी सुविधाजीविता ने तुम्हें कायर, दब्बू और डरपोंक बना दिया है ! तुम जन से दूर होकर अपने अकेलेपन के निर्जन द्वीप पर निर्जीव किताबों और भुतहा विचारों के साथ जी रहे हो और डरावने दुस्वप्न देखते हुए बौद्धिक प्रलाप कर रहे हो ! डरते हुए चाहे अपने डर के हाथों मरो, या फासिस्टो के हत्यारे दस्तों और उनके द्वारा उकसाई गयी उन्मादी, पागल भीड़ के हाथों -- बात तो एक ही है !

(22दिसम्‍बर, 2018)

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