माओ त्से-तुंग की दो कविताएंं
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बसंत के जाते ही
आती है आँधी और बारिश,
उड़ते हुए हिम के फाहे
स्वागत करते हैं बसंत की वापसी का ।
ऊँची बर्फ़ से ढँकी चट्टान पर
खिलता है एक फूल प्यारा और सुन्दर ।
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प्यारा और सुन्दर वह फूल सिर्फ़ अपने लिए ही नहीं
आवाहन करता है बसंत का,
संतुष्ट है वह बसंत का अग्रदूत बनकर ।
पहाड़ी फूलों का यौवन जब होगा अपनी पूरी उठान पर,
मुस्कुरा उठेगा तब वह
उनके बीच घुल-मिलकर ।
(दिसम्बर 1961)
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-- माओ त्से-तुंग
(यह कविता माओ ने जीवन-संगिनी चियांग-चिंग द्वारा लिए गए एक फ़ोटोग्राफ़ के पीछे लिखी थी )
शाम की गहराती छाया में
खड़े हैं देवदारु के कड़ियल दरख़्त
तेजी से उमड़ते-घुमड़ते हुए
गुज़र रहे हैं तूफ़ानी बादल
एक गहरी शांति धारे हुए ।
परी गुफा में प्रकृति
बिखेर रही है अभिभूत कर देने वाली छटाएँ I
दुर्गम ख़तरनाक ऊँचाइयों पर ही
दिखती है सुन्दरता
अपने अनंत रूपों में ।
(9 सितम्बर 1961)

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