कहानी चाहे जितनी यथार्थवादी हो, उसे बनाने के लिए कल्पना का सहारा तो लेना ही पड़ता है और कहानी के सच को खोलने के लिए कहानी कहने वाले को थोड़ी मदद झूठ की भी लेनी पड़ती है I
मार्खेज ने लिखा है,"कथा का आविष्कार उस दिन हुआ जिस दिन जोनास घर लौटा और अपनी पत्नी से उसने कहा कि उसे तीन दिनों की देरी इसलिए हुई क्योंकि एक व्हेल ने उसे निगल लिया था I"
एक बच्चे के अन्दर का कलाकार उसी दिन पंख खोलने लगता है जब मनहूस स्कूल से छुटकारा पाने के लिए वह पेटदर्द का बहाना बनाना शुरू करता है और इधर-उधर मटरगश्ती करता हुआ देर से घर लौटने के बाद देरी के कारण के तौर पर कोई झूठी कहानी सुना देता है I फिर माँ-बाप नियमों में बंधकर जीने और 'सदा सच बोलने' आदि की नसीहतें दे-देकर बच्चे की सारी कल्पनाशीलता और रचनात्मकता की ह्त्या कर डालते हैं और उसे अपने ही सांचे में ढालकर एक मनहूस नागरिक बना डालते हैं I गौरतलब है कि स्कूल की दमघोंटू मनहूसी से छुटकारा पाने के लिए और अभिभावकीय दमन से बच निकलने के लिए ही बच्चे को अपनी कल्पना-शक्ति से एक कहानी बनानी पड़ती है I यानी मुक्ति की राह निकालने के लिए सृजनशीलता और कल्पना की ज़रूरत अनिवार्यतः होती है !
यथार्थ में कुछ-कुछ जादुई होता ही है, या यूँ कहें कि अक्सर यथार्थ को सटीक ढंग से प्रस्तुत करने के लिए बयान में थोड़ा जादू लाना ही पड़ता है I बच्चे इस बात को नैसर्गिक तौर पर समझते हैं, फिर समाज 'अनलर्निंग' की एक प्रक्रिया से उन्हें गुजारता है और उनकी कल्पनाशीलता और सर्जनात्मकता की हत्या कर देता है I एक अन्यायपूर्ण सामाजिक ढाँचे के बने रहने के लिए यह ज़रूरी होता है कि उस समाज में जीने वाले नागरिकों का बहुलांश कल्पनाशीलता के मामले में ठूंठ हो और सृजनशीलता के मामले में अक्षम हो ! जो कल्पनाशील और सृजनशील नहीं होता वह लकीर का फ़कीर होता है, कायर और समझौतापरस्त होता है I
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( नोट -- इस संक्षिप्त टिप्पणी को पढ़कर कोई सवाल उठा सकता है कि किसी भी प्रकार के सृजन और संधान के लिए अनुशासन की ज़रूरत तो होती ही है ! मेरा कहना है कि बिलकुल होती है, पर वह अनुशासन ऊपर से लादा गया अनुशासन नहीं होता बल्कि सृजन और संधान की ज़रूरत से पैदा हुआ अनुशासन होता है ! दूसरा सवाल कोई पूछ सकता है कि जो सत्ता की सेवा में सन्नद्ध कलाकार होता है, वह भी तो सृजनशील और कल्पनाशील होता है ! मेरा कहना है कि लोभ-लालच का भौतिक प्रोत्साहन भी एक किस्म की मिथ्या-सृजनशीलता, सृजनशीलता का मिथ्याभास, या यूँ कहें कि सृजनशील होने की मिथ्याभासी चेतना पैदा करता है, पर वह वास्तविक सृजनशीलता नहीं होती ! सृजनशीलता हमेशा सामाजिक होती है ! )
(1नवम्बर,2018)
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एक कामरेड "सद्गृहस्थ" शब्द का इस्तेमाल गाली की तरह करते हैं ! "अरे, वो एक सद्गृहस्थ है," यह कहते समय उनके चेहरे पर जो व्यंग्य और हिकारत होती है, उसे सुनकर कोई सद्गृहस्थ धरती में समा जाता, पर नहीं समाएगा क्योंकि सद्गृहस्थों की पाचन-शक्ति भी गजब की होती है ! "सद्गृहस्थ" वह प्राणी होता है, जो नियम से दफ़्तर जाता है और समय से घर वापस आता है, सस्ती सब्जी और गारंटीशुदा असली दूध लाने के लिए 5 किलोमीटर जाता है, पेट ख़राब होने के डर से बाज़ार का गजर-मजर बहुत कम खाता है (और फिर भी उसे गैस-बदहजमी-पाइल्स वगैरह की शिकायत हमेशा रहती है), एलोपैथी के साइड-इफेक्ट्स बताता रहता है और कुछ होमियोपैथी दवाएँ और कुछ आयुर्वेदिक चूरन वगैरह फांकता रहता है, अपने घर की खिड़कियों के परदे हमेशा खींचता रहता है, अपने जवान होते बेटे-बेटियों पर कभी भरोसा नहीं करता, परिवार के किसी अनिष्ट की आशंका से हमेशा भयभीत रहता है, आन्दोलन-हड़ताल वगैरह से हमेशा कोसों दूर रहता है, सरकार से लाख शिकायत हो उसके ख़िलाफ़ पब्लिक में कुछ बोलना महापाप समझता है, मोहल्ले में माता के जगराते का चन्दा माँगने वाले गुण्डों से बहुत डरता और चिढ़ता है पर मुस्कुराकर उनका स्वागत करता है और चन्दा भी देता है, कविता-कहानी लिखने को हद दर्जे का पागलपन मानता है और लेखकों को पागल या परग्रहीय प्राणियों जैसा अजूबा मानता है, कामरेडों के घर आने को घर पर गिद्ध बैठ जाने जैसा अशुभ और अपने बच्चों के लिए अनिष्टकारी मानता है, मोहल्ले के हर भंडारे में भगोना-कैसेरोल लेकर जाता है और तीन टाइम का जुगाड़ कर आता है, अखबारों में सिर्फ अपराध समाचार और स्थानीय खबरें पढ़ता है, हमेशा बचत और एक घर बना लेने के बारे में सोचता है और अक्सर लम्बी साँसे लेकर कहता रहता है कि 'हे भगवान, क्या ज़माना आ गया है !'

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