रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
-- ग़ालिब
******
चचा का कोई जवाब नहीं ! सदियाँ बीत गयीं, पर ज़िंदगी का सबक देते रहने से बाज़ नहीं आते ! देखिये भला, क्या फ़रमाते हैं :
अहले-बीनिश को है तूफ़ाने-हवादिस मकतब
लतमा-ए मौज कम अज़ सीली-ए उस्ताद नहीं
(जिसके पास दृष्टि है, उसके लिए आफ़त और बदकिस्मती के तूफ़ान ही पाठशाला होते हैं और लहरों के थपेड़े गालों पर उस्ताद के चांटों की तरह होते हैं !)
-- ग़ालिब
********

No comments:
Post a Comment