Thursday, November 01, 2018


जायनवादी फासिस्ट विचारों के प्रभाव में इस्रायल के आम नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा भी इसक़दर बर्बर और रुग्णमानस हो चुका है कि वह न सिर्फ मासूम फिलिस्तीनी बच्चों पर सैनिकों की हिंसा और फिलिस्तीनी बस्तियों पर बमबारी पर हर्षोन्माद से भर जाता है, बल्कि खुद भी गिरोह बनाकर जंगली कुत्तों की तरह फिलिस्तीनी बच्चों और स्त्रियों पर हमले करता है और हत्याएँ करता है I कुछ समय तक जर्मन लोगों में भी हिटलर ने ऐसा ही यहूदी-विरोधी हिंसक उन्माद भर दिया था I जब उनका होश ठिकाने आया तबतक काफ़ी देर हो चुकी थी !

दिल्ली में मदरसे में पढ़ने वाले 8 साल के मासूम मुहम्मद अजीम की जिसतरह उसी की उम्र के आसपास के हिन्दू बच्चों ने जघन्य ह्त्या कर दी, यह भीड़ की हिंसा का नया आयाम है ! यह घटना बताती है कि धार्मिक कट्टरपंथियों ने नफ़रत और उन्माद का ज़हर इस क़दर समाज के पोर-पोर में भर दिया है कि बच्चों का दिमाग तक विषाक्त हो चुका है I 16 वर्षों पहले जो गुजरात में हुआ था, वह देश के किसी हिस्से में हो सकता है I नफ़रत की फसल अब पूरे देश में लहलहा रही है !

हमारा समाज बीमार, बेहद गंभीर रूप से बीमार है ! हमारे बच्चे भी धर्मोन्माद की इस हत्यारी मानसिक बीमारी की चपेट में आ चुके हैं ! लेकिन अभी भी समय है ! हो सके तो बच्चों को तो बचा लें, भविष्य को तो बचा लें !

धार्मिक कट्टरपंथी फासिज्म के विरुद्ध तृणमूल स्तर से एक जुझारू प्रगतिशील सामाजिक आन्दोलन खड़ा करने के अतिरिक्त दूसरा कोई भी रास्ता नहीं है !

(26अक्‍टूबर,2018)

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