Friday, December 05, 2014

पूँजी

कारखानों में खेतों में करती है श्रमशक्ति की चोरी
वह मिट्टी में ज़हर घोलती है
हवा से प्राणवायु सोखती है
ओजोन परत में छेद करती है
और अार्कटिक की बर्फीली टोपी को सिकोड़ती जाती है।
वह इंसान को अकेला करती है
माहौल में अवसाद भरती है
मण्‍डी के जच्‍चाघर में राष्‍ट्रवाद का उन्‍माद पैदा करती है
स्‍वर्ग के तलघर में नर्क का अँधेरा रचती है।
आत्‍मसंवर्धन के लिए वह पूरी पृथ्‍वी पर
कृत्‍या राक्षसी की भाँति भागती है
वह अनचीते पलों में
दिमाग पर चोट करती है
युद्धों की भट्ठी में मनुष्‍यता को झोंकती है।
वह कभी मादक चाहत तो कभी
आत्‍मघाती इच्‍छा की तरह दिमाग में बसती है
युद्ध के दिनों में हिरोशिमा
और शान्ति के दिनों में
भोपाल रचती है।

-- कविता कृष्‍णपल्‍लवी

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