मेरा तो जनता के पक्ष में खड़ा होने वाले सभी कवियों, लेखकों, कलाकारों से साफ़-साफ़, दो टूक शब्दों में कहना है कि सभी सरकारी अकादमियों, जयपुर लिटफेस्ट, साहित्य आजतक जैसे आयोजनों, विविध साहित्य महोत्सवों और भारंगम आदि-आदि का, और विश्वविद्यालयों के उन सभी आयोजनों का पूर्ण बहिष्कार किया जाना चाहिए जिनमें संघी कुलपति और भाड़े के टट्टू नौकरशाह मंच पर बिराजे हों। इस फ़ासिस्ट समय में सत्ता और पूँजी के सभी प्रतिष्ठानों और आयोजनों से पूरी तरह दूरी बरतना भी प्रतिरोध का एक कारगर तरीक़ा है।
अगर आप एक सच्चे लेखक हैं तो आपकी हैसियत आपके लेखन से तय होगी, न कि सरकार और सेठों की संस्थाओं के दिये गये ओहदों, ईनामों, पदवियों से और उनके रंगारंग जलसों में सजधजकर मंचों को सुशोभित करने से। हमें अपनी बात जनसमुदाय तक अपने वैकल्पिक माध्यमों से पहुँचानी होगी और एक फ़ासिस्ट समय में, लाजिमी तौर पर सड़क पर भी उतरना होगा। अपने दिलों से जेल और मुकदमों वगैरह का डर निकाल देना भी ज़रूरी है। राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में तो ऐसा बहुत सारे उन लेखकों और पत्रकारों ने भी किया था जो वामपंथी नहीं थे। फ़ासिस्ट, और सभी सत्ताधारी, इसी बात से तो डरते हैं कि लोग कहीं उनसे डरना बन्द न कर दें।
फ़ासिस्ट अंधेरगर्दी और आतंक राज के ख़िलाफ़ साहस के साथ आवाज़ उठाना आज हमारा बुनियादी कर्तव्य और दायित्व है। हमारे यशस्वी और साहसी पूर्वज लेखकों और कलाकारों ने हमें यही राह दिखलाई है। जिन लोगों ने बीसवीं सदी के फ़ासिज़्म विरोधी प्रतिरोध संघर्षों और राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलनों के इतिहास को पढ़ा है वे इस सच्चाई से भलीभाँति परिचित हैं।
(9 Jan 2026)

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