Wednesday, September 30, 2020


 कभी ज़िन्दगी को किसी एक महाकाव्यात्मक उपन्यास या किसी बीहड़ यायावर ज़िन्दगी का अपनी भाषा में अनुवाद बनाने को जी चाहता था । फिर लगा कि इसे अपने ढंग की एक बेढब-अनगढ़ कहानी की तरह लिखते चले जाना चाहिए । फिर ख़याल आया कि इतनी भी फुरसत कहाँ ! बेहतर यही होगा, और यही मुमकिन भी है कि इसे बस देश-दुनिया के तरह-तरह के किस्से सुनाने की तरह ख़र्च कर दिया जाए । 

सुने हुए किस्से हमेशा लोगों को अपने-अपने तरीके से याद आते हैं, उनकी तफ़सीलात और  वाक़यात को लेकर लोग अक्सर शक़ में पड़े रहते हैं और हक़ीक़त, सपनों और कल्पनाओं की भूल-भुलैया में भटकते रहते हैं । इसतरह लोगों में अगर सच की खोज में भटकने, सपने देखने और कल्पनाओं की उड़ान भरने की थोड़ी चाहत या आदत पैदा हो जाये तो अच्छा ही रहेगा ।

ज़माने पहले एक कामरेड ने यह बात कही ... यूँ ही राह चलते -चलते ..

लीजिए ! अब मैं ख़ुद शक़ में पड़ गयी हूँ कि यही बात कही थी न !

(30 Sep 2020)


................................................


भारत का इतिहास देखिए, पूरी दुनिया का इतिहास देखिए । किसी आततायी सत्ता के विरुद्ध हक़ और इंसाफ़ की हर लड़ाई क़ानून और अदालती आदेशों की चौहद्दी में क़ैद रहकर नहीं, बल्कि उनका अतिक्रमण करके लड़ी गयी है। नागरिक अवज्ञा आन्दोलन अन्यायी सत्ता का आज्ञापालन नहीं किया करते ।

(8 oct. 2020)


No comments:

Post a Comment