'तारसप्तक' के कवि गिरिजा कुमार माथुर की यह कविता पढ़िए, शायद अबतक न पढ़ी हो । इसे मैंने अग्रज कवि साथी Vishnu Nagar की वाल से लिया है । उनका हार्दिक आभार!
क्रांति की भूमिका
सिर्फ अपने ही लिए जब जीने लगते हैं आदमी
तब उनकी हर चीज बिकाऊ हो जाती है
जब जोखिम उठाने की आदत मिट जाती है
हर कौम मर जाती है
जब अपनी कमजोरियाँँ सुनने से डर लगता है
जब सच को दबाना ही नीति बन जाती है
जब झूठ का ही सिक्का कामयाबी से चलता है
तब ईमानदारी खतरनाक हो जाती है
यह माना कि लोग बहुत सहनशील होते हैं और दुनिया हर जुल्म जरा जल्दी भूल जाती है
पर एक बार फिर भी कभी भूलती नहीं हैं दोस्त
सब्र करने की हद भी एक दिन टूट जाती है
जब कुछ नहीं होता, तब क्रांति हो जाती है ।
('हिंदी जगत ' के अप्रैल-जून 2020 अंक से साभार)

No comments:
Post a Comment