Friday, October 11, 2019

एक मुद्दे पर अपने विचारों को एकदम दोटूक साफ़ कर देना चाहती हूँ!


ये जितने मुसंघी और कठमुल्ले हैं, जितने भी वहाबी-सलाफ़ी या शिया धार्मिक कट्टरपंथ के खुले-छिपे अनुगामी हैं, ये आम मुस्लिम अल्पसंख्यक आबादी और आम मेहनतकश जनों के वैसे ही दुश्मन हैं, जैसे हिन्दुत्ववादी धार्मिक कट्टरपंथी ! ये भी वैसे ही फासिस्ट हैं जैसे संघी हिन्दुत्ववादी ! फर्क सिर्फ इतना है कि भारत में हिन्दुत्ववादियों का बहुसंख्यावादी फासिज्म ही मुख्य चुनौती और मुख्य खतरा हो सकता है, अल्पसंख्यकों का धार्मिक कट्टरपंथी फासिज्म नहीं ! हिन्दुत्ववादी फासिज्म ही यहाँ सत्ता पर काबिज हो सकता है ! पूँजीपति वर्ग अपनी हित-सेवा के लिए उन्हींपर भरोसा कर सकता है और तमाम धार्मिक अल्पसंख्यकों को अलगाव में डालने, उनका 'घेटोकरण' करने और उनपर आतंक-राज स्थापित करने का काम हिंदुत्ववाद ही कर सकता है ! भारत में 'हिन्दू राज' स्थापित करने का ही नारा दिया जा सकता है, 'इस्लामी राज' का नहीं !

लेकिन फिर भी भारत में इस्लामी कट्टरपंथ के घोर जन-विरोधी और फासिस्ट चरित्र को समझना होगा ! हिन्दू बहुसंख्यावादी फासिज्म का मुकाबला सिर्फ और सिर्फ, तर्कणा और सेकुलरिज्म की ज़मीन पर खड़ा होकर ही किया जा सकता है ! सिर्फ और सिर्फ, एक सच्चे सेक्युलर और सच्चे जनवादी भारत में ही (और समग्र रूप में ऐसा सच्चा जनवाद तो अब सिर्फ समाजवाद ही दे सकता है) धार्मिक अल्पसंख्यक सुरक्षित रह सकते हैं और बराबरी और आज़ादी के साथ ज़िंदगी बसर कर सकते हैं ! लेकिन जितने भी मुसंघी कट्टरपंथी हैं, वे खुद ही सेकुलरिज्म और आधुनिकता का विरोध करते हैं, एक से एक सड़ी-गली और अहमक़ाना बातें करते हैं, जहालत भरे फ़तवे जारी करते हैं, कम पढी-लिखी गरीब मुस्लिम आबादी की बहुसंख्या को धार्मिक संकीर्णता और जहालत के जाल में फंसाते हैं और हिन्दुत्ववादियों को इस प्रचार का मौक़ा देते हैं कि सारे मुस्लिम होते ही कट्टर और जाहिल हैं ! ये मुसंघी नास्तिकों से उतनी ही नफ़रत करते हैं जितने हिन्दू धार्मिक कट्टरपंथी ! जाहिर सी बात है कि एक सेक्युलर भारत में ही सभी धार्मिक अल्पसंख्यक सुरक्षित रह सकते हैं, लेकिन मुसंघी सेकुलरिज्म को धर्म का दुश्मन बताते हैं, जबकि सेकुलरिज्म किसी भी धर्म के व्यक्ति को आस्था और पूजा-पाठ के निजी अधिकार को पूरी मान्यता देता है I वह सिर्फ सामाजिक-राजनीतिक जीवन से धर्म को अलग, निजी दायरे में रखने की बात करता है ! सेकुलरिज्म को कुफ़्र घोषित करते हुए मुसंघी मुस्लिम आबादी को राजनीतिक-सामाजिक दायरे में धर्म के झंडे तले संगठित करते हैं ! अब भारत में 'इस्लामी राज्य' तो बनने से रहा, लेकिन धार्मिक आधार पर संगठित मुस्लिम राजनीति का पूरा-पूरा लाभ हिन्दुत्ववादियों को मिलता है और वे ऐसा ज़हरीला प्रचार कर पाने में सफल हो जाते हैं कि हिन्दुस्तान के मुसलमान यहाँ इस्लामी राज्य स्थापित करना चाहते हैं, अतः भारत में 'हिन्दू राज' की स्थापना ही एकमात्र रास्ता है ! इसतरह, मुसंघी फासिज्म संघी फासिज्म का ही हित साधता है, यह उसी की सेवा करता है ! मुसंघियों की बातें हिन्दुत्ववादियों को अपने उन्मादी प्रचार को हवा देने में भरपूर मदद करती हैं ! भारतीय समाज और राजनीति में मुसंघी विचार संघी विचार के पूरक हैं, सहायक हैं !

इस्लामी धार्मिक राज का आदर्शीकरण करने वाले ये मुसंघी वास्तव में पश्चिमी साम्राज्यवाद के घृणित टट्टू होते हैं ! ये सऊदी अरब के बर्बर, विलासी और भ्रष्ट तानाशाहों के ख़िलाफ़ कभी कुछ नहीं बोलते जो अमेरिका की गोद में बैठे हुए यमन के अपने ही धर्म के लोगों पर बमबारी करते हैं, लीबिया, इराक और सीरिया की तबाही में अमेरिका का साथ देते हैं और फिलिस्तीनियों का बर्बर दमन करने वाले जायनवादियों से भी अंदरखाने समझौते करते हैं ! इनके पास इसका कोई जवाब नहीं है कि तमाम इस्लामी राज्य एक-दूसरे से ही क्यों लड़ते रहते हैं, इस्लामी देशों के तानाशाह अपने ही देशों की समान धर्म वाली आम जनता पर जुल्म क्यों ढाते हैं और तमाम तेल-धनी देशों के शेख और शाह पश्चिमी साम्राज्यवादियों के चरण क्यों चूमते रहते हैं ?

हिन्दुत्ववादी बहुसंख्यावादी फासिस्ट लहर का प्रभावी मुकाबला तभी किया जा सकता है जब ग्रासरूट स्तर पर धार्मिक और जातिगत पार्थक्य की दीवारों को गिराकर व्यापक मेहनतकश आबादी की जुझारू एकजुटता क़ायम की जाए ! आम ग़रीब मुस्लिम आबादी को धार्मिक दिमागी गुलामी, संकीर्णता और जहालत के जाल में फंसाकर मुस्लिम धार्मिक कट्टरपंथी हिन्दुत्ववादी फासिज्म के विरुद्ध व्यापक आम आबादी की लड़ाई को कमजोर कर रहे हैं, आम मुसलमानों को फासिज्म का चारा बना रहे हैं और हिन्दुत्ववादियों के अहम मददगार की भूमिका निभा रहे हैं !

आम मुस्लिम आबादी को यह बात समझनी ही होगी कि भारत में एक धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के तौर पर अपनी आज़ादी, बराबरी और अधिकारों के लिए संघर्ष अगर धार्मिक झंडे तले संगठित होकर करने की कोशिश वे करेंगे तो कत्तई कामयाब नहीं हो सकेंगे ! उलटे वे बहुसंख्यावादी फासिस्टों के ही हाथ मज़बूत करेंगे ! वे सिर्फ और सिर्फ, सेकुलरिज्म और समाजवाद के झंडे तले संगठित होकर ही अपना लक्ष्य हासिल कर सकते हैं ! केवल समाजवाद ही सच्चा सेक्युलर और सच्चा जनवादी समाज होता है, जहां सभी के बराबर अधिकार होते हैं, राजनीति और सामाजिक जीवन में धर्म का कोई दखल नहीं होता, लेकिन सभी नागरिकों को निजी विश्वास और पूजा-पाठ की पूरी आज़ादी होती है !

आज ज़रूरत इस बात की है कि मुस्लिम आबादी के बीच से ऐसे साहसिक, तार्किक और प्रबुद्ध लोग आगे आयें जो मुसंघी कट्टरपंथियों की हर रंग-रूप की राजनीति के ख़िलाफ़ बुलंद आवाज़ में बोलें औए व्यापक आम मेहनतकश मुस्लिम आबादी के बीच हर प्रकार की धार्मिक कट्टरपंथ की राजनीति के विरुद्ध प्रचार करते हुए जुझारू सेकुलरिज्म की आवाजों को बुलंदी और ताक़त दें !

(9अक्‍टूबर, 2019)

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