बहुज्ञ मार्क्सवादी विद्वान, भारत में मार्क्सवादी इतिहास-लेखन के जनक, गणितज्ञ, सांख्यिकीविद, मुद्राशास्त्री, भाषाविज्ञानी और आनुवंशिकी-विशेषज्ञ दामोदर धर्मानंद कोसम्बी (31 जुलाई 1907-29जून 1966) के 114वें जन्मदिवस के अवसर पर
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"मार्क्सवाद को, राजनीतिक इष्टसिद्धि या पार्टी एकजुटता के लिए भी, गणित जैसी ग़ैर-लचीली नियम-निष्ठता में घटाकर नहीं देखा जा सकता I न ही इसे खराद मशीन पर काम करने जैसी किसी मानक तकनीक की तरह लिया जा सकता है I कोई भी सामग्री, जब मानव समाज में उपस्थित होती है, तो उसमें अनंत विविधता होती है, प्रेक्षक खुद ही प्रेक्षित आबादी का हिस्सा होता है, जिसके साथ वह तीव्र और अन्योन्य पारस्परिक अंतर्क्रिया करता है I इसका मतलब यह हुआ कि सिद्धांत का सफल क्रियान्वयन विश्लेषणात्मक शक्ति के विकास की माँग करता है, परिस्थिति-विशेष में सारभूत उपादानों को छाँट लेने की क्षमता की माँग करता है I यह चीज़ सिर्फ़ किताबों से नहीं सीखी जा सकती I इसे सीखने का एक तरीका यह है कि हम जन-समुदाय के प्रमुख हिस्सों के निरंतर संपर्क में रहेंI एक बुद्धिजीवी के लिए, इसका मतलब यह है कि वह कम से कम कुछ महीने अपने जीविकोपार्जन के लिए शारीरिक श्रम करने में, मज़दूर वर्ग के एक सदस्य के रूप में ख़र्च करे; उससे श्रेष्ठतर प्राणी के रूप में नहीं, एक सुधारवादी के रूप में भी नहीं, और झुग्गी-झोंपड़ियों का मुआयना करने जाने वाले एक भावुकतावादी "प्रगतिशील" के रूप में भी नहीं I मज़दूरों और किसानों के बीच, उन्हींके बीच के एक आदमी की तरह जीने से हासिल यह अनुभव उसके बाद नियमित रूप से ताज़ा करते रहना होगा और अपने अध्ययन की रोशनी में उनका मूल्यांकन करते रहना होगा I जो लोग ऐसा करने के लिए तैयार हैं, उनके लिए ये निबंध कुछ सहायक सिद्ध हो सकते हैं और सोचने के लिए कुछ सामग्री मुहैय्या कर सकते हैं I"
(Introduction, Exasperating Essays: Exercises in the Dialectical Method)
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मार्क्सवाद के कुछ विरोधी इसे 19वीं सदी के पूर्वाग्रहों पर आधारित एक पुराना पड़ चुका आर्थिक जड़सूत्र कहकर खारिज करते हैं। मार्क्सवाद कभी भी जड़सूत्र नहीं था। महज़ 19वीं सदी में सूत्रबद्ध किये जाने के कारण यह पुराना पड़ चुका और गलत नहीं हो जाता, ठीक वैसे ही जैसे गौस, फैराडे और डार्विन की खोजें, जो अब विज्ञान का हिस्सा बन चुकी हैं। तार्किकता का तकाज़ा है कि जो लोग इसके 19वीं सदी के पुरानेपन पर नाकभौं चढ़ाते हैं उन्हें मिल, बर्क और हरबर्ट स्पेंसर को अपने पक्ष में उद्धृत नहीं करना चाहिए, और न ही इससे भी कहीं ज़्यादा पुरानी और निश्चित तौर पर ज़्यादा कालातीत हो चुकी भगवद् गीता में आस्था रखनी चाहिए। आम तौर पर इसके बचाव में कहा जाता है कि गीता और उपनिषद भारतीय हैं; जबकि मार्क्सवाद जैसे विदेशी विचार आपत्तिजनक हैं। आम तौर पर ऐसे तर्क अंग्रेज़ी में, यानी शिक्षित भारतीयों के बीच प्रचलित विदेशी भाषा में, और ऐसे लोगों द्वारा दिये जाते हैं जो विदेशियों द्वारा भारत में ज़बर्दस्ती लागू की गयी उत्पादन प्रणाली (बुर्जुआ प्रणाली) के तहत जीते हैं। इसलिए आपत्ति विदेशी मूल से उतनी नहीं लगती जितनी स्वयं उन विचारों के प्रति लगती है जिनसे वर्गीय विशेषाधिकार खतरे में पड़ सकते हैं। कहा जाता है कि मार्क्सवाद हिंसा पर, वर्ग-युद्ध पर आधारित है जिसमें आजकल श्रेष्ठ जन विश्वास नहीं करते हैं। वैसे वे यह घोषणा भी कर सकते हैं कि मौसमविज्ञान तूफानों की भविष्यवाणी करके उन्हें प्रोत्साहन देता है। मार्क्सवाद की किसी भी कृति में युद्ध के लिए उकसावा और बेवजह हत्याओं के पक्ष में शब्दाम्बरपूर्ण तर्क ऐसे नहीं हैं जिनकी दिव्य गीता में ऐसी बातों से रत्तीभर भी तुलना की जा सकती हो।
— दामोदर धर्मानन्द कोसम्बी
‘‘एग्ज़ैसपरेटिंग एसेस’’ की भूमिका से (1957)
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"भारत में हर जगह, किसी न किसी तरीके से, सामन्ती सम्पदा या तो पूँजी में तब्दील हो चुकी है, या फिर तेज़ी से तब्दील होती जा रही है I ( इतिहास में ज्ञात प्रत्येक सामन्तवाद, अंतिम विश्लेषण में, आदिम दस्तकारी उत्पादन, और भू-स्वामित्व की विशेष किस्म पर आधारित होता है I इनमें से पहला, भारत में अब बुनियादी चीज़ नहीं रह गया है, और दूसरा मौजूद ही नहीं है I ) आज के समय में सामन्तवाद से लड़ने की बात करना डायनासोर से लड़ने की बात करने के समान होगा I बल-प्रयोग के मेकेनिज्म का कोई भी हिस्सा अब सामन्ती हाथों में नहीं रह गया है I अपने संघटन के हिसाब से आज की विधायिका बुर्जुआ (और निम्न-बुर्जुआ) है I सशस्त्र बल, पुलिस, न्यायपालिका -- ये सभी के सभी सीधे बुर्जुआ नियंत्रण के अधीन हैं, जबकि पहले ये सारे काम सामन्ती कर-उगाही करने वाले अमलों-मुलाज़िमों द्वारा, या ख़ुद सामन्त मालिकों के द्वारा ही निपटाए जाते थे I"
-- डी. डी. कोसम्बी
(On The Class Structure of India,1954)

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